पिछली पोस्ट पर कई टिप्पणियां भय के पक्ष में थीं। बालक को भय दिखा कर साधा जाता है। यह भी विचार व्यक्त किया गया कि विफलता का भय सफलता की ओर अग्रसर करता है – अर्थात वह पॉजिटिव मोटीवेटर है। पता नहीं। लगता तो है कि टिप्पणियों में दम है। भय से जड़ता दूर होतीContinue reading “भय और अज्ञान की उत्पादकता”
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भय विहीन हम
किसका भय है हमें? कौन मार सकता है? कौन हरा सकता है? कौन कर सकता है जलील? आभाजी के ब्लॉग पर दुष्यंत की गजल की पंक्तियां: पुराने पड़ गए डर, फेंक दो तुम भी ये कचरा आज बाहर फेंक दो तुम भी । मुझे सोचने का बहाना दे देती हैं। दैवीसम्पद की चर्चा करते हुयेContinue reading “भय विहीन हम”
वर्तमान पीढ़ी और ऊब
सृजन की प्रक्रिया धीमी और श्रमसाध्य होती है। और जो भी धीमा और श्रमसाध्य होता है उसमें ऊब होती है। पहले की पीढ़ियां ऊब को झेल कर भी कार्यरत रहने में सक्षम थीं। पर आजकल लोग ऊब से डरते हैं। नौजवानों को अकेलेपन से डर लगता है। उन्हें पुस्तकालय में समय काटना हो तो वेContinue reading “वर्तमान पीढ़ी और ऊब”
