जवाहिर लाल नहीं रहा!


पिछले सप्ताह इलाहाबाद गया था। शिवकुटी। गंगा किनारे तो नहीं गया, पर गड्डी गुरु (वीरेंद्र वर्मा) को मेरे आने का पता चला था तो मिलने चले आये थे घर पर। गड्डी गुरू से ही पता चला बाकी लोगों के बारे में – वे जो मेरे नित्य के कछार भ्रमण के साथी थे। रावत जी कहीं बाहरContinue reading “जवाहिर लाल नहीं रहा!”

कोहरा और भय


सौन्दर्य और भय एक साथ हों तो दीर्घ काल तक याद रहते हैँ। सामने एक चीता आ जाये – आपकी आंखों में देखता, या एक चमकदार काली त्वचा वाला फन उठाये नाग; तो सौन्दर्य तथा मृत्यु को स्मरण कराने वाला भय; एक साथ आते हैं। वह क्षण आप जीवन पर्यन्त नहीं भूल सकते। घने कोहरेContinue reading “कोहरा और भय”

चेत राम


मैं उन्हे गंगा किनारे उथले पानी में रुकी पूजा सामग्री से सामान बीनने वाला समझता था। स्केवेंजर – Scavenger. मैं गलती पर था। कई सुबह गंगा किनारे सैर के दौरान देखता हूं उन्हे एक सोटा हाथ में लिये ऊंचे स्वर में राम राम बोलते अकेले गंगा के उथले पानी में धीरे धीरे चल कर पन्नियों,Continue reading “चेत राम”

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