मेरी चाय की दुकान की सोच


अदरक, कालीमिर्च, चायमसाला और चायपत्ती प्रति कप कितनी मिलानी है और दूध का प्रयोग किस प्रकार करना है कि दूध फटे नहीं — यह सब इतना कर लिया है कि एक थीसिस लिख सकता हूं। और बात केवल चाय बना सकने की नहीं है। चाय प्रेम भी प्रकृति प्रेम से कम नहीं है।

वोटदान


विपक्षी गठबंधन के वालेण्टियर हमारी पर्ची ले कर दौड़ भाग कर हमारा बूथ पता कर आये। लाइन में खड़ा भी कर दिया। बुआ-जीजी-फूफा-जीजा को प्रणाम नमस्कार भी किया। हमें भाजपा वाला कोई कलाकार नहीं दिखा। उन्ही कलाकारों के बल पर मोदीजी सरकार बनाने चले हैं।

आखिर सुंदरलाल आ ही गये!


“हां, भीड़ त रही। लहाई क बैठि ग रहे।” सुंदर साठ से ज्यादा उम्र का है। लम्बी दूरी की ट्रेन में, बिना आरक्षण की बोगी जिसमें लोग ठुंसे रहते हैं, उसमें भीड़ उसके लिये कोई बहुत असुविधा की बात नहीं है।

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