सर्विसेज


मेरी पत्नीजी अपने परिवेश से जुड़ना चाहती थीं – लोग, उनकी समस्यायें, मेला, तीज-त्योहार आदि से। मैने भी कहा कि बहुत अच्छा है। पर यह जुड़ना किसी भी स्तर पर पुलीस या प्रशासन से इण्टरेक्शन मांगता हो तो दूर से नमस्कार कर लो। इस बात को प्रत्यक्ष परखने का अवसर जल्द मिल गया। वह वर्दीContinue reading “सर्विसेज”

एक (निरर्थक) मूल्य-खोज


नैनीताल के हॉलीडे होम के स्यूट में यह रूम हीटर मुंह में चमक रहा है, फिर भी अच्छी लग रही है उसकी पीली रोशनी! मानो गांव में कौड़ा बरा हो और धुंआ खतम हो गया हो। बची हो शुद्ध आंच। मेरी पत्नीजी साथ में होतीं तो जरूर कहतीं – यह है स्नॉबरी – शहरी परिवेशContinue reading “एक (निरर्थक) मूल्य-खोज”

लल्लू


हमें बताया कि लोहे का गेट बनता है आलू कोल्ड स्टोरेज के पास। वहां घूम आये। मिट्टी का चाक चलाते कुम्हार थे वहां, पर गेट बनाने वाले नहीं। घर आ कर घर का रिनोवेशन करने वाले मिस्तरी-इन-चार्ज भगत जी को कहा तो बोले – ऊंही त बा, पतन्जली के लग्गे (वहीं तो है, पतंजलि स्कूलContinue reading “लल्लू”

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