वह तब नहीं था, जब मैं टेम्पो में गोविन्द पुरी में बैठा। डाट की पुलिया के पास करीब पांच सौ मीटर की लम्बाई में सड़क धरती की बजाय चन्द्रमा की जमीन से गुजरती है और जहां हचकोले खाती टेम्पो में हम अपने सिर की खैरियत मनाते हैं कि वह टेम्पो की छत से न जाContinue reading “गुल्ले; टेम्पो कण्डक्टर”
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करछना की गंगा
मैने देखा नहीं करछना की गंगा को। छ महीने से मनसूबे बांध रहा हूं। एक दिन यूं ही निकलूंगा। सबेरे की पसीजर से। करछना उतरूंगा। करछना स्टेशन के स्टेशन मास्टर साहब शायद किसी पोर्टर को साथ कर दें। पर शायद वह भी ठीक नहीं कि अपनी साहबी आइडेण्टिटी जाहिर करूं! करछना अकेले ही चल दूंगाContinue reading “करछना की गंगा”
मोहम्मद यूसुफ धुनकर
मेरे मोहल्ले के पास जहां खंडहर है और जहां दीवार पर लिखा रहता है “देखो गधा पेशाब कर रहा है”; वहां साल में नौ महीने जानी पहचानी गंघ आती है पेशाब की। बाकी तीन महीने साफ सफाई कर डेरा लगाते हैं रुई धुनकर। नई और पुरानी रुई धुन कर सिलते हैं रजाई। मैं रुई धुनContinue reading “मोहम्मद यूसुफ धुनकर”
