दिनेश पगला



सवेरे मडैयाँ डेयरी का दृश्य। दूध के बाल्टों, ड्रम तथा दूध देने आये किसानों से भरी जगह के बीच छोटे से स्पेस में वह उछल कर, आगे कूद कर, हाथ लहरा कर, नमस्कार कर और मेरे बारे में पता चलने पर मुझे बार बार चरण छूने का प्रयास कर जो कुछ कर रहा था, वह बहुत रोचक था। डेयरी के उस दूध कलेक्शन सेण्टर पर उजाला बहुत ज्यादा नहीं था। चित्र बहुत साफ नहीं आये। एक छोटे वीडियो में उसकी आकृति भी धुंधली है। पर उसका चरित्र बहुरंगी था।

पास के गांव का रहने वाला है वह। नाम है दिनेश बिंद। मुझे चलते समय वह अपना परिचय देता है – आप को कौनों काम हो, पता कर लीजियेगा। लोग मुझे दिनेश पगला के नाम से जानते हैं। हर कोई मेरे बारे में बता देगा।

डेयरी के उस मेक-शिफ्ट रंगमंच पर जो प्रहसन वह कर रहा था उसकी स्क्रिप्ट में कोई ट्रक या वाहन था। उसका यह क्लीनर। कट्टा लहराते लुटेरे थे और इसने मालिक का “इतना-इतना (वह हाथ से बहुत मोटी गड्डी नोटों की बना कर दिखाया)” पैसा बचा लिया। उस प्रहसन से जो निकल कर आया वह यह कि दिनेश पगला ईमानदार, कर्मठ और दिलेर है।

दिनेश ‘पगला’ बिंद और मैं।

ऐसे चरित्र रोज रोज नहीं मिलते। पहले मुझे लगा कि वह कुछ मानसिक रूप से सरका हुआ है। पर उसने बताया कि गांव के आसपास के भगत लोगों के साथ उत्तराखण्ड, झारखण्ड, गया आदि कई जगहों पर पैदल यात्रा कर चुका है। भगत लोग अपने साथ उसे सामान ले कर चलने या छोटा मोटा काम करने के लिये साथ ले कर जाते हैं। कुल मिला कर उनका कुली होता है वह। … मैं अगर (और यह शेखचिल्ली सोच है) साइकिल से भारत भ्रमण पर निकलूं तो साथ में इस जोकर को बतौर कुली एक साथ की साइकिल पर ले कर चल सकता हूं। मैंने सोचा!

उसके साथ मैंने एक चित्र खिंचवाया। डेयरी के सुभाष ने खींचा। पर रोशनी अच्छी न होने और शायद क्लिक करनें में सुभाष के दक्ष न होने से चित्र अच्छा नहीं आ पाया। … ऐसे लोगों के साथ यादगार बनी रहनी चाहिये।

डेयरी से निकल साइकिल पर भी हाथ लहराते, अपने से कुछ बोलते बड़बड़ाते वह जा रहा था। साइकिल बढ़िया चला रहा था। मुझे फिर लगा कि वह मेरा यात्रा-कुली बन सकता है।

पर अगले दिन सुभाष ने मेरी सोच पर पानी फेरा – “दिनेश बिंद है तो ठीक पर हमेशा नशे में रहता है। नशे के लिये कुछ भी मिल जाये उसे। किसी भी चीज से परहेज नहीं। काम मन लगा कर करता है। पर कहीं टिकता भी नहीं। मर्जी का मालिक है।”

अब यात्रा कुली साथ ले कर हमेशा उसके नशे का इंतजाम तो कर नहीं सकता। और कभी वह टुन्न हो कर गरियार बरदा (वह बैल जो कोंचने और डण्डे से मारने पर भी हल चलाने को तैयार न हो) की तरह अड़ जाये तो बहुत बड़ी लायबिलिटी होगा।

पर, फिलहाल, उस दिन उसका प्रहसन बहुत रोचक लगा। वह डेयरी पर किस लिये आया था, पता नहीं। शायद पता करने आया था कि डेयरी पर दूध दिया जा सकता है या नहीं।

हो सकता है, वह वहां दूध ला कर देते रोज दिखने लगे! संभावना कम है।

गांवदेहात में कोई थियेटर या सिनेमा तो है नहीं। दिनेश पगला जैसे लोग उसकी कमी पूरी करते हैं। उसके पांच मिनट के प्ले से मजा भी आया और आईडियाज भी आये दिमाग में! :-)

फिर मिलना चाहिए, दिनेश पगला!


वजीरगंज से नेवादा


12 मार्च 23

गया का अनुभव पार करने के बाद आज सवेरे सामान्य लगे प्रेमसागर। वजीरगंज में सुमन गेस्ट हाउस से निकल चुके थे। पांच किलोमीटर चलने के बाद मुझसे बात हुई। उनका कहना था कि प्लानिंग में चेंज है। वे नेवादा की बजाय पहले ही मुड़ कर वाया गोविंदपुर आगे निकलेंगे। गूगल नक्शे के हिसाब से वह रास्ता छोटा है।

अलग अलग रास्ते मैं कम्प्यूटर पर छान चुका था। मैंने उन्हे कहा कि ज्यादा दूर तक जाने में रास्ते की लम्बाई एक घटक जरूर है पर यह भी देख लें कि रास्ता कैसा है। गोविंदपुर वाला रास्ता पहाड़ी है। हो सकता है जंगल भी हों। जंगल में अकेले जाना दुरूह होगा। झारखण्ड में वैसे भी, अपेक्षाकृत, वन ज्यादा हैं। उसकी बजाय नेवादा-अलीगंज-सिकंदरा का रास्ता नक्शे के अनुसार अधिकतर मैदानी है। और उसपर दूरी का अंतर मात्र सात किमी है।

प्रेमसागर रास्ते का चुनाव करने के लिये मुझे कह रहे थे, पर मैंने वह नहीं किया। घुमक्कड़ मैं नहीं, वे हैं। योजना और चुनाव उन्हें करना चाहिये। पर प्रेमसागर में यह कमी है – कोई कुछ समझा देता है और उस हिसाब से चल देते हैं। बहुधा उन्हें ज्यादा श्रम करना पड़ा है। खैर, उन्होने आसपास वाले लोगों से बातचीत की। उन्होने भी समझाया कि नेवादा-सिकंदरा वाला मार्ग बेहतर है। सो उन्होने नेवादा की ओर बढ़ना तय किया।

गया के कटु अनुभव – वहां रात्रि विश्राम के लिये आश्रमों द्वारा डोनेशन मांगने की बात को ले कर सोशल मीडिया पर लोगों ने अपना क्षोभ व्यक्त किया। कई लोगों ने अपना अंशदान किया। कुछ ने नियमित कुछ न कुछ देते रहने की बात की। एक सज्जन ने टिप्पणी की – धंधे मातरम! एक अन्य ने कहा कि उनके भी इसी तरह के कटु अनुभव हैं।

गया तो गया! उसके चक्कर में एक दिन प्रेमसागर को 74 किलोमीटर चलना पड़ा। पर शायद इतना वे पहले भी विकल्पहीनता की दशा में चल चुके हैं। समस्याओं का समाधान उनके पास केवल चलने से है! पर उस चलने का परिणाम यह हुआ कि आज उन्हें कई लोगों की सहानुभूति और आर्थिक सहयोग मिला।

दिन में जो भी नदियां दिखीं, सब बड़े पाट वाली और चौड़ी। सब में एक बूंद पानी नहीं। फालगू नदी को तो सीता जी ने शाप दिया था, पर लगता है आसपास की सभी नदियों को वह शाप कस कर लगा है।

दिन में जो भी नदियां दिखीं, सब बड़े पाट वाली और चौड़ी। सब में एक बूंद पानी नहीं। फालगू नदी को तो सीता जी ने शाप दिया था, पर लगता है आसपास की सभी नदियों को वह शाप कस कर लगा है। नदियों में कुशा, कास, सरपत जैसी वनस्पति दीखती है। उसके अलावा एक जगह कई ट्रेक्टर भी दिखे जो बालू ढोने में लगे थे। बालू खनन जहां भी दीखता है, वह मन में अवैध उत्खनन और बालू माफिया का चित्र ही मन में उपजाता है। वही इन्हें देख भी उपजा। ये सभी नदियां बरसाती होंगी और मॉनसून के मौसम में कहर ढाती होंगी।

वजीरगंज-नेवादा के बीच एक बड़ा, व्यवस्थित तालाब।

मॉनसून के पानी का प्रबंधन लोग करते हैं; ऐसा प्रेमसागर ने कहा। कई ताल हैं। बड़े बड़े तालाब। उनका रखरखाव भी किया जाता है। इसके अलावा तीस से पचास फुट की बोरिंग पर पानी मिल जाता है। लोग पारम्परिक खेती में लगे हैं। हॉर्टीकल्चर का कोई प्रसार नहीं है। दो दिन पहले एक जगह पर मधुमक्खी पालकों के बक्से किसी जगह सड़क किनारे जरूर दिखे थे। मैंने प्रेमसागर को कहा कि आगे अगर उन्हें कुछ अच्छे और सुंदर बने तालाब दीखें तो उनका भी चित्र लेने का प्रयास करें।

नेवादा जिला में एक औद्योगिक विकास प्राधिकार और उसके आसपास कुछ ट्रेनिंग संस्थानों के बोर्ड नजर आये। एक जगह टीसीएस – टॉपर्स कॉन्वेण्ट स्कूल – देखा।

नेवादा जिला में एक औद्योगिक विकास प्राधिकार और उसके आसपास कुछ ट्रेनिंग संस्थानों के बोर्ड नजर आये। एक जगह टीसीएस – टॉपर्स कॉन्वेण्ट स्कूल – देखा। गिट्टी क्रशिंग या बालू उत्खनन के अलावा कोई उद्योग नहीं दिखा। उद्योगों के पनपने के लिये उपयुक्त कानून-व्यवस्था, कुशल और ईमानदार प्रशासन और मनोवृत्ति की उर्वरता है ही नहीं शायद।

प्रेमसागर ने मैसेज दिया है कि कोई सोनू जी ने अपने मैरिज हॉल में उन्हें निशुल्क रहने का स्थान दिया है। “मैं भईया मंदिरों को ही तलाश रहा था। पर मंदिरों के आसपास भोजन का कोई प्रबंध नहीं था। तभी एक जगह यह नौजवान मिल गये। बोले बाबा आप मेरे मैरिज हॉल में रह सकते हैं। भोजन आपको बाहर से देखना होगा।” – प्रेमसागर ने बताया।

हूडी पहने सोनू जी हाथ पैर से पोलियोग्रस्त होने के कारण अक्षम भले ही हैं पर संस्कारी नौजवान हैं। वे टचस्क्रीन का मोबाइल बड़ी कुशलता से इस्तेमाल कर रहे थे। उनकी माता जी ने घर से भोजन बना देने की पेशकश जरूर की, पर उन्हें असुविधा होती। प्रेमसागर ने होटल तलाशे जो ज्यादातर नॉनवेज भी बनाते थे। इसलिये एक जगह से लिट्टी-चोखा खरीद कर खाया और रात के भोजन का काम उसी से पूरा हो गया।

गया के धर्म-व्यवसायियों से उलट सोनू जी ने उदात्त भाव से प्रेमसागर की जो सहायता की वह प्रशंसनीय है।

सोनू जी ने अपने मैरिज हॉल में उन्हें निशुल्क रहने का स्थान दिया है।

वैसे, शक्तिपीठ पदयात्रा पर निकले प्रेमसागर को अगर मैरिज हॉल वाले सोनू जी की बजाय किसी मंदिर के प्रांगण में ही रुके होते तो मुझे अच्छा लगता। कमरा, बिस्तर, सफाई और कम्बल आदि का एक बेंचमार्क तो प्रेमसागर ने बना लिया ही लिया है और उससे कमतर में रहने की उनकी अभ्यस्तता कम होती गयी है। पर शायद मुख्य कारण यह है कि जिस भाव से सोनू ने प्रेमसागर को अपने यहां रहने के लिये आमंत्रित किया, वह मंदिरों-देवालयों के लोगों में अब होता ही नहीं!

कुछ दशकों पहले तक मंदिर के ओसारे तीर्थयात्रियों के रहने रुकने के सामान्य ठिकाने होते थे। अब शायद युग बदल गया है। देवालयों में अगर तीर्थयात्री नहीं रुकते, तीर्थयात्रियों को रुकने के लिये वे आमंत्रित नहीं करते तो शायद देवता भी वहां नहीं होते होंगे।

शायद मैं ज्यादा ही अव्यवहारिक बातें कर रहा हूं। अगर मुझे यात्रा करनी हो तो मैं प्रेमसागर से कहीं ज्यादा सुविधाओं की अपेक्षा करूंगा। मैं तो यह मान कर चलता हूं कि देवता देवालयों में नहीं, प्रकृति में या लोगों के उदात्त स्वभाव के बीच रहते हैं। मैं मंदिरों के दर्शन का कोई विशेष प्रयास करता भी नहीं। पर वही एक प्रमुख कारण है कि मैं यात्रा कर नहीं रहा। लिखना मेरे बस का है, डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) मेरे बस का है। यायावरी मेरे बस की नहीं। यायावर तो प्रेमसागर हैं।

बीस दिन हो गये यात्रा को। अठारह ब्लॉग पोस्टें हो गयीं। सात सौ से ज्यादा किलोमीटर चल चुके प्रेमसागर। मुझे तो डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लेखन में थकान हो रही है। प्रेमसागर की समस्याओं को खुद ओढ़ लेने की थकान। पता नहीं प्रेमसागर को फेटीग (fatigue) हो रहा है या नहीं। मुझे तो मानसिक यात्रा ही करनी हो रही है, पर प्रेमसागर के तो पैर भी दर्द करते होंगे? कौन सा तेल मलते हैं प्रेमसागर पण्डिज्जी?!

ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

गया – मंगला गौरी दर्शन


11 मार्च 23

शाम होते होते प्रेमसागर ने अष्टादश शक्तिपीठों में से तीसरे महाशक्तिपीठ का दर्शन सम्पन्न कर लिया। गया में वे मंगलागौरी मंदिर हो आये। इससे पहले उन्होने प्रयाग में ललिता देवी/अलोपी माता और वाराणसी में विशालाक्षी देवी के दर्शन कर लिये हैं। उनके अलावा कई अन्य शक्तिपीठों पर भी वे जा चुके हैं। अब तक शक्तिपीठ पदयात्रा में वे सात सौ किलोमीटर के आसपास पैदल चल चुके हैं।

उनका शक्तिपीठ पदयात्री का दर्जा ऊंचा हो गया है।

गया के रास्ते सवेरे चाय की दुकान पर बैठे जंच रहे हैं प्रेमसागर। चाय की दुकान रफीगंज में है।

सवेरे, भेजे चित्र में गया के रास्ते चाय की दुकान पर बैठे जंच रहे हैं प्रेमसागर। चाय की दुकान रफीगंज में है। दुकान वाले सज्जन को करसारा के प्रमोद जी ने सहेज दिया था। सो चाय के पैसे नहीं देने पड़े। आगे रास्ते में नहरें और सूखी नदियाँ पड़ीं। चौड़ा पाट और केवल रेत। सरपत उगा होगा बीच बीच में, जिसे लोग काट ले गये हैं। नक्शे में फालगू तो नहीं पड़ती रफीगंज और गया के बीच। कौन नदियां हैं ये? गूगल मैप को जूम कर देखने पर भी कोई अंदाज नहीं लगा। बरसात में शायद इनमें खूब पानी आ जाता होगा। उथली और चौड़ी नदी लगती हैं ये। शायद फालगू ही हो।

रेत की नदियां।

जो चित्र भेजे और जो विवरण दिया, उससे यह पूरा इलाका मुझे मनहूस लगा। कोई आश्चर्य नहीं कि इस फालगू नदी को सीता जी का शाप लगा है। यह राम द्वारा उनके पूर्वजों के पिण्डदान के समय उग्र हो गयी थी।

महाभारत काल का भी यहां से जुड़ाव रहा है। भीम वेदी और भीम मंदिर हैं यहां। पर वह सब प्रेमसागर ने देखा नहीं। उनके रात गुजारने का कोई इंतजाम नहीं हुआ था तो उन्हें गया छोड़ आगे बढ़ने की जल्दी थी। “भईया सभी मंदिरों-सरोवरों को मैंने मन ही मन में प्रणाम कर लिया है। अब आगे बढ़ कर नेवादा जिला में कोई जगह तलाशता हूं रात में रुकने के लिये।” – प्रेमसागर ने कहा।

गया धर्म का केंद्र रहा है आदि काल से। पर वहां धर्म कम, धर्म का व्यवसाय ज्यादा दिखा। मंगला गौरी मंदिर के दर्शन और उसके साथ शिव/भैरव मंदिर के दर्शन के अलावा प्रेमसागर ने कुछ खास देखा नहीं। किन्ही सुरेंद्र गिरि जी का नाम लिया, जिन्होने मंगला गौरी के दर्शन कराये। उसके अलावा शाम हो जाने के कारण वे चार पांच आश्रमों में गये कि रहने को कोई ठौर मिल सके। वहां बताया गया कि पांच छ हजार डोनेशन दें तो व्यवस्था हो सकेगी। आश्रम भी व्यवसाय बने हुये हैं। एक होटल ने कहा कि वहां शादी की बुकिंग है, वर्ना उन्हें जगह दे देते। प्रेमसागर ने कहा – भईया, लोग पिण्डदान को आते हैं और वे इन्हें मनमांगा मोटा पैसा देते हैं। मेरे जैसे के लिये जिसे चार पांच सौ निकालना कठिन है, कोई जगह नहीं है गया में।”

मंगलागौरी और भैरव मंदिर

कहीं चाय पी और मीठा खा कर प्रेमसागर आगे बढ़े। फालगू पार कर नेवादा जिले की ओर। अंत में पच्चीस किमी और चले तो वजीरगंज में किसी सुमन गेस्ट हाउस में रुकने को कमरा मिला। “भईया, न मिलता तो रात भर चलता ही रहता मैं।” – प्रेमसागर का कहना था। किसी भी समस्या के निदान के लिये प्रेमसागर के पास एक ही उपाय है – चलना!

करसारा से वजीरगंज तक दिन भर में कुल चौहत्तर किलोमीटर चले प्रेमसागर। मुझे लगता था कि वे गया भी नहीं पंहुच पायेंगे और पंहुच भी गये तो रात में आराम कर अगले दिन दर्शन करेंगे मंदिरों के। पर धर्म के व्यवसाय के नगर गया में उन्हें रुकने की जगह नहीं मिली! शायद इसका अंदाज प्रेमसागर को था। इसलिये शुरू से ही वे तेज चाल में चलते ही रहे। दिन में कहीं आराम नहीं किया।

बड़ी जगह है गया। पर रात गुजारने को ठौर नहीं मिला प्रेमसागर को।

अब वजीरगंज के रास्ते वे देवघर पंहुचेंगे और वहां से वाया वासुकीनाथ बंगाल में प्रवेश करेंगे। देवघर उनका जाना पहचाना है। सुल्तानगंज से बैजनाथधाम की सैकड़ों पदयात्रायें वे कर चुके हैं। सो यह रूट पकड़ना उन्हें सही लगा। बंगाल में कई शक्तिपीठ हैं। उनके दर्शन कर अगर बरसात का समय नहीं हुआ तो वे कामाख्या मंदिर के दर्शन के लिये गुवाहाटी निकल जायेंगे। यह डेढ़ दो महीने का कार्यक्राम होगा। यह सब निर्भर है कि लोगों से उन्हें अंशदान मिलता रहे जिससे उनके रात गुजारने और भोजन का खर्चा निकल आये।

उनके पास पैसा नहीं है। साधन नहीं हैं। लोग जुड़े हों और सहायता कर रहे होंं- वह बहुत नहीं दिखता। प्रेमसागर मध्यप्रदेश-गुजरात में कई लोगों की बात किया करते थे। वैसी बातें अब सुनने में नहीं आतीं। शायद माता और महादेव सही में उनकी कड़ी परीक्षा ले रहे हैं। या फिर व्यर्थ ही एक नया प्रॉजेक्ट हाथ में ले कर चल दिये हैं वे।

मैं उनकी सहायता के लिये लिख सकता हूं। वही किये दे रहा हूं। पाठक से मैं अपील ही कर सकता हूं कि प्रेमसागर को उनके यूपीआई पते पर जो सहयोग कर सकते हों, करने का कष्ट करें। पर मेरी भी अपनी सीमा है।

गया के प्रकरण ने मुझे मायूस किया है। मुझे एक तुकबंदी सुनने में आई थी – गया में दया नहीं। पुरी में जात नहीं। कलकत्ता में रात नहीं। पुरी और कलकत्ता का पता नहीं, पर गया में सही मायने में दया नहीं नजर आई। विंध्याचल और बनारस में शक्तिपीठ पदयात्री होने के कारण आदर मिला था। माई की चुनरी उढ़ाई गयी थी। उसके उलट गया में यहां उन्हें टके सेर जवाब मिला – रुकने की जगह चाहिये तो पांच हजार का डोनेशन लाओ!

गया के बारे में एक और तुकबंदी है – बिना पानी की नदी, बिना पेड़ का पहाड़ और बिना दिमाग का आदमी। जरूर गया होगा!

शायद तुकबंदी में दिमाग की जगह दिल होना चाहिये था। हृदयहीन नजर आया गया।

सरकार बनारस और विंध्याचल के पर्यटन विकास के लिये बहुत कर रही है। उसकी कुछ सृजनात्मक शक्ति गया में भी लगनी चाहिये। हिंदू धर्म का व्यवसाय भले रहे; वहां आश्रम वाले मौज करें या भाड़ में जायें; पर प्रेमसागर जैसे साधन हीन श्रद्धालु के लिये वहां स्पेस बने! आगे कोई पदयात्री आये तो उसे रुकने को एक बिस्तर और सस्ता साधारण भोजन तो मिल सके।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
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