बिक्रमगंज से दाऊदनगर


9 मार्च 23

तबीयत का क्या हाल है? पूछने पर कल रात और आज सवेरे एक ही जवाब था प्रेमसागर का – निन्यानबे परसेण्ट ठीक है भईया। बहुत कुछ वैसा जैसा डेटोल के विज्ञापन में सफाई हो जाती है पर एक कीटाणु बचा दिखाया जाता है।

बहरहाल दो रात बिक्रमपुर चौक के होटल में बिता कर आज सवेरे रवाना हुये। आज आठ बजे जब बात हुई तो सात किमी चल चुके थे। उन्होने जो पहला चित्र भेजा वह काव नदी का है, जिसपर एक पुल पर बड़ा ट्रक पास हो रहा है।

बिक्रमगंज के पास काव नदी

सासाराम के पास पहाड़ी स्थान से निकली काव नदी बिक्रमगंज के आसपास कई बार पार करती है। यह नदी गंगाजी में अंतत: मिलती है। इसके उद्गम स्थल जानने की तलाश में मैंने सासाराम जिले के धुआँ कुण्ड और उसके किनारे बने ताराचण्डी मंदिर की डिजिटल यात्रा की। उस डियाक (डिजिटल यात्रा – नेट पर जानकारी छानने की कवायद) में पता चला कि ताराचण्डी मंदिर काव नदी के उद्गम धुआँ कुण्ड के पास है और यह शक्तिपीठ माना जाता है। कहा जाता है कि यहां सती की दांयी आंख गिरी थी।

ताराचण्डी माँ की प्रतिमा। सासाराम। KUMAR AMIT – अपना काम, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=93282044 द्वारा

शक्तिपीठों की सूची का कोई मानक नहीं है। चार, अठारह, इक्यावन, बावन, चौंसठ और एक सौ आठ पीठों की अलग अलग सूचियाँ हैं। कई बार इसपर भी विवाद है कि माई का अमुक अंग किस जगह गिरा था। इसलिये प्रेमसागर आदिशंकर के अष्टादश महाशक्तिपीठ श्लोक के आधार पर चल रहे हैं। उस आधार पर चलते जितने भी शक्तिपीठ दर्शन हो जाये, वह उनका ध्येय है। ताराचण्डी शक्तिपीठ अलका पाण्डे की ‘शक्ति’ पुस्तक के 51 शक्तिपीठों में भी नहीं है। सो वाराणसी से गया जाते हुये सासाराम जाना नहीं हो पाया। अन्यथा, वे बिक्रमगंज की बजाय धुआँ कुण्ड पर काव नदी को देखते।

नेट छानने में मुझे मुझे यह भी पता चला कि इस नदी के किनारे आदिमानव के रहने के प्रमाण मिले हैं। पर मैं किसी पुरातत्व खोज का कोई लिंक नहीं तलाश पाया। वह अगर मिल पाता तो यह डिजिटल यात्रा कथा (डियाक) और रोचक बन पाती। :-)

काव नदी सामान्य आकार की है – पतली और 200 किमी लंबी। यह इलाके की सिंचाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। बरसात के मौसम में इलाके की अन्य नदियों की तरह यह भी विकराल रूप धारण कर लेती है। इसलिये, बरसात के मौसम के पहले ही प्रेमसागर को बिहार, बंगाल और असम की अपनी शक्तिपीठ यात्रा पूरी कर किसी और इलाके में प्रवेश ले लेना है।

यात्रा पर निकलते ही एक जगह एक छोटा मंदिर दिखा प्रेमसागर को।

सवेरे यात्रा पर निकलते ही एक जगह एक छोटा मंदिर दिखा प्रेमसागर को। नया ही बना है। लोगों ने बताया कि वहां कोई यज्ञ कर मंदिर स्थापित हुआ था। मंदिर में झांकी नुमा प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमायें हैं। एक बाबाजी की भी मूर्ति बनी है। वे ही शायद मंदिर के मुख्य गुरू रहे होंगे।

बिक्रमगंज रेलवे स्टेशन भी है। आरा से सासाराम की इकहरी लाइन को स्टेशन के पास पार किया प्रेमसागर ने। आरा और सासाराम के बीच निश्चय ही माल यातायात नगण्य होगा। बिहार के औद्योगिक विकास की कोई कहानी अभी शुरू ही नहीं हुई है। सो, इकहरी लाइन के दोहरा करने की तो जरूरत ही नहीं होगी। हां यह देख अच्छा लगा कि ट्रैक का विद्युतीकरण हो गया है।

बिक्रमगंज रेलवे क्रॉसिंग से लिया चित्र।

रेल लाइन देख कर मुझे नोश्टाल्जिया होता है, पर सन 2023 में इकहरी लाइन देखने में अच्छा भी नहीं लगता। यह रेल लाइन अपने ऊपर के खर्चे के बराबर कमाई नहीं देती होगी रेलवे को। बिहार दस प्रतिशत सालाना जीएसडीपी वृद्धि करे तो शायद एक दो दशक में इस लाइन के दिन फिरें। वर्ना इस प्रांत ने कई रेल मंत्री दिये हैं जो सिर्फ बिहार से बम्बई-दिल्ली की सवारी गाड़ियों को चला कर ही वाहावाही लूटते रहे। उसके अलावा उन्होने लूटा कुछ और भी! :-(

बिक्रमगंज से आगे सड़क ठीक है। एक दो जगह डायवर्शन है। काम हो रहा है। यह हाईवे नम्बर 120 है। काम करते लोगों ने बताया कि वे कलकत्ता से आये हैं। ठेकेदार के आदमी हैं। काम जल्दी करने का उनपर दबाव है। प्रेमसागर ने जब यह बताया तो अच्छा लगा। वैसे मैंने बनारस-शेरघाटी के बीच ग्राण्ड ट्रंक रोड के काम की दुर्दशा देखी है। जगह जगह पर डायवर्शन हैं और सालों से कोई काम होते नहीं दीखता। कई कई जगह तो अर्थवर्क पर बड़ी बड़ी झाड़ियां उग आयी हैं जो एनएचएआई की अकुशलता दर्शाती हैं।

बिक्रमगंज के आगे सड़क

दाऊदनगर के पहले शोणभद्र (सोन नदी) का पाट काफी चौड़ा है। करीब आठ मिनट लगे प्रेमसागर को पैदल पार करने में। नदी में पानी कम है। अच्छा है – पानी नदी की बजाय सोन की नहरों से डेढ़ सौ साल से सिंचाई के काम आ रहा है। डेढ़ सौ साल के इस सिंचाई चमत्कार से बिहार को गुजरात से आर्थिक रूप से एक सदी पहले ही आगे हो जाना चाहिये था, पर आज वह बीमारू प्रांतों में भी फिसड्डी है। यह एक बड़ा आश्चर्य है। यक्ष प्रश्न। कौन युधिष्ठिर बतायेंगे इस आर्थिक जर्जरता का कारण। बिहार ने बाहरी दुनियाँ को उत्तमोत्तम दिमाग दिये हैं और घटिया से घटिया अर्थव्यवस्था। :-(

सोन नदी के किनारे दाऊदनगर

दाऊद नगर ठीकठाक विकसित शहर नजर आया। नेट पर यह भी पता भी चला कि यहां के विद्यार्थी मैरिट लिस्ट में काफी आगे रहते हैं। दाऊद नगर के बारे में जानकारी छानने पर पता लगा कि दाऊद खान कुरैशी औरंगजेब का सेना अधिकारी था। सोन के पूर्व का यह इलाका पलामू के राजा से 1664 में जीतने की खुशी में औरंगजेब ने उसे जागीर दी थी और उसने अपने नाम को स्थाई करने के लिये यह नगर बसाया। वह मूलत: हरियाणा के हिसार फौजा का शेखजादा था।

फ्रांसिस बुखानेन का बिहार का सर्वे जर्नल – सन 1811-12

दाऊद नगर का इतिहास जानने में एक और नाम आता है फ्रांसिस बुखानेन (1762-1829) का। ये सज्जन पेशे से डाक्टर थे। लॉर्ड वेलेसली के सर्जन। पर इनकी रुचि जगहों को देखने और उनका दस्तावेजीकरण में थी। वे अठारहवीं सदी के शुरुआत में भारत आये। उन्होने मैसूर और बंगाल/बिहार की जैव विविधता, समाज और आर्थिक दशा का सर्वे जर्नल लिखा था जिसे सन 1930 में एशियाटिक सोसाइटी ने छापा। इस जर्नल की प्रति इण्टरनेट आर्काइव पर दिखती है। दस साल पहले बिहार सरकार ने इसे पुन: छापा है। सन 1800 के आसपास बिहार के पटना, शाहाबाद, भागलपुर, गया और पूर्णिया इलाके कैसे थे जानने के लिये यह जर्नल बड़ा रिसर्च जखीरा है।

मैंने इस जर्नल का टेक्स्ट नेट पर खोल कर उसमें दाऊदनगर को सर्च किया। कुल 29 बार दाऊदनगर का नाम आया है उस जर्नल में। और उससे पता चलता है कि 3 सदी पहले यहां शेर और बघेरे तो नहीं थे, पर भेड़िये जरूर थे। अफीम, बर्तन और कपड़े का उद्योग था। यहां के आढ़तियों का व्यवसाय बनारस तक चलता था और उनकी हुण्डी की बनारस में अहमियत थी। लोग ‘खुशहाल’ थे।

आप यह टेक्स्ट डॉक्यूमेण्ट यहां देख सकते हैं। थोड़ी मेहनत कर पूरे पीडीएफ डॉक्यूमेण्ट को जो लगभग 130MB का है, डाउनलोड भी कर सकते हैं – अगर आप शोध करने में रुचि रखते हैं। वैसे, यह शायद अमेजन पर भी मिल जाए।

फ्रांसिस बुखानेन की इस पुस्तक पर दो तीन घण्टा डियाकी करने के बाद असल पदयात्रा करने वाले प्रेमसागर भले दाऊदनगर को भूल जायें, मैं डिजिटल मशक्कत के बाद नहीं भूल सकता। इस डियाकी में बहुत हल्के से टिप पर भांति भांति से खोजना और गूगल मैप पर उपलब्ध चित्रों के सहारे इलाके की दशा का आकलन करना शामिल है।

अब आप मान सकते हैं कि मैं केवल प्रेमसागर का कहा लिखने भर की कवायद नहीं कर रहा; मैं खुद इस डियाकी में भी एक प्रकार की यात्रा कर रहा हूं। अपने घर बैठे रोज 25-30 किमी की यात्रा! और मुझ पर उसे लेखन में उतारने का दबाव भी है। :-)

प्रेमसागर दाऊदनगर से थोड़ा आगे जा कर रुके हैं। वहां आज भी होली खेली जा रही है। एक कमरा किसी लॉज में उन्हें मिल गया है। अब यहां से गया करीब 70 किमी दूर है। दो दिन में पंहुच ही जायेंगे।

आप उन्हें आर्थिक सहयोग उनके यूपीआई पते पर देने की सोचें! धन्यवाद।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

सेमरी के आगे से बिक्रमगंज


7-8 मार्च 23

सेमरी/माल्याबाग के आगे किसी लॉज में रुके थे प्रेमसागर। तबियत कुछ ठीक नहीं थी। पर लगता है वह जगह ज्यादा जमी नहीं। सवेरे सवा पांच बजे उठ कर चल दिये। लगभग पंद्रह किलोमीटर चल कर बिक्रमगंज पंहुच गये। मुझे फोन किया तो सवेरे के सवा आठ बजे थे। बीमार होने के बावजूद भी तेज ही चले होंगे। अजीब मनई है यह प्रेमसागर। हरारत या बुखार होने पर मैं तो कमरे के साथ अटैच्ड बाथरूम जाने के पहले सोचता हूं। ये सज्जन पंद्रह किमी चल लिये।

उनकी सांस भारी थी। तबियत वास्तव में खराब ही होगी। अकेला पदयात्री। अनजान जगह और टेंट में मुद्रा भी सीमित। मैं होता तो यात्रा को इतिश्री कह घर लौटने की सोचता। वैसा कुछ प्रेमसागर के मन में आया ही नहीं होगा।

रास्ते में खींचा सूर्योदय का चित्र।

“भईया, रस्ता में कुछ फोटो खींचे हैं। आपको भेज दिये हैं। यहां ठीक होटल मिल गया है। पांच सौ किराया है। आज दिन भर आराम करूंगा और कल छ बजे निकलूंगा आगे के लिये।” – प्रेमसागर आगे की यात्रा की बात कर रहे हैं। तबियत ठीक नहीं है। होली का मौसम है। लोग रास्ते भर हुड़दंग करने वाले होंगे ही। पर उनको तो चलना है। चरैवेति, चरैवेति!

मैंने दिन भर कोई सम्पर्क नहीं किया उनसे। आराम मिलना चाहिये। शाम सात बजे से आधा आधा घण्टे पर तीन फोन किये पर कोई जवाब नहीं मिला। घण्टी पूरी बज कर बंद हो गयी। मुझे फिक्र लगी – तबियत ज्यादा न बिगड़ गयी हो।

उनकी सांस भारी थी। तबियत वास्तव में खराब ही होगी। अकेला पदयात्री। अनजान जगह और टेंट में मुद्रा भी सीमित। मैं होता तो यात्रा को इतिश्री कह घर लौटने की सोचता। वैसा कुछ प्रेमसागर के मन में आया ही नहीं होगा।

अगले दिन, आज 8 मार्च को, सवेरे आठ बजे फोन आया प्रेमसागर का – “कल नींद में थे भईया। दवाई ले कर सोये थे। रात में इग्यारह बजे देखा कि आपकी मिस कॉल हैं। उस समय फोन करना ठीक नहीं समझा। आज तबियत बेहतर है पर गला अकड़ गया है। दूसरे आज बारिश भी हो रही है। होटल के मालिक को मैंने बोल दिया है कि एक दिन और रुकना होगा।”

मैंने उन्हें कहा कि अगर सम्भव हो तो बिक्रमगंज चौक का एक फोटो खींच लें। प्रेमसागर ने बताया कि उनका होटल चौक के ही पास है। आधे घण्टे में चौक के चित्र भेज दिये। चित्र से अंदाज लग गया कि अभी सवेरे होलीमय नहीं है वातावरण। बारिश से सड़क गीली है। लोकल नेताओं के नव वर्ष, ईद, मकर संक्रांति और होली की बधाई के पोस्टर लगे हैं। चहल पहल है। पर बहुत चेंचामेची नहीं है। जो जानकारी नेट पर है, उसके अनुसार यह चौक बिहार के इस हिस्से – रोहतास जिले के पश्चिमी भाग का बड़ा रूरर्बन केंद्र है। इसी लिये मैंने इसका चित्र लेने को कहा था प्रेमसागर को।

बिक्रमगंज चौक। रूरर्बियन सेण्टर। चौक कस्बाई बिजनेस सेण्टर जैसा दीखता है।

चौक कस्बाई बिजनेस सेण्टर जैसा दीखता है। कोई नेता जी हैं घनश्याम कुमार। उनके बड़े बड़े पोस्टर हैं। एक डाक्टर साहब के आरोग्यम ईएनटी अस्पताल का पोस्टर है। कोचिंग क्लासेस वाले के पर्चे खम्भे पर चिपके हैं। चौक के बीचोंबीच कोई नेता जी नहीं, कोई मॉर्डन आर्ट का स्कल्प्चर है। बिक्रमगंज का रूरर्बिया, रूरल कम अर्बन ज्यादा बनने का प्रयास कर रहा है।

मैं यह सोच रहा हूं कि यात्रा किसकी है – प्रेमसागर की या मेरी? प्रेमसागर का तो कहना है कि उन्हें नींद आ गयी तो कोई चार लाठी भी मारे तो नींद नहीं खुलती। मेरी मनस्थिति दूसरी है। रात लघुशंका के लिये नींद खुलती है; और उम्र के साथ ज्यादा ही खुलती है; तो प्रेमसागर के यात्रा विवरण के शब्द गढ़ने का भाव बना रहता है। इस तरह की डिजिटल यात्रा किसी ने की है – इस तरह के घर के कमरे में रहते हुये यात्रा कथा लिखने के प्रयोग। मुझे यह अलग तरीके की चीज लगती है और इसके लिये भी एक शब्द गढ़ता हूं मैं – डियाक (डिजिटल यात्रा कथा)।

डियाक लेखन में मूल तत्व प्रेमसागर के फोन पर दिये इनपुट्स और ह्वाट्सएप्प/टेलीग्राम पर भेजे चित्र हैं। उनके अलावा गूगल मैप, विकिपेडिया और गूगल सर्च द्वारा खंगाली जानकारी बैकग्राउण्ड को गाढ़ापन देती है। कभी कभी मुझे कुछ पुस्तकें भी खरीदनी पड़ती हैं। पर वह खरीद भी डिजिटल माध्यम – किण्डल पर ही होती है। कागज का प्रयोग तो शायद ही होता हो। इसलिये इसे डिजिटल यात्रा कथा लेखन या डियाक लेखन कहा जा सकता है। डियाक में अभी मैंने कभी भी फिक्शन का प्रयोग नहीं किया। पर कभी कभी लगता है विभिन्न स्थानों के बारे में इण्टरनेट पर इतनी जानकारी, इतने चित्र बिखरे हैं कि एक फिक्शनल यात्री गढ़ कर पॉल थरू की टक्कर का ट्रेवलॉग – डियाक ठेला जा सकता है। कोई न कोई कर देगा। या ऊर्जा बनी रही तो कभी मैं ही डियाकी में नये प्रयोग कर गुजरूं! :lol:

फिलहाल, इस डियाक लेखन ने बहुत कुछ होल्ड पर डाल दिया है। बहुत कुछ लिखना है। सुरेश पटेल दो बार मिलने आ चुके हैं। उनके सब्जियों की खेती और विपणन के प्रयोग में बहुत कुछ है जिसपर लिखा जाना चाहिये। मेरे नाती, विवस्वान के जनेऊ संस्कार पर बहुत कुछ सोचा है। कुछ नोट्स भी हैं और ढेरों चित्र भी। मेरी बिटिया बोलती नहीं, पर उसे भी लगता होगा कि बाहर के चिड़िया कौव्वा दीखते हैं, पर विवस्वान पर लिखना नहीं सूझता। विवेक ने साइकिल चलाना शुरू किया है और स्वास्थ्य पर नये प्रयोग कर रहे हैं। राजकुमार उपाध्याय और उनका परिवार एक अलग तरीके से मुझे प्रभावित कर चुका/रहा है। … बहुत कुछ है, जिसपर लिखा-कहा जाना है। पर वह सब नहीं हो रहा। डियाक चल रही है। डिजिटल यात्रा कथा!

मैं बिक्रमगंज को बारीकी से देखता हूं। यहां रेलवे स्टेशन है। एक नहर भी दीखती है। चौक से सड़कें जाती हैं बक्सर, सासाराम, पटना और डेहरी को। बढ़िया कनेक्शन है बिहार के बाकी हिस्सों से। बिहार में, अगर रिहायश बनानी ही हो (और वह बड़ा अगर है – बिहारी भी बिहार छोड़ देस परदेस जा रहे हैं :-( ) तो बिक्रमगंज बढ़िया जगह हो सकती है। फिलहाल तो यह डियाकी सोच है। :lol:

मैं प्रेमसागर पर लौटता हूं। मेरा सोचना है कि अस्वस्थ प्रेमसागर को मदद की जरूरत है। यात्रा कितनी भी फ्रूगल क्यों न हो, उसके लिये कुछ न कुछ आर्थिक सहयोग तो चाहिये। जिसका भी फोन मेरे पास आता है उन्हें घुमा-फिरा कर प्रेमसागर को सहायता करने की बात कहता हूं। मेरे ख्याल से पाठकगण भी वैसा कुछ कर सकते हैं। थोड़ा बहुत अंशदान उनके एक दिन लॉज का किराया या भोजन का खर्चा अदा कर सकता है। पता नहीं, प्रेमसागर को मेरा यह कहना कैसा लगेगा, पर प्रेमसागर को आर्थिक योगदान करना पुण्य का काम है।

बिक्रमगंज का होटल और 500रुपये रोज का कमरा।

आज बिक्रमगंज में एक दिन और रुकने के बाद (आशा है) कल प्रेमसागर दाऊद नगर के लिये निकलेंगे। वह सोन नदी पर जगह है। तीस किमी आगे। दाऊद नगर से गया है 70 किमी दूर। गया में मंगलागौरी शक्तिपीठ है। प्रेमसागर का अगला महाशक्तिपीठ।

आज होली है। रंगों का त्यौहार मंगलमय हों!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

बक्सर से सेमरी – सोन नहर


6 मार्च 23

बक्सर से सवेरे रवाना होने पर गूगल ने प्रेमसागर को गोल गोल घुमा दिया। दो बार एक ही जगह वापस आ गये तो लोगों से रास्ता पूछा और आगे बढ़े। उन्हें नवानगर की ओर चलना था। जहां तक चल सकें, वहां तक। दोपहर में तीन-चार बजे से रात गुजारने की जगह तलाशने की सोच बना ली थी। जहां मिल जाये, वहीं डेरा जमाया जाये। सब महादेव पर छोड़ रखा था, पर राह चलना और जगह तलाशना उनका कर्म है – इसे वे बखूबी समझते हैं। इसके अलावा ब्लॉग पर लिखने लायक सामग्री उपलब्ध कराना भी शायद वे अपने कामों में महत्वपूर्ण समझते हैं।

बक्सर सोन नहर, उसकी बगल से जाती सड़क और नहर पर पुराना पुल

रास्ता एक नहर के किनारे किनारे चलता है। नक्शे में मैं पाता हूं कि वह सोन मेन कनाल है। एक पुल का चित्र देख कर लगा कि वह बहुत पुराने तरह का है। मुझे 80-100 साल पुराना लगा। यह जिज्ञासा हुई कि शायद यह सड़क और यह नहर अपने में पुराना इतिहास समेटे है। करीब दो घण्टे नेट पर ‘सोन मेन केनाल’ तलाशने पर सन 1853-55 का समय नजर आया। उस समय ब्रिटिश शासन नहीं था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से एक सेना के इंजीनियर लेफ्टीनेण्ट डिकेंस शाहाबाद (आरा) आये। उन्होने लोगों को कुंये से पुरवट/मोट से पानी निकाल कर बड़े श्रमसाध्य तरीके से खेती करते देखा।

डिकेंस वास्तव में गजब के इंसान थे। वे सेना में आर्टिलरी शाखा के अफसर थे और उनका जल प्रबंधन से कोई लेना देना नहीं था। पर लोगों के खेती के तरीके से द्रवित – प्रभावित हो कर उन्होने आसपास के बड़े भू भाग के जल संसाधनों का सर्वेक्षण किया। उन्होने पाया कि इलाके की दो बड़ी नदियां – सोन और गंगा के तल में काफी अंतर है। सोन का पानी अंतत: गंगा में ही जाता है। उनकी सोच थी कि सोन के पानी पर बैराज बना कर उससे नहरों द्वारा एक बड़े इलाके – उत्तर प्रदेश में कर्मनासा के पश्चिमी भाग से ले कर बक्सर और आरा के बड़े ग्रामीण इलाके को सींचा जा सकता है।

इण्टरनेट से ही मुझे गगन प्रसाद जी की एक पुस्तक/रिपोर्ट – हिस्ट्री ऑफ इर्रीगेशन इन बिहार की 200 पेजों की पीडीएफ कॉपी मिल गयी। इस पुस्तक में प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश काल तक का सिंचाई का इतिहास है। पुस्तक के सोन नदी की नहरों पर लिखे अध्याय के बीस-तीस पेज मैने ब्राउज किये। (आप यह रिपोर्ट इण्डिया वाटर पोर्टल के इस पेज पर दिये लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं)।

डिकेंस ने 1855 में अपनी रिपोर्ट बना कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पेश की। उसके अनुसार सिंचाई की नहरों और बैराज पर 61 लाख रुपये का खर्च आना था और आधा काम होने पर रेट ऑफ रिटर्न 11 प्रतिशत था। काम पूरा होने पर 19 प्रतिशत आमदनी का आकलन था। निश्चय ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी कोई काम धर्मादे खाते में नहीं करने वाली थी। कम्पनी के डयरेक्टर्स नें डिकेंस की बहुत प्रशंसा की, लेकिन रिपोर्ट पर काम तुरंत शुरू नहीं हुआ।

उसके बाद 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हुआ। कुंवर सिंह के विद्रोह से बिहार का यह इलाका तो बहुत प्रभावित था। अंग्रेज सिमट गए पर जल्दी ही संग्राम दब गया। डिकेन्स वापस आए। तब तक वे शायद लेफ्टीनेण्ट कर्नल बन गये थे। उन्होंने आगे सोन नदी का सर्वेक्षण किया। कालांतर में डिकेंस की रिपोर्ट में सोन नदी के पूर्वी भाग की नहरेंं जो गया और पटना जिलों को भी सिंचित करतीं, जोड़ी गयीं। अंतत: 1868-69 में, जब देश कम्पनी के नहीं, ब्रिटिश सरकार के शासन में था, काम शुरू हुआ।

White Board पर मेरे द्वारा बनाया नहर सिस्टम का स्केच। सोन नदी में डेहरी के पहले इंद्रपुरी में डैम है। वहां से नहर अकोढ़ी गोला तक जाती है। अकोढ़ी गोला से दो नहरें बक्सर और आरा को निकलती हैं। अंतत: ये नहरें गंगा नदी में मिलती हैं। सोन नदी खुद भी अंतत: गंगा में पटना में मिलती है।

डेहरी ऑन सोन से 11 किमी पहले इन्द्रपुरी डैम बना। इंद्रपुरी डैम से अकोढी गोला तक नहर बनी और वहां से पश्चिमी सोन नहर बक्सर में गंगा तक आयी। पूर्वी सोन नहर अकोढी गोला से आरा जिले में गंगा तक पंहुची। दोनो नहरें करीब 100 किमी लम्बी हैं। इससे बक्सर और आरा जिलों का बड़ा खेती का इलाका सिंचित होता है।

बक्सर सोन नहर से निकली एक उप नहर। दूसरा चित्र नहर पर बनाये ग्रामीण पैदल पुल का है।

सो, आज यात्रा में, प्रेमसागर जिस नहर और उसपर बने पुल का चित्र भेज रहे थे, वह 1874 की बनी है। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे लोगों से पता करें कि नहर आज भी कितनी प्रभावी है। पदयात्रा करते हुये प्रेमसागर ने इस पश्चिमी सोन नहर पर अपनी यात्रा के दौरान चार बड़ी नहरें और पैंतीस छोटी नहरें निकलती देखीं। इन छोटी-बड़ी नहरों से यह पश्चिमी सोन नहर एक बड़े भू भाग को सिंचित करती है। किसानों ने प्रेमसागर को बताया कि पूरे साल नहर में पानी रहता है। किसी किसी साल पानी की कमी होने पर फरवरी-मार्च में पानी नहीं होता, अन्यथा हमेशा सिंचाई के लिये पानी मिलता है। इन नहरों के कारण लोगों ने कुंये या ट्यूब वेल का प्रयोग नहीं किया। हाल में नीतिश सरकार ने जब बोरिंग करने पर पचहत्तर प्रतिशत की सबसिडी दी, तब कुछ लोगों ने ट्यूब वेल लगाए। अन्यथा सारी सिंचाई इसी नहर से होती है।

नहर के पार जो दो छोटे कमरे दिख रहे हैं, उनमें पिपरमिण्ट का आसवन होता है।

प्रेमसागर ने कई तरह की खेती देखी। धान, गेंहू, चना, सरसों तो होता ही है। उसके अलावा कमलगट्टा और मखाना व्यापक तौर पर होता है। एक जगह प्रेमसागर को पिपरमिण्ट की खेती और उसके आसवन का एक प्लाण्ट भी दिखा।

प्रेम सागर ने ही गुजरात यात्रा के दौरान मुझे नर्मदा नहरों के द्वारा गुजरात की ग्रामीण खुशहाली दिखाई थी। कुछ वैसा ही कर्नल डिकेंस और कर्नल रेण्डाल के इन सोन नहरों से भी हुआ होगा। इन नहरों से ग्रामीणों को लाभ हुआ होगा पर लाभ ब्रिटिश लोगों ने कमाया भी खूब कमाया होगा।

पूरे दिन मैं बक्सर की इस सोन नहर और प्रेमसागर के दिये इनपुट्स से चमत्कृत होता रहा। प्रेमसागर की इस यात्रा से न जुड़ा होता तो मुझे डेढ़ सौ साल पहले का यह सिंचाई इतिहास, जो आज भी प्रभावी है; पता ही नहीं चलता।

सोन नहर के सहारे प्रेमसागर बक्सर से सिकरौड़ तक 18 किलो मीटर चले। आगे वे नवानगर/बिक्रमगंज की ओर मुड़ गये। यह रास्ता आगे दाऊद नगर में सोन नदी पार करता है।

शाम चार बजे प्रेमसागर नवानगर पार कर चालीस किमी चल कर सेमरी के आगे रात्रि विश्राम के लिये रुके। खुले में या किसी मंदिर में रुकना खतरे से खाली नहीं था। मंदिर वालों ने बताया – “बाबा, होली का मौसम है, नौजवान बदमाशी कर सकते हैं। रात में होलिका जलनी है। खुले में सोने पर कोई हो सकता है आपका सामान उठा कर होलिका में डाल दे”।

सो प्रेमसागर ने लॉज तलाशी। एक जगह उन्हें कमरा मिला। मांग तो वह एक हजार की कर रहा था, पर प्रेमसागर ने अपना सब सामान दिखा कर बताया कि वे दो सौ ही दे सकते हैं। झिक झिक हुई पर कमरा मिल गया दो सौ में। “भईया पास में ही लाइन होटल (ढाबा) से भोजन मिल जायेगा”। फिलहाल प्रेमसागर ने बताया कि उन्हें हल्की हरारत है। वे मेडीकल दुकान से दवाई ले कर सोने का प्रयास करेंगे।

आगे की यात्रा –

सेमरी से दाऊद नगर करीब 45 किमी है और उसके आगे सत्तर किमी है गया। तीन चार दिन लगेंगे गया पंहुचने में। कल होली के दिन निकलना-चलना शायद ही हो पाये। फिर भी, देखें आगे क्या होता है।

ॐ मात्रे नम:। हर हर महादेव।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

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