डिण्डौरी – नर्मदा किनारे धर्मशाला में रात्रि


29 सितम्बर 21, रात्रि –

धर्मशाला वालों ने बहुत मान सम्मान किया। कमरे में झाड़ू लगवा कर दरी बिछवाई, गद्दा, चादर और कम्बल आदि साफ साफ दिये। धर्म शाला थी तो चारपाई नहीं थी, गद्दा फर्श पर ही लगा। बड़े आदर-प्रेम से भोजन कराया। “लगता है नर्मदा माई अपने पास रात में सुलाना चाहती थीं, सो उन्होने धर्मशाला में बुला लिया। अब कल सवेरे यहीं माई की गोद में स्नान कर आगे बढ़ूंगा।”

गाड़ासरई से डिण्डौरी की यात्रा कुछ कष्टदायक रही होगी। रास्ते में सड़क भी कहीं कहीं खराब थी। गिट्टी चुभ रही थी नंगे पैरों में। धूप भी थी और सड़क तप भी रही थी। उमस भी ज्यादा थी और फिर बारिश आ गयी। एक मंदिर में प्रेमसागर ने विश्राम किया। तीन घण्टे।

रास्ते में सड़क को चार लेन का बनाने का काम भी चल रहा था। उसके सम्बंध में एक दो चित्र भेजे हैं, पर उनसे गतिविधि स्पष्ट नहीं होती। चलते चलते लिये उनके चित्रों में कई बार बांयी ओर उनकी कांवर का कोई अंश भी आ जाता है। एक चित्र में एक नदी के पुल पर दांयी ओर एक ट्रक का कोना है और उसके बाद कपड़े का तिकोना टेण्ट जैसा रंगीन कपड़ा। यह ‘टेण्ट’ मुझे कई चित्रों में दिखा। तब समझ आया कि यह दृश्य का अंग नहीं है, दृष्टा का सामान है! :-)

कांवर पर वजन साधना और हाथ में स्मार्टफोन के कर चित्र लेने का प्रयास करना – प्रयाग से यात्रा शुरू करते समय प्रेमसागर को नहीं पता रहा होगा कि यह कार्य भी उनकी यात्रा का अभिन्न अंग हो जायेगा।

यह ‘टेण्ट’ मुझे कई चित्रों में दिखा। तब समझ आया कि यह दृश्य का अंग नहीं है, दृष्टा का सामान है!

एक जगह प्रेम सागर जी को उड़द की दंवाई करते पांच बैलों का युग्म दिखा। चित्र बहुत अच्छा आया है। उससे कई चीजें मुझे स्पष्ट हुईं। पहली बात तो यह कि उड़द की फसल – अभी कुआर महीने का पूर्वार्ध ही है – खलिहान में आ गयी है। दूसरे, मध्यप्रदेश में इस भाग में ट्रेक्टर का नहीं, बैलों का उपयोग खेती में हो रहा है। बैल भी स्वस्थ लग रहे हैं। उनकी हड्डियाँ नहीं दिख रहीं। इसका अर्थ है कि खेती किसानी में उनका नियमित योगदान है। किसान उनकी देखभाल ठीक से कर रहा है। तीसरे, पांच बैलों को एक साथ दंवाई में प्रयोग मैंने अपनी पिछली किसी याद में नहीं पाया – अपने बचपन को खूब कुरेदने पर भी। एक दो या ज्यादा से ज्यादा तीन बैल एक साथ दंवाई में प्रयोग होते देखे हैं। दो चित्र भेजे हैं प्रेम सागर जी ने। एक में बैल ही हैं और दूसरे में पीछे किसान एक पतली डण्डी लिये चल रहा है; जिससे कि अगर कोई बैल रुके तो उसके पृष्ठ भाग को खोद सके। चित्र इतना बढ़िया लगा कि मैंने उसे ब्लॉग हेडर बना लिया!

पांच बैलों से उड़द की दंवाई

मुझे लगा कि सप्ताह भर में किसान के यहां उड़द की नयी दाल दल कर तैयार हो जायेगी। नवरात्रि में किसी दिन बड़ा (दही बड़ा) जरूर बनेगा। कल्पना करने में ही मेरे मुंह में पानी आने लगा। उड़द का बड़ा – यहां उसे अवधी में बरा कहते हैं – और ढेर सारा पतला साम्भर मेरा प्रिय नाश्ता है। कल तो मातृ नवमी है। मेरे घर पर स्वर्गीय अम्मा की स्मृति में चने की दाल भर कर पूरी-पराठा बनेगा। कोंहड़ा की तरकारी और खीर साथ में होगी, इसलिये कल तो नहीं पर एक दो दिन बाद यह बड़ा साम्भर जरूर बनेगा – प्रेम सागर जी की यात्रा के साथ यूं जुड़ा जायेगा! :-)

प्रेम सागर बताये कि एक दो नदियां और मिलीं रास्ते में, उनके चित्र भी उन्होने लिये पर लगता है खांची भर चित्रों में लदने से वे रह गये। बहरहाल रास्ता, चित्रों से लगता है कि बहुत ऊंचाई नीचाई वाला नहीं है। नर्मदा, जो साथ साथ दांये चल रही होंगी प्रेम सागर के – साथ साथ पर दृष्टि के पार – वे भी पहाड़ पर उछलने कूदने से थक कर कुछ शांत हो चुकी होंगी।

चित्र प्रेमसागर ने रात साढ़े दस बजे भेजे। यह भी लिखा कि वे डिण्डौरी में राठौड़ धर्मशाला में रात विश्राम करेंगे। धर्मशाला नर्मदा तट पर है। मैंने उन्हें रात साढ़े दस बजे फोन कर पूछा तो उन्होने बताया कि वन विभाग में इंतजाम नहीं था। वहीं पता चला कि नर्मदा किनारे धर्मशाला है। वहां रुक जायें। धर्मशाला वालों ने पहले तो सौ रुपया किराया लिया, पर जब यात्रा का ध्येय उनको पता चला तो वे किराया वापस करने लगे। प्रेमसागर ने कहा कि अब जब दे ही दिया है तो उसका मंदिर में प्रसाद चढ़ा दीजियेगा।

उसके बाद धर्मशाला वालों ने बहुत मान सम्मान किया। कमरे में झाड़ू लगवा कर दरी बिछवाई, गद्दा, चादर और कम्बल आदि साफ साफ दिये। धर्म शाला थी तो चारपाई नहीं थी, गद्दा फर्श पर ही लगा। बड़े आदर-प्रेम से भोजन कराया। “लगता है नर्मदा माई अपने पास रात में सुलाना चाहती थीं, सो उन्होने धर्मशाला में बुला लिया। अब कल सवेरे यहीं माई की गोद में स्नान कर आगे बढ़ूंगा।”

30 सितम्बर 21, सवेरे –
डिण्डौरी में नर्मदा में स्नान के बाद प्रेमसागर।

सवेरे पौने सात बजे प्रेमसागर से बात हुई तो वे डिण्डौरी से निकल चुके थे। निकले ही थे। करीब पंद्रह मिनट हुआ था। सवेरे धर्मशाला वालों ने पूरे सम्मान से चाय पिला कर विदा किया। नर्मदा में स्नान के समय लिये चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं। सवेरे बादल थे और नदी के जल के समीप हल्की धुंध थी। अन्यथा डिण्डौरी में नर्मदा अपने पूरे सौंदर्य के साथ होती हैं। मानो अपने पिता अमरकण्टक/मैकल के यहां से उछलती कूदती आ कर यहां कुछ विश्राम करती हों और अपना सिंगार करती हों। यहां के बाद वे मण्डला की ओर मुड़ जाती हैं। प्रेमसागर को सीधे जबलपुर निकलना था। वे द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के अनुशासन से बंधे हैं, नर्मदा माई की परकम्मा के अनुशासन से नहीं। उन्होने नर्मदा माई को प्रणाम किया। पुल पार कर नर्मदा के बांयी ओर से दांई ओर आ गये। नर्मदा माई मण्डला घूम कर जबलपुर आयेंगी और वे सीधे पंहुचेंगे।

आज प्रेमसागर करीब चालीस किलोमीटर चल कर अमेरा पंहुचेंगे। कल जो चलने में कष्ट हुआ है, उसको ध्यान में रख कर अब उन्होने रबड़ की सैण्डल खरीदने का मन बना लिया है। मेरी पत्नीजी कहती हैं कि उन्हें सेण्डल खरीदने का पैसा भेज दो। मैं उन्हें कुछ कहता नहीं। प्रेमसागर पर शंकर भगवान और नर्मदा माई – दोनों की असीम कृपा है। मैं कौन होता हूं उन्हें देने वाला। मेरा काम महादेव जी ने लिखने का बांट दिया है, वही देखता हूं!

प्रेम सागर ने नर्मदा माई को प्रणाम किया। पुल पार कर नर्मदा के बांयी ओर से दांई ओर आ गये। नर्मदा माई मण्डला घूम कर जबलपुर आयेंगी और वे सीधे पंहुचेंगे।

आज मातृ नवमी है। अम्मा जी की स्मृति में दाल की पूड़ी, कोंहड़ा की तरकारी और खीर बनी है। नहा धो कर मैं अम्मा को और अपने पिताजी, बाबा, आजी, नाना, नानी – सब को प्रणाम करता हूं। आज वह भी किया और प्रेमसागर जी की यह पोस्ट भी लिखी। सब हड़बड़ी में हुआ है। कुछ छूट भी गया होगा। उसे बाद में अपडेट करूंगा। अभी अम्मा जी की स्मृति में दान देने के लिये बाहर जाना है। … की बोर्ड पर बैठने के लिये पत्नीजी आज तमतमाई नहीं, पर लगता है प्रेम सागर जी के चक्कर में अपनी दिन चर्या में कुछ परिवर्तन करने होंगे। जैसे प्रेम सागर सवेरे उठ कर स्नान पूजा कर लेते हैं; मुझे भी वह कर लेना चाहिये। उसके बाद वे कांवर संभालते हैं और मुझे तब की-बोर्ड संभालना चाहिये। … यात्रा और डिजिटल यात्रा की जुगलबंदी में सुर कुछ बेहतर सामंजस्य से निकलने चाहियें! :lol:

आज की यात्रा – डिण्डौरी से अमेरा
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कोदों का भात – करंजिया से गाड़ासरई


28 सितम्बर 2021 शाम –

आज तपती सड़क पर पैर जला। मैंने उनसे पूछा – सैण्डल लेने की नहीं सोची? बताये – “सोचा; पर भईया मन माना नहीं। आज लोगों ने बताया कि डिण्डौरी के रास्ते कहीं चट्टी (कपड़े का स्ट्रैप लगी खड़ाऊं) मिलती है। वह मिली तो खरीदूंगा।

आज गर्मी बहुत थी। सड़क तप रही थी। चलने में दिक्कत हुई। थकान भी ज्यादा। दूरी भी करीब चालीस किलोमीटर से ज्यादा। प्रेमसागर पांड़े सवेरे छ बजे निकल लिये थे करंजिया रेस्ट हाउस से पर शाम साढ़े सात बजे तक पंंहुचे गाड़ासरई। रास्ते में ज्यादा गांव मिले नहीं। गोरखपुर तक दो गांव और गोरखपुर के बाद गाड़ासरई तक तीन गांव। बस। “गांव रहे होंगे पर सड़क से दूर रहे होंगे।”

प्रेम सागर ऊर्जा के लिये दिन में चाय की दुकानों पर रुकते हैं। चाय के साथ एक दो बिस्कुट भी ले लेते हैं। आज चाय की दुकानें भी ज्यादा नहीं दिखीं। गोरखपुर के पहले एक और उसके बाद दो चाय की दुकानें। वहीं रुक कर थोड़ा सुस्ताना भी हो जाता है। “सड़क गर्म हो गयी थी, पर रास्ता ठीक था। ऊंचा नीचा था, पर ज्यादा नहीं। जंगल भी अधिक नहीं थे। पहाड़ियां दूर दूर दिखती थीं। दो नदियाँ और आठ नाले मिले। नदियों के नाम बताने वाले नहीं थे और उनपर कोई किनारे नाम भी लिखे नहीं दिखे।”

कोदों का भात खाये प्रेमसागर

गाड़ासरई रेस्ट हाउस आने पर पता चला कि इलाके में मोटे अन्न – कोदों, सांवा और तिन्नी के चावल की खेती होती है। प्रेम सागर ने अनुरोध किया कि कोदों का चावल बनाया जाये। “कोदों मैंने सुना था पर उसका भात पहले खाया नहीं था। खाया तो बहुत स्वादिष्ट लगा। कोदों का भात और 2-3 रोटी ली रात के खाने में। वहां के लोगों कह दिया है कि पांच किलो कोदों आपके लिये रख दें। इसी रास्ते लौटना हुआ तो आपके लिये लेता आऊंगा। शुगर के लिये ज्यादा फायदेमंद रहता है।”

प्रेम सागर के आगे अभी बहुत सी यात्रा शेष है। पर वे लौटानी की और डिण्डौरी-गाड़ासरई के मार्फत लौटानी की सोच ले रहे हैं। दूसरे मेरे बारे में फिक्र कर रहे हैं – यह देख कर सुखद अनुभूति हुई।

लोग अमृतलाल वेगड़ जी की नर्मदा यात्रा की तुलना इस यात्रा से करने लगते हैं। पर दोनो यात्राओं की मूल प्रकृति भिन्न है। वेगड़ जी, उनकी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को अलग रख दिया जाये; नर्मदा की परिक्रमा कर रहे थे। वे तीरे तीरे चल रहे थे। अमरकंटक से रवाना होने पर कपिलधारा के बाद उनके पास सड़क मार्ग से चलने का विकल्प था। पर उन्होने वन में छिपी नर्मदा के किनारे किनारे चलने का ‘जोखिम’ लिया। उनकी यात्राओं में स्थानीय लोगों से मेलजोल बातचीत खूब है। उनका नित्य ठहरने और भोजन बनाने का अनुष्ठान भी पाठकोंं को रसरंजित करता है। उनकी यात्रा धीरे धीरे बहती है। वे नर्मदा के सौंदर्य को देखते सूंघते परखते चलते हैं।

पर प्रेमसागर को नर्मदा माई की परिक्रमा नहीं करनी है। उनको द्वादश ज्योतिर्लिंग दर्शन करने हैं और उन्हें जल चढ़ाना है। उनके साथ लोगों की टोली नहीं है। ‘एकला चालो’ का भाव है। नर्मदा उनके दांये डेढ़ दो किलोमीटर पर ही बह रही होंगी पर उनका रास्ता सड़क से हिलता नहीं – भले ही पांव डामर की सड़क पर तपते हैं। उनका ध्येय शाम तक नियत वन विभाग के पड़ाव तक पंहुचना होता है। कोई नदी नाला या नर्मदा मिल गयीं तो ठीक वर्ना उन्हें रोज के अपने चलने के किलोमीटर गिनने हैं।

रास्ते में मिली एक नदी। नाम बताने वाला कोई आसपास नहीं था

प्रेमसागर के साथ डिजिटल यात्रा करते हुये मैं उस यात्रा में ‘वेगड़त्व’ तलाशने का (असफल) प्रयास करता हूं। यात्रा के माधुर्य और सौंदर्य की बजाय मुझे संकल्प-शिव भक्ति-धर्म और परम्परा निर्वहन की सोचनी चाहिये। पर वह मैं कर नहीं पाता। महादेव ने शायद यात्रा वृत्तांत लिखने के लिये मुझ जैसे आदमी को गलत चुना। उन्हें ‘भदोहिया भुच्च’ की बजाय किसी काशी के पण्डित को चुनना चाहिये था। जिसकी विषेशज्ञता रुद्राष्टाध्यायी में होती!

और प्रेमसागर के चक्कर में मैं अपना इतना समय की-बोर्ड पर दे रहा हूं कि मेरी पत्नीजी आज उखड़ गयी हैं – “तुम्हारी चाय पड़े पड़े ठण्डी हो जाती है। तुम्हें मेरी कोई फिक्र ही नहीं। दिन रात प्रेमसागर-प्रेमसागर। एक अलग कमरा ले लो। साल दो साल जब तक यात्रा चलती है, तुम अलग ही धूनी रमाओ!” :lol:

आज की यात्रा के समाप्ति पर रेस्ट हाउस के लोगों के साथ का एक चित्र भेजा है। चित्र में वन विभाग के जो लोग हैं उनके नाम भी बताये हैं। रात में लिया चित्र बहुत साफ नहीं है। पर यात्रा में अपना योगदान देने वालों को ब्लॉग पर स्थान देना भी जरूरी है; इसलिये मैं चित्र लगा रहा हूं।

पुष्पेंद्र, प्रेमसागर, जगन्नाथ और महेंद्र पाठक

रास्ते में जो चित्र प्रेमसागर ने खींचे हैं, उनमें धान का खेत, एक टूरिस्ट लोगों को रहने का भव्य स्थान, एक नदी और गांव के छप्पर और एसबेस्टॉस शीटों की मिली जुली छत के मकान हैं। प्रेम सागर चलते ही चले गये होंगे। धान के खेत के पास रुक कर उसमें निकलती धान की बालों की गंध सूंघने का प्रयत्न तो नहीं किया होगा। उनकी यात्रा का ध्येय ही अलग प्रकार का है। मैं उनसे इस विषय में पूछता भी नहीं।

आज तपती सड़क पर पैर जला। मैंने उनसे पूछा – सैण्डल लेने की नहीं सोची? बताये – “सोचा; पर भईया मन माना नहीं। यहां लोगों ने बताया कि डिण्डौरी के रास्ते कहीं चट्टी (कपड़े का स्ट्रैप लगी खड़ाऊं) मिलती है। वह मिली तो खरीदूंगा। वैसे शायद आगे रबर वाली सैण्डल लेनी ही पड़े।” … परम्परा, धर्म, जरूरत और संकोच की कशमकश में हैं प्रेमसागर। मैंने उन्हें कहा कि अगर चट्टी मिले तो उस दुकान का फोटो ले लीजियेगा और चट्टी का भी।

उनका अगला पड़ाव डिण्डौरी है।

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29 सितम्बर 21, सवेरे –

दो घण्टा चलने के बाद, करीब तेरह किलोमीटर की यात्रा कर चुके हैं प्रेमसागर साढ़े आठ बजे तक। उन्होने रेस्ट हाउस के कुछ चित्र भेजे हैं। जगन्नाथ जी का चित्र है जिन्होने भोजन बनाया था –

जगन्नाथ जी

पुष्पेंद्र जी और उनकी पत्नीजी का चित्र है। “भईया, हम खास तौर से यह चित्र भेज रहे हैं; काहे कि ये मेरे मना करने पर भी हमें एक किलोमीटर तक साथ छोड़ने आये। और वह भी नंगे पांव!”

पुष्पेंद्र जी और उनकी पत्नी जी।

रास्ते में एक नदी दिखी उन्हें। नाम था ‘सुरसरी” शायद देव नदी मानते होंगे लोग। प्रेमसागर ने बताया कि एक खास बात नोट की आज उन्होने – “आज जो भी रास्ते में मिला – बच्चा भी; वह ‘नर्मदे हर, नर्मदे हर’ बोल रहा था मुझे देख कर। इसके पहले यह नहीं होता था। यह बहुत अच्छा लगा मुझे।”

सुरसरी नदी

अभी इतना ही। बाकी शाम को लिखा जायेगा। :-)

नर्मदे हर! हर हर महादेव! जय हो!


जंगल ही पड़ा – अमरकण्टक से करंजिया


27 सितम्बर 21 शाम –

… पर यह लग गया कि महिला के पास कोई कपड़ा था ही नहीं। प्रेमसागर ने उसे अपना छाता दे दिया। और मन द्रवित हुआ तो अपनी एक धोती भी निकाल कर उसे दे दी। महिला लेने में संकोच कर रही थी। तब प्रेम सागर ने कहा – “ले लो। तुम्हें यहां जंगल में कोई देने वाला नहीं आयेगा। मेरी फिक्र न करो, महादेव की कृपा रही हो बाद में मुझे कई छाता देने वाले मिल जायेंगे। माई, मना मत करो।”

अमरकंटक में लगता है कुछ दूर छोडने आये थे रमानिवास वर्मा जी। उनके मोबाइल से मिले कुछ चित्र प्रेमसागर ने फारवर्ड किये हैं। एक चित्र में उनकी कांवर का पूरा व्यू है। प्रेमसागर ने बताया कि करीब पैंतीस किलो वजन होगा। पैंतीस किलो वजन के साथ अमरकंटक से करंजिया की 22-25 किमी की पूरी तरह वन से गुजरती सड़क से पदयात्रा की प्रेम सागर ने। जैसा चित्र में दिखता है – पैर नंगे ही हैं। सेण्डल नहीं खरीदी उन्होने। रमानिवास जी के चित्रों में नेपथ्य में नर्मदा का जल है। शायद झील सी बनाई है नर्मदा ने। उसके आगे तो – जैसा प्रेमजी ने बताया – नर्मदा की चौड़ाई 10-15 फिट ही है। आदमी पैदल पार कर ले!

करंजिया तक के रास्ते में पेड़ ही थे वन के। मुश्किल से 12-15 लोग दिखे। चरवाहे। कोई बस्ती नहीं किसी भी तरफ। रास्ता ऊंचा नीचा था। शुरू में नर्मदा दूर दिखीं – कपिलधारा और कबीर आश्रम। उसके बाद तो बंदर ही थे। बहुत से बंदर थे – दो तीन सौ रहे होंगे। झुण्डों में। वह तो अच्छा था कि वर्माजी ने एक डण्डा दे दिया था, वर्ना वे आक्रमण भी कर सकते थे।

एक जगह एक 22 साल की महिला शिशु को लिये जा रही थी। अकेले। धूप तेज थी। गरीब दिखती थी महिला। प्रेम सागर ने उससे कहा कि धूप तेज है, कोई गमछा-कपड़ा उढ़ा दो बच्चे को। पर यह लग गया कि महिला के पास कोई कपड़ा था ही नहीं। प्रेमसागर ने उसे अपना छाता दे दिया। और मन द्रवित हुआ तो अपनी एक धोती भी निकाल कर उसे दे दी। महिला लेने में संकोच कर रही थी। तब प्रेम सागर ने कहा – “ले लो। तुम्हें यहां जंगल में कोई देने वाला नहीं आयेगा। मेरी फिक्र न करो, महादेव की कृपा रही हो बाद में मुझे कई छाता देने वाले मिल जायेंगे। माई, मना मत करो।”

वन विभाग के करंजिया रेस्ट हाउस में पंहुच कर वहां के दो लोगों के साथ एक चित्र भेजा। नाम लिखा – गणेश दुबे और एस के बर्मन। आज ज्यादा चलना नहीं हुआ, पर पैंतीस किलो वजन उठा कर चलना अपने आप में मेहनत का काम है और वह भी जब 1000 मीटर से 800 मीटर की ऊंचाई पर अमरकण्टक का पहाड़ पार किया जा रहा हो – ऊंचाई-नीचाई के साथ।

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गणेश दुबे (बांये) और एस के बर्मन (दांये) के साथ करंजिया रेस्ट हाउस में प्रेमसागर
28 सितम्बर 21, सवेरे –

कल प्रेमसागर से बात नहीं हो पाई। रास्ते भर फोन नहीं लगा। जंगल में शायद नेटवर्क नहीं काम करता। करंजिया में भी फोन तो लगा पर आवाज ऐसी नहीं थी कि बात हो सके। मैंने आज सवेरे सवेरे जल्दी ही उनसे बात की। उन्होने कल के यात्रा विवरण के साथ बताया कि रेस्ट हाउस में शारदा लाल यादव जी ने बड़े आग्रह से उन्हें सात आठ चपातियाँ खिला डालीं। चार तो सब्जी के साथ थी। उसके बाद तीन-चार दूध के साथ। “इतना ज्यादा कभी खाता नहीं था मैं”।

खाने के बाद मना करने के बावजूद उन्होने पैर भी दबाये और फिर सारे शरीर की मालिश भी कर दी। यह बताते हुये प्रेम सागर की आवाज में शायदा लाल जी के प्रति कृतज्ञता मिश्रित नमी झलक रही थी।

शारदा लाल यादव जी

प्रेम सागर जी ने बताया कि रेस्ट हाउस के आस पास बस्ती नहीं है। कुछ दूरी पर गांव शायद है।

बात सवेरे पांच बजे हुई थी। छ बजे उन्होने उजाला होने पर आसपास के चित्र भेजे। आज वे करंजिया से गाड़ासरई तक की यात्रा करेंगे। गूगल मैप के अनुसार रास्ता ऊंचा नीचा है। आठ सौ पैंतीस मीटर से 729 मीटर की ऊंचाई नीचाई है। आज चलना भी ज्यादा पड़ेगा – करीब चालीस किलोमीटर।

नर्मदे हर! हर हर महादेव! जय हो!

करंजिया से गदासराय


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