माधवपुर


13-14 दिसम्बर 21 –

माधवपुर सौराष्ट्र का एक तटीय गांव या कस्बा है। छोटा पर सांस्कृतिक रूप से समृद्ध। तेरह दिसम्बर की शाम प्रेमसागर अपनी द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के अंतर्गत नागेश्वर जाते हुये यहां पंहुचे थे। वहां जनक भाई के आतिथ्य में एक दिन ठहर कर उन्होने आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखा।

माधवपुर घेड के नाम से एक पर्यटक वेबसाइट है जो सुंदर चित्रों के साथ माधवपुर की जानकारी देती है। वेब साइट के अनुसार यहां दर्शनीय है – माधवराय का प्राचीन मंदिर, माधव रमणीय समुद्र तट, रामनवमी के दौरान कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का विवाह आयोजन और उसका व्यापक उत्सव, ओशो का एक आश्रम, वल्लभाचार्य की एक ‘बैठक’ और एक कछुओं के अण्डों से बच्चे जनने की हेचरी। “घेड” शब्द का अथ जानने के लिये मैंने नेट पर ही छानबीन की।

घेड का अर्थ व्यापक आद्रभूमि (wetland) से है। समुद्रतटीय इलाके में यह घेड क्षेत्र वर्षा के मौसम में अधिक जलवृष्टि का जल अपने में भर लेते हैं। इससे बाकी रिहायशी स्थल बाढ़ से बच जाते हैं। माधवपुर की यह आद्रभूमि गूगल नक्शे में बहुत व्यापक क्षेत्र में नहीं दिखती पर पोरबंदर के आसपास भादर और ओजत नदियां जब समुद्र में मिलती हैं तो करीब 100 वर्ग किलोमीटर के घेड क्षेत्र से गुजरती हैं। इन नदियों में बारिश के मौसम में व्यापक तबाही मचाने की क्षमता होती होगी। पर घेड क्षेत्र होने के कारण कोई जलप्लावन रिहायशी इलाके में नहीं होता। उस आद्रभूमि के कारण वनस्पतीय, जैव और जानवरों की भी विविधता होती होगी और पर्यावरण भी पुष्ट होता होगा। उसके बारे में अलग से जानकारी लेने का यत्न करूंगा।

एक माधवपुर नाम का स्थान नेपाल में है, जिससे इस माधवपुर का कोई सम्बंध नहीं है। यह माधवपुर तो कृष्ण के रुक्मिणी विवाह से पौराणिक महत्व रखता है।

मेरे पास प्रेमसागर के ठेले चार पांच दर्जन चित्र हैं। कुछ समझ आ रहे हैं और कुछ का संदर्भ समझ नहीं आता।

प्रेमसागर ने इन स्थलों के भ्रमण के बाद चार पांच दर्जन चित्र, थोक में, संदर्भ रहित मेरे पास ह्वाट्सएप्प पर ठेल दिये। उनका विवरण देने के लिये कोई फोन करने की औपचारिकता या शिष्टाचार पालन भी नहीं किया। उन्हें जनक भाई और अन्य लोगों का आतिथ्य सत्कार मिल रहा है, ऐसे में मुझे फोन करने का ध्यान कहांं! गुजरात में छोटा उदयपुर से वडोदरा के इलाके में भी उनका इसी प्रकार का व्यवहार दिख चुका है – जहां लोग उन्हें धर्म श्रद्धा में भाव देते रहे और प्रेमसागर अपनी यात्रा के मूल अनुशासन को भूल उसी में मगन रहे। शंकर भगवान बीच बीच में यह परिवर्तन उनकी परिस्थितियों में करते रहे हैं। अब फिर कर रहे हैं। अब फिर, शायद प्रेमसागर के बारे में ब्लॉग लिखने की आवृति कम होते जाने का समय आ रहा है। शायद! :lol:

माधवराय का 15वीं सदी का पुराना मंदिर तो मुस्लिम आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया है। इधर, गांगेय प्रांत में तो उस बर्बरता को गंगा-जमुना संस्कृति का वर्क चढ़ाया जाता है; वहां गुजरात में कोई और नाम दिया जाता होगा इस बर्बरता को जस्टीफाई करने के लिये। उस पुराने मंदिर के खण्ड दिखते हैं। एक नया माधवराय मंदिर बना है कहीं आसपास पर उसका चित्र प्रेमसागर के चित्रों में चिन्हित नहीं होता। प्रेमसागर को मैं अनेकानेक बार कह चुका हूं कि चित्र भेजते समय उसके परिचय में कोई पंक्ति या वॉइसनोट डाल दिया करें। पर प्रेमसागर में वह डिसिप्लिन कभी आया ही नहीं। अनगढ़ व्यक्ति है यह! यह आदमी ट्रेवल-ब्लॉग लेखन के लिये गढ़ा ही नहीं गया है।

माधवराय का 15वीं सदी का पुराना मंदिर तो मुस्लिम आक्रांताओं ने नष्ट कर दिया है।

दिलीप थानकी जी ने बताया कि कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का उत्सव वैसे ही मनाया जाता है जैसा परम्परा में होता रहा होगा। उनके मायके और मामा के इलाके के लोग विदर्भ, झारखण्ड (?) और असम (?) से यहां आते हैं। माधवराय मंदिर में विवाह की सभी रस्में विधिनुसार सम्पन्न होती हैं। एक रथ पर कृष्ण-रुक्मिणी की सवारी पूरे गांव में निकलती है। लोग नाचते गाते साथ चलते हैं और एक दूसरे पर अबीर-गुलाल भी लगाते हैं। रामनवमी के दौरान पांच दिन चलता है यह उत्सव। उसके पर्यटन महत्व का दोहन भी किया जाता है।

थानकी जी ने बताया कि यहां रजनीश (ओशो) का एक प्राचीन शैली का आश्रम है जिसमें ओशो के अन्य आश्रमों जैसी तड़क भड़क नहीं है। शांत जगह है और वहां जाना अच्छा लगता है। वेबसाइट के अनुसार वहां ओशो परम्परा के स्वामी ब्रह्मवेदांत जी रहते हैं। आश्रम में बिना पैसा दिये भी रहा जा सकता है। वहां आश्रम की दिनचर्या के नियमों का पालन करना होता है। स्थान रमणीय है।

ओशो आश्रम के चित्र का स्क्रीनशॉट। मूलचित्र इस वेबसाइट पर है।

माधवपुर के समुद्र तट के जो चित्र इण्टर्नेट पर दिखते हैं वे बहुत मोहक हैं। पूरी वेबसाइट देखने पर मन होता है कि यहां भदोही जिले में रिहायश बनाने की जगह एक कुटिया मुझे वहीं माधवपुर में बना कर बस जाना चाहिये था! एक ऐसा एक डेढ़ कमरे का स्थान जहां से समुद्र तट डेढ़ दो किलोमीटर की दूरी पर हो। मन होता है कि थानकी जी या जनक भाई से पूछूं कि किराये पर ऐसा कमरा कितने में मिल सकेगा जिसमें कुछ बेसिक फर्नीचर हो और आसनी से रहा जा सके। सुबह शाम समुद्र तट पर व्यतीत करना और दिन में सोचना और लिखना – कितना आनंद रहे! पर हर स्थान जो प्रकृति के समीप होता या दिखता है, लुभाता है। शायद एक मोबाइल घर होना चाहिये जिसपर जहां मन हो पार्क कर महीना दो महीना रहा जाये, फिर वहां से निकल कर कहीं और! जॉन स्टाइनबैक के “ट्रेवल्स विथ चार्ली” की तरह एक ट्रक की बॉडी पर बने घर/सैलून को लेकर!

रेलवे की नौकरी में सैलून की यात्रा की आदत रही। लगभग 80 प्रतिशत यात्रायें वैसे ही की हैं। अब कोई कम्पनी इस तरह के ट्रक बॉडी पर घर/सैलून बना कर किराये पर देने लगे तो मेरे जैसे कई लोग होंगे जो उसका प्रयोग करना चाहेंगे। वे जो मात्र पर्यटक नहीं हैं – वे जो घुमंतू जीवन का अनुभव करना चाहते हैं अपनी धीमी रफ्तार से। वे जिनके लिये यात्रा महत्वपूर्ण नहीं है। जिनके लिये अनुभव महत्व का है। उगते और अस्त होते सूरज का अनुभव! जंगल और घेड का अनुभव!

मेरे पास प्रेमसागर के ठेले चार पांच दर्जन चित्र हैं। कुछ समझ आ रहे हैं और कुछ का संदर्भ समझ नहीं आता। प्रेमसागर का फोन नहीं आया और मैं अपनी ओर से करना नहीं चाहता। जीडी; यह कांवर ऑब्सेसन बहुत अच्छी बात नहीं। प्रेमसागर की लाइफ और लाइफस्टाइल जितना दिखे, देखो; पर उसे जानने का जुनून न पालो! इग्यारह बजे पोस्ट करने की भी क्या बाध्यता है? जब वे सज्जन बतायेंगे, तब देखा जायेगा। नहीं तो जो लिखा है, वही काफी है।

15 दिसम्बर 21 सवेरे –

सवेरे प्रेमसागर अवतरित हुये। सौ से ऊपर फोटो ठेलीं आज सवेरे, कल के उनके भ्रमण की। थोक में अपनी गैलरी मुझे थमा दी। उसमें दो दर्जन फोटो बनारस में मोदी के कार्यक्रम की भी हैं। कुछ मेरे ही ब्लॉग के स्क्रीनशॉट हैं जो किसी ने उन्हे भेजे होंगे। मैंने उन्हे कहा भी कि इनका मैं क्या उपयोग करूं? उन्हें मुझे आठ दस फोटो देनी चाहियें। उनके साथ वॉइस नोट या एक पंक्ति का लेखन होना चाहिये जिससे उन्हें लिंक किया जा सके।

जनक भाई के परिवार का चित्र।

माधवराय के भग्न मंदिर का मात्र एक चित्र है जिससे स्पष्ट नहीं होता कि उसे कितना खण्डित किया गया और कितना वह समय से रखरखाव के अभाव में खण्डहर बना। समुद्र के बीच का कोई चित्र नहीं है। जनक भाई के परिवार के अनेकानेक चित्र हैं पर यह नहीं पता चलता कि जनक ठाकर जी कौन हैं और कौन दूसरे लोग। यह भ्रम-संशय पहले भी होता रहा है पर बहुत बार मैं इत्मीनान से उनसे बात कर समझ लिया करता था। अब प्रेमसागर के पास समय का टोटा है।

आज वे तीस किलोमीटर चलेंगे, उसके बाद किसी वाहन से पोरबंदर जा कर रात्रि विश्राम करेंगे। कल या परसों वापस उसी स्थान पर आ कर वहीं से कांवर यात्रा प्रारम्भ करेंगे। पोरबंदर में उनके लिये कोई आयोजन है, जिसमें शामिल होना है। … यह प्रेमसागर के कांवर यात्री से आयोजनों में शामिल होने का फेज है। यह पहले भी हो चुका है। नया नहीं है! इस रूपांतरण में ब्लॉगानुशासन का कचरा होता है। वह होगा! :lol:

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

नीलकंठ वर्णी और माधवपुर


शिव भक्त प्रेमसागर की यात्रा इस समय वैष्णवों के बीच और वैष्णवों के पूरे आदर से सराबोर हो रही है। आज सवेरे वे लोयेज के स्वामीनारायण नीलकण्ठ वर्णी स्वामी के मंदिर में थे। स्वामीनारायण की शिक्षापत्री में भगवान स्वामीनारायण के सूत्र दिये हैं जिनके अनुसार सामान्य व्यक्ति को, आचार्यों को, राजा और गृहस्थ को, शादी शुदा और विधवाओं को और ब्रह्मचारी/साधू को पालन करना होता है। वे सभी जीवन के ‘करने और न करने के नियम’ हैं। वे नियम वैष्णव परम्परा के अनुसार ही लगते हैं। कहीं कहीं वे सरल और सामान्य लगते हैं और कहीं लगता है कि उनका पालन करना कठिन होगा। वे माध्वाचार्य के द्वैत दर्शन के समीप लगते हैं। बाकी, उन सूत्रों का चूंकि मैंने सरसरी निगाह से ही अवलोकन किया है; मैं शिक्षापत्री पर कोई निश्चयात्मक टिप्पणी नहीं कर सकता।

यह जरूर है कि अभी पिछले कई वर्षों से अपने जीवन को जिस तरल तरीके से जीता रहा हूं, उसे आगे अगर मुझे शिक्षापत्री के नियमों से बांधना हो तो कठिन होगा। वैसे उन नियमों का सत्तर अस्सी प्रतिशत पालन तो मैं करना ही होऊंगा। प्रेमसागर शायद उससे ज्यादा करते होंगे – यद्यपि वे शैव हैं।

पूर्णत: नैतिक नियमों से बंध कर चलने में एक झंझट है। नियमपालन में उहापोह की स्थिति तो आती है। उस समय क्या किया जाये? तब नैतिक नियमों के मूल – धर्म या उसे जो भी नाम दें – पर जाने और अपने कार्य निर्णय की जरूरत महसूस होती है। वे धर्म सूत्र कहां हैं? स्वामीनारायण भगवान ने अपने प्रवचन दिये हैं जो उनके वचनामृत में संकलित हैं। उनमें शायद समाधान हो। … मैं जितना इस सब के बारे में सोचता हूं, उतना यात्रा विवरण लिखने से दूर होता हूं। धर्म-नैतिक-व्यवहार के बारे में लिखने की एक सीमा तो बनानी होगी। इसलिए यात्रा पक्ष पर लौटा जाये।

नीलकण्ठ वर्णी

सवेरे प्रेमसागर उठ कर बलदेव राजगुरु जी के साथ नीलकण्ठ वर्णी आश्रम का भ्रमण कर लिये। उन्होने उस कुंये का भी दर्शन किया जहां नीलकण्ठ वर्णी आये थे और जल ग्रहण किया था। कथा यह है कि उस कुयें पर महिलायें ही पानी भरती थीं और उन्होने नीलकण्ठ वर्णी को कहीं और जाने को कहा। उन्होने अपना गागर और रस्सी भी उन्हें नहीं दिया कुंये से पानी भरने के लिये। पर चमत्कार हुआ कि कुंये का पानी अपने आप ऊपर आ गया किशोर स्वामी की प्यास बुझाने के लिये। उससे गांव वालों को किशोर साधू की विलक्षणता का आभास हुआ। वहां वे गुरू रामानंद के शिष्यों के माध्यम से उनके सम्पर्क में आये और कालांतर में रामानंद जी ने उन्हें सहजानंद के रूप में दीक्षा दी। उन्हें अपने उद्धव सम्प्रदाय का उत्तराधिकारी भी बनाया। समय बीता और यह सम्प्रदाय कई शाखाओं में बंटा – अभी तीन शाखायें मुख्यत: नजर आती हैं। नीलकण्ठ वर्णी के इस लोयेज स्थित मठ को तीनो शाखायें श्रद्धा से देखती हैं।

उस कुंये की फोटोग्राफी पर प्रतिबंध के कारण प्रेमसागर वहां के चित्र नहीं ले पाये, पर उसे देखा इत्मीनान से।

प्रेमसागार को मठ के प्रमुख स्वामी जी का भी आशीर्वाद मिला। उन्होने नीलकण्ठ वर्णी की प्रतिमा पर जल भी चढ़ाया। एक चित्र में बलदेव राजगुरु जी भी जल चढ़ाते नजर आते हैं। मैंने प्रेमसागर से पूछा कि जल कौन सा चढ़ाया था – अपने कमण्डल का या नीलकण्ठ वर्णी परिसर का। उन्होने बताया कि वहीं का था। शायद उस पवित्र कूप का हो, जिसकी कथा नीलकण्ठ वर्णी के साथ जुड़ी है।

प्रेमसागर मठ के दर्शन के बाद माधवपुर के लिये रवाना हुये। कुछ ही किलोमीटर आगे उन्हें पंकज भाई अपने घर ले गये और उनका आतिथ्य सत्कार किया। दिलीप थानकी जी से बात करते हुये पता चला कि मार्ग में बहुत से लोगों को उन्होने प्रेमसागर के बारे में सूचना दे रखी है। इस पूरे समुद्र तटीय क्षेत्र में लोग सरल हैं, धर्म में श्रद्धा रखते हैं और उनमें धोखा देने की वृत्ति नहीं है। लोग शाकाहारी हैं और शराब का सेवन नहीं करते। बकौल दिलीप जी, लोगों में धूर्तता नहीं, भोलापन है और परनिंदा में समय व्यतीत नहीं करते। आतिथ्य की भावना उनमें सहज है।

कुछ ही किलोमीटर आगे उन्हें पंकज भाई अपने घर ले गये और उनका आतिथ्य सत्कार किया।

शाम के समय प्रेमसागर माधवपुर में थे। वहां जनक भाई से उनकी मुलाकात हुई। जनक भाई ने आग्रह किया कि प्रेमसागर वहां एक दिन और रुक जायें। इसी भाव के तो भूखे थे प्रेमसागर। वे रुक गये हैं। कल वे माधवपुर में रहेंगे। आसपास के स्थलों का दर्शन करेंगे। यहां समुद्र तट है, ओशो का मूल आश्रम है और कृष्ण के विवाह से सम्बंधित स्थल/कथायें भी हैं।

लगता है प्रेमसागर को आतिथ्य मिलता रहेगा नागेश्वर/द्वारका तीर्थ तक और प्रेमसागर की यात्रा जो सप्ताह-दस दिन में हो सकती थी, उसमें दुगना समय लगेगा। महादेव ने सोमनाथ की खूब भरपाई का इंतजाम कर दिया है।

जनक भाई और माधव पुर की चर्चा अगली पोस्ट में।

जय माधव! जय श्री कृष्ण! हर हर महादेव!

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प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

गड़ू से लोयेज


12 दिसम्बर रात्रि –

जब शुरू किया था तो अपेक्षा नहीं थी कि इतनी पोस्टें हो जायेंगी इस कांवरिया पर। लेकिन अभी तक न प्रेमसागर आउट हुये हैं न मैं। फर्क इतना पड़ा है कि मेरे आसपास इतना कुछ है जिसपर मानसिक हलचल होती है। अब उत्तर प्रदेश चुनाव का हल्ला शुरू हो रहा है। गांव की राजनीति अलग है। गौ गंगा गौरीशंकर पर दो तीन अधलिखी पोस्टें ड्राफ्ट में पड़ी हैं। पर सारा लेखन समय प्रेमसागर के खाते जा रहा है। यह भी नहीं है कि प्रेमसागर विषय की विविधता दे रहे हों। वे अपनी ओर से पूरी कोशिश करते हैं; पर यात्रा में देखने के नजरिये में वैविध्य लाना सरल काम नहीं है।

मैं इंतजार करता हूं कि प्रेमसागर उदासीनता दिखायें बताने में तो मैं लेखन की आवृति कम करूं। लेकिन वह होता नहीं। सोमनाथ के आसपास दर्शन की साठ फोटो मेरे पास भेज दी हैं। उनमें रिपिटीशन भी है। उन चित्रों में उपयुक्त का चयन करना, उन्हें क्रॉप और एडिट करना और उनपर प्रेमसागर का वाटरमार्क चस्पां करना भी समय खाता है। मैं कोशिश करता हूं कि बिना चित्रों के काम चलाया जाये, पर उससे मेरा लेखन बढ़ता है। दूसरे मेरी भाषा में लालिल्य की तंगी तो है ही। चित्र और लेखन की जुगलबंदी का अनुपात बदलना भी कठिन है। मैं पॉडकास्टिंग का सहारा ले सकता था, पर प्रेमसागर की अटक कर धीरे बोलने की आदत श्रोता को बांध नहीं सकती।

रास्ते का एक दृश्य। दोनो ओर समुद्र तटीय वृक्ष दिख रहे हैं।

अब मुझे आसपास लोग मिलते हैं – कई ऐसे लोग भी जिन्हें मैं सोच नहीं सकता कि वे प्रेमसागर के बारे में जानते होंगे। पर वे भी मुझसे प्रेमसागर के बारे में पूछते हैं। एक गांव के व्यक्ति ने जब पूछा कि “इंही मोबईलिया पर ही लिखथ्यअ का प्रेमसंकर (नाम गलत बोले) के बारे में (इसी मोबाइल पर ही लिखते हैं क्या प्रेमसंकर के बारे में)?” तो मुझे आश्चर्य हुआ। प्रेमसागर को लोग जानने लगे हैं और उनके साथ मुझे जोड़ कर देखने लगे हैं। यहां गांवदेहात में भी मिलने लगे हैं ऐसे लोग। … प्रेमसागर फेमस हो जायेंगे। आजकल कोने अंतरे के लोगों को खोज खोज कर प्रधानमंत्री पद्मश्री बना रहे हैं। प्रेमसागर पद्म पुरस्कार पा जायेंगे और तुम लिखते ही रह जाओगे जीडी! :lol:

खैर; आज के ट्रेवल-ब्लॉग पर आया जाये। प्रेमसागर सवेरे चार उठते ही टेम्पो पकड़ कर सोमनाथ से गड़ू आ गये। एक ही दिन रुके सोमनाथ में।

लगता है सोमनाथ में किसी स्थानीय ने प्रेमसागर को कोई भाव दिया नहीं। कांवर देख कर भी किसी ने कुछ पूछा तक नहीं। सोमनाथ के ट्रस्टी साहेब, जिन्होने प्रेमसागर के लिये रेस्ट हाउस करवा दिया था, वे भी शायद सोमनाथ में नहीं थे। उनसे प्रेम सागर की फोन पर ही बात हुई। प्रेमसागर बेचारे वेरावल से सोमनाथ के बीच ठीक से रास्ता न जानने के कारण अंधेरे और जंगल में भटभटाये भी। एक कांवर पदयात्री पंद्रह-बीस किलो वजन लिये ढाई हजार किलोमीटर चल कर अमरकण्टक से जल उठाये चला आ रहा हो और गंतव्य पर पंहुचने पर कोई देख कर प्रतिक्रिया भी न दे, यह अजीब लगता है। पर यही था।

शंकर भगवान के तौर तरीके भी अजीब हैं। किसी किसी जगह – शहरों और गांवों में – प्रेमसागर को 25-50 लोग साथ साथ लेने और छोड़ने आये और यहां सोमनाथ में जो बाबा की खास नगरी है; वहां कठिन तप कर पंहुचे शिव भगत को कोई लोकल बोलने बतियाने या एक जून चाय – खाना पूछने वाला भी नहीं था। वह तो भला हो दिलीप थानकी जी का जो पोरबंदर से प्रेमसागर के लिये आये और उनको आसपास के दर्शनीय स्थान दिखाये, भोजन आदि कराया; वर्ना सोमनाथ वालों ने तो घोर उपेक्षा ही की।… बाबा महादेव; मैं तो आपके यहां (सोमनाथ में) जाने के पहले खूब सोचूंगा, तभी तय करूंगा; अगर कभी जाने की बात भी हुई तो। या फिर जाऊंगा तो बढ़िया सी कार में एक लाख रुपया जेब में रख कर ही। तभी आपके वहां लोग नोटिस करेंगे।

प्रेमसागर को तनिक भी खराब नहीं लगा। उन्होने मुझे सोमनाथ के अनुभव के बारे में खुद कुछ कहा भी नहीं। पर मुझे अच्छा नहीं लगा। लिखना मेरे हाथ है सो मैंने लिख दिया। प्रेमसागर ऐसा खुद कभी कहते या लिखते ही नहीं।

मेरी पत्नीजी तो मेरी यह बात सुन कर और भी भुनभुना रही हैं। उन्होने कहा – “मंदिरों के आसपास के लोग; ये पण्डे-पुजारी भक्त नहीं हैं; भगवान की सेल्फ अप्वाइण्टेड दलाली करते हैं। जहां दलाली है वहां भ्रष्टाचार है, वहां भक्ति नहीं और भक्त की कद्र भी नहीं है। यह केवल सोमनाथ का ही हाल नहीं है। सभी मंदिरों में इन्ही दलालों की भरमार है – चाहे काशी हो, विंध्याचल हो या ॐकारेश्वर हो। वहां भक्त का हितैषी कोई भक्त ही मिले तो मिले; ये लोग तो नहीं ही होंगे। हिंदू धर्म की सहिष्णुता, करुणा और आतिथ्य भाव की अपने लालच के कारण बेइज्जती करते हैं ये लोग।”

गड़ू में प्रेमसागर ने कुछ देर आराम किया। सवेरे मैंने छ बजे उनसे बात की तो उन्हें जम्हाई आ रही थी। नींद शायद ठीक से पूरी नहीं की थी। दिन में गड़ू से लोयेज तक 30-32 किमी की पदयात्रा उन्हें करनी थी। मैं प्रेमसागर की संकल्प शक्ति की दाद दूंगा। तीन घण्टे बाद जब मैंने पता किया तो वे नौ किलोमीटर पदयात्रा कर चुके थे। दिन में उनसे कोई आगे बात नहीं हुई। शाम सवा सात बजे पूछा तो वे लोयेज के स्वामीनारायण मंदिर में थे। साढ़े छ बजे शाम को पंहुच गये थे। एक चित्र उनका सूर्यास्त का है जो लोयेज से तीन-चार किलोमीटर पहले का होगा।

एक चित्र उनका सूर्यास्त का है जो लोयेज से चार किलोमीटर पहले का होगा।

जब मैंने प्रेमसागर से बात की तो लोयेज के आश्रम में वहां के बलदेव भाई राजगुरु जी प्रेमसागर से मिलने आये थे। राजगुरु जी कांवर भक्त की कठिन तपस्या से प्रभावित थे। प्रेमसागर ने बताया कि वे – स्वामी बलदेव भाई राजगुरु जी – उनसे मिलने के लिये एक-डेढ़ किलोमीटर पहले सड़क पर ही खड़े थे।

बलदेव भाई राजगुरु जी से मेरी भी बात हुई। वे सरल और पवित्रात्मा लगे – कोई ईश्वर के “बिचौलिये” नहीं। भगवान ने दो ही दिन में दो छोरों के अनुभव कराये प्रेमसागर को। प्रेमसागर ने दोनो को सम भाव से लिया होगा; मैं उतना श्रद्धावान नहीं हूं; मैं सम भाव से नहीं ले पा रहा। यह भी विचित्र अनुभव रहा – सोमनाथ के बाद लोयेज! मुझे लगा कि महादेव कह रहे हों – “तुमने जल अर्पण किया वह अच्छा किया। मैं उसे एकनॉलेज करता हूं। मैं तुम्हें लोयेज में मिलूंगा! अभी यहां इन लोगों के बीच फंसा हूं।”

नीलकण्ठ वर्णी। स्वामीनारायण की किशोरावस्था, जिसमें वे लोयेज आये थे। यह एक पोस्टर का थम्बनेल व्यू है।

नीलकण्ठ वर्णी स्वामीनारायण के बारे में जानने की इच्छा मुझमें जगी है बलदेव राजगुरु जी से फोन पर बातचीत कर। वर्ना सोमनाथ में प्रेमसागर की उपेक्षा के कारण आस्था पर ठेस ताजा थी।

स्वामीनारायण भगवान आज से 230 साल पहले घूमते घामते छपिया से यहां पंहुचे थे। किशोर वय के ही रहे होंगे। गुरु रामानंद के सम्पर्क में आये। गुरु ने विलक्षण शिष्य को पहचाना और उन्हें दीक्षा दी। वे नीलकण्ठ वर्णी से स्वामी सहजानंद बने और कालांतर में वे स्वयम ईश्वरीय हो गये। स्वामीनारायण भगवान।

यूं, बचपन में उनका नाम घनश्याम पाण्डे था। मेरे पूर्वज भी उसी स्थान के आसपास से थे, जहां से स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामीजी थे। अपने नाम में भी पाण्डे होने पर मुझे गर्व हो रहा है। अभी जितनी बाकी जिंदगी है, उसमें शायद मुझपर भी कोई कृपा हो और सरलता-भक्ति और ईश्वर के प्रति उत्तरोत्तर श्रद्धा में विकास हो। शायद मुझे भी कोई मार्गदर्शक मिलें। … पर वह साधक की तीव्र अभीप्सा और ईश्वर की कृपा बिना नहीं ही होता; ऐसा मुझे बताया गया है।

चोरवड में धीरूभाई अम्बानी मेमोरियल घर। चित्र दिलीप थानकी जी द्वारा।

प्रेमसागर से उनकी यात्रा के दौरान बात नहीं हुई। पर उनसे दिलीप थानकी जी का फोन नम्बर मिला और उनसे सम्पर्क हुआ। थानकी जी ने बताया कि प्रेमसागर चोरवड़ से हो कर गुजरे। चोरवड़ धीरूभाई अम्बानी का जन्मस्थान है। वे रास्ते भर अरबसागर के साथ चलेंगे। तीस-बत्तीस किलोमीटर पर लोयेज में स्वामीनरायण मंदिर में उनके रुकने का इंतजाम है। वहां स्वामीनारायण सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी जी किशोरावस्था में घूमते घामते नीलकण्ठ वर्णी के रूप में यहां आये थे। इस स्थान का स्वामीनारायण सम्प्रदाय में बहुत महत्व है। अत्यंत पवित्र स्थल है यह।

रास्ते में मंगरोल पड़ता है। यह गुजरात के राजाओं में से एक की स्टेट थी। सन 1949 में इसका भारत में विलय हुआ और यह सौराष्ट्र का अंग बना। विलय एक रेफरेण्डम के उपरांत हुआ जिसमें नागरिकों ने पाकिस्तान की बजाय भारत में रहने पर मुहर लगाई थी। यह गुजरात के जूनागढ़ जिले में है।

मंगलोल नगर पालिका का प्रवेश द्वार

दिलीप जी ने बताया कि आगे की पूरी यात्रा के दौरान स्थानों की, उनके भौगोलिक और एतिहासिक महत्व आदि के बारे में पूरी जानकारी दे सकेंगे। यह पूरा इलाका उनका देखा जाना है और प्रेमसागर की यात्रा के प्रबंध से उन्हें सहज प्रसन्नता है – “अब हम तो खुद इस प्रकार की यात्रा कर नहीं सकते। इसलिये जो अवसर मिला है, उसमें अपना जो भी योगदान हो सके वह करने में ही पुण्य है।”

दिलीप थानकी

स्वामीनारायण मंदिर के राजगुरु जी कह रहे थे कि जो वे कर रहे हैं वह ईश्वर का काम है; वे तो निमित्त मात्र हैं। दिलीप जी भी लगभग वही भाव व्यक्त कर रहे थे – निमित्त वाला! गीता में भी केशव कहते हैं – निमित्त मात्रम भव सव्यसाचिन!

काश; सोमनाथ के बंधु भी निमित्त बनते। पर क्या पता, वे अपनी तरह से निमित्त बने हों; मेरा देखना ही वक्र हो! क्या पता!

स्वामीनारायण आश्रम में कक्ष की दीवार जहां प्रेमसागर को ठहराया गया।

कल वैसे प्रेमसागर को ज्यादा नहीं चलना है। उन्हें लोयेज से माधवपुर तक ही जाना है। माधवपुर लोयेज से 16 किमी आगे है। वे अगर कल सवेरे देर से भी रवाना होते हैं तो शाम से पहले माधवपुर पंहुच जायेंगे। प्रेमसागर ने बताया कि वे सवेरे आश्रम में घूमेंगे और वे स्थल देखेंगे जहां नीलकण्ठ वर्णी के रूप में भगवान स्वामीनारायण के कुछ स्मृति-चिन्ह हैं।

अपडेट 13 दिसम्बर सवेरे –

प्रेमसागर ने स्वामीनारायण परिसर का भ्रमण किया। आश्रम के प्रमुख स्वामी जी का आशीर्वाद भी पाया और नीलकण्ठ वर्णी भगवान को जल भी चढ़ाया। उस सब के चित्र भेजे हैं। बलदेव राजगुरु जी भी उन चित्रों में हैं।उसके बाद आगे की यात्रा के लिये रवाना हुये प्रेमसागर। सवेरे का अनुभव विवरण आगे की पोस्ट में होगा।

स्वामीनारायण भगवान की जय! ॐ नम: शिवाय। हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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