प्रभास तीर्थ (सोमनाथ) में एक दिन


12 दिसम्बर 21, सवेरे –

कल सवेरे सवेरे देवी अहिल्याबाई निर्मित सोमनाथ मंदिर में जल चढ़ा आये प्रेमसागर। उसके बारे में पिछली पोस्ट में लिखा जा चुका है। बाद में प्रेमसागर ने बताया कि नये मंदिर में जल चढ़ाने की प्रथा नहीं है। वे पुराने मंदिर में अकेले रेस्ट हाउस से निकल कर गये और थोड़ी ही देर में जल अर्पण कर लौट आये।

नया मंदिर मई 1951 को स्थापित हुआ था। पुराना मंदिर देवी अहिल्याबाई होल्कर ने इस्वी सन 1783 में बनवाया था – जैसा मंदिर के बाहर लिखे पट्ट में है। इसका स्थान और परिकल्पना देवी अहिल्याबाई के स्वप्न में आयी थी और बिना समय गंवाये उन्होने मंदिर का निर्माण प्रारम्भ कराया था। बहुत से श्रद्धालु यह मानते हैं कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग ही मूल सोमनाथ शिवलिंग है। यहां आसानी से स्थानीय पुजारी की सहायता से लोग पूजा अर्चना कर सकते हैं। और हर किसी को गर्भगृह में जाने की निर्बाध अनुमति है; जो नये मंदिर में नहीं है।

शिव कहां रहते होंगे? वे तो सब जगह हैं। पर अगर मेरी व्यक्तिगत राय मांगी जाये तो मैं यह कहूंगा कि सोमनाथ का गौरव, शान तो नये मंदिर में है; पर सोमनाथ का हृदय देवी अहिल्याबाई के मंदिर में है।

पुराना मंदिर देवी अहिल्याबाई होल्कर ने इस्वी सन 1783 में बनवाया था – जैसा मंदिर के बाहर लिखे पट्ट में है।

कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी सन 1922 में सोमनाथ मंदिर की अपनी यात्रा के बाद लिखते हैं –

मुंशी जी की पुस्तक Somanatha the Shrine Eternal का परिशिष्ट अंश

पता नहीं वे किस अंश की बात कर रहे हैं। सम्भवत: सोमनाथ मंदिर के टूटे प्रस्तर खण्डों की या देवी अहिल्याबाई के मंदिर की। अगर वे देवी अहिल्याबाई के मंदिर पर कह रहे हैं तो उससे निम्न बातें मुझे स्पष्ट होती हैं –

  • देवी अहिल्याबाई तो दिव्य महिला थीं। उनके नाम से वाराणसी, उज्जैन और सोमनाथ के ज्योतिर्लिंगों के पुनरुद्धार का वर्णन मिलता है। उन्हें तो हिंदू जागरण का मुकुट मानना चाहिये।
  • उनके पहले और बाद के हिंदू मानस, सेठ और राजे रजवाड़े घोर चिरकुट (सॉरी, इससे बेहतर शब्द मुझे नहीं मिला) थे जो 1783 के 140 साल बाद (जब मुंशी जी ने लिखा) तक इस मंदिर की सामान्य देखरेख भी नहीं कर सके। सोमनाथ हिंदू धर्म का गौरव प्रतीक है। उसका सामान्य रखरखाव भी नहीं हुआ होगा सन 1922 में। अन्यथा मुंशी जी उसपर संतोष तो व्यक्त करते।
  • यही हाल काशी के मंदिरों का है जहां लोग मंदिर को घर में हड़प गये थे और अब भी काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के इतर मंदिरों में उनके पट्ट के ऊपर साड़ी बेचने वालों के बोर्ड देखता हूं। मंदिर परिसरों में साड़ी बेचक नजर आते हैं विश्वनाथ गली में।
काशी में काशीराज काली मंदिर और 1008 गौतमेश्वर महादेव मंदिर जहां दुकाने लगी हैं और साड़ियाँ टंगी हैं। चीनी और इतालियन भोजन मिल रहा है।

पर इस 1783 के मंदिर का भी कुछ कायाकल्प हुआ है – ऐसा पत्रिका के एक न्यूज आइटम में है। अठाईस मार्च 21 की अहमदाबाद डेटलाइन की इस खबर के अनुसार सोमनाथ ट्रस्ट इसका लोकार्पण प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा करवाना चाहता है। पता नहीं वह हुआ या नहीं; पर वहां देवी अहिल्याबाई की प्रतिमा लग गयी है – ऐसा प्रेमसागर के भेजे चित्र से स्पष्ट है। प्रेमसागर के चित्रों में यह जूना मंदिर छोटा है, पर इस समय अच्छी दशा में दिखता है। उसके आगे कुछ दुपहिया वाहन खड़े हैं। कोई तामझाम नहीं है। मेरे आसपास के कई शिवालय ऐसे ही हैं। शिवजी के पास उनमें निर्बाध जाया जा सकता है। वहां लालची पण्डा-पुजारीगण भी नहीं घेरते। महादेव सब जगह हैं। कंकर में शंकर हैं। पर मेरे लिये महादेव 1783 वाले इस मंदिर में ही होंगे – वहां उनसे आसानी से अप्वाइण्टमेण्ट जो मिल सकता है। :-)

सोमनाथ के 1951 वाले नये मंदिर के सामने प्रेमसागर

प्रेमसागर जी अकेले रेस्ट हाउस में रहे। भोजन बाहर किसी भोजनालय में किया। दिन में पोरबंदर से दिलीप थानकी जी पोरबंदर से उनसे मिलने आये। साथ में उनके जीजा जी थे। एक चित्र में उनका भांजा भी दिखाई पड़ता है।

दिलीप जी ने सोमनाथ से नागेश्वर ज्योतिर्लिंग तीर्थ, दारुकवन की यात्रा का रोड-मैप भी प्रेमसागर को दिया है। दिन में उन्हें साथ सोमनाथ के आसपास के दर्शनीय स्थल – परशुराम जी की तपस्थली, कृष्ण का देहत्याग स्थल, हिरन-कपिला-सरस्वती का त्रिवेणी संगम दिखाये भी। भोजन आदि भी दिलीप जी ने कराया। यह लगता है कि महादेव ने आगे की नागेश्वर तीर्थ यात्रा के लिये प्रेमसागर को दिलीप जी को सुपुर्द कर दिया है। आगे के ट्रेवल-ब्लॉग का बारह आना भर इनपुट लगता है दिलीप जी देंगें। प्रेमसागर के जिम्मे केवल चलना और चित्र खींचना रहेगा! :lol:

दिलीप थानकी, प्रेमसागर और दिलीप जी के बहनोई साहेब (भूरी जैकेट में)

प्रेमसागर से फोन नम्बर ले कर मैंने दिलीप जी से बात की। वे दफ्तर निकलने की जल्दी में थे। उन्होने बताया कि उन्हें प्रेमसागर के बारे में अपने मित्र अजित प्रताप सिंह जी से पता चला। अजित लखनऊ में हैं और बस्ती/बहराइच से हैं। पता नहीं अजित प्रेमसागर के सम्पर्क में कैसे आये और उस सम्पर्क में इस ब्लॉग का कोई रोल है या नहीं। पर जैसे भी है; दिलीप थानकी जी सोमनाथ-पोरबंदर-द्वारका-नागेश्वर के बीच प्रेमसागर का पूरा साथ देंगे; यह लगता है।

अजित प्रताप सिंह,, पुत्र श्री राजेंद्र प्रताप सिंह, देवखाल, हरैया, बस्ती। वर्तमान में लखनऊ में रहते हैं।

आज सवेरे प्रेमसागर से बात की तो वे गड़ू में थे। किसी टेम्पो से वे सोमनाथ से सवेरे गड़ू पंहुच कर आराम कर रहे थे। जूनागढ़ से सोमनाथ के रास्ते वे गड़ू से हो कर गुजरे थे, इसलिये वहां तक की यात्रा उन्होने वाहन से सम्पन्न की। आगे, कांवर पदयात्रा करेंगे नागेश्वर तीर्थ के लिये घण्टे भर बाद वे रवाना होने वाले थे। नागेश्वर तीर्थ उनका पांचवा ज्योतिर्लिंग होगा यात्रा का। इस यात्रा में वे लगभग सौराष्ट्र के अरब सागर के समुद्र तट के साथ साथ ही चलेंगे।

आज की पोस्ट में इतना ही।

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

2418 कि.मी. की कांवर पदयात्रा कर प्रेमसागर सोमनाथ पंहुचे


10 दिसम्बर, रात्रि –

शाम के समय प्रेमसागर वेरावल रेलवे स्टेशन के सामने थे। घण्टा भर लगा उन्हें सोमनाथ पंहुचने में। आठ बजे के बाद मैंने बात की तो बताया पंहुच गये हैं और अब रेस्ट हाउस की ओर जा रहे हैं जहां उन्हे रुकना है। मैंने त्वरित गणना की। वे दो हजार चार सौ अठारह किलोमीटर चल चुके हैं प्रयागराज से यात्रा प्रारम्भ करने के बाद। साधन हीन व्यक्ति अपनी कांवर लिये अपनी आस्था और संकल्प के साथ इतनी बड़ी यात्रा, अकेले कर चुका है और यह अभी उस लम्बी यात्रा का एक मुकाम भर है – यात्रा की सम्पन्नता नहीं।

मैं ब्लॉग लेखन में प्रेमसागर के साथ अनेकानेक भावों को व्यक्त करने की छूट लेता रहा हूं। कभी कभी वह प्रेमसागर के साथ, उनकी प्रवृत्ति के साथ “अप्रिय मजाक” भी लग सकता है। पर सभी विघ्नों-बाधाओं और साधान हीनता के बावजूद इतना कर गुजरना – यह बहुत ही दैवीय चमत्कार है। उस चमत्कार, उस बदलाव, उस मनोवृत्ति में सुधार को प्रेमसागर ने कितना महसूस किया, वह तो वही बता सकते हैं; मैंने अपने में जरूर किया है। उनकी सोमनाथ तक की यात्रा, जो आज शाम वेरावल से सोमनाथ तक कांवर लिये शाम के घने होते अंधकार में रास्ता इधर उधर तलाशते बार बार उन्हें फोन करने तक सहयात्री रहा हूं; मुझमें बहुत कुछ बदलाव ले आयी है। यह प्रेमसागर के बारे में पिछले साढ़े तीन महीने से सतत जुड़ाव का ही परिणाम है। जय प्रेमसागर!

जूनागढ़ से निकलने के बाद प्रेमसागर की बीस किलोमीटर प्रति दिन चलने के औसत से उन्हे चार दिन लगने चाहिये थे सोमनाथ पंहुचने में। आठ दिसम्बर की शाम को वे किन्ही नागबाबा के मंदिर/आश्रम में रुके थे। वहां से वेरावल-सोमनाथ 61 किलोमीटर से अधिक दिखाता था नक्शा। मैं सोचता था कि वे बीस की औसत दूरी ही पार करें। पर लगता है सोमनाथ ज्यादा त्वरित चलने और पंहुचने को प्रेरित किया भगवान महादेव ने।

नौ दिसम्बर को प्रेमसागर सवेरे सात बजे के बाद ही निकल पाये। “भईया नागबाबा के मंदिर परिसर का दरवाजा ही सात बजे के बाद खुला। वही उनका खोलने का समय है। इसलिये चलने में आज देरी हुई। इतनी देरी पहले कभी नहीं हुई थी।” – उन्होने ने कहा।

उनका शाम का मुकाम क्या है? यह पूछने पर उन्होने बताया – और बड़े आत्मविश्वास से बताया – गोरू। सामान्यत: लोगों और स्थानों के नाम बताने में गड़बड़ कर जाते हैं प्रेमसागर।

मैंने नक्शे में गोरू तलाशा पर कोई स्थान आसपास नहीं मिला। फिर मिलते जुलते नामों की तलाश की। ग और र के योग से बनने वाले नाम तलाशे, पर सफलता नहीं मिली। अंत में वेरावल के रास्ते गड़ू मिला। वह नागबाबा के आश्रम से 38 किमी दूर था। प्रेमसागर वैसे भी देर से निकले थे। इतना चलने में रात 8-9 बजना ही था। यह भी मुझे अंदेशा था कि इलाके में जंगली जानवर – गिर के शेर के आने की सम्भावना तो होती ही है। शाम ढलने पर दो तीन घण्टे धुंधलके-अंधेरे में चलना कोई बुद्धिमानी नहीं, दुस्साहस होगा।

मैंने प्रेमसागार को सलाह दी कि वे पंद्रह किलोमीटर चलने के बाद जगह तलाशना प्रारम्भ कर दें जहां रात गुजारी जा सके। भले ही भोजन न मिले, पर रात गुजारने को छत मिल सके। वे अगर कोई शॉर्टकट लेने के लिये किसी गांव में जाते हैं (और शॉर्टकट तलाशने की बात प्रेमसागर बहुधा करते हैं, जो सामान्यत: होता नहीं) तो वहां किसी स्कूल या पंचायत भवन की उपलब्धता की भी कोशिश करें।

उस सब की जरूरत पड़ी नहीं। कंचा भाई – जिन्हे रेखा परमार जी ने उनसे सम्पर्क में रहने और यात्रा की ‘व्यवस्था’ के लिये कह रखा था; ने गड़ू के 11 किलोमीटर पहले किन्ही रंजीत परमार जी के पेट्रोल पम्प पर उनके रहने की व्यवस्था कर दी। इस प्रकार 9 दिसम्बर को प्रेमसागर 27 किमी चले।

दांये से बांये – रंजीत परमार, उनके भाई और उनके पेट्रोल पम्प के कर्मी

परमार जी ने उन्हें घर बुला कर भोजन कराया। उनके स्नान आदि के लिये गरम पानी का इंतजाम किया। रात में रुकने के लिये दो विकल्प उन्हे दिये – उनके घर पर या पेट्रोल पम्प के विश्राम कमरे में। प्रेमसागर को बातों बातों में पता चला था कि रंजीत जी के घर पर लोग देर से उठने के आदी हैं। “यह मेरे लिये तो दुखदाई हो जाता भईया। तो मैंने कहा कि पेट्रोल पम्प पर ही रुक जाता हूं मैं। वहां एक ठो तखत था। गद्दा और रजाई रंजीत जी घर से भिजवा दिये। अपने कर्मचारियों को बोल भी दिया कि सवेरे बाबा जी के उठने पर नहाने के लिये गर्म पानी का इंतजाम कर देना।” – प्रेमसागर ने पेट्रोल पम्प का कमरा चुना।

वे अगले दिन सवेरे सवेरे निकल लेना चाहते थे। सोमनाथ के इतना पास आ चुके थे कि इस यात्रा को दो दिन की बजाय एक दिन में ही सम्पन्न करने की चाह उनके मन में बैठ गयी थी। जल्दी निकल कर और बीच में कम रुकते हुये वे शाम सांझ ढलने तक सोमनाथ मंदिर को छू लेना चाहते थे।

दस दिसम्बर की सुबह प्रेमसागर जल्दी ही निकल लिये। “परमार जी के कर्मचारी बहुत भले थे भईया। सवेरे नहाने के लिये उन्होने गरम पानी की व्यवस्था कर दी थी। पांच सवा पांच बजे मैं निकल लिया था।” प्रेमसागर ने मुझे बताया। मैंने उनसे सवेरे साढ़े छ बजे बात की थी तो उस समय वे पांच सात किलोमीटर चल चुके थे प्रभास तीर्थ (देवपाटन, प्रभास पाटन या सोमनाथ) की ओर। मैं वाराणसी के लिये निकल रहा था। उनको मैंने बताया तो प्रेमसागर ने अपना जोड़ा – “भईया, बाबा (विश्वेश्वर महादेव – काशी विश्वनाथ के महादेव) से मेरे लिये भी कह दीजियेगा कि हम हूं उन्हीं के बच्चा हैं। हमारा खियाल रखें।”

बाबा विश्वनाथ तो प्रेमसागर के सदा साथ हैं। पूरी यात्रा वे ही सम्पादित कर-करा रहे हैं। बीच बीच में प्रेमसागर की दैहिक-मानसिक शक्ति का लोड टेस्ट करते रहते हैं, पर ख्याल पूरा रखते हैं। यह पूरी यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं, उनकी संकल्प सिद्धि का साधन नहीं; अपने में तीर्थ बन गयी है।

दस दिसम्बर की सुबह मेरी पत्नीजी, मैं और शैलेश पाण्डेय पांच पण्डितों से बाबा विश्वनाथ पुनर्नवीकृत परिसर में पूजन कराते हुये। पहले विश्वनाथ मंदिर में इस प्रकार के दृश्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी!

मैं बाबा विश्वनाथ के मंदिर में गया। वहां तो मंदिर का कायाकल्प हो गया है। तेरह तारीख को प्रधानमंत्री जी मंदिर के परिसर के पुनर्नवीकरण का उद्घाटन करने वाले हैं। वह स्थान तो हमें – शैलेश पाण्डेय के सहयोग से देखने का अवसर मिला। वहां परिसर में पूजन में जो मनोकामना मैंने व्यक्त की, उसमें प्रेमसागर की यात्रा की सकुशल सम्पन्नता भी एक थी। प्रमुख थी।

जैसे जैसे वे अरबसागर के तट की ओर बढ़े वैसे वैसे नारियल और ताड़ के वृक्ष दीखने लगे। नारियल की खेती होती भी नजर आयी।

दिन की यात्रा के कई चित्र हैं प्रेमसागर के। जैसे जैसे वे अरबसागर के तट की ओर बढ़े वैसे वैसे नारियल और ताड़ के वृक्ष दीखने लगे। नारियल की खेती होती भी नजर आयी। नदी का चित्र है। नक्शे में वह व्रजिमी दिखती है। जल पर्याप्त है नदी में। कुछ ही किलोमीटर के बाद वेरावल के पश्चिम में वह अरब सागार में जा कर मिलती है।

नदी का चित्र है। नक्शे में वह व्रजिमी दिखती है। जल पर्याप्त है नदी में।

जूनागढ़ और सासन गिर के आसपास से कई नदियां निकलती, एक दूसरे में मिलती और अंतत: अरबसागर में जाती दिखती हैं। पूरा इलाका दर्शनीय होगा। पता नहीं इस सब को प्रेमसागर ने किस भाव से देखा होगा! आज तो वे चालीस किलोमीटर से ज्यादा ही चले और यात्रा की थकान के कारण रात में बहुत विस्तार से कुछ बताने की स्थिति में नहीं लगते थे।

वेरावल प्रवेश द्वार

शाम सवा पांच बजे वे वेरावल की सीमा में प्रवेश किये। उसके बाद लोगों से पूछते पूछते सोमनाथ की ओर बढ़े। कोई शॉर्टकट लेने के फेर में थोड़ा भटके भी। मैंने घण्टा भर बाद पूछा तो उन्होने कहा कि रास्ता सूझ नहीं रहा है। अंधेरा हो गया है और जंगल जैसा लग रहा है। लोगों ने इस रास्ते की बजाय सड़क मार्ग से जाने को कहा है।

इस प्रकार शॉर्टकट छोड़ सड़क पकड़ कर प्रेमसागर एक घण्टे बाद सोमनाथ पंहुचे।

साढ़े सात बजे की उनकी लाइव लोकेशन के अनुसार वे सोमनाथ मंदिर के आसपास थे। बाद में पता चला कि मंदिर वे बाहर से देख चुके और रात की रोशनी में लिये उनके चित्रों से स्पष्ट होता है कि वे सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग का भी दर्शन कर आये थे।

सोमनाथ मंदिर का प्रेमसागार का रात में लिया चित्र

यह संतोष हो रहा है कि द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा का चौथा ज्योतिर्लिंग; और शिवपुराण में वर्णित प्रथम ज्योतिर्लिंग तक पैदल चलते हुये प्रेमसागर पंहुच गये हैं। कल वे भगवान सोमनाथ का दर्शन कर उन्हें गंगा, अमरकण्टक (नर्मदा) और ॐकारेश्वर में लिया कावेरी का जल अर्पित करेंगे। आज का दिन महत्वपूर्ण रहा है, जब उन्होने सोमनाथ के दर्शन किये। कल का दिन अति महत्व का होगा, जब वे कांवर का जल चढ़ायेंगे!

रात सवा आठ बजे प्रेमसागर सोमनाथ मंदिर में थे।

अपडेट सवेरे 11 दिसम्बर 21 –

प्रेमसागर ने 8:06 पर सोमनाथ मंदिर से बाहर निकल कर फोन किया। मेरी पत्नी और मुझे चरण स्पर्श किया – बोल कर। बताया कि विधिवत जल चढ़ा दिया महादेव को। आज कुछ स्थान देखेंगे और कल सवेरे वे नागेश्वर तीर्थ के लिये रवाना हो जायेंगे।

मंदिर में प्रवेश के पहले मोबाइल इत्यादि सब रखा लिया जाता है। इस कारण से उस समय का कोई चित्र उनके पास नहीं है। उनकी आवाज में एक महान उपलब्धि पाने का भाव स्पष्ट था। निश्चय ही इसके लिये उन्होने बड़ी कांवर साधना की है।

घण्टा भर बाद प्रेमसागर ने समुद्र किनारे से वीडियो कॉल किया। पांच रुपये का टिकट कटा कर समुद्र तट पर पंहुचे थे वे। उन्होने सोमनाथ मंदिर और समुद्र दिखाया मुझे। अपना चेहरा भी दिखाया। खूब प्रसन्न चेहरा! हायर सेकेण्डरी के इम्तिहान में मैरिट लिस्ट में आने पर मेरा भी चेहरा इतना प्रसन्न रहा होगा!

प्रेमसागर ने समुद्र किनारे से वीडियो कॉल किया। … खूब प्रसन्न चेहरा! हायर सेकेण्डरी के इम्तिहान में मैरिट लिस्ट में आने पर मेरा भी चेहरा इतना प्रसन्न रहा होगा!

जय सोमनाथ! हर हर हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

रैवतक-गिरनार के बगल से गुजरे प्रेमसागर


08 दिसम्बर, रात्रि –

माहेश्वर (माहिष्मती) के बाद अगला प्राचीन या महाभारत कालीन स्थल आया गिरनार या रैवतक। इन नामों से मेरा परिचय कराया था कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी के ‘कृष्णावतार के दूसरे भाग’ ने। कृष्ण मथुरा से पलायन कर गोमांतक और फिर रैवत पर्वत (या गिरनार) और प्रभास तीर्थ (प्रभास पाटन) के आसपास स्थान तलाशते हैं। रैवतक में उनके यदुवंशी आते जाते रहते हैं। प्रभास के आसपास कहीं द्वारका के द्वीप में वे अपनी राजधानी बनाते हैं। द्वारका प्रभास तीर्थ (सोमनाथ या वेरावल) के आसपास होनी चाहिये – दूर सौराष्ट्र के पश्चिमी कोने पर नहीं। … ये शंकायें मन में उठती रही हैं। पर वे सब अलग रखी जायें। मुख्य बात यह रही की हमारे कांवर यात्री प्रेमसागर 7 दिसम्बर को जूनागढ़ पंहुचे। जूना यानि पुराना। जूना गढ़ अर्थात पुराना किला।

पूर्व की ओर गिरनार या रैवतक पर्वत है। जिसे देवताओं का निवास माना गया है।

यहीं बगल में पूर्व की ओर गिरनार या रैवतक पर्वत है। जिसे देवताओं का निवास माना गया है। इस पर्वत का कई बार उल्लेख महाभारत और हरिवंश पुराण में होता है। यहां अनेक जैन तीर्थ हैं। तीर्थंकर अपने जीवन की अंतिम अवस्था यहीं बिताते रहे हैं। और हर मोड़ पर यहां का उल्लेख भारत के समग्र इतिहास का हिस्सा रहा है। यह सब मुझे प्रेमसागर के कारण इधर उधर से पुन: देखना पड़ा। के.एम. मुंशी जी की एक दो पुस्तकें भी किण्डल पर खरीदी हैं। उन्हें कितना पढ़ पाऊंगा या पुनर्पठन कर पाऊंगा, कह नहीं सकता। पर उनकी अपने पास उपलब्धता एक आत्मविश्वास तो देती है।

जूनागढ़ का स्वामी नारायण मंदिर

सात दिसम्बर को प्रेमसागर ने मुझे कई चित्र भेजे – जूनागढ़ के स्वामी नारायण मंदिर और अन्य स्थलों के। वे मंदिर में अपना सामान रख कर आसपास के भ्रमण में व्यस्त हो गये थे। मेरे फोन करने पर उन्होने कहा कि वे जूनागढ़ घूम रहे हैं जूनागढ़ के गुरुकुल के प्रोफेसर धवल त्रिवेदी जी के साथ, और वापस आ कर मुझे फीडबैक देंगे। पर कोई फीडबैक वाला फोन आया नहीं।

मुझे यह कांवर यात्री अपनी प्रवृत्ति से बिल्कुल 180 डिग्री उलट लगता है। मैं अगर बीस-पच्चीस किलोमीटर पैदल चलूं तो शांति से कमरे में बैठ कर आराम करूंगा या दिन भर के किये की सोचूंगा या फिर कोई पुस्तक पढूंगा और सो जाऊंगा। एक कदम कमरे के बाहर रखने की सोचूंगा ही नहीं। और ये सज्जन जूनागढ़ पंहुचते ही अपना सामान पटक कर कोई मंदिर, कोई आरती, कोई दर्शनीय स्थान देखने निकल लिये। उनके लिये यह सब मनोरंजन या धर्म का हिस्सा होगा। मेरे लिये वह अपनी ऊर्जा का अपव्यय। … मेरी पत्नीजी हर बार कहती हैं – “तुम उसे अपने अनुसार तोलने की बराबर गलती करते रहे, और करते जा रहे हो। वह विशुद्ध धार्मिक कार्य पर निकला है। तुम्हें सब दो कौड़ी का लगता होगा, उसके लिये आरती, मंदिर, चमत्कार, भागवत कथा और बाबाओं से मिलना बहुत महत्व का है। जिस चीज को तुम समझते नहीं हो, उसपर अपनी मानसिक ऊर्जा का अपव्यय क्यों करते हो? वह अपने तरीके से मगन है, तुम अपने तरीके से पढ़ लिख कर मगन रहो! नहीं रह सकते तो अपने रास्ते चलो और उसे अपने अनुसार चलने दो।”

वह हो नहीं पाता। पर प्रेमसागर पर मेरे कहे का कोई प्रभाव पड़ता है? शायद नहीं। या शायद पड़ता भी है तो बहुत कम। इस ट्रेवल-ब्लॉग में हम दोनो की भौतिक और मानसिक यात्रायें आसपास और समांतर चलती रही हैं। दोनो में कुछ जुड़ाव है, पर अलगाव भी बहुत है। पर अजब बात है कि यह ट्रेवल-ब्लॉग चल रहा है। :-)

जेतलसर के आगे से यात्रा प्रारम्भ कर सात दिसम्बर को प्रेमसागर को नक्शे के हिसाब से केवल सत्रह किलोमीटर चलना था। पर शायद चले वे 19-20 किमी के लगभग। जूनागढ़ बड़ा शहर है। उन्हें स्वामीनारायण मंदिर पंहुचना था; पर स्वामीनारायण नाम के कई स्थल वहां दिखते हैं। शहर में चलते हुये उन्हे कई जगह ठिठकते-रुकते देखा मैंने लाइव लोकेशन पर। फिर ह्वात्सएप्प पर आठ घण्टे की लोकेशन शेयरिंग का समय समाप्त हो गया और मुझे पता नहीं चल पाया कि अंतत: किस स्थान पर उनका डेरा जमा। डेरा किसी स्वामीनारायण मंदिर में था। उसके चित्र बहुत सुंदर और दर्शनीय हैं। वह प्रबंध करने में अश्विन पण्ड्या जी ने किन्ही रेखा परमार जी से सम्पर्क किया था। रेखा जी समाज सेवी हैं। उन्होने जूनागढ़ और उसके आगे भी ठहरने के स्थान के लिये प्रेमसागर की सहायता की।

मेरे मन में एक अधेढ़ महिला की छवि बनी रेखा परमार जी की। आज सवेरे जब प्रेमसागर ने किसी चाय की दुकान से मुझे फोन किया तो मैंने पूछा – रेखा परमार जी से मिले थे ?

“नहीं भईया। उन्होने जोशी भाई को देखने के लिये कह दिया था। स्वामीनारायण मंदिर में उन्होने ही प्रबंध किया। उनका फोटो मैंने आप को भेज दिया है। … और मेंन बात है कि रेखा परमार जी से इस कारण मिल नहीं पाया कि उनकी शादी थी।” – प्रेमसागर ने कहा। मुझे लगा कि प्रेमसागर कुछ गलत बोल रहे हैं। शायद फोन का सड़क चलते वाहनो के बैकग्राउण्ड के शोर में मैंने गलत सुना; पर प्रेमसागर ने पूछ्ने पर फिर बताया – “हां हां। रेखा जी की खुद की शादी थी।”

रेखा परमार मेरे पैराडाइम को बदलती हुयी दन्न से अधेड़ महिला से लड़की बन गयीं। एक कम उम्र की महिला/लड़की यह सब प्रबंध कर सकती है?! उत्तर भारत में यह रोल निभाती किसी अविवाहित लड़की/महिला की कल्पना नहीं की जा सकती। यह तो अनूठा चरित्र है गुजरात का जिसके बारे में प्रेमसागर अपनी तरफ से नहीं, मेरे पूछने पर बता रहे हैं। और उनके पास रेखा परमार जी के व्यक्तित्व को बताने के लिये और कोई इनपुट हैं ही नहीं। मुझे लगा कि मुझे खुद उनसे बात करना चाहिये था। उनपर तो एक पोस्ट लिखी जा सकती है। पर पोस्ट लिखने के लिये एक अदद फोटोग्राफ और कुछ मूलभूत जानकारी तो चाहिये ही! प्रेमसागर इस मामले में कच्चे हैं।

वे मुझे और बातें बताये। छोटी बड़ी सब तरह की बातेँ। यह बताये कि जेतलसर के आगे जिस मंदिर में वे रुके वहां उन्हे बाजरे की रोटी, उड़द के दाल की खिचड़ी मिली थी। खेतों में काम करने वाले मजदूर गुजरात के नहीं, राजस्थान के थे। नदियां कुछ पानी के बिना थीं और कुछ पानी के साथ। डी. त्रिवेदी जी जूनागढ़ के गुरुकुल के प्रधान हैं। उन्हें शैलेश जी ने सूचना दी थी प्रेमसागर के बारे में। शैलेश जी सोमनाथ मंदिर के ट्रस्टी हैं और विकलांग सेवा समिति में अश्विनी पण्ड्या जी से जुड़े भी हैं। त्रिवेदी जी उनसे मिलने के लिये आये थे ढेर सारे फल ले कर। “उतने फल का मैं क्या करता भईया। आधा उन्ही को दे दिया प्रसाद के रूप में और कुछ और लोगों में भी बांटा” – प्रेमसागर ने कहा। “शैलेश भाई सोमनाथ में मिलेंगे। कह रहे हैं कि उन्हीं के पास रहूं सोमनाथ में।”

गिरनार के दो प्रस्तरखण्ड एक दूसरे के साथ इतने आसपास हैं कि लगता है विष्णु भगवान लक्ष्मी जी को चुम्बन कर रहे हों।

गिरनार के दो प्रस्तरखण्ड एक दूसरे के साथ इतने आसपास हैं कि लगता है विष्णु भगवान लक्ष्मी जी को चुम्बन कर रहे हों। प्रेमसागर ने गिरनार के चित्र भी दिये हैं और बताया भी है। “वहां एक ऐसा मंदिर भी है जहां हिंदू और मुसलमान दोनों जाते हैं। यहां मुसलमानों की आबादी काफी है पर कभी यहां दंगा नहीं हुआ।”

वहां नागा आश्रम मिला जिसमें साधू लोग द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा सम्पन्न कर अपना फाइनल डेरा जमाते हैं। दस साधू वहां जाते हैं तो आठ ही वापस आते हैं। दो वहीं रह जाते हैं और और वे दिखाई भी नहीं देते – लोगों से सम्पर्क से दूर रहते हैं। भवनाथ शिवजी कहते हैं उस स्थान को। कार्तिकेय की खोज में शिव और पार्वती अलग अलग दिशाओं में निकले थे और यहीं आ कर मिले और विश्राम किये थे – यह कथा कही जाती है। वहीं पर इग्यारह मुखी हनुमान जी की प्रतिमा है मंदिर में।

इग्यारह मुखी हनुमान जी

यह सब सूचनायें थीं। पर एक अलग प्रकार के व्यक्तित्व – रेखा परमार के बारे में कुछ नहीं था। प्रेमसागर कई पक्ष सिरे से ओवरलुक कर जाते हैं। और कई बातें तो तब पता चलती हैं जब आप टटोलते प्रश्न उनसे करें। उन्हे बदलना कठिन है।

अगले दिन, आज आठ दिसम्बर को प्रेमसागर कुछ देर से निकले। लगभग छ बजे। “यहां सवेरा ही सात बजे के बाद होता है भईया।”

बड़ी नदी पर पत्थर का मेहराबदार पुल जिसमें बीच में पांच खम्भे दिख रहे हैं।

दिन में किसी नदी को देखा। बड़ी नदी पर पत्थर का मेहराबदार पुल जिसमें बीच में पांच खम्भे दिख रहे हैं। नदियां अरब सागर के नजदीक हैं तो उनमें पानी भी है और चौड़ाई भी। प्रेमसागर ने बताया कि नाव भी चल रही थी उसमें। नक्शे में मधुवंती नदी नजर आती है। शायद वही हो। प्रेमसागर ने बताया कि नया पुल बनाने का भी काम चल रहा था वहां। आसपास कई नदियां – ओजत, मधुवंती, द्राफद आदि दिखती हैं और उनपर बने डैम भी। पानी का दोहन खूब और विधिवत होता दिखता है सौराष्ट्र के इस दक्षिणी भाग में।

प्रेमसागर को गन्ने, अरहर और केला के खेत दिखे। एक जगह धान की थ्रेशिंग के बाद जमा किया गया पुआल के भूसे का ढेर भी दिखा। निश्चय ही वहां पराली जलाने जैसी कु-प्रथा नहीं है।

गुजरात के पूरे रास्ते प्रेमसागर ने अपनी ओर से गुजराती नमकीन की बात नहीं की। आज एक फोटो भेजा जिसमें अखबार पर फाफड़ा, सलाद और मिर्च दिखती है। “चटनी भी दिया था भईया; इमली की। यहां नाश्ते में समोसा नहीं, ज्यादातर ढोकला और फाफड़ा होता है। जलेबी मिलती है। पर उतनी नहीं, जितना अपनी तरफ मिलती है।”

दिन में एक सरपत की यज्ञशाला जैसी कोई चीज का चित्र भी भेजा था। “कोई शौकीन आदमी बनवाया होगा। मुझे लगा कि आपको चित्र अच्छा लगेगा, इसलिये खींच लिया।” मेरी पसंद के लिये एक जगह खोंचा लगे बैलों का फोटो भी खींच कर भेजा। वे हल नहीं लोहे का कोई हेंगा जैसा कुछ खींच रहे थे जो मिट्टी को लेवल करने या ढीला करने के काम आता है।

शाम के समय वे एक नाग बाबा के मंदिर में डेरा जमाये। इसके बारे में कंचा भाई ने बताया। कंचा भाई कौन हैं? “कंचा भाई को रेखा परमार जी ने रास्ते की ‘बेवस्था’ के लिये कहा था”। प्रेमसागर लोगों के बारे में विस्तार, उनके सही नाम, उनका परिचय आदि देने में कच्चे हैं। वे नाम लेते हैं तो यह मान कर चलते हैं कि मैं उन्हें जानता हूं! :lol:

नाग बाबा का मंदिर छोटा है पर परिसर बड़ा। लोग यहां सोमनाथ जाते आते ठहरते होंगे। उस हिसाब से एक बड़ा हॉल है और खुला स्थान। वहां लोग अपना भोजन आदि बना सकते होंगे। प्रेमसागर उस दिन अकेले यात्री थे और मंदिर की ओर से उन्हें भोजन भी मिल गया। जमीन पर बिछाने के लिये एक चटाई; उसके ऊपर गद्दे नुमा लेवा और ओढ़ने के लिये रजाई! इतना प्रबंध काफी था प्रेमसागर जैसे अल्पजीवी कांवर यात्री के लिये।

दो दिनों में प्रेमसागर 46 किलोमीटर चले हैं नक्शे के हिसाब से। उसमें लास्ट माइल इधर उधर जाने रुकने को जोड़ा जाये तो कुल 49 किमी। अब सोमनाथ 60 किमी या उससे कम बचा है। दो दिन और चलना होगा। दस दिसम्बर तक वे वेरावल छू सकते हैं अगर सामान्य से कुछ ज्यादा चलें। अन्यथा इग्यारह दिसम्बर को वे सोमनाथ में होंगे।

पोस्ट सामान्य से कुछ लम्बी हो गयी। प्रेमसागार की दी जानकारी के कारण भी और अपनी सोच उसमें डालने के कारण भी। मेरी पत्नीजी पोस्ट अप्रूव किया करती हैं और उसे दस में से नम्बर देती हैं। आज दस में से आठ से ज्यादा मिल पायें तो मानूंगा कि मेहनत सफल है! :lol:

जय सोमनाथ। हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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