साइकिल सैर की एक दोपहर – विचित्र अनुभव


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

बहुत दिनों बाद धूप थी, हवा नहीं बह रही थी और वातावरण में गलन भी नहीं थी। बहुत दिनों बाद गुलाब को कहा कि मेरी साइकिल की हवा चेक कर ले। बहुत दिनो बाद गांव देहात में साइकिल ले कर मैं निकला। बारह से ऊपर समय हो गया था। दक्षिणायन सूर्य उत्तर की ओर साइकिल की छाया बना रहा था। वातावरण में धूल थी, पर इतनी नहीं कि सांस में घुटन सी हो। साइकिल सैर आनंददायक नहीं थी, पर अप्रिय भी नहीं थी।

अगियाबीर के नाले में आज फिर किसी ने अपने नीचाई के खेत में पानी दिया था जो पगडण्डी पर बह कर आ गया था। उसमें से अगर साइकिल निकालता तो जरूर साइकिल फंस जाती। न आगे जाते बनता न पीछे। एक बार पहले मैं फंस चुका था; सो इस बार सतर्क था। किनारे से बच बचा कर निकला और साइकिल भी सूखे से धकेल कर निकाली। सौ दो सौ कदम चढ़ाई पर पैदल चलना पड़ा साइकिल घसीटते हुये। उतने के लिये मेरे ऑस्टियोअर्थराइटिस ग्रस्त घुटनों और छियासठ वर्षीय शरीर को ज्यादा तकलीफ नहीं हुई। तीन चार साल पहले यह नहीं कर पाता। निश्चय ही मैं चार साल पहले के खुद से ज्यादा फिट हूं। गांव का असर है!?

सामने दक्षिण की ओर गंगा को उन्मुख परिसर का विस्तार। एक रंगमंच सा सज गया था।

आगे कमहरिया के गौगंगागौरीशंकर पंहुचा। सतीश वहां नहीं मिले। फोन किया तो उनकी पत्नी ने कहा कि बाहर गये हैं और फोन घर पर ही है। शैलेश पाण्डेय ने बनारस से मेरे लिये एक डमरू भेजा था, जो सुनील ओझा जी ले कर आये थे और सतीश के टेण्ट में रखा था। वही लेना था, पर सतीश के न होने से मिला नहीं। वहां रामप्रसाद थे। वे मुनीम/केयरटेकर जैसा काम देखते हैं। उन्होने कहा – बाबू जी बैठिये, मैं चाय बनाता हूं।

रामप्रसाद जी ने चाय बनायी। इसी बीच एक पुरुष और महिला मोटर साइकिल पर वहां आये। आदमी उस महिला का पति था या नौकर स्पष्ट नहीं हो रहा था। उसने महिला के लिये कुर्सी खींच कर रखी। तब महिला उसपर बैठी। कुर्सी खींचने का काम वह खुद कर सकती थी।

इसी बीच एक पुरुष और महिला मोटर साइकिल पर वहां आये। आदमी उस महिला का पुरुष था या नौकर स्पष्ट नहीं हो रहा था। उसने महिला के लिये कुर्सी खींच कर रखी। तब महिला उसपर बैठी।

एक रंगमंच सा सज गया था। तीन खण्ड रंगमंच के। एक तरफ मोटर साइकिल और मेरी साइकिल। बीच में सतीश का टेण्ट। दूसरी तरफ एक तख्त पर बैठा मैं और सामने दक्षिण की ओर गंगा को उन्मुख परिसर का विस्तार। मोटर साइकिल के पास कुर्सी पर बैठी महिला। बीच में टेण्ट में चाय बनाता रामप्रसाद और दूसरी तरफ तख्ते पर बैठा मैं। खण्ड एक में महिला अपनी बुलंद आवाज में अपने से ही बोले जा रही थी। स्वत: स्फूर्त मोनोलॉग। मुझे नहीं लगा कि वह किसी से बात कर रही हो। बीच में रामप्रसाद ने उसके पति/नौकर से बातचीत में मेरे बारे में कहा कि “वे रेलवे के बड़े अफसर हैं; उनको चाय पिला रहा हूं।”

इतना सुनते ही वह आदमी लपक कर मेरी ओर चला आया। बिना भूमिका के पास के तख्त पर बैठ कर मुझसे कहने लगा – “मेरे दो लड़के इलाहाबाद में रह कर नौकरी की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। आप अगर कुछ उनकी सहायता कर सकें। कोई नौकरी दिला सकें।..”

“मैं क्या कर सकता हूं भाई। मैं तो रिटायर हो चुका हूं। मेरे हाथ में तो कुछ नहीं है। आर आर बी की परीक्षा दिलवाइये। उससे ही नौकरी का कुछ हो सकता है।” – मैंने अपना ऑफ्ट-रिपीटेड डायलॉग बोला जो गांवदेहात में बार बार मुझे बोलना पड़ता है। और लोग तो कुछ जान पहचान निकाल कर, भूमिका बना कर नौकरी की बात करते हैं; यह बंदा तो घोर अपरिचय के बाद भी लप्प से नौकरी दिलाने की कह रहा है। मुझे अजीब लगा। झुंझलाहट भी हुई कि सतीश के न रहने पर मैं वहां चाय पीने के लिये रुका क्यूं?!

वह आदमी हार नहीं माना – “आप पूरी तरह रिटायर हो गये हैं?”

“भाई रिटायर तो रिटायर। आधा रिटायर कुछ होता नहीं।”

“तब भी आपके पास कौनो जुगाड़ तो होगा।” यह सुन कर मैं खीझ गया। पर तभी रामप्रसाद चाय ले आये।

“भाई मेरी खुद की नौकरी कड़ी परीक्षा पास करने पर लगी थी। वही अपने लड़कों को करने को कहो। कोई जुगाड़ काम नहीं करता।”

वह बंदा फिर भी पेस्टरिंग करता रहा। मेरा चाय पीना दूभर हो गया। इस बीच उसने बताया कि वह नौकरी करता था, पर पत्नी बीमार रहती है, इसलिये नौकरी छोड़ दी। उनको आंगनवाड़ी और जहां जाना होता है ले कर जाना होता है। उसी में बहुत समय चला जाता है। मुझे और कंफ्यूजन हुआ। पत्नी बीमार हो तो नौकरी छोड़ कर निठल्ला बनना हजम होने वाला सिद्धांत नहीं लगता था। और पत्नी किसी भी तरह से लाचार-बीमार नहीं दिखती थी। चौधरी की तरह कुर्सी पर बैठी थी। हो न हो, यह बंदा भी मेरी तरह “गुड फॉर नथिंग” ही है। गांवदेहात में ऐसे गुड-फॉर-नथिंगों की भरमार है। वे लोग जो पढ़ लिख कर खेती किसानी करते नहीं। श्रम करने की उनकी इच्छा शक्ति ही नहीं है। नौकरी भी चाहते हैं जिसमें तनख्वाह हो पर काम न हो।

जल्दी जल्दी चाय खत्म की। रामप्रसाद को अच्छी चाय बनाने का धन्यवाद दिया और वहां से चलने लगा। रंगमंच का फोकस तख्ते से टेण्ट होते मोटरसाइकिल के पास कुर्सी पर बैठी महिला की ओर शिफ्ट हुआ। बिना किसी पूर्व परिचय के वह महिला मुझसे बोली – “अरे, आप कहां चल दिये? इतनी जल्दी। आप कहां से आये हैं? कहां रहते हैं?” उसके शब्द धीरे धीरे, पूरी स्पष्टता के साथ, चबा चबा कर निकल रहे थे। मानो रंगमंच निर्देशक ने उन्हें इसी तरह डायलॉग बोलने को कहा हो। पूर्ण अपरिचित के साथ इस प्रकार बोलना मुझे बहुत वीयर्ड लगा।

उस महिला को हूँहां में जवाब दे चला। मेरे मन का नॉन-प्रेक्टिसिंग पत्रकार इस दम्पति के बारे में जानकारी लेने का प्रयास करने लगा। औरत चण्ट है और आदमी घोंघा। औरत की आंगनवाड़ी में नौकरी लग गयी है तो आदमी को लगा कि काम करने की जरूरत नहीं। वह महिला के नौकर-मोटरसाइकिल चालक के रोल में आ गया है। ज्वाइण्ट फैमिली में रहते हैं पर उसमें अपना योगदान नहीं करते। उल्टे, महिला पूरे परिवार पर तोहमद लगाती फिरती है कि वे सब मिल कर उसे मार डालना चाहते हैं। एफ आई आर लिखा कर पूरे परिवार को थाने घसीट चुकी है वह! वे दम्पति भारत के उस पक्ष को दिखाते हैं जो जाहिल-काहिल-नीच-संकुचित है। भारत अगर प्रगति नहीं करता तो ऐसे लोगों के कारण ही।

सामान्यत: गांवदेहात का यह पक्ष मेरे सामने नहीं आता। यह पता चलने पर खिन्नता भी हुई और जानकारी भी बढ़ी। मुझे नहीं लगता कि पढ़ने वाले इसे कोई रिलेवेण्ट पोस्ट मानेंगे। पर अनुभव हुआ तो लिख देने का मन हो आया। ब्लॉग है ही उस काम के लिये। :lol:


नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न – प्रेमसागर पर अंतिम पोस्ट


24 दिसम्बर 21 –

बीस दिसम्बर को दिन सवेरे प्रेमसागर ने बताया था कि वे पोरबंदर से आगे निकल लिये हैं। पोरबंदर से द्वारका 106 किमी और नागेश्वर तीर्थ 118 किमी है नक्शे के अनुसार। मेरे अनुमान से इस यात्रा में प्रेमसागर को तीन दिन लगने चाहिये थें। बाईस दिसम्बर को उन्हें गंतव्य पर पंहुचना था और तेईस को उन्हें नागेश्वर तीर्थ के दर्शन करने चाहिये थे।

दिलीप थानकी जी द्वारा भेजा नागेश्वर तीर्थ का चित्र।

वैसा ही हुआ। कल दोपहर में तीन बजे प्रेमसागर का फोन आया कि उन्होने नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न कर लिया है। सोमनाथ में वे अकेले थे। यहां उनके साथ दिलीप थानकी जी, उनके जीजा जी, उनके परिवार-कुटुम्ब के कई सदस्य और दिलीप जी की बहन का वह बालक (जिसका चित्र पोरबंदर के समुद्र तट पर प्रेमसागर के साथ है) भी थे। प्रेमसागर अपनी इस उपलब्धि पर हर्षित दिख रहे थे। इसमें दिलीप थानकी जी और उनके कुटुम्ब की महती भूमिका है। उन्होने प्रेमसागर का सोमनाथ और उससे आगे न केवल पूरा ध्यान रखा, उन सब ने प्रेमसागर को उसी तरह का आतिथ्य दिया, जैसी छपिया के घनश्याम पाण्डे को नीलकण्ठ वर्णी के रूप में सौराष्ट्र ने दिया होगा। दिलीप जी और उनका कुटुम्ब प्रेमसागर के प्रति जो श्रद्धा व्यक्त कर रहा है वह अभूतपूर्व है। वे लोग प्रेमसागर की आगे की द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा का सारा आर्थिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम बनाने और उसे सुचारु रूप से सतत जारी रखने के लिये कृत संकल्प हैं। महादेव की असीम कृपा प्रेमसागर पर है।

प्रेमसागर को, यह स्पष्ट हो गया है कि उन्हें मेरी लेखन सहायता की आवश्यकता आगे नहीं है। उन्होने इस को स्पष्ट शब्दों में नहीं कहा, पर उन्होने यह जरूर किया कि बीस दिसम्बर के बाद मुझे जानकारियां देना बंद कर दिया।

बाईस दिसम्बर को प्रेमसागर का फोन आया दिन में। उन्होने बताया कि पिछले दिन उनके पैर में कांटा चुभ गया था, सो चलने में पीड़ा थी। इस कारण वे बातचीत या चित्र नहीं दे पाये थे। यह वाजिब कारण लगा। पर उन्हें बिना जूते चलने की जरूरत क्यों हुई? प्रेमसागर ने बताया – “भईया, जूता टूट गया था। नया जूता मन माफिक मिला नहीं जो कपड़े का ही हो, जिसमें चमड़ा न इस्तेमाल हुआ हो।” यह कारण मुझे कुछ अजीब लगा। छोटे स्थानों पर भी प्रेमसागर को जूता या सेण्डिल मिल जा रहा था। पोरबंदर में न मिलना उचित नहीं प्रतीत होता, वह भी तब जब दिलीप जी प्रेमसागर की सब जरूरतें सहर्ष पूरी कर रहे हों। प्रेमसागर शायद जूता छोड़ कर चलना चाहते हैं और मुझे “नाराज” भी नहीं करना चाहते थे। पहले मैं नाराज भी होता और उनकी “जड़ता” या “लोग क्या कहेंगे” की भावना को निरर्थक ठहराने का प्रयास करता। पर इसबार मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।

थानकी जी का भेजा नागेश्वर तीर्थ का एक और चित्र

उसके बाद भी प्रेमसागर का नियमित फीड बैक – चित्र, फोन या लाइव पोजीशन शेयरिंग नहीं हुई। यह साफ हो गया, उनके बिना बोले कि वे आगे कोई सहयोग नहीं चाहते। वह सहयोग मैंने उन्हे जो दिया था, उसमें उनपर अपने स्नेह के अलावा जो गुस्सा, नारजगी या उनकी सोच पर व्यंगोक्तियाँ रही हैं, वे अब उन्हें अधिक चुभ रही हैं। वे शायद पहले भी कष्ट देती रही हों, पर तब उन्हे मेरे सहयोग, लेखन और लोगों से बातचीत कर उनकी सहायता करने आदि की आवश्यकता रही थी। अब उनके पास विकल्प हैं।

खैर, जो भी हो; पिछले लगभग चार महीने प्रेमसागर के साथ यात्रा जुगलबंदी ने मुझे बहुत फायदा दिया है। उनकी यात्रा न होती तो मैं रीवा, शहडोल, अमरकण्टक और नर्मदीय क्षेत्र, भोपाल, उज्जैन, माहेश्वर, गुजरात और सौराष्ट्र की मानसिक यात्रा कभी न कर पाता। कांवर यात्रा का उन्होने मुझे सहभागी बनाया, अपने सुख दुख – लगभग पूरी तरह – मुझसे बांटे, मेरे ब्लॉग को नया आयाम दिया; उसके लिये प्रेमसागर को धन्यवाद।

पोरबंदर से नागेश्वर तीर्थ की यात्रा के मेरे पास कोई चित्र या और जानकारी नहीं है। परसों प्रेमसागर ने यह जरूर बताया था कि यह यात्रा भाग उन्होने कांवर को केवल प्रतीक के रूप में ले कर सम्पन्न किया है। प्रतीक के रूप में थोड़ा जल अपने कंधे पर लिये चले वे। बाकी सामान और जल के लोटे या तो पोरबंदर में रहे या द्वारका में। यात्रा के तीन दिनों में रातें उन्होने पोरबंदर (एक दिन) और द्वारका (दो दिन) रुक कर बिताईं। दिलीप थानकी जी के कुटुम्ब के लोग उन्हें यात्रा स्थल से वाहन द्वारा रात बिताने के लिये ले जाते थे और अगले दिन उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ते थे, जहां से रात्रि विश्राम के लिये वे विराम लिये थे। इस प्रकार नवी बंदर से नागेश्वर तीर्थ की यह यात्रा पारम्परिक तरीके से कम प्रतीकात्मक तरीके से ज्यादा हुई। पर परम्परा पालन प्रेमसागर का ध्येय होना भी नहीं चाहिये। क्या होना चाहिये, उसपर कहने में इससे पहले मैं प्रवचनात्मक मोड में आ जाऊं, मैं इस ट्रेवलब्लॉग को यहीं विराम देता हूं।

मेरे ब्लॉग की पोस्टों के साथ 2654 किलोमीटर चले हैं। यह कोई कम पद यात्रा नहीं है। मुझे उसके साथ जुड़ने में ‘सेंस ऑफ प्राइड’ है; जिसे मैं लिखे बिना यह 90 पोस्टों की सीरीज बंद नहीं करूंगा। यह सब सम्पादित कर कभी पुस्तक का रूप लेगा या नहीं, मैं नहीं कह सकता। ब्लॉग से पुस्तक के रूपांतरण के लिये मैं निहायत आलसी हूं। अन्यथा “मानसिक हलचल” से पांच सात पुस्तकें दुह लेता। :lol:

देवाधिदेव महादेव प्रेमसागर का कल्याण करें। हर हर महादेव!


*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

जैतूना से बदामा खातून – मनिहारिन की पीढ़ियाँ


मनिहारिन/चुड़िहारिन का पेशा अभी भी गांव में जिंदा है और पीढ़ियों से महिलायें उस काम में लगी हैं। पांच अप्रेल को मैंने नूरेशाँ मनिहारिन के बारे में एक स्टेटस पोस्ट लिखी थी। अब मेरे घर पर बदामा मनिहारिन दो बार आयी है।

Maniharin
दऊरी उठाये महिहारिन

मेरी पत्नीजी के बचपन में जैतूना खातून आया करती थी। वह सीधे घर के आंगन में जाती थी – जनानखाने में। उसे घेर कर सभी महिलायें, लड़कियां आसपास इकठ्ठा हो जाती थीं। सभी को चूड़ी पहनाती थी। उनके मांग के अनुसार लिपिस्टिक, स्नो (क्रीम) आलता-सिंदूर-ईंगुर, बिंदी, आईना, पाउडर आदि दिया करती थी। फीता या लाल रिबन का चलन था। काला परांदा भी बिकता था। घण्टा डेढ़ घण्टा मजमा लगता। दाम चुकाने में रुपया पैसा तो चलता ही, अनाज के साथ बार्टर भी होता था।

मनिहारिन-चुड़िहारिन का लोक संस्कृति में बड़ा स्थान था।

मुझे अच्छा लगा कि वह स्थान अब भी कमोबेश कायम है। बदामा मनिहारिन ने बताया कि जैतूना उसकी अजिया सास थीं। इसका मतलब कम से कम तीन पीढ़ी से उसके परिवार की महिलायेंं इस व्यवसाय में हैं। बदामा विधवा है। नूरेशाँ भी विधवा थी। बदामा बताती है कि उसका आदमी अठारह साल पहले गुजर गया था। उसकी जेठानी भी विधवा है और इसी तरह मनिहारिन का काम करती है। मुझे याद नहीं रहा नूरेशाँ के बारे में अपनी पुरानी पोस्ट का अन्यथा पूछता कि वही तो नहीं है इसके जेठानी। वह भी अपने को वहीं – महराजगंज के आसपास का बताती थी।

नूरेशां मनिहारिन
नूरेशाँ मनिहारिन

नूरेशां और बदामा – दोनो में कई समानतायें हैं। दोनो महिलाओं के सामान का सेगमेण्ट डील करती हैं। दोनो महिलायें हैं तो उनसे महिलायें सहजता से बातचीत करती हैं। कुछ सामान – जैसे सेनिटरी पैड्स या अण्डरगारमेण्ट्स – जो महिलायें अभी भी गांव/कस्बे के जनरल स्टोर्स से लेने में झिझकती-शर्माती हैं उन्हें ये सहजता से उपलब्ध करा देती हैं। बदामा ने बताया कि वह सेनीटरी पैड्स ला कर देती है। कीमत पैंतीस से ले कर सत्तर रुपये तक होती है। गांवदेहात में भी, उत्तरोत्तर सेनीटरी पैड्स का प्रयोग बढ़ रहा है। सरकार अगर महिलाओं का सशक्तीकरण करना चाहती है तो उसके फुट-सोल्जर ये मनिहारिनें हो सकती हैं जो हाइजीन की बातें महिलाओं से करें और उन्हें सेनीटरी पैड्स के प्रयोग को प्रेरित करें।

बदामा मनिहारिन
वाणी पाण्डेय ने आसपास की तीन चार महिलाओं – बच्चियों को बुला कर उन्हें अपनी ओर से चूड़ी पहनवाई। मनिहारिन बदामा है।

मेरी बिटिया वाणी पाण्डेय आयी हुई है। वह बोकारो में एक महिला सशक्तीकरण ग्रुप – साथ फाउण्डेशन का काम देखती है। उसने आसपास की तीन चार महिलाओं – बच्चियों को बुला कर उन्हें अपनी ओर से चूड़ी पहनवाई। पैर में काला धागा, जिसमें नकली मोतियां लगी होती हैं और जिसे बच्चे, महिलायें नजर न लगने के लिये पायल की तरह पहनते हैं; ‘काला धागा नजरिया वाला’ कहा जाता है; वह भी (उनकी फरमाइश पर) पहनवाया। छोटे शिशुओं के लिये ये मनिहारिने करधनी भी बेचती हैं।

बदामा के दो लड़के सूरत में काम करते हैं। सरिया ढलाई (?) का काम करते हैं। घर का खर्चा बदामा अपने बल पर चलाती है। चूड़ी, कंगन, क्लिप, आलता, ईंगुर सिंदुर, बिंदी, अण्डर गारमेण्ट्स आदि लिये चलती है अपनी दऊरी में। ग्राहक उसके महिलायें किशोरियाँ ही हैं। बता रही थी एक मरसेधू उससे सेफ्टी रेजर पूछ रहा था। वह मना करने पर पत्ती (ब्लेड) पूछने लगा। उसका मनचलापन देख कर बदामा में जवाब दिया – “तोहरे बदे कुच्छो नाहीं बा। तूं जा महामाई के (तुम्हारे लिये कुछ भी नहीं है, तुम्हें महामाई – संक्रामक बीमारी – खायें!)!”

बदामा मनिहारिन - मनिहारिनों की समाज में आदर इज्जत पहले भी थी, अब भी है।
बदामा मनिहारिन – मनिहारिनों की समाज में आदर इज्जत पहले भी थी, अब भी है।

आजकल लड़कियों महिलाओं की पसंद में पहले से अंतर आया है। अब रिबन या परांदा नहीं बिकता। अब लड़कियां रबर बैण्ड मांग करती हैं। बुकनी की मांग कम हो गयी है। कान नाक में बुंदे पहनने वाली महिलायें भी अब नहीं हैं। अब सेनीटरी पैड्स, रुमाल और अण्डर गारमेण्ट्स बिकते हैं। नकली मोतियों की माला, सस्ती ज्वैलरी, काजल के पेंसिलें बिकती हैं। अब महिलायें घर के जनानखाने में, आंगन में नहीं बाहर ओसारे में भी बैठक लगाती हैं। आंगन का कॉन्सेप्ट उत्तरोत्तर खतम होता जा रहा है।

मेरी पत्नीजी बताती हैं कि पहले चूड़ी पहनाये जाने पर वे मनिहारिन की दऊरी को धरती छू कर प्रणाम करती थीं। ज्यादातर उनके पास पैसा नहीं होता था, वे बदले में अनाज देती थीं। अब वह प्रणाम करना या अनाज से बार्टर करना खत्म हो गया है। पर मनिहारिनों की समाज में आदर इज्जत पहले भी थी, अब भी है।

गांव में तरह तरह के फेरीवाले मुझे दिखते हैं। तरह तरह का फेरी का नये प्रकार का बाजार बढ़ा है। कोरोना लॉकडाउनके दौरान वे कम दिखते थे, पर अब तो बहुत से दिखते हैं। उनके बीच यह मनिहारिन सेगमेण्ट बहुत अर्से से चल रहा है, और आगे भी चलता रहेगा। बदामा की अगली पीढ़ी भी इस बिजनेस में तैयार होगी, इसकी आशा और यकीन है।

Bangles
मनिहारिन की दऊरी का सामान

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