भोपाल के आगे निकले प्रेमसागर


18 अक्तूबर 21, रात्रि –

प्रेमसागर सवेरे चार बजे भोपाल यात्री निवास में तैयार हो कर बैठे थे, पर बारिश होती रही। मैंने उनसे सवेरे की बातचीत का कर्मकाण्ड सात बजे के आसपास किया तो लगा कि शायद आज निकलना न हो पाये। वैसे भी आष्टा – जहां उनका तय मुकाम था, उनके अनुसार 50-56 किलोमीटर और मेरे गूगल मैप अध्ययन के अनुसार 87 किलोमीटर दूर था। अगर 56 किमी भी मान लिया जाये तो भी अब निकल कर पंहुच पाना संदिग्ध था। मैंने सोच लिया कि आज उनका भोपाल प्रस्थान लिखा नहीं है। पर शायद प्रेमसागर के संकल्प की दृढ़ता को आंकने में एक बार फिर चूक की मैंने। करीब 8-9 के बीच बारिश थमी होगी और वे निकल लिये। मैंने शाम के वार्ता कर्मकाण्ड के समय उनसे पूछा – आज निकल नहीं पाये?

“नहीं भईया। हम तो निकल लिये थे। आपको लाईव लोकेशन भी भेजे थे ह्वाट्सएप्प पर। हम तो मोटामोटी 30-35 किलोमीटर चल कर यहां आ गये हैं। कोई जगह है – धुन, डी एच यू एन। यहां वन विभाग की छोटी रोपनी (नर्सरी) है। यहां इंदर सिंह परिहार, तेज सिंह राजपूत और चतर सिंह जी मिले हैं। अभी अभी ही पंहुचा हूं। मैं उनके फोटो अभी आपको भेजता हूं।” – प्रेमसागर ने उत्तर दिया।

“यहां इंदर सिंह परिहार, तेज सिंह राजपूत और चतर सिंह जी मिले हैं।”

मैंने इस भाव में कि दिन में कोई चित्र आदि प्रेमसागर ने टेलीग्राम पर ठेला नहीं, सोचा था कि आज यात्रा नहीं हुई। ह्वाट्सएप्प सामान्यत: मैं देखता नहीं, पर मैंने ही प्रेमसागर को कहा था कि लोकेशन वे ह्वाट्सएप्प पर ही शेयर किया करें। वह देखा नहीं और मुगालते में रहा। लेकिन प्रेमसागर, नक्शे के अनुसार 28 किलोमीटर खींच ही लिये थे आज!

यह स्थान – धुन – नक्शे पर दिखा नहीं मुझे। अगला नाम दिखता था पचांवा। पचांवा सिहोर से अगला स्टेशन हुआ करता है भोपाल की ओर। सन 2003 और उसके पहले दशकों तक मैं रतलाम रेल मण्डल का ट्रेन परिचालन संभालता था और यह इलाका – ये स्टेशन मेरे अपने हुआ करते थे। मैंने नक्शे को ध्यान से देखा। सिहोर, पचांवा, फंदा, बकनिया भंवरी, बैरागढ़ – सब स्टेशन दिखे। मैं अपने फ्लैश बैक में चला गया। पर यह यात्रा विवरण उस फ्लैश-बैक का नहीं है; यह तो प्रेमसागर की कांवर यात्रा का है।

मैंने प्रेमसागर का धुन रोपनी के कमरे का चित्र देखा। साधारण 12′ गुणा 12′ फिट का कमरा। एक रस्सी बांध कर कपड़ा लटकाया गया है। एक सरकारी टाइप अलमारी। छाता और कील से टंगा एक झोला! प्रेमसागार को सत्तर अस्सी किलोमीटर चल कर कोई बड़ी जगह तलाशने की बजाय 35-40 किमी पर ऐसी छोटी जगहें चुननी चाहियें। वहां लोगों के पास साधन विपन्नता होगी पर भाव सम्पन्नता कहीं ज्यादा होगी और वह साधन हीनता की असुविधा को ओवर कम्पनसेट कर देगी!

रास्ते के चित्रों में भोपाल का ताल दिखता है।

रास्ते के चित्रों में भोपाल का ताल दिखता है। बैरागढ़ के समीप का लोकेशन होगा। चित्रों में अगर प्रेमसागर लोकेशन टैग कर दिया करें तो शायद चित्र की डीटेल्स में दिख जाये। पर पता नहीं टेलीग्राम/ह्वाट्सएप्प उन टैग्स को बनाये रखते हैं कि नहीं। यह तो तकनीकी विद्वान ही बता सकते हैं। भोपाल के ताल को अपनी अनगिनत यात्राओं में मैंने ट्रेन के इंजन से या कैरिज की खिड़की से निहारा होगा! उस जमाने में मेरे पास फोटो लेने के गैजेट्स नहीं होते थे अन्यथा टनों चित्र होते मेरे पास उसके! अब केवल स्मृतियां हैं।

प्रेमसागर ने बताया कि एक वृद्ध मिले थे। पांवों से लाचार। सत्तर से ऊपर उम्र होगी। उनके एक पैर में झुनझुनी रहती थी। अशक्त होने के कारण बेटा और पतोहू ने भी उनको उपेक्षित कर दिया था। अपना भोजन भी खुद बनाते थे। प्रेमसागर को देख कर उनसे कुछ उपाय मांगने लगे। यह कहने पर कि वे कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, माने नहीं। उनकी आंखों में आंसू थे। अंतत: प्रेमसागर ने उन्हें श्रद्धा के डोमेन का उपाय बताया – “आप शिवजी के प्रति पूरी श्रद्धा रख कर त्रयोदशी की रात में पास के किसी शिवाला के शिवलिंग पर बेलपत्र रखें और उसको घर ला कर चबा कर खा जायें। कुछ दिन करें। अश्वगंधा का प्रयोग करें…”

“भईया, मैं और क्या उपाय बताता? वे मान ही नहीं रहे थे। लोगों को डांट कर, झिड़क कर तो चला नहीं जा सकता। इन्ही प्रकार के उपायों का सहारा लेना होता है।” प्रेम सागर ने कहा। पर वैसे देखा जाये तो प्रेमसागर खुद उदाहरण हैं चमत्कार के। और वे खुद एक संकल्प के अनुसार चले जा रहे हैं इतनी बड़ी यात्रा पर!

वे खुद एक संकल्प के अनुसार चले जा रहे हैं इतनी बड़ी यात्रा पर!
कितनी बड़ी है द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा?

संकल्प बहुत बड़ा है, यह सभी सोचते हैं। पर कितना बड़ा है? कितनी लम्बी है यह यात्रा? मैं गूगल मैप का सहारा लेता हूं। प्रयाग से भोपाल के आगे तक प्रेमसागर ने 1276 किलोमीटर पैदल चलना पूरा किया है। नक्शे पर भोपाल से मैं निम्न स्थानों को ट्रेस करता हूं –

कांवर यात्रा पथ किलोमीटर
प्रयाग – वाराणसी – अमरकण्टक – जबलपुर – भोपाल (Shiva1)1243
भोपाल – उज्जैन – ॐकारेश्वर – नासिक (त्र्यम्बकेश्वर) – भीमाशंकर – घृश्नेश्वर – सोमनाथ – नागेश्वर – केदारनाथ (Shiva2)4105
केदारनाथ – देवघर (बैजनाथ) – श्रीशैलम (मल्लिकार्जुन) – रामेश्वरम (Shiva3)4074
कुल योग 9422
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा

यात्रा के उक्त तीनों खण्डों के गूगल मैप्स के स्क्रीनशॉट नीचे स्लाइड-शो में हैं।

प्रेमसागर

मैंने उक्त गणना में गूगल मैप की दूरी में 7 प्रतिशत और जोड़ा है जो सामान्यत: लास्ट माइल कनेक्टिविटी में अतिरिक्त चलना हो ही जाता है। इसके अलावा यह भी सम्भव है कि जिस क्रम में यात्रा की परिकल्पना मैंने की है, वह सही पथ न हो। श्रीशैलम और रामेश्वरम की यात्रा इटारसी-नागपुर होते हुये (लगभग) दक्षिणापथ से की जानी उचित होगी या झारखण्ड-ओडिसा-आंध्र-तेलंगाना के मार्ग से; उसपर विचार किया जा सकता है। किसी परिवर्तन से दूरी में घट-बढ़ हो ही जायेगी। पर अनुमानत: यात्रा 9-10 हजार किलोमीटर की होगी।

कुल मिला कर लगभग 10 हजार किलोमीटर के आसपास यह द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा बनती है। उसका एक बटा आठवां हिस्सा (12-15 प्रतिशत) अभी तक सम्पन्न हो चुका है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इससे यह विश्वास पुख्ता हुआ है कि प्रेमसागर यात्रा सम्पन्न करने में सक्षम हैं।

पर यह अभी है सम्पूर्ण यात्रा का एक छोटा भाग ही। आगे बहुत से लोगों का; अनेक प्रकार के संसाधनों और शुभकामनाओं का; और आर्थिक रूप से योगदान का भी; सहयोग आवश्यक होगा। जिस प्रकार से अब तक महादेव ने (विलक्षण रूप से) प्रेमसागर पर कृपा की है; उसी तरह आगे भी सहायता करते रहेंगे। जिस रफ्तार से अभी यात्रा चली है, उससे लगभग 350-400 दिन लगने चाहियें पूरी यात्रा सम्पन्न होने में। जैसा शुरुआत में प्रेमसागर ने मुझे कहा था – वे इससे ज्यादा समय के लिये अपने को तैयार कर चले हैं पर सोचते हैं कि उससे कहीं कम समय में वे यात्रा सम्पन्न कर लेंगे।

19 अक्तूबर 21, सवेरे –

सवेरे का वार्ता-कर्मकाण्ड साढ़े छ बजे किया। प्रेमसागर उस समय निकले ही थे आष्टा के लिये। दो तीन किलोमीटर चले होंगे। रोपनी के वन कर्मी साथ साथ चल रहे थे उन्हें विदा करने के लिये। “इनसे कह रहा हूं लौट जाने के लिये पर भईया मान ही नहीं रहे।”

और वे लोग उन्हें सिहोर तक छोड़ कर गये। सिहोर उनकी रोपनी से 10 किलोमीटर की दूरी पर है।

सिहोर तक छोड़ कर गये वे लोग। सिहोर के इस चित्र में तेज सिंह प्रेमसागर का पिट्ठू उठाये हुये।

कल रात मैंने लिखा था – वहां लोगों के पास साधन विपन्नता होगी पर भाव सम्पन्नता कहीं ज्यादा होगी और वह साधन हीनता की असुविधा को ओवर कम्पनसेट कर देगी! और मुझे लगता है कि वन कर्मियों ने उनको छोड़ने साथ चलने के भाव से वह सिद्ध ही कर दिया!

मैंने प्रेमसागर को कहा कि इस क्षेत्र में हनुमान जी कम भेरू बाबा ढेरों मिलेंगे सड़क किनारे। उनके चित्र लें। तरह तरह के नामों के उपसर्ग वाले भेरू मिलेंगे। यह इलाका ही शैव गढ़ रहा है। प्रेमसागर अपने इलाके में चल रहे हैं।

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर


भोपाल, बारिश, वन और बातचीत


18 अक्तूबर 21, सवेरे –

कल सवेरे वन विभाग के रेस्ट हाउस परिसर की नर्सरी देख कर कई चित्र भेजे प्रेमसागर ने। उनका मूल ध्येय मुझे सूचना देना था। वन की वनस्पति, जीव जंतुओं और चिड़ियों के बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं। शायद वहां शहर या पर्यटक आते हों। उनकी जानकारी के लिये अच्छी बातें हैं होर्डिंग्स में। गौरय्या, मकड़ी, बया, सर्प दंश, शेर, दीमक … अनेकानेक जीवों की जानकारी है उनमें।

वन की वनस्पति, जीव जंतुओं और चिड़ियों के बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं।

प्रेमसागर का समय धर्म और उसके इर्दगिर्द की जानकारी में ज्यादा लगता है। वे कल मंदिरों के दर्शन की बात कर रहे थे। कुछ मंदिरों के नाम भी लिये, जो आसपास हैं। मुझे उनके बारे में याद नहीं है चूंकि मेरी वासना उस ओर नहीं है। जाने कब भवसागर से विरक्ति का भाव मुझमें आयेगा और यह ब्लॉग-श्लॉग छोड़ कर मैं जप-ध्यान-मनन और मंदिरों के चक्कर में अपना समय देने लगूंगा। फिलहाल मेरे लिये ईश्वर सरलता से जीने और ईश्वरीय सौंदर्य – जो आसपास दिखता है – को अभिव्यक्त करना मुझे ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है।

प्रेमसागर मंदिरों के दर्शन को जा नहीं पाये। दिन भर बारिश होती रही। बारिश थी और रविवार का दिन; सो लॉजिस्टिक की भी समस्या रही। वाहन तो बहुत से खड़े थे, पर उन्हें चलाने वाले ड्राइवर लोग नहीं आ पाये थे। दिन भर कहीं निकले नहीं। “अब वापसी में भोपाल आऊंगा, तब देखूंगा मंदिरों को।” मैं यह कथन समझ नहीं पाता। प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग पद यात्रा तो फारवर्ड यात्रा है। एक से दूसरे ज्योतिर्लिंग को छूने की। उसमें यह वापस आने की बाद कैसे फिट होती है। खैर, अपनी बात वे जानें। फिलहाल उन्हें भोपाल से उज्जैन को निकलना है। कल तो कोई मूवमेण्ट नहीं हुआ। उन्होने अपनी लोकेशन शेयर करने का जो लिंक दिया था, वह एक ही स्थान बताता रहा।

आज सवेरे चार बजे से ही प्रेमसागर तैयार बैठे हैं पर बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही। आष्टा पंहुचने का तय हुआ था। प्रेमसागर के हिसाब से वह 50-55 किलोमीटर है। मेरे पास गूगल मैप की जानकारी के अनुसार वह 87 किलोमीटर दूर है। बीच में कोई रुकने का स्थान बन नहीं पाया। और आज आठ बजे तक तो निकल भी नहीं सके। आष्टा तक पंहुचना सम्भव ही नहीं लगता, चाहे वे सड़क छोड़ कर एक सीधी लकीर खींच कर भी वन विभाग के रेस्ट हाउस से वहां जाने की सोचें।

“अब तक कभी कितना अधिकतम चले हैं एक दिन में?”

प्रेमसागर का ऐसी बात का उत्तर ‘मोटा-मोटी’ से शुरू होता है। उनके कुछ तकिया कलाम हैं। मोटा-मोटी के अलावा जो बहुत ज्यादा प्रयोग होता है, वह है – “फिर-जो”। यह फिर-जो इतना घिस गया है कि वह ‘फिन-जे’ या ‘फिंजे’ सुनाई पड़ता है। कोई व्यक्ति अपने तकिया कलाम के बारे में कभी सजग नहीं होता। अगर हो जाये तो वह तकिया कलाम बन ही न पाये। मेरे नाना जी का तकिया कलाम था – जौन बाटई, तौन बाटई (जोहै सो है)। और वे हर वाक्य के अदि-मध्य-अंत में इतना जौन बाटई, तौन बाटई बोलते थे कि सुनने वाला मूल कथ्य भूल ही जाता था। :lol:

प्रेमसागर ने उत्तर दिया – “मोटा-मोटी, फिर-जो, पैंसठ किलोमीटर मान सकते हैं। सुबह जल्दी सुल्तानगंज से जल ले कर निकलते थे और दिन भर में इतना चल लेते थे।”

पैसठ किलोमीटर! गजब!

मैंने बिल ब्रायसन की पुस्तक “अ वाक इन द वुड्स” को पढ़ना-सुनना शुरू किया है।

प्रवीण पाण्डेय के द्वारा एपलेचियन ट्रेल की पदयात्रा के बारे में एक लिंक देने पर मैंने बिल ब्रायसन की पुस्तक “अ वाक इन द वुड्स” को पढ़ना-सुनना शुरू किया है। उसमें बिल ब्रायसन एक दिन में 12 मील चल रहे हैं और जिस दिन 14 मील हो गया उस दिन वह बड़ा अचीवमेण्ट हो गया! और यहां प्रेमसागर आये दिन पचास किलोमीटर तो धांस ही देते हैं। पचास किलोमीटर यानी 30-32 मील! ग्रेट हो प्रेमसागर जी! और अब तक पौने आठसौ मील चल लिये हैं इस पदयात्रा में!

अपने सेण्डिल के बारे में प्रेमसागर का कहना है – “भईया, सेण्डिल भी सोचता होगा कि दुकानदार ने किस आदमी को मुझे थमा दिया। चैन लेने ही नहीं देता। महीने भर में में ही घिस गया है। जल्दी ही बदलना पड़ेगा।” वह तो गनीमत है कि प्रेमसागर का सेण्डल सस्ता वाला है – तीन-चार सौ का। किसी रीबॉक या आदिदास का खरीदे होते तो बारम्बार खरीदने में उन्हें लोगों से पैसे की अपील करनी पड़ती।

वैसे, बाई-द-वे, यह पढ़ने वाले प्रेमसागर जी की जरूरतों के लिये कुछ न कुछ दे सकते हैं। उनकी सहायता तो की जानी चाहिये। एक फोन पे का अकाउण्ट है उनका, जिसमें डिजिटली भेजा जा सकता है। प्रेमसागर खुद तो किसी से आगे बढ़ कर मांगने की बात करते नहीं। पर उनकी मितव्ययता के बावजूद, जरूरतें तो हैं ही।

कल एसडीओ साहब – तरुण कौरव जी आये थे उनके पास। वे बड़े सज्जन व्यक्ति हैं। प्रवीण दुबे जी ने उन्हे जब प्रेमसागार की सहायता के लिये कहा तो वे कई दिन से प्रेमसागर की यात्रा ट्रैक कर रहे थे। अनेकानेक बार उन्हें फोन किया होगा। लगता है प्रवीण दुबे के साथ प्रगाढ़ता होगी उनकी। प्रेमसागर ने बताया कि उनकी बिटिया पढ़ाई पूरी कर सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही है। शुभकामनायें।

एसडीओ साहब – तरुण कौरव जी

प्रेमसागर ने अग्निहोत्री जी का भी चित्र भेजा है। अग्निहोत्री जी इस रेस्ट हाउस की देखभाल करते हैं। प्रेमसागर को परिसर भी उन्होने ही दिखाया। यात्रा के दौरान अग्निहोत्री जी की तरह अनेकानेक भले लोगों ने अपना योगदान दिया है और आगे भी बहुत से लोग मिलेंगे। जब तक मैं यह यात्रा विवरण लिख रहा हूं, तब तक उनके बारे में लिखने और उनके चित्र ब्लॉग पर देने की आदत रहेगी। … वैसे यात्रा विवरण दो ही स्थितियों में बंद हो सकता है – एक, प्रेमसागर उदासीन हो जायें इनपुट्स देने में। और दो, वे सरल पदयात्री से हट कर शोहरत और सेलिब्रिटी बनने में रुचि लेने लगें – तब मैं उदासीन हो जाऊंगा उनके बारे में। अभी दोनो ही बातें नहीं हैं।

अग्निहोत्री जी

प्रेमसागर मुझे बताते हैं – “लोग मिलते हैं और बहुत असमंजस में डालते हैं। कहते हैं कि उनके घर में ये परेशानी है, ये बीमार है, यह कष्ट है। वे मांगते हैं कोई भभूत, कोई प्रसाद, कोई तावीज। मैं बताता हूं कि मैं उस तरह का बाबा या सिद्ध नहीं हूं। पर वे मानते नहीं। उनसे पीछा छुड़ाने के लिये कभी कभी कोई सेब, कोई केला या छुहारा जैसा कुछ देना पड़ता है। रास्ते चलते लोगों को डांटा या झगड़ा नहीं किया जा सकता। समझा-बुझा कर अपना रास्ता निकालना पड़ता है।”

“एक बार तो – जबलपुर के पहले रास्ते में एक आदमी बोले अपना सब सामान छोड़ कर आगे जाओ। मैंने उनसे कहा – जी, यह सब आपका ही है। आपके लिये ही ले कर चल रहा था मैं। अब तक मेरा था, अब आपका है। … पर जाने क्यों उस व्यक्ति ने मुझे जाने दिया। सो ऐसे लोग भी मिलते हैं। शायद महादेव ही परीक्षा ले रहे हों कि अपने सामान में मेरी कितनी आसक्ति, कितना मोह है।”

दस बज गये हैं। प्रेमसागर का लोकेशन कुछ हिला बताता है। लोकेशन अभी भोपाल में ही है, पर चलता प्रतीत होता है उनका चिन्ह। शाम को पता करूंगा कि वे अभी भी भोपाल में ही हैं या किसी अगले मुकाम पर। अब निकल कर आष्टा तक जाना तो सम्भव नहीं होगा। शायद रास्ते में कोई ठिकाना तलाशें। सवेरे बता रहे थे – “कोई नीरज जी फोन कर रहे हैं। यू-ट्यूब से जुड़े हैं। यहां से पचीस किलोमीटर दूर। वे अपने यहां रुकने के लिये कह रहे हैं।” सो क्या पता, नीरज जी के यहां तक पंहुच पायें। यात्रा पर निकलने के बाद अगला मुकाम अपने हाथ में कम, मौसम, रास्ते और संयोग पर ज्यादा निर्भर करता है। आज देखते हैं क्या होता है! :-)

हर हर महादेव!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

भोजेश्वर मंदिर और भोपाल


16 अक्तूबर 21, रात्रि –

भोजेश्वर मंदिर के चित्र देख कर मुझे आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की “बाण भट्ट की आत्मकथा” याद हो आती है। उन्होने परिचय कराया बाणभट्ट से। उनकी रचना कादम्बरी अपूर्ण है जो शायद उनके पुत्र भूषणभट्ट ने पूरी की। उसी की तर्ज पर हजारीप्रसाद जी ने बाणभट्ट की आत्मकथा भी इस प्रकार लिखी है जो अभूतपूर्व तो है; पर बकौल उनके (छद्मनाम ? व्योमकेश शास्त्री) है अपूर्ण ही।

उत्कृष्टता और अपूर्णता बाणभट्ट के साथ जुड़ी है। उनकी उत्कृष्टता लेखन में है। भोजेश्वर मंदिर की उत्कृष्टता और अपूर्णता स्थापत्य में है। कादम्बरी के लिये तो भूषणभट्ट मिल गये। वे नहीं होते तो शायद आधुनिक युग में आचार्य हजारी प्रसाद जैसे व्यक्ति मिल जाते कदम्बरी को पूरा करने के लिये। भोजेश्वर मंदिर के लिये कोई ‘भूषणराज’ नहीं मिले। वह मंदिर, जिसकी इतनी प्रतिष्ठा है, इतनी मान्यता कि इसे मध्यप्रदेश का सोमनाथ कहा जाता है; अब भी बिना कगूरे के, बिना गुम्बद के है।

भोजेश्वर मंदिर, भोजपुर। मंदिर अधूरा बना है। By Bernard Gagnon – Own work, CC BY-SA 3.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=33820444

भोजेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व विभाग के पास है। उनकी पॉलिसी में शायद मंदिर के पूर्ण-निर्माण की बात न हो, मात्र विरासत के रखरखाव की ही जिम्मेदारी हो। पर व्यापक हिंदू समाज का यह दायित्व नहीं बनता कि मंदिर पूरी तरह बने जैसा भोजराज बनवाना चाहते थे। कहा जाता है कि इस मंदिर के और परिसर में और भी जो कुछ बनना था, उसके नक्शे पत्थर में उकेरे गये हैं और वे 11वीं सदी के ही हैं। कुछ प्रस्तरखण्ड भी तराशे हुये पड़े हैं – प्रतीक्षा करते कि उनका प्रयोग होगा। मंदिर के पूर्णनिर्माण के लिये पत्थर भी कहीं और से नहीं लाने हैं। वह धरती ही पत्थरों से भरी पड़ी है।

“मध्य भारत के सोमनाथ” का पूर्णनिर्माण होना चाहिये; नहीं? बिना गुम्बद के मंदिर जंचता नहीं। कम से कम मुझे तो वह अपूर्ण लगता है।

प्रेमसागर जी ने उस मंदिर के 21 फिट ऊंचे और 18फिट 8 इंच परिधि के विशालकाय शिवलिंग के चित्र भेजे हैं पर उनकी कैमरे की सेटिंग के कारण पूरी भव्यता से दृश्य नहीं आ पाया। गूगल मैप पर यह चित्र जिसे शुभम नागर जी ने खींचा है शिवलिंग की विशालता और भव्यता को अच्छे से दर्शाता है –

भोजेश्वर मंदिर का विशाल शिवलिंग।

प्रेमसागर जी ने बताया कि यह शिवलिंग पीतल का बना है। जितनी बार मैं इस शिवलिंग को (चित्र में) देखता हूं, मंत्रमुग्ध सा रह जाता हूं। प्रेमसागर ने भी बताया कि वहां शिवलिंग के पास कुछ देर ध्यान लगाने में उन्हें जो अनुभूति हुई, वैसी पहले कभी बाबा धाम में भी नहीं हुई थी। बाबा धाम (देवघर) वे सौ से अधिक बार कांवर ले कर जल चढ़ाने जा चुके हैं। प्रेमसागर की द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में मेरा डिजिटल साथ बना रहा तो सभी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन होंगे। पर भोजेश्वर मंदिर का यह दर्शन भूला नहीं जा सकता।

प्रेमसागर आज सवेरे सात बजे वहां मंदिर पंहुच गये थे। उनके साथ मंदिर के महंत पवन गोस्वामी जी और उनके दो पुत्रों के चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने।

बांये और दांये पवन गोस्वामी जी के पुत्र और बीच में पवन गोस्वामी (बांये) के साथ प्रेमसागर। नेपथ्य में भोजेश्वर शिवलिंग है।

महंत जी के बारे में प्रेमसागर बताते हैं कि बहुत सरल और मिलनसार व्यक्ति हैं। उनकी अगवानी के लिये कल रास्ते में वे खड़े थे; यह प्रमाण है उनकी सरलता का।

इग्यारह बजे के बाद ही प्रेमसागार भोजेश्वर मंदिर से भोपाल के लिये रवाना हुये। भोजपुर बेतवा के किनारे है। वहां जाना नहीं हुआ। एक सज्जन ने कल ट्विटर पर टिप्पणी की थी कि पास में भीमबेटका है, प्रेमसागर जी को वहां भी हो आना चाहिये।

पर प्रेमसागर बतौर टूरिस्ट नहीं निकले हैं। वे तो कांवर ले कर सिर झुका कर जप करते हुये चला करते थे। बिना आसपास देखे। यह तो बदलाव उन्होने किया है कि यात्रा मार्ग में दृश्य और सौंदर्य में “कंकर में शंकर” के दर्शन करने का। वह बदलाव ही बहुत बड़ा बदलाव है। उनसे अपेक्षा करना कि वे अपनी यात्रा से डी-टूर हो कर आसपास के स्थान देखने के लिये घुमक्कड़ी करेंगे, उनकी कांवर यात्रा का मूल ध्येय ही खतम करना होगा। वे पर्यटक नहीं हैं, वे कांवरधारी तीर्थयात्री हैं। उस मूल स्वरूप से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिये।

रास्ते में एक सज्जन – महेंद्र जी मिले। वे प्रेमसागर का बैग उठा कर साथ साथ चले।

भोजपुर में एक सज्जन – महेंद्र जी मिले। वे प्रेमसागर का बैग उठा कर साथ साथ चले। इस प्रकार कांवर यात्रा में उन्होने प्रेमसागर का कुछ भार कम कर सहयोग दिया। प्रेमसागर ने टिप्पणी की – लोग आगे ज्यादा से ज्यादा मेरे बारे में जानने की उत्सुकता दिखाने वाले मिल रहे हैं। वे किसी न किसी तरह से सहायता करने की कोशिश करते हैं।

भोजपुर से भोपाल के रास्ते में उन्हें नदियां मिलीं। वे बेतवा की ट्रिब्यूटरी होंगी। एक नदी – कलियासोत तो नक्शे में दिखती है। वे नदियां भोपाल के तालों से निकली होंगी। मन्दिरों-मूर्तियों के चित्र लेने का तो स्वभाव प्रेमसागर में पहले से था। अब वे नदियों, पुलों और रास्तों, वनों, खेतों, पहाड़ियों, घाटियों और झरनों के चित्र लेने के बारे में अधिकाधिक सजग और सहज हो रहे हैं।

भोजपुर-भोपाल के रास्ते का स्लाइड शो।

कल भोपाल में समय व्यतीत करेंगे प्रेमसागर। परसों रवाना होंगे उज्जैन के लिये।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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