उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार


12 अक्तूबर 21 रात्रि –

आज सवेरे उदयपुरा से निकलने के एक घण्टे बाद ही प्रेमसागर को एक छोटी नदी का बड़ा पुल मिला। नर्मदा के उत्तर में यह नदी है तो और उत्तर में विंध्य की किसी पहाड़ी-जंगल से निकलती होगी। सवेरे के गोल्डन ऑवर की रोशनी में चित्र अच्छा आया है। नक्शे में खूब छानने पर भी दिखी नहीं। ऐसी अनेक नदियों का मकड़जाल बिछा है नर्मदेय क्षेत्र में। यह सब नर्मदा का सौंदर्य बढ़ाता है। क्या उपमा देंगे? ये नर्मदा की घनी केश राशि की एक एक लटें हैं?

उदयपुरा और बरेली – दोनो मध्यप्रदेश में हैं; राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नहीं। प्रेमसागर को आज उदयपुरा से आगे बढ़ना है होशंगाबाद की ओर। नर्मदा से उत्तर में है यह मार्ग। करीब 8-10 किलोमीटर नर्मदा तट से दूर। किनारे किनारे चलने वाले परकम्मावासी यह मार्ग नहीं चुनते होंगे। पर नक्शे में मैं देखता हूं तो ढेरों मंदिर पड़ते हैं रास्ते में। मुख्य हनुमान जी और माता जी के हैं। कुछ बाबा लोग भी हैं – हरदौल बाबा, मेणे वाले बाबा, पटेल बाबा, मंदारी बाबा आदि। ये बाबा लोकल देवता होंगे। या शिवजी ही ग्लोकल हो कर बाबाओं में रूपांतरित हुये हों। कहीं कहीं मंदिरों में हनुमान जी के साथ शिवजी का ड्यूयेट भी दिखता है नक्शे में। यह जरूर है कि राम-जानकी-कृष्ण बड़े मार्जिन से हनुमान जी से पापुलर वोट हारते दीखते हैं। “राम से अधिक राम कर दासा” वाली बात सिद्ध है!

दिन में एक नदी और एक नहर और मिली रास्ते में। नाम पता नहीं चला। रास्ते में कोई आदमी आसपास नहीं था, जिससे प्रेमसागर पूछते। कुल मिला कर जल की कमी नहीं इस इलाके में। मईया का प्रताप है कि जो भी फसल लेना चाहो, हो जाती है। सांवां, कोदों, तिन्नी – सब होता है मोटे अनाज के रूप में। अरहर और धान के खेत भी दिखे प्रेमसागर को। एक जगह चने की बुआई भी हो रही थी। ग्रामीण सड़क से थोड़ा दूर था, वहां तक जा नहीं पाये।

ग्यास और प्रीतम। इन दो बच्चों ने प्रेमसागर को राह चलते रोका और मंदिर में बिठा कर साबूदाने की खीर खिलाई।
माता जी का मंदिर

सवेरे साढ़े नौ बजे एक मंदिर पर समय गुजारने के चित्र भेजे हैं चलते चलते प्रेम सागर ने। माता के दरबार के नाम से जानी जाती है यह जगह। वहां दो बच्चों ने प्रेमसागर को राह चलते रोका और मंदिर में बिठा कर साबूदाने की खीर खिलाई। नवरात्रि का समय है सो साबूदाने की ‘फलहारी’ खीर थी जो व्रत करने वाले भी खा सकें। बच्चों के नाम भी लिखे हैं प्रेमसागर ने। ग्यास और प्रीतम।

चार घण्टे से ज्यादा चल चुके थे माता जी के मंदिर तक प्रेमसागर। साबूदाने की खीर खा कर वहीं विश्राम करने लगे। बारह बजे तक वहीं आराम किया। अपनी आगे की यात्रा का समय-आकलन उन्होने कर लिया होगा अन्यथा आराम के लिये रुकने की बात तो साढ़े नौ बजे नहीं एक डेढ़ घण्टे बाद उठती है जब धूप और तेज हो जाती है। बाद में प्रेमसागर ने बरेली पंहुचते पंहुचते फोन पर बताया कि वहीं पर एक नागा बाबा थे, जूना अखाड़े के। चलते समय वे प्रेमसागर की बिदाई करने लगे। बिदाई की विधिवत परम्परा निर्वहन के साथ उन्हें पांच सौ एक रुपये भी दे रहे थे। प्रेम सागर ने मना किया और मात्र एक रुपया लेने की बात की। “भईया जूना अखाड़ा के नागा बाबा लोगों में इस तरह बिदाई करने और मान सम्मान करने का चलन है।”

“अरे यह क्या बात हुई आपको पांच सौ एक रख लेना चाहिये था!”

“नहीं भईया, नागा लोगों का दिया धन पचाना आसान बात नहीं है। मेरे मना करने पर भी पचास रुपया और दिये नागा बाबा। नाम पूछने पर बताये कि जब सन्यासी बन गये तो नाम का क्या। कपड़ा-लंगोट कुछ नहीं पहने थे। बस एक गमछा लपेट लिये थे लोगों के सामने आने के समय।”

जूना अखाड़े के नागा बाबा

मेरी पत्नी जी से सुना तो टिप्पणी की – “बकलोल हैं प्रेम सागर। जो मिल रहा था, रख लेना था। इन अखाड़ा-वखाड़ा वाले बाबा लोगों के पास खूब सम्पदा है। खूब पैसा है। उनसे जो मिले ले लेना चाहिये!” :lol:

फिर जोड़ा – “पर शायद ठीक किया; उस लकड़हारे की तरह जिसने देवता से सोने, चांदी की कुल्हाड़ियां लेने से मना कर दिया था यह कह कर कि उसकी कुल्हाड़ी तो लोहे की है। और देवता ने उसे तीनो कुल्हाड़ियां दे दी थीं। हो सकता है अंतत: प्रेमसागर के साथ महादेव कुछ वैसा ही करें। परीक्षा बहुत लेते हैं ये महादेव!”

रास्ते में चलते हुये लोगों ने प्रेमसागर को हाईवे पर चलने की बजाय खेत की मेड़ पकड़ कर तिरछे निकलने का एक रास्ता बताया। उसपर चल दिये प्रेमसागर। जब सड़क से दूर हो गये तो लोकेशन बताने वाला एप्प भ्रमित हो कर अण्टशण्ट लोकेशन बताने लगा। अंतत: उन्हें एक छिंद धाम के इन्टीरियर मंदिर परिसर में दिखाया। छिंद धाम में मध्यप्रदेश भर के लोग मनौती के लिये आते हैं। मंत्री भी आते हैं और संत्री भी। वहां हनुमान जी का मंदिर है और राम जानकी भी हैं। मनौती वाले देव शायद हनुमान जी हैं और पीपल के दो विशालकाय वृक्ष।

वहां से सिंगल लेन वाली सड़क बरेली आती है। पता चला कि खेतों की मेड़ लांघते प्रेमसागर छिंद धाम पंहुचे थे। कीचड़ में पैर भी धंसे पर पांच किलोमीटर बचाने की चहक उनकी आवाज में थी। …. मैंने दोनो मार्गों का तुलनात्मक अध्ययन किया नक्शे पर। पूरी तरह परखने पर उन्होने कुछ खास नहीं बचाया था चलने में। पर खेतों में धंस कर आने का एडवेंचर तो मिला ही होगा। समय उन्हें उतना ही लगा। या शायद कुछ ज्यादा ही। पैर भी कीचड़ में सने होंगे जो उन्होने छिन्द धाम के सरोवर में धोये होंगे। पर उनकी जगह अगर मैं होता तो मैं भी यह “छोटे रास्ते पर चलने” का एडवेंचर ही करता! गांव के टेढ़े-घुमाव वाले रास्तों पर चलने का अपना ही आनंद है!

प्रेमसागार और महेंद्र सिंह राजपूत

उदयपुरा से बरेली नक्शे में 35 किमी दूर है। महेंद्र सिंह राजपूत, जिनके यहां उदयपुरा में आतिथ्य पाये थे प्रेमसागर; उनकी ससुराल है बरेली में। उन्होने सत्कार उदयपुरा में किया तो बरेली में उनके ससुराल वालों की बारी थी पुण्य लूटने की। प्रेमसागर पदयात्रा करते वहां पंहुचे तो महेंद्र सिंह और उनका परिवार के अन्य लोग पीछे से आये। उनका आने का ध्येय “महराज” जी को ससुराल वालों से परिचित कराना था। नवरात्रि का समय है तो वे लोग रुके नहीं। रात में नौ-दस बजे के बीच वापस उदयपुरा लौट गये।

पैंतीस किलोमीटर चल कर बरेली आने और लौटने का यह कार्य केवल महराज रूपी अतिथि को हैण्ड-ओवर करना भर था। आतिथ्य की परम्परा का यह डायमेंशन “नर्मदे हर” के क्षेत्र में ही हो सकता है जहां परकम्मा करने वालों का सत्कार उनकी संस्कृति का अंग बन गया है! स्लाइड-शो में देखा जा सकता है कि प्रेमसागर जी के लिये कितने लोग थे। इतने लोग प्रेमसागर के निमित्त इकठ्ठा हुये तो सेलिब्रिटी बन ही गये हैं वे!

रात आठ बजे ही मुकाम पर पंहुचे प्रेमसागर। आज पैर में तकलीफ वाली बात नहीं की उन्होने और मैं पूछ भी नहीं पाया। पंहुचने पर ठकुराइन के मायके वालों के आदर सत्कार में ही डूब गये होंगे वे। उसके बाद न उनका फोन आया और न कोई मैसेज ही। अगले दिन सवेरे उन्होने बताया कि भोजन शानदार बना था और मीठा में खीर और रसमलाई दोनो थी। कांवर यात्रा में पैर की ऐसीतैसी तो होती है पर भाव भी खूब छक रहे हैंं प्रेमसागर। यह मैंने कहा तो तुरंत उन्होने जोड़ा – भईया आपका आशीर्वाद है।

आशीर्वाद मेरा है और भोजन का आनंद वे ले रहे हैं! :lol:

आगे वन विभाग के एसडीओ साहेब तरुण जी ने प्रेमसागर के लिये इंतजाम कर रखा है। बरेली से बारी अगले दिन उन्हें पंहुचना है जो मात्र बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर है।

13 अक्तूबर की यात्रा छोटी है – बरेली से बारी

उसकी चर्चा अगली पोस्ट में होगी!

हर हर महादेव! नर्मदे हर! जय हो!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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कुछ और चलें – गाडरवारा से उदयपुरा


11 अक्तूबर, रात्रि –

दूरियां जल्दी तय कर लेने का लालच (?) है प्रेमसागर को। उन्होने सोचा था कि पच्चीस किलोमीटर के हिसाब से मुकाम रखेंगे। उसी हिसाब से उन्हें गाडरवारा से चल कर सांईखेड़ा तक चलना था। पर दस-इग्यारह बजे तक उन्हें लगा कि काफी दूरी तय कर ली है। इसके अलावा मौसम भी अच्छा है। सांईखेड़ा तो वे तीन बजे तक पंहुच ही जायेंगे। कुछ और चलें तो नर्मदा पार कर उदयपुरा भी पंहुच सकते हैं। वहां भी रुकने का विकल्प है। वहां के लोग भी फोन कर आमंत्रित कर रहे हैं।

और प्रेमसागर ने आगे बढ़ने का निर्णय किया। दो बजे मैंने नेट पर नक्शे में देखा – बड़ी तेजी से प्रेम सागर आगे बढ़ रहे थे। पर सांईखेड़ा में उन्हें देर तक रुके पाया। रुकने वाली जगह पर कोई गूगल मैप में एक मैडीकल स्टोर दिखाई दे रहा था। हो सकता है वहां कोई दवाई लिए हों। वहां से चलने पर उनकी चाल धीमी लगने लगी थी।

नर्मदा किनारे तो बहुत देर तक कोई गतिविधि नहीं नजर आयी। करीब घण्टा भर हुआ। वे नदी के करीब थे, पर नक्शे के स्टेटस के हिसाब से नदी पार नहीं की थी।

वहीं से उनका फोन शाम छ बजे मुझे आया – “भईया जरा देख कर बतायें यहां से अभी कितना दूर है उदयपुरा।”

“सवा आठ किलोमीटर है। पर बहुत देर से आपने नदी पार नहीं की। क्या दिक्कत है?”

“पैर में दर्द हो रहा है। मालिश कर रहा हूं। उदयपुरा से फोन कर रहे हैं। आठ किलोमीटर है तो दो घण्टा लगेगा। पन्द्रह मिनट में एक किलोमीटर चलता हूं मैं।” – प्रेमसागर की आवाज में संतोष था। वे आठ बजे तक तो पंहुच ही जायेंगे!

मुझे अपनी दशा सम्पाती की तरह लगी। रामायण का वह गीध और किसी प्रकार से वानरों की सहायता नहीं कर सकता था। उसके पंख जल चुके थे और वह बूढ़ा भी था। खुद जा कर लंका से सीता की सुधि नहीं ला सकता था। वह केवल यह देख सकता था कि लंका कितनी दूर है और उसमें सीता कहां पर हैं। मैं भी केवल यह बता सकता था कि प्रेमसागर का गंतव्य कितना दूर है। यह बता सकता था कि रास्ते में एक और नदी – मच्छवई नदी – और पड़ेगी। पतली सी नदी दिखती है नक्शे में। हो सकता है सूखी हुई हो। और, कोई शॉर्टकट नहीं है जिसे पकड़ा जा सके। नक्शे के हिसाब से सीधा रास्ता है उदयपुरा का। सड़क लगभग कौव्वा-उड़ान के रास्ते के हिसाब से है।

हनूमान (प्रेमसागर) नर्मदा तट पर थे और सम्पाती (मैं) अपने घर, जिला भदोही में। हनूमान के पास अपना भी गैजेट था, अपना जंतर, अपना मोबाइल। उसमें देख सकते थे कि कितनी दूर है उदयपुरा। पर उन्हे मुझ सम्पाती से जानना था! :lol:

अंतत: वे सात साढ़े सात बजे तक छू ही लिये उदयपुरा। नक्शे में कुल चालीस किलोमीटर है यह गाडरवारा से। नक्शे में दिखाई दूरी में आसपास का और चलना जोड़ लें 42-43 किमी चलना हुआ होगा। पच्चीस किमी चलना तय किया पर चले उससे पंद्रह सत्रह किलोमीटर ज्यादा।

दूरी तय करने का लोभ प्रेमसागर में है और उसका कोई तोड़ नहीं है। उसके लिये उनके पास तर्क हैं। … पैर में दर्द इसलिये हुआ कि रास्ते में कोई चाय का दुकान नहीं मिला। चाय न मिले तो कोई बात नहीं, आराम कहीं भी किया जा सकता था पर मेन बात कांवर को ऊंचे जगह पर रखने की है; वह चाय की दुकान पर ही हो पाता है। इसी तरह के और तर्क थे प्रेम सागर के पास। “पैर में दर्द है भईया पर एक ठो टैबलेट खा लेंगे, रात में सोयेंगे तो ठीक हो जायेगा।”

पता नहीं, महादेव कह रहे हैं क्या कि टैबलेट खा बेट्टा, और चला चल?! महादेव हैं मूडी देवाधिदेव। ऐसी प्रेरणा दे सकते हैं। … मैंने प्रेमसागर से तर्क करना बंद कर दिया। कांवर प्रेम सागर की, संकल्प प्रेम सागर का, यात्रा प्रेमसागर की; मैं जबरी उनके पैर के दर्द को ले कर दुबला हो रहा हूं। … तुमसे अपने गठियाग्रस्त पैर के दर्द का इलाज तो होता नहीं और तुम नसीहत देते हो प्रेमसागर को, जीडी! बंद करो अपनी एम्पैथी! मैं चुप हो गया।

वैसे भी, कल नीरज रोहिल्ला ने टिप्पणी की थी –

रीताजी की बात में दम है (पूर्ण सहमति नहीं है अभी), इंजीनियरिंग में कहते हैं 1st order effect, 2nd order and 3rd order etc. उनकी यात्रा का 1st order ध्येय किसी भी प्रकार बाधित न हो, एक सूत भी नहीं, तभी बाकी करेक्शन लगाए जा सकते हैं। :-)

नीरज की फेसबुक पेज पर टिप्पणी

प्रेमसागर का फर्स्ट ऑर्डर ध्येय यात्रा को (जल्दी) सम्पन्न करना है। और वे अपनी क्षमताओं का पूरा दोहन उसके लिये करना चाहते हैं। तब सेकेण्ड ऑर्डर, थर्ड ऑर्डर ध्येय का प्रश्न ही नहीं उठता। पीरियड।

मैं सोचता था कि अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने के लिये प्रेमसागर को ज्यादा ध्यान देना चाहिये पर प्रेमसागर जानते हैं अपनी कुल्हाड़ी की गुणवत्ता। सौ से ज्यादा बार सुल्तानगंज से देवघर कांवर ले कर चल चुके हैं। उन्हें संज्ञान है कि उनकी कुल्हाडी टॉप क्लास है।


सवेरे गाडरवारा से निकल कर प्रेमसागर ने एक दुकान पर चाय पी। चाय सर्व करने वाले का चित्र उन्होने भेजा है। इकहरे बदन का आदमी। कांधे पर एक नेपकिन लिये है और हाथ में चाय का पेपर कप। कुल्हड़ का चलन मध्यप्रदेश में नहीं है। कुम्हार अपनी मिट्टी बारबार उपयोग किये जा सकने वाले उपकरणों को बनाने में करता है एक बार चाय पी कर फैंकने वाले कुल्हड़ में नहीं। वहां गांगेय पीली मिट्टी बहुतायत में नहीं होती। वैसे कुल्हड़ न हो तो पेपर कप अगला उपयुक्त बायो डीग्रेडेबल विकल्प है। यहां उत्तर प्रदेश में तो लोग पैसा बचाने के लिये कुल्हड़ और पत्तल की बजाय प्लास्टिक की ग्लास और थर्मोकोल की प्लेट चलाते हैं जो अंतत: पोखर-ताल-नदी को चौपट करती है। मुझे वह चाय वाला आदमी और वह पेपर कप देख कर अच्छा लगा।

चाय की वह छोटी दुकान नहीं थी, सड़क किनारे का बड़ा रेस्तरां था। शायद गाडरवारा कस्बे के छोर पर ही होगा। साफ सुथरी जगह। बड़ी जगह पर चाय के पैसे भी ज्यादा लगे होंगे। सवेरे सवेरे उसमें प्रेमसागर के अलावा कोई और ग्राहक नजर नहीं आता था उस चित्र में जो प्रेम सागर ने भेजा था।

रास्ता अच्छा था – स्टेट हाईवे है वह। बबूल के पेड़ बहुत थे सड़क किनारे, जैसा प्रेमसागर ने बताया। मौसम भी साथ दे रहा था। धूप असहनीय नहीं थी। प्रेमसागर प्रसन्न थे और सांईखेड़ा में रुकने की बजाय आगे बढ़ जाने की सोचने और उस हिसाब से मुझे तर्क देने लगे थे।

रास्ता अच्छा था – स्टेट हाईवे है वह।

आसपास खेती थी, गन्ना ज्यादा दिखा प्रेमसागर को। नर्मदा घाटी का इलाका है। सतपुड़ा और विंध्य की ऊंचाइयों से झरता पानी इस घाटी में आता होगा, सो पानी पर्याप्त मिल जाता होगा गन्ने की खेती के लिये – यह मेरी अटकल है। अन्यथा पश्चिमी मध्यप्रदेश – मालवा इलाके में जहां मैंने दो दशक गुजारे हैं, गन्ने की खेती की किसान सोच भी नहीं सकता था। “लोग बता रहे थे कि इस नर्मदेय क्षेत्र में जमीन का ये हाल है कि सब तरह की फसल हो जाती है यहां – धान, गेंहू, गन्ना, चना, मक्का …।”

साईंखेडा से 12 किमी पहले, एक हनुमान जी के मंदिर में एक विरक्त साधू के समीप प्रेमसागर कुछ समय बैठे।

रास्ते में, साईंखेडा से 12 किमी पहले, एक हनुमान जी के मंदिर में एक विरक्त साधू के समीप प्रेमसागर कुछ समय बैठे। वे साधू (या सज्जन) सामान्य साधू वाले वेष में नहीं थे। ध्यानमग्न थे। उनके हाथ “आजानुभुज” थे। कृषकाय शरीर। चेहरे पर शांति थी और शरीर की नसें फूली देखी जा सकती थीं। एक टाट पर बैठे थे। व्यक्तित्व आकर्षक था। ऐसे कई लोग, जो तपस्या करते हैं, मिल जाते हैं। उन्हें ढूंढने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता। बस आपकी प्रवृत्ति, आपकी ट्यूनिंग वैसी होनी चाहिये। उनसे बात भी हुई प्रेमसागर की। यात्रा की बात सुनी तो महात्मा जी अपनी मोहमाया की बात करने लगे। विरक्त हो गये हैं पर परिवार अभी भी साथ जुड़ा है। मोहमाया छूटती नहीं। प्रेमसागर से उन्हें तुलना करने की जरूरत आन पड़ी। महात्मा जी शायद तुलना-वृत्ति से उबर नहीं सके हैं।

एक चाय की दुकान वाला बहुत स्नेही जीव था। सड़क से प्रेमसागर को बुला कर ले गया और चाय नाश्ता कराया। फलहारी चिवड़ा भी खिलाया। नाम बताया राकेश। एक फोटो भी लिया प्रेमसागर ने चाय वाले का। चित्र में समोसे के साथ तली हुई बड़ी बड़ी हरी मिर्चें रखी हैं। प्रेमसागर का कहना है कि हरी मिर्च खानी चाहिये। उससे पेट खराब नहीं होता और एक भी बीज अगर पेट में है तो बुखार नहीं आता। मेरा हरी मिर्च का अनुभव शून्य है। कभी गलती से एक टुकड़ा खाने में चला जाये तो ढेर सारा पानी पीना पड़ता है और तुरंत उसके एण्टी-डोट की तरह गुड़ की भेली की याद हो आती है। दुनियां दो खेमे में बंटी है – मिर्च भक्त और मिर्च द्रोही! प्रेमसागर और ज्ञानदत्त दो अलग अलग खेमे के हैं! :lol:

चाय की दुकान वाला राकेश

रात साढ़े सात बजे प्रेमसागर उदयपुरा के महेंद्र सिंह राजपूत जी के घर पर पंहुचे। वहां उनका आदर सत्कार हुआ। ठहरने के लिये पास के एक होटल के कमरे की व्यवस्था थी। महेंद्र सिंह जी दो भाई हैं और ज्वाइण्ट फैमिली रहती है। उन दोनो की पुत्रियां और बेटा हैं और चित्र में उनके बुजुर्ग पिताजी भी हैं। थके थे प्रेमसागर, सो टैबलेट खा कर सोये। मुझे कोई चित्र भेजने-बातचीत करने का अनुष्ठान भी अगले दिन सवेरे पूरा हुआ।

कल सवेरे भोर में ही उन्हें बरेली के लिये निकलना है। मध्यप्रदेश का यह बरेली उदयपुरा से 35-37 किमी दूर है। चलने में, आटे के साथ नमक बराबर उससे ज्यादा ही हो जाता है, जो नक्शे में दिखाया जाता है। दूसरे दूरी रास्ते की दुरुहता का मापदण्ड तो होती नहीं। पर दूरी से एक आंकड़ा तो मिलता ही है। आकलन के अनुसार उदयपुरा तक प्रेमसागर 1083 किमी चल चुके हैं। इससे ज्यादा ही चले होंगे, कम नहीं।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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गाडरवारा, गाकड़, डमरू घाटी और कुम्हार


10 अक्तूबर शाम –

सवेरे प्रेमसागर रेस्ट हाउस के आसपास घूमे। खपरैल के मकान देखे और उनके चित्र लिये। वन विभाग की कॉलोनी की सड़क का चित्र देख कर मुझे अपने रेलवे के दिनों की याद हो आयी। मैं छोटी जगहों में रहा हूं और वहां की रेल कॉलोनी के दृश्य इसी प्रकार के ही होते थे। सवेरे उनमें सैर करने का भी वही आनंद होता था। साफ सड़कें और वृक्ष। वृक्षों से गिरी पत्तियां। उन दृश्यों को तो बहुत याद करता हूं। यहां गांव में भी खुला माहौल है, पर खुली सड़कें और उनके किनारे पेड़ तो नहीं हैं। ऊबड़ खाबड़ सड़क और उसके किनारे गांव वालों के शौच की गंध तो बहुत ही उबकाई लाती है। पर सब कुछ तो जीवन में हर समय नहीं मिल सकता! प्रेमसागर के उन चित्रों को देख कर मैं अतीत में चला गया। वह अतीत, जहां अब जाना नहीं होगा। :-(

गाडरवारा की वन विभाग की कॉलोनी की सड़क

प्रेमसागर की ख्याति-खबर उनके आने के पहले पंहुचने लगी है। गाडरवारा में उनसे मिलने कुछ लोग आये थे। मैंने उनसे पूछा नहीं कि कौन लोग थे। प्रेमसागर भी बाकी चीजें बताते समय शायद उनके बारे में बताना भूल गये। उन्होने यह बताया कि सवेरे सड़क पर झाड़ू लगाती महिला दिखी तो उससे पूछा कि उसकी कोई सहायता कर सकते हैं क्या? महिला ने बताया कि उसने चाय नहीं पी है। उसको को उन्होने पैसे दिये थे चाय पीने के लिये। उस महिला का मरद भी सफाई के काम में था तो दो लोगों की चाय के लिये दिये।

अपने एक उसूल की बात उन्होने प्रसंगवश बताई प्रेमसागर ने – “भईया, वैसे मैं भीख मांगने वालों को भीख नहीं देता। पर वृद्ध और बीमार लोगों को जरूर सहायता करने की कोशिश करता हूं। उसके अलावा जो सार्वजनिक स्थान पर सफाई के काम में लगे मिलते हैं, उनके प्रति हमेशा कुछ न कुछ देने का भाव मन में रहता है। काहे कि यह सफाई का काम कोई करता नहीं। और यह बहुत जरूरी काम है।”

अशोक मेहरा जी गाकड़ भूनते हुये

दोपहर के खाने में मनीष तिवारी के घर पर गाकड़ भर्ता का इंतजाम था। बनाने के काम में अस्थाई कर्मी अशोक मेहरा जी लगे थे। गाकड़ वैसे ही बनता है जैसे यहां उत्तरप्रदेश में बाटी। उसमें शायद सत्तू नहीं भरा रहता। मालवा में आगे यही रूपांतरित हो कर बाफला बन जाता है। बाफला बनाने की प्रक्रिया कुछ अलग है। वहां गोल टिक्कड़ पहले उबाला जाता है फिर कण्डे पर भूना जाता है। मुझे बाटी की बजाय गाकड़ और गाकड़ की बजाय बाफला ज्यादा अच्छा लगता है। बाटी में जो सत्तू झरता है उसे समेटते हुये खाना झंझट का काम लगता है। यह जरूर है कि बाटी की तुलनात्मक बेइज्जती पूर्वांचल-बिहार वालों को कत्तई नहीं रुचेगी। :lol:

दोपहर के खाने में मनीष तिवारी के घर पर गाकड़ भर्ता का इंतजाम था।

फिलहाल प्रेमसागर के गाकड़-भर्ता-दाल-दही आदि के चित्र को देख मन किया कि मनीष का निमंत्रण स्वीकार कर गाडरवारा का चक्कर लगा ही लिया जाये। … सब मानसिक लड्डू फोड़ने वाले ख्याल हैं! :-)

शाम के समय शक्कर नदी के उस पार, पूर्वी किनारे के आगे वे डमरू घाटी गये। यहां गाडरवारा के ही किन्ही भगवान सिंह परिहार जी ने एक बड़े से परिसर में एक मंदिर-कम-टूरिस्ट स्पॉट जैसा बनाया है। सीमेंट या प्लास्टर ऑफ पेरिस की छोटी-बड़ी-विशालकाय मूर्तियां हैं। शिव जी और हनूमान जी की विशालकाय मूर्तियां और शिवलिंग हैं। बतखें हैं। प्राकृतिक दृश्य है। डमरू के आकार की इस घाटी का कोई इतिहास भी है और दो दशक पुराना वर्तमान भी। गाडरवारा से जुड़ा है डमरू घाटी का नाम। मुझे बहुत कुछ लिखा मिला नहीं नेट पर डमरू घाटी की प्राचीनता के बारे में। शायद जो है वह कुछ दशकों की परिकल्पना और दो दशकों का निर्माण है। एक खबर वहां आने वाले चढ़ावे की राशि के बारे में है, जिससे यह पता चलता है कि चढ़ावा खूब आता है – अर्थात श्रद्धालू पर्यटक खूब आते हैं। कुल मिला कर पर्यटन, तफरीह और धार्मिक स्थल का घालमेल सा लगा डमरू घाटी।

वहं के कई चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं। उनमें से जो अच्छे हैं उन्हें मैं यहां स्लाइड-शो के रूप में लगा दे रहा हूं। कुछ अधिक लिखने की बजाय वे चित्र ही कह देंगे कि डमरू घाटी का डमरू कैसे बजना चाहिये।

मैंने कल प्रेमसागर के यह कहने पर कि यहां गाडरवारा में उन्होने खपरैल की छतों वाली कई इमारतें देखी हैं, यह आग्रह किया था कि वे अगले दिन (अर्थात आज) उन स्थानों के चित्र लें और यह भी पता करने की कोशिश करें कि खपरैल बनाने वाले कुम्हार अब भी खपरैल व्यापक तौर पर बनाते हैं या जो है वह पुरानी इमारतें भर ही हैं। कम से कम मैं यहां भदोही में तो पाता हूं कि खपरैल – नरिया-थपुआ – का बनाना कुम्हार लोगों ने बंद ही कर दिया है। लोग सीमेण्ट की ढलईया वाली छतें या एसबेस्टॉस/स्टील की शीट की छतें ही इस्तेमाल करने लगे हैं। मड़ई सरपत, रंहठा, बांस की खपच्ची और अन्य घासफूस के प्रयोग से बनती है। खपरैल तो खतम हो गयी है। यह परिवर्तन कुछ दशकों का है।

खपरैल का घर

गाडरवारा में चूंकि प्रेमसागर आज अपनी यात्रा से अवकाश लिये थे, वे आसपास खपरैल और कुम्हार की तलाश में ही घूमे मनीष तिवारी के साथ, उनकी मोटर साइकिल पर। खपरैल की छतों की इमारतें आकर्षक लगती हैं। कुम्हार भी मिला। उसके पास अब बड़े चक्के वाला हाथ और डण्डी से घुमाने वाला चाक नहीं है। उसका स्थान एक हॉर्सपावर की इण्डक्शन मोटर से चलित चाक ने ले लिया है जिसे बटन दबा कर चलाया जाता है और चाक की स्पीड भी शायद रेग्युलेटर से नियंत्रित की जाती है।

पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस, गाडरवारा

कुम्हार ने बताया कि खपरैल की बिक्री का समय तो मानसून के पहले का था। तभी बन कर वह बिक चुका। अब तो वह घरिया बना रहा था। बहरहाल यह तो पता चला कि खपरैल बनना अभी जारी है।

कुम्हार का बिजली चालित चाक

मेरी पत्नीजी यह सुन देख कर कहती हैं – बेचारे प्रेमसागर! कहां तो द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में नाक की सीध में, कांवर उठाये कदमताल किये चले जा रहे थे और उसमें रमे हुये थे। तुमने उस शरीफ आदमी को खपरैल देखने और कुम्हार की बस्ती खोजने में लगा दिया! शंकर भगवान तुम पर किचकिचा रहे होंगे। तुम उनका शोषण कर रहे हो ‌‌डिजिटल एक्स्प्लॉइटेशन (Digital Exploitation)! :lol:

मैं कहता हूं – नहीं, ऐसा नहीं है! मैं उनकी यात्रा को एक नयी विमा – नया डायमेंशन देने का प्रयास कर रहा हूं। यह देखना-परखना-सूंघना उनके चरित्र को निखारेगा और उन्हें एक अनूठा कांवरिया बनायेगा। और यह सब करा कौन रहा है? मैं नहीं करा रहा। इस कांवर यात्रा में जो कुछ हो रहा है वह महादेव प्रेरित ही है। सब वे ही कर रहे हैं और वे ही करा रहे हैं।

कुम्हार घरिया बना रहा था।

मेरे समधी रवींद्र पांड़े की मोबाइल की रिंगटोन है – प्रभु आपकी कृपा से, सब काम हो रहा है। करते तो तुम हो बाबा, मेरा नाम हो रहा है। … सो कर सब महादेव ही रहे हैं! :-)

कल भोर में ही निकल लेंगे प्रेमसागर गाडरवारा से। उनकी योजना सांईखेड़ा तक जाने की है। वह पचीस किमी दूर है। वहां रात में रुकने के दो विकल्प हैं। एक तो किसी सज्जन के घर पर है और दूसरा मंदिर में। प्रेम सागर ने कहा है कि भोर में निकल कर दस बजे तक चलेंगे। फिर जब धूप तेज हो जायेगी तो दोपहर तक कहीं छाया में ठहरेंगे। बाकी यात्रा शाम को पूरी कर मुकाम पर पंहुच जायेंगे। अब वे दिन भर चलने के कारण बीमार होने का जोखिम नहीं लेंगे। कुछ दिनों बाद जब धूप का ताप मंद पड़ जायेगा, तब दिन भर चलने की सोचेंगे।

सांईखेड़ा दूधी नदी के किनारे है। वह नदी भी सतपुड़ा के पहाड़/जंगल से निकलती है और आगे चल कर नर्मदा में मिल जाती है। वैसे ही जैसे शक्कर नदी सतपुड़ा से निकल कर नर्मदा में मिलती है। प्रेम सागर इसी तरह नर्मदा के आसपास चल रहे हैं। अभी नर्मदा के दक्षिणी/बांयी बाजू में हैं। परसों वे बोरास के पास नर्मदा लांघेंगे। वे नर्मदा के परकम्मा वाले होते तो नर्मदा माई को लांघने का काम नहीं करते! पर वे दूसरे मुहीम पर हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा पर!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

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