गाडरवारा, खपरैल, मनीष तिवारी और नदियां


9 अक्तूबर 21, शाम –

प्रेमसागर सवेरे दस बजे पंहुच गये थे गाडरवारा। रास्ते में शक्कर नदी के चित्र भेजे। नदी में जल कम है, रेत ज्यादा। उथली हैं नदी। इतनी उथली कि मेरे विचार से पैदल पार की जा सकती है। किसी चित्र में कोई डोंगी उसमें नहीं दिखी। नदी का पाट चौड़ा है। बारिश होने पर खूब जल होता होगा और बारिश के मौसम के बाद रेत की नदी होती होगी। पता नहीं सदानीरा रहती है या नहीं। पर नदी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं लगता। शक्कर कभी मीठी रही होंगी, अब मिठास बची नहीं लगती।

गीली रेत में पक्षियों और जानवरों के चलने के निशान साफ देखे जा सकते हैं जबकि फोटो पुल से लिये होंगे प्रेमसागर ने। उनके चित्र समय के साथ बेहतरतर (उत्तरोत्तर बेहतर के लिये गढ़ा शब्द) होते चले जा रहे हैं।

गाडरवारा में शक्कर और सीतारेवा का संगम है। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे जा कर संगम देख आयें। रेस्ट हाउस से तो किलोमीटर भर दूर होगा। नक्शे में शक्कर का पाट चौड़ा लगता है और सीतारेवा छोटी और पतली नदी लगती हैं। शायद चंचल और सुंदर नदी रही हो, तभी नाम में रेवा जुड़ा हो।

रास्ते में शक्कर नदी के चित्र भेजे। नदी में जल कम है, रेत ज्यादा। उथली हैं नदी।

नदियां – चाहे प्रत्यक्ष हों या नक्शे में, मुझे आकर्षित करती हैं। लगता है पूर्वजन्म में मैं मल्लाह रहा होऊंगा। किसी नदी को मैने सताया होगा और उन्होने शाप दिया होगा – जा तू अगले जनम में तैरना भी नहीं जानेगा और पानी में हिलने में तुझे भय लगा करेगा। कुछ वैसा ही है मेरे साथ – नदी को निहारता हूं पर उसमें पैर रखने से भी भय लगता है। लोग कहते हैं कि रोज गंगा जाते हो, उसमें स्नान कितनी बार किये हो? … मैंने शायद ही कभी गंगाजी में डुबकी लगाई हो। पैंतीस साल पहले अपने बब्बा को संगम में स्नान कराने ले गया था; तब लगाई थी उनके साथ। उनकी अंतिम ख्वाहिशों में एक रहा होगा संगम में नहाना। बस वही याद है। नदी के प्रति लगाव, भाव और भय का अजीब मिश्रण है मेरे व्यक्तित्व में।

प्रेमसागर मुझे फोन मिलाते हैं और बात करने के लिये फोन एक वन रक्षक मनीष तिवारी को थमा देते हैं। मनीष 1996 से वन विभाग के कर्मचारी हैं। तब कैजुअल लगे होंगे। सन 2008-09 से नियमित वन रक्षक हैं। यहीं गाडरवारा में पदस्थापना है। सरकारी क्वार्टर मिला है। वे दो भाई हैं। मनीष और उनके छोटे भाई के परिवार साथ रहते हैं उनके सरकारी मकान में। वैसे उन्होने एक प्लॉट ले लिया है गाडरवारा में। “नर्मदा मईया की कृपा रही और आप लोगों का आशीर्वाद रहा तो मकान भी बन ही जायेगा।”

दोनो की पत्नी हैं, उनकी माता जी हैं और दोनो के दो दो बच्चे हैं। मनीष के दो लड़के हैं – आठवीं और चौथी कक्षा में। भाई की दो बेटियां हैं जो अभी छोटी हैं। एक ढाई साल की और दूसरी कुछ महीने की। उनके पास गाय है या नहीं – यह नहीं बताया और मैंने पूछा भी नहीं।

मनीष बताते हैं कि ये नदियां – और कई नदियां हैं जो नर्मदा माई में जा कर मिल जाती हैं – उनके बचपन में सदानीरा हुआ करती थीं। उनके गांव के पास भी उम्मर नदी है जो आगे चल कर दूधी नदी में मिलती है और दूधी मिलती है नर्मदा में। ये सभी नदियां सतपुड़ा की देन हैं। सभी नर्मदा के जल को समृद्ध करने वाली हैं। शक्कर तो वाराह गंगा हैं नर्मदा पुराण में। वाराह भगवान शक्कर नदी के रूप में प्रकट हुये थे, ऐसा विवरण आता है। “एक बार मैं नर्मदा पुराण सुन रहा था पण्डितजी से, तब उन्होने उल्लेख किया था।”

पर अब इन नदियों में गर्मियों में पानी नहीं रहता; रेत ही रहती है। बरसात होना कम हो गयी है। “मेरे गांव के पास भी उम्मर नदी है, उसमें मेरे बचपन में हमेशा पानी होता था, अब केवल बारिश और ठण्ड में ही होता है।”

बालू दोहन का बड़ा खेल चलता है, बड़ा ग़जब का कारोबार है। पूरे मध्य प्रदेश में चल रहा है। एक ट्रॉली जो पहले में हजार से कम की होती थी अब चार पांच हजार की आती है। अब तो सुनते हैं रेत ट्रेन से भी जाने लग गयी है। मनीष तो नर्मदा की ट्रिब्यूटरी नदियों की बात बताये, नर्मदा का खुद का हाल भी बताने वाला कोई मिलेगा कभी। वैसे मनीष बताते हैं कि नर्मदा यहां गडरवारा से अठारह किमी पर हैं और वहां जाना तो महीने में दो चार बार हो ही जाता है। उनमें तो अच्छे से पानी है।

मनीष तिवारी

मनीष अपनी नौकरी से संतुष्ट दिखे। पच्चीस किलोमीटर दूर उनका गांव है। वहं खेत हैं। ट्रेक्टर है। छोटा भाई प्राइवेट में नौकरी करता है और गांव की खेती भी संभालता है। “आपकी दया से एक चार पहिया गाड़ी भी है और गांव तक डामर की सड़क भी है। आने जाने में दिक्कत नहीं है। मैं तो यहीं रहता हूं। भाई गांव आता जाता रहता है। हम दोनो साथ रह कर और हिलमिल कर बढ़िया से संभाल रहे हैं गाडरवारा का काम भी और गांव का काम भी।” – मनीष यह बताते हुये अपना संतोष, प्रसन्नता और मेरे प्रति आदर, सब व्यक्त कर देते हैं। वह बार बार यह जोड़ते हैं – आप भी एक बार गाडरवारा का चक्कर लगाईये न। चित्र में मनीष अपनी सरकारी नौकरी और पास में गांव की खेती की जुगलबंदी तथा भाई के साथ एक साथ रहने के कारण एक अपवर्ड-मोबाइल-क्वासी-रूरल मध्यवर्गीय व्यक्ति लगते हैं। वनरक्षक अगर सामान्यत: इसी प्रकार के होंगे तो उनके जरीये बहुत कुछ बदलाव गांव-समाज में आ रहे होंगे।

पता नहीं मनीष को मुझसे बात कर कैसा लगा; मुझे तो बहुत रस मिला। लगा कि अपनी साइकिल ले कर मैं उससे उनके गांवदेहात में मिलने निकला हूं, गाडरवारा! …. अब लगता है कि तुम ब्लॉग की मजूरी नहीं कर रहे, तुम भी यात्रा कर रहे हो, जीडी! :-)

प्रेमसागर कल गाडरवारा के आगे निकलने के मूड में नहीं हैं। आज उन्हें थोड़ी हरारत थी। पेरासेटामॉल ले कर सोये और दोपहर तीन-चार बजे ही उठे। बता रहे थे कि लगता है ताप है। कल चलने के लिये लक्ष्य है पिपरिया तक जाने का। रास्ता लम्बा है। मैं उनसे कहता हूं कि पचीस तीस किमी से ज्यादा दूर अगला मुकाम नहीं होना चाहिये। भले ही रुकने के लिये कोई असुविधाजनक घर ही मिले। उनकी जरूरतें ही क्या हैं – एक बिस्तर, दो रोटी और सब्जी! वह न भी हो तो सत्तू चिवड़ा, चीनी तो है ही उनकी पोटली में। मुकाम उतनी दूर होना चाहिये जितना सरलता से रास्ता देखते आनंद लेते कटे। कांवर-मैराथन प्रतियोगिता थोड़े जीतनी है।

प्रेमसागर हां हां कह देते हैं पर करते अपने हिसाब से ही हैं। खैर, फिलहाल कल उन्होने निकलना मुल्तवी कर दिया है। जान गये हैं कि शरीर एक दिन का आराम मांगता है।

उन्होने बताया कि यहां गाडरवारा में उन्होने कई इमारतों में छत खपरैल की देखी। पास में पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस भी है, जिसकी इमारत बड़ी है और छत खपरैल की है।

मेरा आसपास देखने का आग्रह-प्रवचन लगता है प्रेमसागर पर असर डाल रहा है। उन्होने बताया कि यहां गाडरवारा में उन्होने कई इमारतों में छत खपरैल की देखी। पास में पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस भी है, जिसकी इमारत बड़ी है और छत खपरैल की है। मैं प्रेमसागर को कहता हूं कि अगर खपरैल की छत व्यापक है तो उसको बनाने वाले – नरिया और थपुआ बनाने वाले – कुम्हार भी आसपास होने चाहियें। मनीष ने बताया कि आस-पास कुम्हार हैं। कल प्रेमसागर और मनीष खपरैल के घरों के चित्र भी लेंगे और कुम्हारों से भी मिलेंगे। … आठ सौ किमी दूर बैठे मुझे आनंद आ रहा है। प्रेमसागर की यात्रा में दूरी नापने के साथ आसपास देखने का आयाम भी जुड़ रहा है। आसपास देखेंगे, फिर उसमें सौंदर्य की अनुभूति करेंगे और सौंदर्य आयेगा तो शिवत्व तो उसमें घुलामिला होगा ही! सत्यम-शिवम-सुंदरम!

प्रेमसागर को ब्लॉग की उपयोगिता समझ आ रही है। वे महसूस करते हैं; कि उनके माध्यम से खपरैल के मकानों के, कुम्हारों के और आसपास के लोगों के चित्र उसमें आयें। “सीतारेवा और शक्कर के संगम को भी कल देख कर आऊंगा” – वे बताते हैं। वे यह भी कहते हैं – “आप मनीष जी के बारे में भी लिखें। उससे वन विभाग के बड़े अधिकारियों और प्रवीण भईया को भी तो पता चले मनीष जी के बारे में कि किसे लोग हैं और कैसी जिंदगी है उनकी”। अब प्रेमसागर अभिव्यक्ति की जरूरत और महत्व के पक्ष को भी समझने लगे हैं – मेरी पत्नीजी कहती हैं कि कहीं भी पंहुचने पर मात्र मंदिर, मूर्तियां और चमत्कार तलाशने वाला व्यक्ति अब खपरैल और कुम्हार भी तलाशने लगा है – यह बहुत गहन बदलाव है व्यक्तित्व का!


अपडेट 10 अक्तूबर, सवेरे – पिछली पोस्ट में जिक्र है कौड़िया के राजकुमार जी का। प्रेमसागर का आपात स्थिति में परसों उन्होने अपने घर रात्रि आश्रय और भोजन का इंतजाम किया था। वे कल रात में मिलने मिलने आये। गलती से उनका नाम पोस्ट में राजकुमार रघुवंशी की बजाय राजकुमार यदुवंशी लिखा गया था। उसे सही कर दिया गया है। उन्हें असुविधा हुई, उसका खेद है। इसके लिये उन्हे कौड़िया से गाडरवारा आना पड़ा, यह और गड़बड़ हुआ। प्रेमसागर और मैं दोनो ही भविष्य में लोगों के नामों को ले कर सतर्क रहें – यही सीख मिलती है।

कल राजकुमार रघुवंशी जी को प्रेमसागर के पास गाडरवारा आना पड़ा।
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कंकर में शंकर और नरसिंहपुर से आगे


पता नहीं भोलेनाथ किसपर प्रसन्न होते हैं; पर मुझे भोलेनाथ की ओर से कांवर यात्रा का अंतिम परीक्षा प्रश्नपत्र बनाने का चांस मिलता तो मैं एक ही प्रश्न उसमें रखता – क्या तुमने यात्रा के दौरान मुझे बाहरी दुनियां में देखा? देखा तो कितना देखा?

किसका अनुशासन ज्यादा है और किसकी उन्मुक्तता ज्यादा है – नर्मदा परिक्रमा की या द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा की? यह प्रश्न मेरे मन में कई बार उठता है। नर्मदा परिक्रमा के नाम पर अमृतलाल वेगड़ जी की तीन किताबें मेरे सिरहाने पड़ी रहती हैं – कई दिनों से आसपास रखी हैं वे। और कांवर यात्रा का तो मैं डिजिटल सहभागी हूं। दोनो यात्राओं के कालखण्ड भिन्न हैं। दोनो के ध्येय भिन्न हैं और दोनो का गांवदेहात की संस्कृति छूने का अंदाज अलग है। वेगड़ मंदिर के चबूतरे पर, मड़ई में, ओसारे में और कभी कभी तो किसी पेड़ के नीचे भी डेरा जमाये हैं। उन्हें कभी, पूनम की रात में खीर बनाने के लिये गांव के कई लोगों से दूध इकठ्ठा करना पड़ा है। उनके ट्रेवलॉग में गांव की विपन्नता है पर उसकी दरियादिली और सरलता भी है।

वेगड़ जी की नर्मदा त्रयी।

मैं प्रेमसागर से कई बार पूछता हूं कि कभी जंगल में गाय-गोरू चराते चरवाहों से बात हुई? रास्ते में कोई गरीब, विपन्न दिखा? कभी सड़क किनारे ही सही किसी झोंपड़ी के सामने चारपाई पर या जमीन पर घण्टा आध घण्टा व्यतीत किया? मैं कई बार कहता हूं कि ज्योतिर्लिंग के अर्ध्य में ही शिवत्व नहीं है, वे इन मूर्त रूपों में भी हैं। सर्वव्यापक हैं महादेव!

ऐसा नहीं कि प्रेमसागर कोशिश नहीं करते। उत्तरोत्तर उनके देखने और बताने में परिष्कार हुआ है। पर यात्रा के शिवत्व पर गंतव्य का शिवत्व अभी भी भारी पड़ रहा है। अभी उनका औसत चलना 35 किलोमीटर के आसपास हो रहा है। मेरा बस चले तो मैं उन्हें कहूं कि उसे घटा कर पच्चीस किमी पर ले आयें और कस्बों-शहरों के बीच गांव देहात का अनुभव और उसका वर्णन अधिक करें। उन्हें गाकड़ भरता बनाना आता है। कभी कभी अपने सीधा-पिसान और आसपास उपलब्ध आलू और बैंगन का प्रयोग कर वह भी बनायें। वन कर्मी या आसपास के लोग जो उनके साथ पचीस पचास किलोमीटर चल सकते हों, वे एक दो दिन साथ चलें, रहें। महादेव उससे प्रसन्न होंगे! यात्रा की अवधि एक तिहाई बढ़ जायेगी, पर उससे यात्रा की सार्थकता द्विगुणित हो जायेगी। कंकर में शंकर हैं या यूं कहूं कि शंकर कंकर में ही है! :-)

प्रेमसागर

वेगड़ एक जगह लिखते हैं कि उनके गुरू नंदलाल बोस ने कहा था – सफल बनने के पीछे न भागना, सार्थक बनना। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा की सार्थकता यात्रा के रस में है, यात्रा में शिवतत्व खोजने और अनुभव करने में है। पता नहीं भोलेनाथ किसपर प्रसन्न होते हैं; पर मुझे भोलेनाथ की ओर से कांवर यात्रा का अंतिम परीक्षा प्रश्नपत्र बनाने का चांस मिलता तो मैं एक ही प्रश्न उसमें रखता – क्या तुमने यात्रा के दौरान मुझे बाहरी दुनियां में देखा? देखा तो कितना देखा?


8 अक्तूबर रात्रि –

आज मैंने आधा पौना घण्टा लगाया प्रेमसागर को यह बताने के लिये कि वे टेलीग्राम या ह्वाट्सएप्प पर किस प्रकार से अपना लोकेशन शेयर कर सकते हैं। उनकी यात्रा को ट्रैक करना उससे आसान हो जायेगा। उन्होने सेट कर लिया टेलीग्राम को शेयरिंग के लिये। मुझे दोपहर दो बजे तक उनका मार्ग और स्थान पता चलता रहा। तब आठ घण्टे पूरे हो गये और उसके बाद आगे आठ घण्टा सेट करने की जहमत उन्होने नहीं उठाई। मैंने उनसे कहा भी, पर वे नहीं कर पाये।

कभी वे काफी टेक-सैवी लगते हैं और कभी बिल्कुल अनाड़ी। आज अनाडीत्व भारी पड़ रहा था। मसलन मैंने सवेरे पाया कि उनके स्मार्टफोन में गूगल मैप ही नहीं है। आधुनिक काल में बिना गूगल मैप के भारतवर्ष की यात्रा का बीड़ा उठा लेना मुझे वैसा ही लगा जैसे जुगनू या एक दिया ले कर अंधेरे को चीरते निकल पड़ना। वह तो महादेव जी ने उन्हें वन विभाग के लोगों और अन्य सुधी जनों की सहायता उपलब्ध करा दी है अन्यथा वे तो बस निकल पड़े थे! बस! सरलता के एक सुदूर छोर पर हैं प्रेमसागर! उतना सरल होना भी खतरनाक (?) है। …. पर उसके उलट एक सोच यह भी है कि लक्ष्य की विशालता का कोई पूरा आकलन कर चलने की सोचे तो शायद शुरू ही न कर पाये। आकलन के जाल में ही उलझ जाये। बड़ी बात यह है कि प्रेमसागर निकल लिये हैं और अब तक करीब एक हजार किमी चल चुके हैं! पर बिना आकलन और आकलन के मकड़जाल इन दोनो छोरों के बीच कोई मध्यबिंदु तो होगा?!

चलते समय नरसिंहपुर में उन्होने वीरेंद्र जी से बात कराई। वीरेंद्र मेहरा (जैसा उनके बोर्ड से दिखता है) व्यवसायी हैं। उनका होटल है जहां प्रेमसागर रुके थे। वीरेंद्र जी परक्कमा वालों की सेवा करते हैं। नर्मदा परिक्रमा वाले उनके यहां ठहरते हैं। और उसके अनुसार उनका होटल सात्विक भोजन वाला है – शाकाहारी, बिना लहसुन प्याज वाला। वीरेंद्र जी ने आगे भी प्रेमसागर को सहायता देने की बात कही। उन्होने रास्ते में पड़ने वाले उन लोगों के फोन नम्बर भी प्रेमसागर को दिये हैं जो सहायता कर सकते हैं।

वीरेंद्र जी बोले – “अब, महराज जी के साथ तो साक्षात भोलेनाथ हैं ही। सो उनको क्या दिक्कत है! यह तो हमारे लिये बड़ी सौभाग्य की बात है कि इतनी बड़ी यात्रा करने वाले की एक दिन सेवा का हमें मौका मिला। हमारे यहां जो संत लोग परिक्रमा पर आते हैं, उनको तो सेवा करने का मौका हमें यहां नरसिंहपुर में होटल होने के कारण तो मिलता ही है। … कराता तो सब ईश्वर ही है। हम तो निमित्त मात्र बना कर यहां बिठा दिये गये हैं।”

वीरेंद्र जी के साथ प्रेमसागर

वीरेंद्र मेहरा जी कर तो बिजनेस रहे हैं, पर उनका सेवाभाव और उनकी विनम्रता उनको बरक्कत देता ही होगा! उनसे बात करा कर प्रेमसागर निकल ही लिये होंगे आगे की यात्रा पर।

वीरेंद्र जी के होटल के बाहर निकलने को तैयार प्रेमसागर

प्रेमसागर ने बताया कि रास्ते में – करीब दोपहर में – एक नब्बे साल के वृद्ध मिले। लंगड़ा रहे थे। बोले कि उनके पांव में कांटा चुभ गया है। निकल नहीं रहा। प्रेमसागर ने अपनी कांवर एक ऊंचे स्थान पर टांगी। पानी ला कर वृद्ध का पैर धोया जिससे उनके तलवे में गड़ा कांटा नजर आ जाये। पर कांटा बहुत ध्यान से देखने पर भी कहीं दिखा नहीं। “तब भईया हम उन्हें पचास रुपिया दिये और कहा कि किसी डाक्टर के यहां जा कर कांटा निकलवा लें। मैं तो उन्हें अपनी सैण्डल भी दे रहा था, पर उनने मना कर दिया यह कहते हुये कि कभी चप्पल पहने नहीं हैं।”

“यह तो आपने बहुत अच्छा किया। उन वृद्ध का चित्र लिये क्या?” – मैंने पूछा। उन्होने कहा – “नहीं, मुझे चित्र लेना अटपटा लगा।”

गोस्वामी जी और सोनी जी के साथ प्रेमसागर पेड़ के नीचे। प्रेम सागर जी को भोजन परोसा जा रहा है।

उसके बाद ही करोली गांव पड़ा जहां तीन लोग रास्ते में मिले – गोस्वामी जी, सोनी जी और यादव जी। उन्हें शायद नरसिंहपुर से किसी ने, शायद वीरेंद्र जी ने खबर की होगी। ये लोग परकम्मा वालों को भोजन कराते हैं। वे लोग अपने साथ प्रेमसागर के लिये भोजन ले कर आये थे। एक आम के वृक्ष के नीचे प्रेमसागरजी को उन्होने भोजन कराया। भोजन करा कर वे लोग चले गये तो वहीं पर प्रेमसागर ने एक नींद निकाली पेड़ की छाया में। यूं इतना चलने, वह भी तेज गर्मी में और दिनों दिन चलते रहने के कारण नींद की कमी तो प्रेमसागर को होगी ही। बाद में मैंने उन्हे कहा कि उन्हें अपना चलने के अनुशासन की अति नहीं करनी चाहिये।

प्रेमसागर जी को भोजन कराते यादव जी।

वहीं उनसे मिलने और उनका सामान आगे ले कर चलने के लिये एक वन कर्मी आ गये। वे अपनी मोटर साइकिल पर सामान ले कर आगे पीछे चलते रहे। एक गांव (नाम बताया था करमदा) में उन्हें रात्रि विश्राम करना था पर जिन सज्जन के यहां ठहरना था, उनके घर में कोई पारिवारिक विवाद हो गया था। वहां रुकना नहीं हो सका। वहां पंहुचते शाम हो गयी थी और रुकने का ठिकाना तय नहीं था। अंतत: प्रेमसागर को दस बारह किलोमीटर और चलना पड़ा और कौड़िया गांव में राजकुमार रघुवंशी जी के यहां रात्रि विश्राम हुआ।

प्रेमसागर और राजकुमार रघुवंशी
9 अक्तूबर 21, सवेरे –

सवेरे प्रेमसागर को एक बार फिर समझाया कि अपनी लोकेशन शेयर कैसे करनी है। आज वे कहते हैं कि उन्हें ठीक से समझ आ गया है। रात में कुछ आराम मिला है और दिन में आज केवल गाडरवारा तक जाना है जो यहां से पांच सात किलोमीटर की दूरी पर है। रेंजर साहब ने सम्पर्क भी किया है। सवेरे सात-सवा सात बजे तक राजकुमार यदुवंशी जी के यहां से; कौड़िया गांव से; प्रेमसागर निकल लिये। नौ बजे सक्कर नदी पार कर लिये थे। कुछ लोग उनसे मिलने आये थे। चाय की भी दुकान थी।

चायवाले के साथ प्रेमसागर

आगे गाडरवारा है जहां उन्हें रुकना है। अच्छा है कि आज चलना ज्यादा नहीं है। थकान और नींद की कमी की पूर्ति हो सकेगी।

सक्कर नदी, गाडरवारा और उसके बाद की चर्चा अगली पोस्ट में।

आज सवा नौ बजे तक की यात्रा – कौड़िया गांव से सक्कर नदी के पुल तक।
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गोटेगांव से नरसिंहपुर और मुन्ना खान की चाय


7 अक्तूबर 21, शाम –

“विदा लेते समय भईया लड़की की विदाई का सा माहौल हो गया था। लोगों की आंखों में आंसू थे।” – प्रेमसागर ने कहा। प्रेमसागर को उपमा देते नहीं पाया मैंने पहले। दृश्य भावभरा रहा ही होगा! एक अजनबी कांवर ले कर चल रहा व्यक्ति ऐसे आत्मीय हो जाता है!

आज नरसिंंहपुर तक की यात्रा 38किमी की थी। कल 62 की होने के कारण आज प्रेमसागर आगे की यात्रा पर निकले देरी से। वैसे सवेरे जल्दी निकलने पर चलना तेज होता है, पर थकान रही होगी कल की। देर से निकलने का मतलब दिन की तेज धूप का सामना करना था और जो तेजी सवेरे होती, वह शायद धूप बढ़ने के पहले ही 20-25 किमी का रास्ता तय करा देती।

उन्हें लोग छोड़ने एक लिये आये थे। एसडीओ खत्री जी ने गोटेगांव में रुकवाया उन्हें अपने एक मित्र के होटल में था। सवेरे अपने घर पर उन्होने आमंत्रित किया। नाश्ते के लिये तो प्रेमसागर ने मना किया – “खा लेने पर चलने में आलस आता है और चलना नहीं हो पाता।” पर उनके यहां मिले प्रेम भाव की बात मुझसे फोन पर वे बार बार करते रहे। उनकी बिटिया जो सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, को कांवर के प्रति कौतूहल था। उसने कांवर उठाने के लिये मांगा – “बाबा जी, एक बार उठाने दीजिये।”

एसडीओ खत्री जी अपने परिवार के साथ।

“मैं कांवर दूंगा उठाने को अगर तुम मुझे चाचा जी या अंकल जी कहोगी। बाबा या महराज नहीं हूं मैं।” – प्रेमसागर ने कहा। उन्हें विदा करने के लिये बहुत से लोग सड़क पर आये। प्रेमसागर जी ने नाम बताया कि टोनी सिंह जी का परिवार था। वे एसडीओ साहब के मित्र हैं और व्यवसायी भी। वे लोग करीब तीन किमी साथ चले। औरतें भी थीं। “विदा लेते समय भईया लड़की की विदाई का सा माहौल हो गया था। लोगों की आंखों में आंसू थे।” – प्रेमसागर ने कहा। प्रेमसागर को उपमा देते नहीं पाया मैंने पहले। दृश्य भावभरा रहा ही होगा! एक अजनबी कांवर ले कर चल रहा व्यक्ति ऐसे आत्मीय हो जाता है!

मैने लोगों में उपजने वाली श्रद्धा की कल्पना की थी; ऐसी आत्मीयता की नहीं। लोगों के भाव समझने के लिये बाहर निकलना होता है, की-बोर्ड पर वे भाव नहीं उभरते। डिजिटल-ट्रेवलॉग की सीमायें हैं। बहुत संकुचित सीमायें। पर यह भी है कि उत्तरोत्तर प्रेमसागर अपने को बेहतर अभिव्यक्त करने लगे हैं। शायद मुझसे भी उनकी आत्मीयता बढ़ रही है।

आत्मीयता इस तरह है कि बात बात में प्रेमसागर मुझसे “उपदेश” भी पा रहे हैं और कभी कभी डांट भी। पर उसका बुरा माना हो, ऐसा फिलहाल नहीं लगा।

गोटेगांव से रवाना होने के पांच किलोमीटर आगे एक चाय की दुकान पर एक मुस्लिम बुजुर्ग बैठे थे। उन्होने बड़ी आत्मीयता से प्रेमसागर को पास बुलाया। उन्हें चाय पिलाई। गर्मी बहुत थी। इसलिये प्रेमसागर की उनसे बातचीत ज्यादा नहीं हुई। पर उनके बारे में उन्होने मुझे संदेश दिया –

मुन्ना खान
एक चाय की दुकान में चाचा’ जिनका नाम मुन्ना खान है ने बड़े प्यार से बुला कर
चाय पिलाये। इनका बहुत-बहुत धन्यवाद।
मुन्ना खान जी बोले – “हमको इंसान से मतलब है
धर्म से नहीं हम जानते हैं कि हम लोग इंसान हैं।
मेरा मक्का मदीना या आपका शिव एक ही है।
मेरा नाम मुन्ना खान है
आइए आप चाय पी लीजिए”
हम उनका बात को काट नहीं पाये।
हमने बैठकर चाय पी ली। मुन्ना खान जी का बात व्यवहार हमको बहुत ही अच्छा लगा।
हर हर महादेव
मुन्ना खान जी पर प्रेमसागर का टेलीग्राम पर संदेश्।

और भी लोग मिले रास्ते में। ये सज्जन मिले जिन्होने प्रेमसागर का काफी आदर सत्कार किया। दही-चीनी खिलाया। उनका नाम तो नहीं बता सके प्रेमसागार, पर चित्र जरूर ले लिया। राह चलते कांवर उठाये यात्री से आदर, श्रद्धा, प्रेम से बात करना, पानी, गुड़, चाय या दूध आदि पिलाना – यह बड़ी बात है।

ये सज्जन मिले जिन्होने प्रेमसागर का काफी आदर सत्कार किया।

आगे रास्ते में घाटी थी, लगभग एक किलोमीटर लम्बी घाटी। हरियाली और नदी भी दिखी। इलाके में गन्ना की खेती बहुत होती है। चित्र अच्छे हैं, पर प्रेमसागर शायद धूप और गर्मी से बेहाल थे। वे शाम सात बजे के आसपास नरसिंहपुर पंहुचे। उनके चित्र भी मुझे रात दस बजे के बाद मिले।

एक मंदिर के चित्र भी भेजे हैं। कोई दादा महराज। “ये बहुत चमत्कारी बाबा हैं। इनको मैंने पानी पीते देखा।” – प्रेमसागर ने बताया।

ऐसा पानी या दूध पिलाने का अनुष्ठान कई मंदिरों-मूर्तियों में भारत में (और बाहर भी) होता है। सर्फेस टेंशन का प्रयोग कर ऐसा प्रतीत होता है कि मूर्ति तरल पी रही है। इसी फिनॉमिना के तहद भारत भर में गणेश जी दूध पिये थे एक बार! मैं वे सभी चित्र एक स्लाइडशो में लगा दे रहा हूं। यात्रा में सौंदर्य, भाव, श्रद्धा, चमत्कार, भौतिकी – सब गड्ड-मड्ड है!

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