जबलपुर, ग्वारीघाट, गुप्तेश्वर महादेव और अर्जी वाले हनुमानजी


4 अक्तूबर 21, रात्रि –

प्रेमसागर एक दो दिन जबलपुर में गुजारेंगे। वे नर्मदा, उसके तट और उसके आसपास के धार्मिक स्थलों के दर्शन करेंगे। इस दौरान उनकी जांघ के घाव भी कुछ सूख जायेंगे। अमरकण्टक से जबलपुर तक वे नित्य चलते ही आ रहे हैं। सप्ताह में एक दिन तो लकड़हारे को भी अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाना चाहिये।

मैंने जबलपुर नहीं देखा। रात में ट्रेन से गुजरा हूं कई बार और सोते सोते निकल गया हूं। रेल के हिसाब से जबलपुर की बजाय खमरिया या कटनी का नाम ज्यादा सुनता था – माल यातायात के कोण से वे ज्यादा महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन या यार्ड हैं। अब, प्रेम सागर की चेलाई करते हुये गूगल मैप पर वह ट्रेस कर रहा हूं। महादेव जो न करायें, वह थोड़ा! :lol:

मैं जब भी किसी चित्र में किसी को प्रेमसागर को प्रणाम करते, या भाव देते देखता हूं; यहां तक कि वृहन्नलाओं के आशीर्वाद का चित्र देखते समय भी; तब यह सोचता हूं कि शंकर जी इस सरल व्यक्ति की परीक्षा लेने के लिये मन में अहंकार न दे दें। पर मैं यह नहीं देखता कि उनको असली ‘भाव’ तो मैं दे रहा हूं। ट्रेवलॉग लिखने के लिये उनसे छोटी छोटी बात जानना चाहता हूं। रास्ते में चाय की दुकान कैसी है, चायवाला कैसा लगता है, कोई जंगली जानवर दिखा, किसी ने नमस्कार किया, हालचाल पूछा, वन कर्मियों का परिवार उनके साथ रहता है या कहीं और, किसने उनके पैर छुये और किसने उपेक्षा की, रास्ते में उमस थी या बारिश, फसल कैसी है… अनेकानेक प्रश्न और उनपर प्रेमसागर के उत्तरों में यह भी तलाशता हूं कि नारद की तरह उन्हें भी कहीं घमण्ड छू तो नहीं कर गया। नारद का यह प्रसंग रामचरित मानस के बाल काण्ड में है जहां शंकर जी नारद के काम-विजय पर इतराने और अपनी सिद्धि बढ़ा चढ़ा कर बोलने पर कहते हैं कि जैसा मुझसे अपना “यश” सुनाया है वैसा हरि को न सुनाना।

पर नारद ने अपने गर्व के आगे शंकर जी को अनसुना कर दिया –

बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहुं तबहूँ॥
दो0-संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान॥127 बालकाण्ड॥

प्रेमसागर अपने जीवन की सार्थकता तलाश रहे हैं। उसी की तलाश में चलते चले जा रहे हैं। पर यह सार्थकता तलाशते तलाशते किसी मुकाम पर सफलता और शोहरत न तलाशने लग जायें – इसका मुझे भय है। आखिर मैं अपनी जीवन की पहली पारी में सफलता के पीछे ही दौड़ता रहा हूं; सार्थकता तो अब तलाश रहा हूं – अगियाबीर के टीले पर, किसी लुहार, किसी नाऊ, किसी बच्चे की संगत में या प्रेमसागर की यात्रा में। प्रेमसागर भी ज्योतिर्लिंगों को अर्ध्य देने में सार्थकता ही ढूंढें; सफलता की राजसिक ताजपोशी नहीं।

मेरी पत्नीजी कहती हैं कि मैं प्रेमसागरमय हो गया हूं। सोते जागते ब्लॉग पर उनके बारे में लिखने संवारने में ही लगा रहता हूं। पर शायद वह मेरी प्रवृत्ति है। जिसमें मन लगता है तो पूरी तरह लगता है और उचटता है तो उस ओर देखने को मन नहीं करता। यह दोष गहरा है।

खैर, आज के वृत्तांत पर आता हूं। प्रेमसागर एक दो दिन जबलपुर में गुजारेंगे। वे नर्मदा, उसके तट और उसके आसपास के धार्मिक स्थलों के दर्शन करेंगे। इस दौरान उनकी जांघ के घाव भी कुछ सूख जायेंगे। अमरकण्टक से जबलपुर तक वे नित्य चलते ही आ रहे हैं। सप्ताह में एक दिन तो लकड़हारे को भी अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करने में लगाना चाहिये।

आज वे ग्वारीघाट गये। नर्मदा यहां समृद्ध जलराशि वाली नदी हैं। मैकल की शिशु कन्या नहीं, पूर्णत सौंदर्यवती नवयुवती। अभी उन्हें भेड़ाघाट की नीचे उतरने की छलांग लगानी है अत: नवयुवती ही होना है। प्रौढ़ा तो उछलकूद नहीं कर सकती। वह कूदेगी नहीं, अगल बगल से रास्ता तलाशेगी और उसमें बहुत कुछ इधर उधर हो जायेगा!

ग्वारीघाट की जलराशि के चित्र मनमोहक हैं।

ग्वारीघाट में नर्मदा। सामने के किनारे पर बांयी गुरुद्वारा दिख रहा है।

दक्षिणी घाट पर एक सफेद रंग का गुरुद्वारा है। बांई ओर एक चौड़ा घाट बना है। सीढ़िया हैं। दक्षिणी तट पर भीड़ कम होती होगी। शहर तो उत्तरी घाट पर है। ग्वारीघाट शायद उत्तरी घाट को ही कहा जाता है।

आशीष जी उन्हें नौकाविहार पर ले गये। उन्हें कई मंदिर भी दिखाये – गुप्तेश्वर महादेव; रामलला का मंदिर, इच्छापूर्ति वाले हनुमान जी (बोर्ड पर लिखा है अर्जी वाले हनुमान जी); बड़े बड़े चूहों और हाथियों के द्वारपाल वाले गणेश जी और शनि भगवान के मंदिर आदि। प्रेमसागर ने बताया कि अर्जी वाले हनुमान जी के पास अर्जी डालने की एक पेटिका भी रखी है। पता नहीं उस अर्जी की पेटी को कौन खोलता होगा और उनको प्रॉपर डिस्पोजल करता होता या डीडीटी (Direct Disposal by Tearing) करता होगा! और प्रॉपर डिस्पोजल क्या होता है? हनुमान जी की प्रतिमा के सामने अर्जी को पढ़ कर सुनाना? शायद यही होता हो। डीडीटी करते होते तो अब तक कोई मीडिया वाला खबर छाप चुका होता – अर्जी वाले स्कैण्डल की! :lol:

वे सभी स्थान वन विभाग के परिसर से एक ही सीध में दक्षिण की ओर पड़ते हैं। नक्शे में करीब दस-बारह किलोमीटर का रास्ता होगा। शाम के समय प्रेमसागर जी से बात करता हूं तो वे किसी और मंदिर देखने जाने की जल्दी में थे। वाहन आ चुका था। उन्होने बताया कि गंतव्य पर पंहुच कर मुझे वीडियो कॉल करेंगे। पर उस कॉल की न मुझे प्रतीक्षा थी, न वे कर पाये। मैं अपनी पत्नीजी के साथ मानस पाठ में लग गया और वे स्थानों-मंदिरों को देखने चित्र खींचने में लग गये होंगे। दोनो अपने अपने प्रकार से जीवन में रस ले रहे थे!

(मंदिरों के चित्रों का स्लाइड-शो)

दोपहर के समय का प्रेमसागर ने एक ग्रुप फोटो भेजा। वन विभाग के लोगों के परिवारों के साथ लॉन में खड़े हैं प्रेमसागर। करीब दस आदमी, उनमें से कुछ की पत्नियां और दो बच्चे। सब के लिये प्रेमसागर की लम्बी पदयात्रा के प्रति कौतूहल और आदर उनके पास ले आया होगा। कुछ लोगों ने उनसे आशीर्वाद भी मांगा होगा। यह सोच कर अच्छा लगता है। पर यह सोच कर भय(?) भी लगता है कि प्रेमसागर आशीर्वाद-बांटक-बाबा बन कर ही न रह जायें। जीवन की सार्थकता का ध्येय उससे कहीं बड़ा, कहीं ज्यादा व्यापक है। वह शायद जितना ज्योतिर्लिंगों पर जल चढ़ाने में है; उतना ही इन सब में शिव को देखने-अनुभव करने में है! … सर्वजन रूपम शिवोहम शिवोहम!

वन विभाग के लोगों के परिवारों के साथ लॉन में खड़े हैं प्रेमसागर।

कल प्रेमसागर जबलपुर के और भी स्थान देखेंगे। जबलपुर के बारे में वे कहते हैं कि बड़ा अनूठा और पवित्र जगह है। बड़े बड़े सिद्ध महात्मा यहां आ कर तपस्या किये हैं। … अपने अपने देखने की दृष्टि! वे पुराने सिद्ध महात्मा देख रहे हैं, लोग जबलपुर का टूरिज्म, आधुनिकता और विकास नोट करते होंगे। अब देखते हैं कल क्या दिखता है? कल क्या भेजते हैं टेलीग्राम एप्प पर प्रेमसागर! आज इतना भर।

नर्मदे हर! हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची


उठो; चलो भाई!


यह एक पुरानी पोस्ट है – बारह जनवरी 2013 की। मैं अस्पताल में भर्ती था। शरीर इण्ट्रावेनस इंजेक्शनों से एण्टीबायोटिक अनवरत भरने की प्रक्रिया से छलनी था। पर मन यात्रा की सोच रहा था। उस समय शरीर कह रहा था कि वह यात्रा नहीं कर सकता। मन उस समय भी – भीषण बीमारी में भी – यात्रा की याद में खोया था। पोस्ट में मैंने लिखा है –

शैलेश पाण्डेय ने पूर्वोत्तर की यात्रा ज्वाइन करने का न्योता दिया है – मोटर साइकल पर। सुकुल ने साइकल पर नर्मदा यात्रा का। मुझे मालुम है इनमें से दोनों पर मैं नहीं निकलने वाला। … पर ये न्योते, ये सोच और ये आग्रह यह बताते हैं कि एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है।

– इसी पोस्ट से।

इस पोस्ट को लिखे 9 साल हो रहे हैं। अनूप शुक्ल इस समय आयुध कारखाने के महाप्रबंधक हो गये हैं। शीर्षस्थ अफसर। शैलेश भाजपा के केंद्रिय कार्यालय में पार्टी की सतत चलने वाली चुनावी जद्दोजहद का (महत्वपूर्ण) हिस्सा हैं। दोनो को ही यात्रा का कीट काटता रहता है।

डा. विनीत अग्रवाल भी रिटायर हो चुके हैं। उन्हें बारम्बार हिमालय अपनी ओर खींचता रहता है और वे यात्रायें करते रहते हैंं।आजकल उनसे सम्पर्क नहीं हो रहा है।

मैं रिटायर हो कर भदोही जिले के एक गांव में हूं और भौतिक तौर पर यात्रा के नाम पर मेरे पास साइकिल भ्रमण भर है – आसपास के पचीस तीस गांवों का भ्रमण। पर अचानक मेरे हाथ प्रेमसागर लग गये हैं और उनके माध्यम से एक डिजिटल ट्रेवलॉग लेखन मेरे हिस्से लग गया है। यह सही होता नजर आ रहा है –

एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है।

वेगड़ नहीं, साइकिल-वेगड़ या रेल-वेगड़ भी नहीं; मैं प्रेमसागर जी के जोड़ीदार के रूप में डिजिटल-वेगड़ बन रहा हूं। द्वादश ज्योतिर्लिंग की डिजिटल-यात्रा कर रहा हूं! :lol:

आप पुरानी पोस्ट पढ़ें –


बीमार ज्ञानदत्त का लेटेठाले स्केच।
बीमार ज्ञानदत्त का लेटेठाले स्केच।

अनूप शुक्ला जब भी बतियाते हैं (आजकल कम ही बतियाते हैं, सुना है बड़े अफसर जो हो गये हैं) तो कहते हैं वे नरमदामाई के साइकल-वेगड़ बनना चाहते हैं। अमृतलाल वेगड़ जी ने नर्मदा की पैदल परिक्रमा कर तीन अनूठी पुस्तकें – सौन्दर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे तीरे नर्मदा लिखी हैं। साइकल-वेगड़ जी भी (नर्मदा की साइकल परिक्रमा कर) ट्रेवलॉग की ट्रिलॉजी लिखें, शुभकामना।

अभी यहां अस्पताल में, जब हाथ में इण्ट्रावेनस इन्जेक्शन की ड्रिप्स लग रही हैं और एण्टीबायोटिक अन्दर घुसाये जा रहे हैं; मैं यात्रा की सोच रहा हूं।

यही होता है – जब शरीर बन्धन में होता है तो मन उन्मुक्तता की सोचता है।

मैं रेल की नौकरी वाला, ट्रेने चलवाना जिसका पेशा हो और जिसे और किसी चीज से खास लेना देना न हो, उसके लिये यात्रा – ट्रेवल ही सब कुछ होना चाहिये। पर मेरे पास ट्रेवल ही नहीं है। या ट्रेवल के नाम पर शिवकुटी का गंगाजी का फाफामऊ के पुल से निषादघाट तक का वह क्षेत्र है, जहां से कच्ची शराब का बनना सेफ दूरी से देखा जा सके। मेरे कथन को एक ट्रेवलर का कथन नहीं माना जा सकता।

इसलिये, जब मैं यह अपनी स्कैपबुक में दर्ज करता हूं – एक औसत से कुछ अधिक बुद्धि का इन्सान, जिसे लोगों से द्वेष न हो, जो आत्मकेन्द्रित न हो, जो सामान्य तरीके से मानवता की भलाई की सोचता हो, जो यात्रा कर देखता, परखता, लोगों से इण्टरेक्ट करता और अपनी ऑब्जर्वेशन रिकॉर्ड करता हो; वह मानव इतिहास में आसानी से जगह पा सकता है – तो मैं अपनी सोच ईमानदारी से प्रस्तुत करता हूं। पर उस सोच की सत्यता के बारे में बहुत आश्वस्त नहीं होता। ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस सोच के अनुसार हैं – गुरु नानक, जीसस क्राइस्ट या बुद्ध जैसे भी।

पर मैं साइकल-वेगड़ या रेल-वेगड़ बन कर भी आत्म संतुष्ट हो जाऊंगा।

शैलेश पाण्डेय ने पूर्वोत्तर की यात्रा ज्वाइन करने का न्योता दिया है – मोटर साइकल पर। सुकुल ने साइकल पर नर्मदा यात्रा का। मुझे मालुम है इनमें से दोनों पर मैं नहीं निकलने वाला। … पर ये न्योते, ये सोच और ये आग्रह यह बताते हैं कि एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है। निकलना चाहिये।

उठो; चलो भाई!

(यह पोस्ट कल 12 जनवरी को पब्लिश होगी। तब तक शायद डाक्टर विनीत अग्रवाल, यहां रेलवे के मुख्य फीजीशियन मुझे अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय कर लें।)


कुण्डम से जबलपुर – वृहन्नलाओं का आशीष पाये प्रेमसागर


वृहन्नलाओं के समूह में चार लोग थे। सबसे उम्रदराज व्यक्ति प्रेमसागर के सिर पर हाथ रख आशीष दे रहा था, अपने पूरे समूह की ओर से। भारतीय समाज में उनके आशीर्वाद का बहुत महत्व है। नया बच्चा जन्मता है या किसी का विवाह होता है तो हिंजड़े गुणगान कर आशीष दें; वह शुभ माना जाता है। प्रेमसागर को अपनी यात्रा के पुनीत ध्येय के कारण वह आशीर्वाद बिन मांगे बड़ी सरलता से सहर्ष मिल गया।

मैंने सवेरे साढ़े पांच बजे फोन किया प्रेमसागर को। सोचा था कि वे इस समय निकलने वाले होंगे अपनी पदयात्रा पर। पर उन्होने कहा – “भईया सवेरे साढ़े चार बजे निकल लिये हैं। आज लम्बा चलना है और जितना सवेरे खींच लें उतना बेहतर है। दिन में गर्मी बहुत हो जाती है और चलना सवेरे चलने से चार गुना भारी पड़ने लगता है। अब सवेरे 11-12 बजे तक 25 किमी चल लेंगे। उसके बाद आराम करेंगे और तब तक वन विभाग वाले यादव जी आ कर सामान भी ले जायेंगे। कांवर हल्की हो जायेगी। आगे जबलपुर की यात्रा सुगम हो जायेगी।”

चलने की धुन में रमे हैं प्रेम सागर।

उसके बाद आठ बजे फोन आया उनका – “भईया, पैर की तकलीफ बढ़ गयी है। रास्ते में बार बार मैं जांघ में पाउडर लगा रहा था। मैडीकल दुकान खोज रहा था कोई दर्द की दवाई के लिये। कुछ लोगों ने बताया – ऐसे दवाई लेने की बजाय आगे गांव में एक डाक्टर साहब रहते हैं; उन्हें दिखाओ। वे बहुत भले इंसान हैं। अगर वे मिट्टी भी उठा कर दे देंगे तो आपका सारा रोग दूर हो जायेगा।”

“एक किमी आगे डाक्टर साहब का घर था। वहीं आया हूं। भले डाक्टर साहब हैं। दवाई भी दिये हैं और चाय भी पिलाये हैं। आप जरा उनसे बात कर लीजिये।”

डाक्टर साहब से मैंने बात की। मैंने उन्हे कहा – “डाक्टर साहब आप जो कर रहे हैं, बहुत ही पुण्य का कार्य है। ये सज्जन द्वादश ज्योतिर्लिंग की पदयात्रा पर हैं। और यह संयोग ही है कि इनको महादेव ने आपके यहां भेज दिया है, निदान-उपचार के लिये।”

डाक्टर साहब ने कहा कि फिक्र न करें; आगे 24 किलोमीटर जबलपुर है और उसके आगे भी लम्बी यात्रा है इनकी। भगवान, ऊपर वाले सब सही करवायेंगे इनकी यात्रा! जब मन में आ जाती है तब ऊपर वाला अपने से सब व्यवस्था करता है।

डाक्टर परिहार और प्रेमसागर

डाक्टर साहब वास्तव में बहुत भले इंसान थे, डाक्टर से ज्यादा। उन्होने प्रेमसागर को पैरासेटामॉल का एक पत्ता, जख्म सूखने के लिये गोलियां और लगाने के लिये क्रीम/मलहम दिया। कोई पैसे नहीं लिये। उनको चाय, बिस्कुट और मठरी खिलाया अलग से। सवेरे सवेरे प्रेमसागर चाय की दुकान तलाशते हैं; आज अजनबी डाक्टर साहब से मिलवा दिया जिन्होने उनको चाय और दवा दोनो ही सप्रेम दी। आप अगर किसी महत-ध्येय के लिये निकल लिये होते हैं तो सारी प्रकृति, सारी दैवी शक्तियां अपने अपने प्रकार से आपकी सहायता में लग जाती हैं। एक अनजान से गांव पडरिया के डाक्टर परिहार इसी में एक कड़ी प्रमाणित हुये।

पड़रिया गांव के डाक्टर परिहार ने प्रेम सागर को दवाई दी और चायपान भी कराया। एक अंचलीय गांव में यह सत्कार और यह इलाज! हर हर महादेव!

जब प्रेमसागर डाक्टर परिहार के यहां इलाज करा रहे और चाय पी रहे थे; तभी वहां वीरेंद्र यादव जी पंहुचे। वीरेंद्र जबलपुर के वनविभाग की पर्यटन नर्सरी के कर्मी हैं। उनका गांव पीछे रह गया था। करीब पांच किलोमीटर पहले। वीरेंद्र जी अपने गांव में थे और वहीं से प्रेमसागर का सामान ले कर जबलपुर निकलने वाले थे। उन्होने सोचा था कि कुण्डम से प्रेमसागर छ बजे के आसपास निकलेंगे, पर वे तो साढ़े चार बजे ही निकल कर उनके गांव से आगे बढ़ आये थे। वीरेंद्र जी ने पड़रिया में सामान लिया। दवा लगा कर और गोलियां खा कर प्रेमसागर भी रवाना हुये। अब उनके साथ केवल हल्की कांवर थी। यादव जी भी रास्ते में उनके साथ आगे पीछे आते रहे और उनका ख्याल रखते रहे।

प्रेमसागर और वीरेंद्र यादव

लगभग बारह बजे फिर एक फोन आया प्रेम सागर का। मुझे आशंका हुई कि कहीं उनकी जांघ का दर्द फिर तो नहीं बढ़ गया। पर इसबार उनकी आवाज में एक अलग तरह की उत्तेजना थी – “भईया कुछ हिंजड़ा लोग मिले हैं चाय की दुकान पर। मेरी यात्रा के बारे में जानने पर मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। हिंजड़ा लोगों का आशीर्वाद बहुत मायने रखता है! आप अगर ठीक समझें तो उनके साथ एक चित्र आपके पास भेज दूं?”

यह अलग तरह की उत्तेजना ही रही होगी; अन्यथा ढेरों चित्र वे रास्ते में लेते हैं और शाम को एक साथ मुझे भेजते हैं। हिंजड़ों का आशीर्वाद उन्हें तुरंत किसी से बोलने बताने वाला अनुभव लगा होगा। और उन्हें मैं ही सुपात्र नजर आया शेयर करने के लिये! :-)

मैंने चित्र देखा। वृहन्नलाओं के समूह में चार लोग थे। सबसे उम्रदराज व्यक्ति प्रेमसागर के सिर पर हाथ रख आशीष दे रहा था, अपने पूरे समूह की ओर से।

भारतीय समाज में उनके आशीर्वाद का बहुत महत्व है। नया बच्चा जन्मता है या किसी का विवाह होता है तो हिंजड़े गुणगान कर आशीष दें; वह अत्यंत शुभ माना जाता है। वे दान लेने के बाद उसी में से कुछ अन्न निकाल कर देते हैं और उस अन्न को लोग अपने घर में हर जगह छींट देते हैं – जिससे उनका आशीर्वाद घर के सब स्थानों को पवित्र कर दे। प्रेमसागर को अपनी यात्रा के पुनीत ध्येय के कारण वह आशीर्वाद बिन मांगे बड़ी सरलता से सहर्ष मिल गया। उन लोगों ने आशीर्वाद के रूप में सिर पर हाथ रखा और उनको एक रुपया का सिक्का भी दिया। इससे बड़ा और क्या हो सकता है?! वह सिक्का उन्हें सदा साथ रखना चाहिये!

मैंने चित्र देखा। वृहन्नलाओं के समूह में सबसे उम्रदराज व्यक्ति प्रेमसागर के सिर पर हाथ रख आशीष दे रहा है, अपने पूरे समूह की ओर से।

आगे बरगी राइट-बैंक केनाल मिली। बहुत ही सुंदर चित्र आया है। साफ पानी, सीधी बनी नहर। वेगड़ जी ने लिखा है कि भविष्य में नर्मदा परिक्रमा का स्वरूप ही बदल जायेगा जब इतने बांध नर्मदा का सौंदर्य बिगाड़ देंगे और कितनी जगहें तो लुप्त हो जायेंगी कितने गांव मिट जायेंगे। वह हुआ होगा, और वह त्रासद है। पर यह नहर भी अपने आप में सुंदर है। मानव कृति प्रकृति से टक्कर लेती!

आगे बरगी राइट-बैंक केनाल मिली। बहुत ही सुंदर चित्र आया है। साफ पानी, सीधी बनी नहर।

उसके पास कहीं टूरिस्ट स्पॉट है। उसके बाद शहरी इलाका प्रारम्भ हुआ। खमरिया का ऑर्डीनेंस डिपो था, जिसके सामने एक डी-कमीशण्ड टैंक रखा था शो पीस के रूप में।

आज कुल मिला कर 50+ किमी चले प्रेम सागर करीब बारह – तेरह घण्टे लगे यात्रा में। रास्ते में उन्हें जांघ के घाव के कारण पीड़ा भी हुई और चाल भी कम हो गयी। जब वे लगभग पंहुच ही गये थे तो रास्ते में एक बुजुर्ग चाचा जी ने जबरी उन्हे रोका और चाय पिलाने पर ही जाने दिया। प्रेम सागर की कांवर यात्रा से रास्ते में बहुत से लोग कौतूहल, श्रद्धा, स्नेह और आदर से भरे मिलते हैं। वे अपने अपने तरीके से उसे व्यक्त करते हैं। प्रेम सागर सरलता से उसे स्वीकार करते रहे होंगे पहले भी, अब वे मुझे बताना/शेयर करना भी प्रारम्भ कर दिये हैं। मैंने देखा कि वे अपना एक ट्विटर अकाउण्ट बना कर मेरा आशीर्वाद भी मांग रहे थे –

शिव जी उत्तरोत्तर उनका मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। बस वे अपनी सरलता क्षण भर को भी न त्यागें और अहंकार को कभी मन में घुसने न दें।

हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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