मातृ ऋण चुकाया नहीं जा सकता


गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी कह रहे थे कि पिता, गुरु या देव ऋण तो व्यक्ति उतार भी सकता है मातृऋण नहीं उतारा जा सकता। उन्होने एक कथानक बताया।

एक व्यक्ति पढ़ लिख कर और व्यवसाय में उन्नति कर सफल हो गया। बहुत समय बाद अपनी माँ से मिला तो बोला – माँ, तेरे बहुत से ऋण हैं, बता तुझे मैं क्या दूं? मैं तेरा ऋण उतारना चाहता हूं।

माँ ने बहुत मना किया कि वैसी कोई आवश्यकता नहीं है। तू सफल हो गया, यही मेरे लिये संतोष की बात है। पर बेटा जिद पर अड़ा रहा। अंतत: माँ ने कहा – तेरे साथ बहुत समय एक बिस्तर पर सोई हूं; आज वैसे ही सोने का मन है।

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बेटा मां के साथ सोया। जब नींद में था तो मां ने एक लोटा पानी उसपर उंड़ेल दिया। वह फनफनाते हुये उठा। माँ ने कहा – बेटा, बुढ़ापे में मेरे हाथ कांपते हैं; सो तेरे उपर पानी गिर गया। चल सो जा।

मैं तुम्हें कितनी रातोंं साथ ले कर सोई हूं। तुम्हे सूखे में सुला कर खुद गीले में सोती रही हूं। हमेशा तेरा ध्यान रखा कि तेरी नींद न टूट जाये। और तू एक रात भी वैसा नहीं कर सका? रुपया पैसा, धन दे कर उसकी बराबरी करना चाहता है।

यही नाटक तीन बार हुआ। अंत में बेटा तमतमा कर खड़ा हो गया – “रात भर पानी क्या पीती है, और पीना भी हो तो मुझे जगा कर मांग लिया होता। … मैं दूसरे बिस्तर पर लेटता हूं।”

“बेटा बस इतने में ही तुम क्रोध में आ गये? मैं तुम्हें कितनी रातोंं साथ ले कर सोई हूं। तुम्हे सूखे में सुला कर खुद गीले में सोती रही हूं। हमेशा तेरा ध्यान रखा कि तेरी नींद न टूट जाये। और तू एक रात भी वैसा नहीं कर सका? रुपया पैसा, धन दे कर उसकी बराबरी करना चाहता है। बेटा, माँ की ममता उसका अपनी है। कुछ दे कर उससे उऋण होने की मत सोचना?” – माँ के इन वचनों को सुन कर बेटे की आंखें खुल गयीं। वह समझ गया कि मातृ ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता!

कुछ ऐसा ही मैंने विश्वनाथ घोष की पुस्तक एमलेस इन बनारस (Aimless in Benaras) में है। उसमें वे 17वें अध्याय मेँ लिखते हैं – मेरी माँ की इस और परेशानी थी। वह सोचती थीं कि कहीं मैं उन्हें उनके बुढ़ापे में छोड़ तो नहीं दूंगा। वे हमेशा कहा करती थीं कि बेटा चाहे जितना धनवान हो जाये, वह माँ के ऋण से उऋण नहीं हो सकता। कोई भी मां से जो मिला है, उसकी भरपाई कितना भी धन दे कर नहीं कर सकता। इसके पक्ष में माँ बनारस के एक मंदिर की कहानी बताती थीं।

कहानी के अनुसार एक धनी ने अपनी माता की प्रतिष्ठा में एक मंदिर बनारस में गंगा किनारे बनवाया। बनने पर मां को वहां बुला कर सगर्व कहा – माँ, यह तुम्हारे सारे ऋण को चुकता करने के लिये है!

रत्नेश्वर महादेव मंदिर, वाराणसी। इसे मातृऋण मंदिर भी कहा जाता है। चित्र विकीपेडिया से साभार। https://bit.ly/3nMeFym

उस धनी का कहना भर था कि उस मंदिर की नीव का पत्थर मिट्टी में धसकने लगा। मंदिर एक ओर को झुकने लगा। वह झुका मंदिर एक वास्तविकता है। रत्नेश्वर महादेव मंदिर 1820 में बना। इसे मातृऋण मंदिर भी कहा जाता है।

मणिकर्णिका घाट पर स्थित यह मंदिर अन्य मंदिरों से अलग, नदी के तल पर बना है और काफी समय यह जल मग्न रहता है।


मेरे साले साहब (शैलेन्द्र दुबे) ने मातृ ऋण मंदिर का नाम नहीं सुना, यद्यपि ये बनारस में रहते हैं। पर चित्र देखने पर बोले – यह तो काशी करवट मंदिर है!

Kashi Karvat के नाम से सर्च करने पर इसी मंदिर के चित्र मिलते हैं। पीसा की मीनार सा यह मंदिर कई किंवदन्तियों को जन्म देने वाला है।


[पोस्ट के हेडर में चित्र – Ratneshwar Mahadev in Mist (Picture by Piyush Singh)]


आज तो कोहरा घना है – प्रतिनिधि चित्र


आज तो मन है बिस्तर में ही चाय नाश्ता मिल जाए। उठना न पड़े। बटोही (साईकिल) को देखने का भी मन नहीं हो रहा।

आज तो कोहरा घना है। यह प्रकृति की व्यक्तिगत आलोचना है!

घना कोहरा

पता नहीं बिसुनाथ का क्या हाल होगा। वह तो आपने एक कमरे के घर में बाहर पुआल के बिस्तर पर सोता है। आज उसे नींद आयी भी होगी? बेचारा। सत्तर साल के आसपास का है। जिंदगी भर मेहनत किया। अब उसे घर के बाहर के टप्पर तले पुआल के तखत पर रहना ही नसीब है। ऐसा नहीं कि उसके साथ ज्यादती हो रही है प्रारब्ध की। गांवदेहात में अनेक लोगों और ज्यादातर वृद्धों का यही हाल है। … फिर भी, तीन चार दशक पहले के वृद्धों से बेहतर दशा है उसकी।

अशोक भी आज नहीं आएगा जल्दी। अलाव वही जलाता है। बिजली भी ऐसे मौसम में गुल है। ऐसे में रजाई में ही रहना उचित है; पर कोहरा देखने का मन ही है जो बार बार घर के बाहर ले जाता है।

सर्दी का ऐसा दिन इस साल पहला ही है।

और इस पर मुंशी जी ने टिप्पणी की –

सूरज न हुआ सचिवालय कर्मचारी हो गया
"12 बजे तक लेट नहीं 3 के बाद भेंट नहीं" 😄

Originally tweeted by मुंशी जी™ (@munshi_jee) on 23-12-2020.


खैर, जैसा घना कोहरा था, सूरज ने वैसे ही दूर भी किया। शायद उन्होने अपनी कैजुअल लीव केंसिल कर ड्यूटी बजाना उचित समझा।


स्कूल बंद हैं; पढ़ाने का जिम्मा दादाजी का हो गया है।


अक्तूबर के महीने में मैंने पोस्ट लिखी थी – स्कूल बंद हैं तो घर में ही खोला एक बच्चे के लिये स्कूल। मैंने अपने घर में अपनी पोती पद्मजा (चिन्ना पांड़े) को पढ़ाने के अपने प्रयोगों के बारे में लिखा था। उसके बाद एक अन्य पोस्ट –पद्मजा के नये प्रयोग में भी पद्मजा को पढ़ाने के प्रयोगों का जिक्र किया था।

मैंने सोशल मीडिया पर भी बच्चों के बाबा-दादी को इस प्रकार के कार्य में रत पाया है। उनके खाली समय का सदुपयोग हो रहा है और बच्चे कुछ समय पढ़ रहे हैं। वैसे भी शायद बच्चों और उनके ग्राण्ड पेरेंट्स के बीच बेहतर समीकरण होते हैं। मां-बाप तो उनपर अपनी हसरतों का बोरा लादते रहते हैं। बाबा-दादी को उस तरह का कोई खास मतलब नहीं होता। वे हसरतों की सार्थकता-निरर्थकता देख-जान चुके होते हैं।

कल बटोही (अपनी साइकिल) को मैंने अचानक रोका। उमरहा गांव से गुजर रहा था तो सड़क के बगल के खेत में एक वृद्ध कुर्सी पर बैठे तीन बच्चों को पढ़ा रहे थे। वे डिक्टेशन दे रहे थे और बच्चे लिख रहे थे – “रमेश किसान है। पर सुरेश तो नेता है।…”

मैंने साइकिल स्टैण्ड पर लगायी और खेत में उतर कर उनके दो-चार चित्र लिये। वृद्ध से पूछा तो उन्होने बताया कि स्कूल तो बंद ही हैं। कभी कभार एक आध घण्टे के लिये वहां बच्चों को बुलाते हैं; पर उसका कोई खास मतलब नहीं। वे रोज घण्टा दो घण्टा बच्चों को पढ़ाते हैं। घर ही के बच्चे हैं। उनके नाती।

एक बच्चे से मैंने पूछा – पढ़ना अच्छा लगता है? उस बच्चे ने तो जवाब दिया, बाकी दोनो भी बोल उठे – “हां, लगता है”।

शायद दादाजी प्यार से पढ़ाते हों।

दादाजी मैली सी धोती या लुंगी पहने थे। ऊपर सर्दी के हिसाब से पूरी बांह का स्वेटर। सिर पर गमछा लपेटे थे और आंख पर चश्मा। दाढ़ी मूछें उन्हे गरीबी में भी गरिमा प्रदान कर रही थीं। पैर प्लास्टिक की कुर्सी पर ही मोड़े हुये थे। कपड़ों से सम्पन्न तो नहीं लगते थे, पर स्वास्थ्य ठीक लगता था। उनका और बच्चों का धूप में बैठ अध्यापन-अध्ययन बरबस ध्यान खींचने वाला था। बच्चे भी पूरी गम्भीरता से अपनी अपनी बोरी बिछा कर और अपने बस्ते ले कर बैठे थे।

खाली पड़े खेत की बजाय किसी घर के सामने या ओसारे में ये लोग बैठे होते तो मैं साइकिल से चलता चला जाता। खेत में बैठने का दृष्य ही कुछ ऐसा बन रहा था कि मैं रुका; भिन्न कोणों से चित्र लिये और दादाजी तथा बच्चों से बात भी की। दादाजी मुझसे उम्र में कुछ ज्यादा होंगे या बराबर भी हो सकते हैं। बच्चों को जो सिखा रहे हों; वह महत्वपूर्ण है ही; महत्वपूर्ण यह भी है कि उनसे आदान प्रदान में उनकी जिंदगी और सोच में भी कुछ बदलाव आ रहा है या नहीं। मेरी पीढ़ी ने बड़ी तेजी से बदलाव देखे हैं और उसकी चकाचौंध में गहन जीवन मूल्य ध्वस्त भी हुये हैं। बच्चों से यह आदान प्रदान सार्थक जीवन मूल्यों की वापसी या निर्माण को अगर बढ़ाये तो अच्छा हो। अन्यथा सब कुछ और भी गड्डमड्ड होता जा रहा है।

कोरोना काल में इस बूढ़ी पीढ़ी के पास एक काम आ गया है। और वह काफी मेहनत से उसे करती दिखती है। … जय हो, इन दादाजी की!


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