नीलिमा का ड्राइवर #गांवदेहात


नीलिमा मेरी सहेली है। इसी जिले के गांव में रहती है। पति की डेयरी है, खेती भी। पढ़ीलिखी है। पर पति ने शहर जाना सही नहीं समझा तो नीलिमा ने गांव को अपना लिया। उससे फोन पर बातचीत होती रहती है।

नीलिमा ने बताया कि दीदी, अपने ड्राइवर का हमने कोई वेतन नहीं काटा। महीना खतम होने पर दूसरे दिन ही उसको पगार दे दी। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि किसी कर्मचारी का वेतन न काटें, तो हमने उसका पालन किया। वैसे हमें दूध बेचने और पशु आहार का इंतजाम करने में दिक्कत आ रही है, लेकिन किसी काम करने वाले की राशि में हमने कटौती नहीं की।

“रविवार को हमने पैसा दिया रामेश्वर (ड्राइवर) को। और सोमवार को शराब की दुकान खुल गयी। हमने मान लिया कि कई दिनों तक अब रामेश्वर के दर्शन नहीं होंगे। महीने भर बिना शराब के रहने के बाद उसे पगार के साथ साथ शराब भी मिली होगी। सोने में सुहागा!”

“लॉकडाउन में वैसे भी कहीं निकलना नहीं हो रहा। इसलिये रामेश्वर का न आना ज्यादा खला नहीं। पर आते जाते लोगों से सूचना मिली कि रामेश्वर ने शराब पी कर हंगामा कर दिया है। अपने घर में ही आग लगा दी है। इस कारण उसके गांव में पुलीस आयी थी। उसे धमका गयी है। आजकल पुलीस की इमेज बेहतर हो गयी है, इसलिये उसे पकड़ कर अंदर नहीं किया। धमकी भर दे कर छोड़ दिया।”

शराब का असर

“दो दिन बाद रामेश्वर आया। पूछने पर उसने सफाई दी कि क्या करता। मेरी बीवी मुझपर हंस रही थी तो मैंने उसे गाली दे दी। उसने अपने मायके वालों को फोन पर बताया तो उसके बाप ने पुलीस को खबर कर दी। जरा सी बात का बतंगड़ बन गया।”

“दीदी, रामेश्वर शराब के बारे में कभी सच सच नहीं बोलता। इसलिये लगता तो है कि उसने आग लगाई होगी।”

“वैसे रामेश्वर ड्राइवर अच्छा है। नशा न किये हो तो उससे बेहतर इंसान मिलना मुश्किल है। पर शराब उसे बरबाद कर रही है। हम लोगों ने बहुत समझाया, लेकिन कुछ दिन ठीक रहने पर फिर वैसा ही हो जाता है। इसी शराब के कारण उसके मां-बाप-भाई सब उससे दूरी बनाये रहते हैं।”

“बड़ा दुख होता है दीदी कि अपने परिवार की, अपने बच्चे की फिकर ही नहीं करता रामेश्वर। भविष्य की न सोचता है, न कोई चिंता करता है। हमारे साथ इसलिये जुड़ा है कि वह ड्राइवर बहुत अच्छा है। उसे नियमित पगार चाहिये और हमें अच्छा ड्राइवर। पर उसके घर की हालत देख बहुत खराब लगता है।”

नीलिमा की बात मुझे गहरे से छू गयी। गांवों में बहुत से परिवार और लोग शराब के कारण बरबाद हो रहे हैं। रामेश्वर जैसे लोग जितना पैसा पाते हैं, उससे गांव में ठीक से रहा-जिया जा सकता है। गांव में और जरूरतें कम हैं। किसी महानगर में इससे तीन गुणा पगार पा कर भी आदमी नरक सा जीवन ही जीता है। रामेश्वर चाहे तो उसके परिवार में सब कुछ अच्छा हो सकता है। पर होता क्या है? होता है पत्नी को गाली देना, पी कर कहीं पड़ जाना या घर में आग लगाने जैसा कुछ करना। :sad:

रामेश्वर जैसे लोग कर्जे में डूबे हैं। पगार शराब पीने और लोन चुकाने में चली जाती है और अगले महीने का राशन भी बनिया की दुकान से उधार आता है।

शराब और उधार; उधार और शराब – यही नियति है रामेश्वर जैसों की। उन्हें जोश आता है तो और उधार ले कर बच्चे का जन्मदिन मना डालते हैं। और उधार बढ़ता ही रहता है। गावों में शहरी मजदूरों वाली आदत बढ़ती ही जा रही है।

(पात्र और स्थान में गोपनीयता हेतु परिवर्तन किया है। इस लिये चित्र भी काल्पनिक हैं। फ्री-मीडिया लाइब्रेरी से लिये गये।)


अंगूर की बेटी

भारतवर्ष में शराब का प्रचलन बहुत बढ़ा है। ऊपर लिखा रामेश्वर अब छत्तीस साल का होगा। वह जब से पैदा हुआ, तब से औसत भारतीय आजतक दुगना तिगुना शराब पीने लगा है। पहले शराब का प्रचलन अमीर देशों – अमेरिका या योरोप में था। अब वह एशिया में प्रसारित हो गया है। अमीर देश अब पीना कम करने लगे हैं और गरीब देश ज्यादा। मेरे बचपन में शराब को सामाजिक मान्यता नहीं थी। शराब पीने वालों को बहुत हेय समझा जाता था। अब यह हाल है कि हम जैसे शराब न छूने वाले लोग उपहास के पात्र बन जाते हैं। चीन और भारत शराब पीने के प्रसार में आगे हो गये हैं।

रेलवे में थे मेरे पति, तब मैंने कई अपने समकक्ष परिवारों को भी बरबाद होते देखा है। एक दो अफसर तो इतना शराब पीते थे कि उन्हें लीवर सिरोसिस हुआ और वे असमय मर गये। एक अफसर के बारे में मेरे पति बताते थे कि वह मैले कुचैले कपड़े पहन कर आता था दफ्तर में। उसकी पत्नी घर चलाने में अपने मायके से मदद मांगती थी। एक दूसरे सज्जन जो वैसे बहुत मेधावी थे, उन्होने अपनी पत्नी को ही शराब पीने का पार्टनर बना लिया था और उनका घर दुगनी तेजी से बरबाद होने लगा था।

धनी, गरीब सब को प्रभावित करता है शराब का नशा। लोग कोरोना के पेण्डेमिक से हतप्रभ हैं। पर सही मायने में देखें तो शराब की लत उससे बड़ा पेण्डेमिक है। उससे बड़ी वैश्विक महामारी है। दुख की बात है कि सरकारें भी उससे बचाव के लिये काम करने की बजाय उससे आमदनी करने पर तत्पर हैं। अब तो एक मुख्य मंत्री यह तक कह रहे हैं कि शराब की डोर टु डोर सप्लाई करने की सोच रहे हैं।

झूम बराबर झूम शराबी। अब अंगूर की बेटी से मुहब्बत कर ले। शेख साहब की नसीहत से बग़ावत कर ले। … चालीस साल पहले यह गाना था; अब यह हकीकत है! :sad:


लॉकडाउन 3.0 में #गांवदेहात का माहौल


महानगरों से लोग चले आ रहे हैं। आशंका थी कि उनके आने से कोरोना संक्रमण अनियंत्रित हो जायेगा। लोग इतने बीमार होंगे और मरने लगेंगे कि सम्भाल पाना मुश्किल होगा।

कई दिन हो गये हैं लोगों के आते। कोई पैदल आया है, कोई साइकिल से, कोई छिपते छिपाते किसी वाहन में बैठ कर। अब ट्रेनें भी ला रही हैं। पर जो आया है उसे ले कर गांव वाले आशंकित हैं। उसे यथासम्भव अलग थलग रख रहे हैं। और प्रशासन भी उनको चिन्हित करने तथा क्वारेण्टाइन करने के लिए मुस्तैदी दिखा रहा है। हालात भयावह हो गये हों, और मामले तेजी से बढ़े हों, ऐसा नहीं दिखता।

पास के गांव मेदिनीपुर में कुछ लोग बम्बई से आये थे – ऐसा बताया गया। उनको पुलीस ने खोज निकाला। निकाल कर पास के स्कूल में क्वारेण्टाइन में रख दिया है। आसपास के सभी स्कूल क्वारेण्टाइन स्थल बना दिये गये हैं। उस गांव का बाहर से आया व्यक्ति उसी गांव के स्कूल में ही क्वारेंटाइन कर दिया गया है। पुलीस ने धमका भी दिया है कि अगर क्वारेण्टाइन तोड़ा तो पकड़ कर जेल में रख देंगे। लोग अपने घर के पास क्वारेण्टाइन किए गए हैं तो सामाजिक तनाव नहीं उपज रहा।

मेरे घर के पास भी प्राइमरी स्कूल है। उसमें सात आठ लोग क्वारेण्टाइन में रखे गये हैं। बगल में ही उनकी बस्ती है – पसियान। शाम के समय छत पर दो क्वारेण्टाइनार्थियों को देखता हूं। स्कूल की छत पर वे रात बिताने के लिये अपना बिस्तर बिछा रहे हैं। बगल के खेत में महिला बकरी चरा रही है। ऊपर खड़े क्वारेण्टाइनार्थी नौजवान की वह कोई रिश्तेदार लगती है। मास्क लगाये नौजवान उससे बतिया रहा है। लगभग समान्य सा माहौल है।

घर से उन लोगों को खाना मिल जा रहा है। सड़क चलते को रोक कर वे सुरती-गुटका भी मंगवा ले रहे हैं। स्कूल बड़ा है और केवल 8 आदमी क्वारेण्टाइन में हैं, सो सुविधाओं की किल्लत नहीं है। उनके घर एक दो कमरे वाले होंगे, पर यहां स्कूल में तो बहुत बड़ा परिसर उन्हें मिला है और बिजली-पानी-शौच की सुविधा है। मजे में ही होंगे वे क्वारेण्टाइन में।

सामान्यत:, एक स्कूल में एक ही जाति के लोग क्वारेण्टाइन किये गये हैं। सो जातिगत तनाव की भी समस्या वहां नहीं है।

स्कूल में क्वारेण्टाइन लोग, स्कूल की छत पर।

यह तो पसियान का हाल है। बभनान (ब्राह्मणों की बस्ती) में भी जटा का लड़का बऊ आया है बम्बई से। बताया गया कि प्रयाग से तो बेचारा पैदल ही आया। पैर में छाले पड़ गये थे। घर वालों ने पहले घर में अलग थलग रखा था, अब स्कूल में क्वारेण्टाइन कर दिया गया है। चाहे पसियान हो, अहिरान हो, केवटान हो या बभनौटी/चमरौटी हो – सब में ग्रामीण लोगों में संक्रमण का भय है और (कम या ज्यादा) सभी दूरी बना कर ही मिल रहे हैं।

पत्नी भी पति को दूर से ही मिल रही है उसके प्रवास से वापस आने पर। यह बड़ी बात है और ढाढस बंधाती है कि संक्रमण ज्यादा नहीं फैलेगा। इक्कादुक्का केस तो सामने आयेंगे ही। उनके बारे में सुन कर एकबारगी धुकधुकी बढ़ेगी और भय की लहर उठेगी, पर कुल मिला कर दो तीन दिन में जैसे हालात प्रकटित हो रहे हैं, हालत बेकाबू जैसी नहीं दिखती गांव में।

स्कूल की छत पर बिस्तर बिछाते क्वारेण्टाइन में रखे लोग। आज पूर्णिमा को वे खुले आसमान तले रात गुजारेंगे।

किसी क्वारेण्टाइनार्थी से बात चीत नहीं हुई मेरी। अन्यथा पता चलता कि हजार किलोमीटर चल कर आने से उनकी मनस्थिति क्या है। पर दूर से देखने पर स्कूल के ये लोग (जिनके चित्र मैंने बगल में अपने परिसर से लिये हैं ) ठीकठाक ही दिख रहे थे।

क्वारेण्टाइन की व्यवस्था ठीक लग रही है। मैंने वूहान, चीन के विषय में एक उपन्यासिका पढ़ी – ए न्यू वाइरस। इसमें क्वारेण्टाइन का जितना तानाशाही, भ्रष्ट और अमानवीय चित्रण है, उसके मुकाबले तो यह देसी क्वारेण्टाइन बहुत सुविधाजनक है – एक पिकनिक जैसा। दोषदर्शी लोग भयावह स्थिति बताने में कसर नहीं छोड़ेंगे, पर मुझे अपने आसपास जो दिखा, वह खिन्न करने वाला नहीं लगता।

मुझे बताया गया कि पास के नेशनल हाईवे नंबर 19 (ग्रांड ट्रंक रोड) से हजारों की संख्या में घर लौटने वाले पैदल या साइकिल पर गुजरे हैं। एक दो तो मुझे भी जाते दिखे। यह भी सुना कि रास्ते में (भय वश) लोग बहुत मदद नहीं करते उनकी। पर कहीं अराजक स्थिति नजर नहीं आयी। दारुण कथायें भी सुनने में नहीं आयीं।

पड़ोस के गांव में बम्बई से राह चलता एक नौजवान आया था। उसका घर 25-50 किलोमीटर दूर है। पैदल चला आ रहा था। यहां गांव में उसकी मौसी रहती हैंं। मौसी और उसके के परिवार वाले सोशल डिस्टेंस रख कर उससे मिले। नहाने खाने की सुविधा दी, पर घर पर रखा नहीं। दूरी बना कर रहे। उसे एक साइकिल दे दी उसके घर तक जाने के लिये, और रवाना कर दिया। बेचारा, थका हारा आने पर उसे अपेक्षा रही होगी कि बहुत आवभगत करेंगी मौसी… कोरोना मूलभूत मानवीयता के नये प्रतिमान ठेल रहा है और समाज उसे अंगीकृत करने को विवश है। गांवदेहात के लिये यह थोड़ी अजीब चीज है।

बशीर बद्र की पक्तियाँ हैं – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से। ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

अब बशीर बद्र की पंक्तियाँ, संशोधन कर, गांव के लिये भी लागू हो रही हैं – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से। ये नये कोरोना का गांव है; ज़रा फ़ासले से मिला करो।


लॉक डाउन 3.0 में भी शहर और गांव अलग अलग प्रकार की प्रवृत्ति दिखा रहे हैं। शराब की बिक्री से मची अराजकता जो शहरों में दिखी, वह गांव में नहीं है। कुछ रोचक किस्से जरूर हैं शराब पीकर अपने को इंद्र मानने वाले शूर वीरों के। पर दारू के लिए यहां उतना पैसा नहीं है और उस तरह की भीड़ भी नहीं टूटी मधु शालाओं पर।

New York Times का स्क्रीनशॉट

यह लिखा मिला (New York Times में ) कि भारत में कोरोना केस डबल होना 12 दिन में हो रहा था, वह 9.5 दिन तक खिसक गया है। पर यह खिसकाव शहरी फिनॉमिना है। गांव में वह नहीं दिखता। गांव अपनी जातिगत डिस्टेंसिंग के तनाव से शापित हो सकते हैं, पर संक्रमण का दुष्प्रभाव लॉकडाउन 3.0 में भी नहीं दिखा।

आज जो दशा है, वह अपनी समझ अनुसार मैंने लिख दी है। और लोग अलहदा विचार रखते होंगे। पर गांव में रह कर इस तरह देखना सब को सुलभ नहीं होगा। अत: तुम्हारे ऑबर्वेशन की भी एक अहमियत है जीडी! :lol:


सुग्गी के मास्क #ग्रामचरित


अपने आसपास के ग्रामीण चरित्रों के बारे में हम ब्लॉग पर लिखेंगे। #ग्रामचरित हैशटैग के साथ। पहला चरित्र थी दसमा। मेरी पत्नीजी द्वारा लिखी गई पोस्ट। अब पढ़ें सुग्गी के बारे में –


सुग्गी गांव में आने के बाद पहले पहल मिलने वाले लोगों में है। उसका घर यहीं पास में है। सौ कदम पर पासी चौराहे पर उसका पति राजू सब्जी की दुकान लगाता है। उसे हमने अपना दो बीघा खेत जोतने के लिये बटाई पर देने का प्रयोग किया था। जब हम यहाँ शिफ्ट हुए तो राजू स्वयं आया था। उसने परिचय दिया कि वह विश्वनाथ का बेटा है। विश्वनाथ मेरे श्वसुर स्वर्गीय शिवानंद दुबे का विश्वासपात्र था। उसी विश्वास के आधार पर पत्नीजी ने खेत उसे जोतने को दिया।

बाद में पाया कि बटाई पर खेती करने के काम में सुग्गी अपने पति की बजाय ज्यादा कुशल है। राजू में अपनी आत्मप्रेरणा (इनीशियेटिव) की कमी है। उसके घर में नेतृत्व का काम शायद सुग्गी करती है।

सुग्गी

मेहनती है सुग्गी। घर का काम करती है। खेती किसानी भी ज्यादातर वही देखती है। क्या बोना है, क्या खाद देना है, कटाई के लिये किस किस से सहायता लेनी है, खलिहान में कैसे कैसे काम सफराना है और आधा आधा कैसे बांटना है – यह सब सुग्गी तय करती है।

अपने आसपास लोगों से अपने हक के लिये दबाव दे कर बोलने बतियाने में वही तेज है अपने पति की तुलना में। पर वह मुखर होने के साथ बात-व्यवहार में भी कुशल है। सब्जी की दुकान में भी वह ज्यादा दखल रखती है। गावदेहात में स्त्रियों में नेतृत्व की क्षमता कम ही पायी जाती है। सुग्गी में वह भरपूर है।

पिछले कई महीनों से सुग्गी अपने हाथ पैर (शायद अर्थराइटिस के किसी प्रकार) के रोग से परेशान है। उंगलिया सूज जाती हैं। उनमें दर्द भी होता है और कभी कभी पानी भी भर जाता है। मेहनतकश के लिये हाथ पैर का जकड़ जाना बहुत दुखदाई होता है। इसके इलाज में कुछ हजार खर्च हो गये हैं। कई महीनों तो वह कोई काम नहीं कर पाई। अब रुपया में बारह आना भर हाथ पैर काम करने लगे हैं। उसी के बल पर वह सतत लगी रहती है श्रम करने में।

अभी सरसों और गेंहू की फसल निपटाई है उसने दो सप्ताह पहले।

लॉकडाउन होने के कारण उसका आदमी सब्जी मण्डी नहीं जा पाता। राजू के पास एक मॉपेड है, जिससे रात दो तीन बजे मण्डी जा कर सब्जी ला सकता है। पर एक बार गया तो किसी पुलीस वाले ने धमका दिया, सो बाद में गया ही नहीं। अब वह और सुग्गी सब्जी की बजाय चाय बेचते हैं अपनी गुमटी पर। कभी कभी सुग्गी आलू की टिक्की भी बनाती है। पुलीस वाले कभी कभी तंग करते हैं, पर अपनी बस्ती के पास होने के कारण काम चला लेते हैं राजू और सुग्गी।

कुछ बकरियां पाली हैं सुग्गी ने। बकरियां गांव के गरीब तबके का फिक्स्ड डिपॉजिट होती हैं। इन पर खर्च लगभग नहीं होता है और साल में एक दो बार बेचने पर ठीकठाक पैसा मिल जाता है। कभी कभी सुग्गी खरगोश भी पालती है। चिन्ना पांड़े के खेलने के लिये वह बकरी के बच्चे और खरगोश ले आती है।

सिलाई भी कर लेती है सुग्गी। स्त्रियों के कपड़े सिल लेती है। उसकी सिलाई मशीन खराब हो गयी तो मेरी पत्नीजी ने अपनी मशीन उसे काम करने को दे दी। वह मशीन महीनों से उसी के पास है।

सुग्गी मास्क बना कर लाई। कुल 15 मास्क बनाये हैं उसने।

कोरोनावायरस संक्रमण से बचाव के लिये मास्क बनाने-बांटने का विचार मेरी पत्नीजी के मन में आया। सुग्गी को एक नमूना दिया मास्क का। दो लेयर के कपड़े – एक मोटा और एक महीन भी उसे दिये। उसे यह भी कहा कि प्रति मास्क दस रुपया सिलाई मिलेगी। यह काम रुचा सुग्गी को। पहले दिन वह दो मास्क बना कर लाई। उनमें नफासत कुछ कम थी, पर काम लायक थे वे मास्क। उसके बाद बाकी पच्चीस मास्क तो बहुत स्तरीय बनाये सुग्गी ने। उनमें से अधिकांश मास्क मेरी पत्नीजी ने घर में काम करने वाली महिलाओं, पड़ोस के अपने भाई के नौकर, अपने वाहन चालक और दसमा को बांटे। अभी भी उन लोगों से कह दिया है कि किसी और को चाहिये तो वे दे सकती हैं।

सुग्गी के बनाये रंगबिरंगे मास्क। पहले उन्हें साबुन से धो कर सुखाया जाता है।

मेरी पत्नीजी द्बारा दिये गये कपड़े और सिलाई के पैसे तथा सुग्गी की कारीगरी ने बड़ा शानदार काम किया कोरोना युद्ध के लिये। मैं भी पहले एन95 मास्क का प्रयोग कर रहा था, अब सुग्गी के बनाये भगवा रंग के मास्क को अपना लिया है। मेरी पत्नीजी और पोती चिन्ना पांड़े भी सुग्गी के बनाये मास्क को पहन कर फोटो खिंचा चुके हैं।

पत्नीजी जरूरतमंद गांव वालों को मुफ्त में मास्क बांटने की सोच रही हैं। आगे शायद मास्क के डिजाइन में और सुधार हो। फिलहाल तीन प्लेट लगा रंगबिरंगा सुग्गी द्वारा बनाया गया मास्क मुझे तो बहुत आकर्षक लगता है।

सुग्गी का व्यक्तित्व आकर्षक है। मेहनत करने से शरीर अनुपात में है। उसके दांत चमकीले सफेद हैं और वह हंसती रहती है। दुख को अपने पर ज्यादा हावी नहीं होने देती। कमर में मोटी करधनी पहने वह सीधे बिना झुके चलती है तो आत्मविश्वास झलकता है उसकी चाल से। चांदी के ही सही, गहने पूरे पहनती है वह। दबंग है, सो अपने बराबर के और अन्य बिरादरी वालों को ज्यादा सेंटती नहीं है। शायद यह दबंगई न हो तो उसका घर दुआर ही न चले!

सुग्गी अपनी नातिन के साथ।

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