
ढूंढ़ी यादव
ढूंढ़ी यादव से मेरी पहली मुलाकात गांव में गुड़ की तलाश में हुई थी। तब ढूंढ़ी हाईवे के किनारे कड़ाहा में गुड़ बना रहे थे। आज से तीन साल पहले की बात है। उनसे मैने थोड़ा सा गुड़ मांगा तो उन्होने कहा कि बन जाने पर शाम को दे जायेंगे। लगा, कि जानपहचान न होने पर वे मुझे यह कह कर टरका रहे हैं। पर शाम को वे (पर्याप्त) गुड़ के साथ मेरे घर पर उपस्थित थे। ढूंढ़ी का इस प्रकार आना और बिना परिचय के गुड़ देना मुझे गांव की अच्छी इमेज मन में बनाने में सहायक बना।
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