तालाब में फंसी घायल नीलगाय


मैं लीलापुर के तालाब के किनारे था। यह बड़ा तालाब है। इसके किनारे बहुत से वृक्ष हैं। इसकी साफ़सफ़ाई पर ग्रामीण बहुत ध्यान देते हैं और यह भी उनका ध्यान रखता है। इसके किनारे एक प्राचीन मन्दिर भी है – शायद 17-18वीं शताब्दी का।

तालाब में पानी पर्याप्त था। उसके दूर के किनारे पर पानी में एक गाय जैसा बड़ा जानवर दिखा। कुछ कुत्ते उसपर झपट रहे थे। वह जब भी बच निकलने और किनारे पर जाने का प्रयास करता था, कुत्ते उसपर हमला कर देते थे। कुत्तों का ध्येय उसे पानी में फ़ंसा कर थका कर मार डालना लगता था।

दृष्य कुछ अजीब सा था। मैने ध्यान से देखा तो पाया कि वह जानवर नीलगाय था। बड़े आकार का नीलगाय।

लीलापुर के ताल के दूसरे किनारे पर पानी में फ़ंसा नीलगाय

नीलगाय ने हार कर अपनी स्ट्रेटजी बदली। वह किनारे पर जाने की बजाय ताल के बीच में तैर कर दूसरे किनारे – मेरी ओर – आने का प्रयास करने लगा। मेरे सामने दो विकल्प थे। उसका चित्र लेते जाना अथवा वहां से हट कर वापस चल देना। नील गाय इस किनारे आने पर बेतरतीब भागता तो उससे मेरे घायल होने की सम्भावना थीं। मेरे पार केवल मोबाइल था। आत्मरक्षा के लिये कोई डण्डी या छड़ी नहीं थी। अपना डेढ़ हाथ का बैटन भी घर पर छोड़ आया था आज।

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रवींद्रनाथ दुबे – एन.आर.वी. और शहर-गांव का द्वंद्व


अगर एन.आर.आई. होते हैं – नॉन रेजिडेण्ट इण्डियन तो वे लोग जो गांव छोड़ कर लम्बे अर्से से मेट्रो शहरों में रहने लग गये हों और जिनकी अगली पीढ़ी वहीं पली-बढ़ी हो; वहीं के सपने देखती हो; वहीं के आचार-विचार-व्यवहार जीती हो; उन लोगों को एन.आर.वी. – नॉन रेजिडेण्ट विलेजर (Non Resident Villager) कहा जा सकता है। इस गांव के श्री रवींद्रनाथ दुबे जी को उस श्रेणी में रखा जा सकता है।

श्री रवींद्रनाथ (सुभाष) दुबे जी

आज रवींद्रनाथ जी गांव (विक्रमपुर) से लसमणा की प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पर सवेरे की सैर करते मिल गये। मैँ साइकिल से वापस लौट रहा था और वे आगे जा रहे थे। बोले कि बड़े डरते डरते घर से निकले हैं। हाइवे पर उन्हे आशंका थी कि कोरोनावायरस सम्बंधी लॉकडाउन में कहीं कोई पुलीस वाला न मिले और अपनी लाठी के जोर पर अभद्रता न कर बैठे। उनके पास एक बढ़िया चमकती बेंत वाली छड़ी थी। पैण्ट और बंडी पहने थे। साफ और सुरुचिपूर्ण वेश। उनका चेहरा सवेरे की सूरज की रोशनी में चमक रहा था। वे अत्यंत शरीफ और सरल लगते हैं। बहुत ही प्रिय और मोहक व्यक्तित्व है उनका।

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भाग, करोना भाग!


आज की रीता पाण्डेय की अतिथि ब्लॉग पोस्ट –


चैत्र शुक्ल पक्ष की द्वादशी (अप्रेल 5, 2020)। रात 9 बजे जब सभी बत्तियां बन्द हुईं और मिट्टी के दिये जगमगा रहे थे, तब आसमान में भी चांद की रोशनी उजाला कर रही थी और वातावरण साफ़ होने के कारण तारे टिमटिमा रहे थे। धूल का कण भी नही‍ं था।

एक आहसास गहरे में था कि पूरा हिन्दुस्तान एक साथ दिया जला कर प्रार्थना कर रहा है कि इस धरती को सुरक्षित रखना, प्रभु! गहरी आध्यात्मिक अनुभूति थी, मानो हर कोई जल-थल-नभ को दूषित करने के लिये क्षमा याचना कर रहा हो।

मन की यह भाव यात्रा का रास्ता दिखाया था प्रधानमन्त्री जी ने। शायद वे जानते हैं कि सामुहिक प्रार्थना में बहुत बल होता है। वे जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। भारत के जन मानस को पहचानते हैं, और सामुहिकता की ताकत को भी। दशकों बाद एक ऐसा नेता हमारे बीच है जिसके आवाहन पर पूरा देश एक साथ खड़ा हो जाता है।

जब मैं छोटी थी, तब सुना था कि प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्रीजी ने जनता से अपील की थी कि अनाज के संकट के कारण लोग एक दिन एक वख्त का भोजन ही करें जिससे युद्धग्रस्त भारत पर विदेश का दबाव कम हो सके। उनके आवाहन पर सहर्ष लोगों ने उपवास किया था। उनके आवाहन पर कई माताओं बहनो ने अपने आभूषण उतार कर देश रक्षा के लिये दान कर दिये थे।

पांच अप्रेल को ऐसे ही एक आवाहन ने मन में एकता और सन्तुष्टि का भाव जगाया।

बच्चे काफ़ी उत्साहित थे। मेरी पोती चीनी (पद्मजा पांडेय) दिया जलाने को ले कर बहुत उत्सुक थी। घण्टा भर पाह्ले से तैयारी शुरू कर दी थी और दीवार पर लगी घड़ी पर बराबर नजर लगाये हुई थी।

नौ बजे, पास के बस्ती के कुछ बच्चे जोर जोर से “भाग, करोना भाग!” का सामुहिक नारा भी बार बार लगा रहे थे। कहीं कहीं पटाके और आतिशबाजी के प्रयोग भी हो रहे थे। कुल मिला कर पूरे देश के एक साथ होने का भाव गहरे में महसूस हो रहा था।

विलक्षण अनुभव था!

दिये जलाये हमने!

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