सतर्क रेल कर्मी, बसंत चाभीवाला

आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!


बसंत को मैंने कटका रेलवे स्टेशन के पास अपनी पोस्ट-रिटायरमेण्ट रिहायश बनाने के बाद सन 2016 के प्रारम्भ में पहली बार देखा था। सवेरे सवेरे वह कोहरे के मौसम में मफलर पहने चला जा रहा था अपने काम पर। इधर उधर ताकता-झांकता और ढीली पैण्डरोल क्लिप्स को अपने हथौड़े से कसता वह बढ़ रहा था। बहुत ही फोटोजीनिक दृष्य था वह। मैंने साइकिल खड़ी कर उसके कई चित्र, कई कोणों से लिये थे। उसका चित्र इतना पसंद आया था कि कई साल तक बसंत मेरे फेसबुक के कवर पर बना रहा। उसके मफलर पहने चित्र को देख कर बहुत सी टिप्पणियों में उसे अरविंद केजरीवाल कहा गया। यद्यपि बाद में लिये उसके चित्रों में वह मुझे नाना पाटेकर जैसा लगा! 😆

उस समय को बीते साढ़े चार साल हो गये। बीच में कई बार अपनी बीट में काम करता दिखा बसंत। हर बार मैंने एक दो चित्र लिये उसके। कालांतर में वह दिखना बंद हो गया। मैंने सोचा कि शायद कहीं तबादला हो गया हो उसका। पर हाल ही में वह पुन: दिखा। तेईस नम्बर रेल फाटक की गुमटी पर खड़ा था। बताया कि गेटमैन टॉयलेट में है। बाहर निकले तो उसके हस्ताक्षर अपनी डायरी में ले कर आगे बढ़े।

उसकी बीट कटका स्टेशन के पूरब में एक किलोमीटर पहले से प्रारम्भ हो कर पश्चिम में माधोसिंघ की ओर चार किलोमीटर जाती है। आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!

बसंत गेटमैन के इंतजार में रुका था और मैं बसंत से बात करने के लिये। उससे पूछने पर पता चला कि वह यहीं रहता रहा है सालों से। मुझे बीच में नहीं दिखा तो वह मात्र संयोग था। अकेला रहता है कटका स्टेशन पर बने क्वाटर में। रहने वाला रांची का है। मैने बात करने के लिहाज से उसे बताया कि मेरी बिटिया वहीं बोकारो में रहती है। उसने कहा – “बहुत अच्छा है झारखण्ड! यह तो यहां के लोग हैं जो जानते नहीं वहां के बारे में। कहते हैं कि पिछड़ा इलाका है, जंगल है। कभी इन लोगों ने देखा नहीं है।”

दो दिन बाद सवेरे छ बजे यूंही मुझे लगा कि साइकिल सैर के दौरान बसंत से मिला जाये। यह सोचा कि अपनी ड्यूटी पर वह निकलने वाला होगा। या शायद निकल गया हो। मैंने साइकिल कटका स्टेशन पर खड़ी की। स्टेशन मास्टर साहब से पूछा तो उन्होने बताया कि अभी वह स्टेशन पर तो नहीं आया। स्टेशन का सफाईवाला साथ में मुझे उसका घर दिखाने ले गया।

बसंत की कॉलोनी का रास्ता। एक बार लगा कि लौट चला जाये। कुछ उपेक्षित सा है यह इलाका।

क्वाटर पर लखंदर (सफाईवाला) ने आवाज लगाई पर बसंत का कोई उत्तर नहीं मिला। उसने अंदर जा कर बसंत को जगाया। बसंत का रेस्ट था और वह सो रहा था। थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया। उसे यह अंदाज नहीं था कि कोई पुराना विभागाध्यक्ष उसे ढ़ूंढता उसके क्वार्टर पर आयेगा।

बसंत -थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया।

जब आप किसी के बारे में लिखना चाहते हैं तो अपने रुतबे या ईगो को दरकिनार कर चलते हैं। मैं वही कर रहा था। वैसे भी रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारी और अधिकारी पासंग में होते हैं। कोई आपको इज्जत दे या लिहाज करे तो यह आपका सौभाग्य। अन्यथा, एक ब्लॉगर को उसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये।

मैंने बसंत का मोबाइल नम्बर लिया। उसपर घण्टी दी तो पता चला कि उसकी बैटरी डिस्चार्ज्ड है। एक की-मैन के लिये मोबाइल की अहमियत ऑफ ड्यूटी और रेस्ट पर होने के दौरान कुछ खास नहीं होती।

अगले दिन सवेरे उसके पेट्रोल ड्यूटी पर निकलते समय मैं कटका स्टेशन पर ही उससे मिला। वह वर्दी पहने अपने उपकरणों से लैस था। मैंने पूछा कि पटरियों की दशा कैसी है?

“ठीक ही है। पण्डराल (पैण्डरोल क्लिप – pandrol clips) कसने पड़ते हैं। वैसे पिछले दो तीन साल में दो बार मैंने टूटी पटरी देख गाड़ी रुकवाई है।” – बसंत ने जवाब दिया। उसने बताया कि वह म्यूचुअल ट्रांसफर की कोशिश कर रहा है रांची जाने के लिये। मुझसे अनुरोध किया कि मैं एडीईएन साहब को कह दूं कि उसका अप्रूवल दे दें। मैंने उसे अपने केस के कागज की प्रति ले कर घर पर अगले दिन मिलने को कहा। पर वह आया नहीं। शायद झिझक के कारण या शायद यह समझ कर कि कुछ करा पाना मेरे प्रभाव क्षेत्र में नहीं होगा। रिटायर्ड आदमी इस तरह के बहुत से “शायद” की कल्पना कर लेता है और उन्हे बुनता रहता है! 😆

वह रेल की पटरियां देखता आगे बढ़ने लगा। एक जगह तीन चार चाभियां कसीं। एक पैण्डरोल क्लिप छिटक कर गिरी हुई थी, उसे लगा कर हथौड़े से ठोंका। वहीं से मुझे बोला – यहां जर्क लगता है। पण्डराल बहुत ढीले होते हैं यहां।

एक कुशल चाभी वाला अपने ट्रेक के चप्पे चप्पे से परिचित होता है। कहां पैकिंग लूज है, कहां गिट्टी में मिट्टी ज्यादा है। कहां रेल में नुक्स है – विजुअल परीक्षण से उसे बहुत कुछ पता रहता है। बसंत वैसा ही रेल कर्मी लगा।

वह अपने पेट्रोलिंग में काम करता आगे बढ़ता गया। मैंने अपनी साइकिल संभाली गंगा किनारे जाने के लिये। यह सोचा था कि अगले दिन वह मुझसे मिलेगा तो उसके यहां अकेले रहने और झारखण्ड में उसके परिवार के बारे में पता करूंगा। पर वह आया नहीं। वैसे भी आगामी महीनों में उसका म्यूचुअल ट्रांसफर अगर हो गया तो वह चला ही जायेगा अपने देस।

इस सर्दी के मौसम में मैं रेलवे के कर्मियों से मिल कर उनके बारे में जानना/लिखना चाहता हूं। इससे मेरी पुरानी यादें भी उभर कर आयेंगी और रेल का सम्पर्क जो पिछले तीन साल से जो लगभग शून्य है; रिवाइव हो सकेगा। पर देखता हूं कि वह सब करने के लिये अपने अतीत के रुतबे के बहुत से मानसिक अवरोध साफ करने होंगे। किसी सामान्य ग्रामीण से मिलना, बोलना बतियाना और उसकी झोंपड़ी में उसकी खाट पर बैठना सरल है; रेल के किसी अमले से वैसी आत्मीयता सहज स्थापित करना कठिन है। बसंत के मामले में, बहुत प्रयास के बावजूद मैं आधा अधूरा ही सफल हो पाया।

पर यह सफलता भी बुरी नहीं! कोशिश करते रहो, जीडी!


श्री वी.के. पंजियार, मरेप्र, वाराणसी रेल मण्डल

लम्बे अर्से तक रेल से दूर रहा। पिछले तीन साल से मैंने कोई पास नहीं लिया, कोई रेल यात्रा नहीं की। पर पिछले सप्ताह वाराणसी के मण्डल रेल प्रबंधक श्री वी.के. पंजियार जी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अगले छ महीने के दौरान (जब मौसम बाहर निकलने, मिलने जुलने के लिये मुफीद रहता है) मुझे 20-25 रेल कर्मियों से मिलने और उनपर ब्लॉग पोस्टें लिखने के लिये सामग्री एकत्र करने की सहायता करें। डीआरएम साहब ने उपयुक्त सहायता का आश्वासन दिया। आज एडीआरएम प्रवीण कुमार जी से भी सम्पर्क हुआ। अब लगता है रेल-कर्मियों पर नियमित ब्लॉग लिखना हो सकेगा। … रेल का सम्पर्क फिर जुड़ेगा। एक अलग प्रकार से!



राजेश की गुमटी और गांव के सामाजिक-आर्थिक बदलाव

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है।


मेरे गांव के लिये जो सड़क नेशनल हाईवे 19 की सर्विस रोड से निकलती है; उसके मुहाने पर दो गुमटियाँ लग गयी हैं। उनमें से एक गुमटी किलनी की है। दूसरी राजेश की। राजेश के बारे में बताया गया कि वह बम्बई रिटर्न्ड है। वहां मिठाई की दुकान पर कुशल कारीगर था। यहां कोरोना संक्रमण के पहले ही आ गया था; इसलिये उसके बम्बई से रीवर्स पलायन की वजह कुछ और होगी।

राजेश, अपनी गुमटी में समोसे बनाता हुआ

उस रोज राजेश अपनी गुमटी में जलेबियां निकाल चुका था। समोसे का मसाला बनाने के बाद उसे मैदे के कोन में भर कर तलने ही जा रहा था कि मैं वहां से गुजरा। मैंने पूछा -कितने में मिलेंगे कच्चे समोसे?

राजेश ने बताया कि तैयार समोसे छ रुपये जोड़ा बिकते हैं। कच्चे वह पांच रुपये जोड़ा दे देगा। मैंने एक दर्जन खरीदे।

राजेश ब्राह्मण है। राजेश दुबे।

इस गांव में ब्राह्मण विपन्नता में हैं। पर वे अपनी जातिगत ऐंंठ के कारण गुमटी लगाने, समोसा चाय बेचने जैसे काम में नहीं लगे हैं। महिलायें दरिद्रता में जीवन निभा रही हैं पर घर के बाहर और खेतों पर काम करने नहीं निकल रहीं। कथित नीची जाति की महिलायें और पुरुष, जो भी काम मिल रहा है, कर रहे हैं। उनके पास जमीनें नहीं हैं, फिर भी वे अपेक्षाकृत ठीक आर्थिक दशा में हैं।

मैं राजेश को इस बात के लिये अच्छा समझता हूं कि उसने इस छद्म सवर्ण बैरियर को तोड़ कर चाय-समोसे की दुकान तो खोली है।

उसकी गुमटी वाली दुकान के सामने मैंने अपनी साइकिल रोक कर कुछ न कुछ लेना प्रारम्भ किया है। कभी कच्चे समोसे, कभी जलेबी और कभी (अपनी पसंद से बनवाये) कम चीनी वाले पेड़े। अभी तीन किलो बूंदी के लड्डू भी खरीदे। मेरी पत्नीजी भी स्वीकार करती हैं कि राजेश के काम में हुनर है। उसके पास पूंजी होती और मौके पर दुकान तो अच्छी चल सकती थी। पर गांव में हाईवे से सटी गुमटी भी एक सही जगह बन सकती है भविष्य में। अगले पांच साल में, अगर विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध नहीं हुई तो यह गांव एक क्वासी-अर्बन सेटिंग हो जायेगा। तब राजेश की यह गुमटी एक ठीकठाक मिठाई की दुकान या रेस्तरॉ का रूप ले सकती है। अगले पांच साल का अवलोकन करना रोचक होगा…

राजेश नियमित नहीं था अपनी गुमटी खोलने में। एक दिन पूछा कि गुमटी रोज क्यों नहीं खुलती? बताया कि बच्चे को फोड़ा हो गया था, उसके साथ बुखार। सो डाक्टर के पास ले जाने के कारण दुकान बंद रही।

राजेश की बिक्री कम होने का एक कारण यह भी है कि यदा कदा उसकी गुमटी बंद रहती है। दुकान नियमित न होने से ग्राहक छिटक जाते हैं।

मैं जानता हूं कि उसका बताया यह कारण न सही है और न पर्याप्त। पर उसको “मोटीवेट” करने के लिये उसकी दुकान पर रुकने और उससे सामान लेने का जो उपक्रम मैंने किया है – उसके बाद देख रहा हूं कि दुकान नियमित खुल रही है।

उसका बेटा, आदर्श भी साथ में बैठता है दुकान पर। छठवीं क्लास में पढ़ता है। आजकल स्कूल नहीं चल रहे। वह सामान तोलता है और गल्ले से पैसे का लेन देन भी जानता है। मेरे घर सामान देने भी वही आया था। मॉपेड चला लेता है।

राजेश की गुमटी। गल्ले पर बैठा उसका लड़का आदर्श। राजेश समोसे के लिये मैदा गूंथ रहा है।

दो पीढी में बहुत बदला है गांव। राजेश के बाबा या उसके पहले के लोग (छोटी जमीन की होल्डिंग के ही सही) किसान होते रहे होंगे। उसके बाद लोग महानगरों को पलायन किये। अधिकांश ड्राइवर बने – उनके पास पूरे देश में घूमने और ट्रक चलाने की कथायें हैं। ड्राइवर बनने के साथ उन्होने देश तो देखा, पर ट्रक चालक के दुर्गुण भी गांव-समाज में वे लाये। राजेश मुम्बई में मिठाई की दुकान पर रहा तो उसके पास एक वैकल्पिक काम का हुनर है। बिजनेस करने का शऊर भी है। महानगरों के कुछ ऐब भी हैं। उसके कारण जो कमाया वह गंवा चुका है। पर अब एक नयी शुरुआत की सम्भावना बन रही है। अगर वह मेहनत से काम करे, तो अगले दशक में बदलती गांव की तस्वीर का एक प्रमुख पात्र बन सकता है।

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है। सवर्णता की वर्जनाओं का सलीब ढोते इन नौजवानों के पास कुछ खोने को नहीं है; सिवाय अपनी दकियानूसी वर्जनाओं के। उन्हें अपने खोल से निकल कर, छोटे पैमाने से ही सही, एक नयी पहल करनी चाहिये।

मेरे लिये राजेश उस आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन का सिपाही है। देखना है कि वह अपनी और अपने परिवेश की गलत आदतों और वर्जनाओं में फंस कर रह जाता है या परिवर्तन के नये आयाम तलाशता-बनाता है। एक पहल तो उसने की है।

उसकी सफलता की कामना करता हूं मैं।


राजन भाई की पोती के स्वास्थ्य के लिये नानी के नुस्खे

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।


सवेरे की चाय पर लगभग रोज रहते हैं राजन भाई। मेरे चचेरे भाई हैं। उम्र में मुझसे करीब छ साल बड़े। उनका घर रेलवे लाइन के उस पार अहाता में है। हमारे घर से करीब आधा किलोमीटर दूर। लॉकडाउन पीरियड में एक वही हैं, जो लगभग नियमित मिलते हैं। उनसे गांव की कई सूचनायें मिलती हैं। अन्यथा हम लोग शायद उतने सामाजिक नहीं हैं। 😆

सवेरे की चाय पर राजन भाई। राजेंद्र दुबे।

उनसे कई तरह की चर्चा होती है। आज वे थोड़ा परेशान थे। उनकी सात महीने की पोती की कुछ स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या है। उनसे बात करते समय मुझे बरबस अपनी नानी की याद हो आयी। जब मैं अपने तीन महीने के बेटे के साथ दिल्ली से बनारस उनके पास आयी थी। आने के पहले बेटा बीमार था और मेरे साथ उसके सामान की बड़ी सी गठरी थी। उसमें थे बदाम का तेल, जान्सन के उत्पादों का पूरा किट और अनेक दवाइयां।

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।

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सढ़सठ साल के राजन भाई कोरोना-काल में अतिरिक्त सतर्क हैं

उन्हें अहसास है अपनी बढ़ती उम्र, इम्यूनिटी का घटता स्तर, और इम्युनिटी बढ़ाने की जरूरत का। जितना गम्भीर वे हैं, उस स्तर पर सभी 65 पार लोगों को होना चाहिये।


साढ़े चार साल पहले जब मैं रिटायर हो कर गांव में आया था, तो साइकिल भ्रमण के साथी बने राजन भाई। मुझसे उम्र में दो-ढाई साल बड़े हैं, पर मुझसे कम उम्र के लगते हैं। उस समय उन्होने मुझे बताया था कि लगभग 12 किलोमीटर रोज साइकिल चलाते थे। शरीर पर कहीं अतिरिक्त चर्बी नहीं। फ़िट्ट लगते थे।

उसके बाद पाया कि देखने में कुछ तकलीफ़ होने लगी थी उनको। मोतियाबिन्द शायद पहले थे था, पर अब ज्यादा बढ़ गया था। उसके ऑपरेशन के लिये इधर उधर भटके। एक बार डाक्टर तय किया तो पता चला कि डाइबिटीज है उनको और चूंकि कभी नियन्त्रित करने का प्रयास नहीं किया था, ब्लड शूगर ज्यादा ही था। डाक्टर ने कहा कि जब तक वे अपना शुगर लेवल कण्ट्रोल नहीं कर लेते, ऑपरेशन नहीं करेंगे। कण्ट्रोल के नाम पर सेल्फ मेडिकेशन के आधार पर आयुर्वेदिक दवा, करेले का जूस छाप उपक्रम किये उन्होने। पर डाक्टर ने दूसरी बार भी उनका शूगर लेवल शल्य चिकित्सा लायक नहीं पाया।

उसके बाद उनके दोनो बेटों ने, लगता है काफ़ी लताड़ा उन्हे। फिर उन्हें अपने पास दिल्ली ले कर गये। वहां लम्बे समय तक राजन भाई रहे और वापस लौटे तो आँखों का ऑपरेशन करा कर ही।

मेरे साइकिल भ्रमण के साथी राजन दुबे।
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गांव में रिहायश – घर के परिसर की यात्रा : रीता पाण्डेय

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!


रीता पाण्डेय (मेरी पत्नीजी) कोरोनावायरस के लॉकडाउन समय में नित्य एक – दो पन्ने लिख रही हैं। किसी भी विषय में। शायद रोज लिखना ही ध्येय है। भला हो इस कोविड19 के कठिन समय का कि यह लेखन हो रहा है। मेरे जिम्मे उस लेखन को टाइप कर ब्लॉग में प्रस्तुत करने का काम रहता है। वह करने में भी एक आनंद है।

प्रस्तुत है, रीता पाण्डेय की आज की पोस्ट –

पति के रिटायरमेंट के बाद, अगले ही दिन, हमारे रहने की जगह बदल गयी। घर में उनकी दिनचर्या में बहुत बदलाव आया। पर मेरी दिनचर्या लगभग वैसी ही रही। आखिर, मैं तो रिटायर हुई नहीं थी; और होना भी नहीं चाहती।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है। आजकल कोरोनावायरस के लॉकडाउन के समय में उसी परिसर में मेरी यात्रा होती है। सुबह की चाय का ट्रे बाहर बराम्दे में रखने के बाद जब नजर घुमाती हूं तो लाल गुड़हल के फूल आमंत्रित करते हैं। कुछ फूल भगवान के चरणों में समर्पित करने के लिये रख लिये जाते हैं तो कुछ डाल पर मुस्कराने के लिये छोड़ दिये जाते हैं।

अभी भी (रेलवे के बंगलों की तरह) मेरे घर का परिसर काफी बड़ा है।

उसके पास बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन। अचानक अमरूद पर नजर जाती है। दो साल पहले लगाया था। तेजी से बढ़ा है पौधा। पिछली साल दो बार फल दिये थे। अभी उसमें फिर फूल खिलने की तैयारी हो रही है।

बोगनबेलिया है। श्रीमाँ ने उनका नामकरण किया था – डिवाइन प्रोटेक्शन।

अमरूद की तरफ ही पपीता है। वह भी फल देता रहा है और देने को तैयार हो रहा है। कलमी आम के वृक्ष तो कई हैं पूरे परिसर में। दो-तीन साल पहले लगाये गये। उनकी ऊंचाई ज्यादा नहीं बढ़ेगी। पर उनपर भी बौर आये हैं और अब टिकोरे लग रहे हैं। सामने की क्यारियों में कोचिया कुछ उदास करते हैं, पर उन्ही के साथ गमलों में लगाये कोचिया स्वस्थ हैं। उन्हे देख प्रसन्नता होती है। चम्पा के पत्ते तो पूरी तरह झड़ चुके हैं। अब उनका कलेवर बदल रहा है।

गुड़हल की कई किस्में हैं। कई रंग।

फागुन से पीला गुड़हल भी खिलने लगा। गुलाब तो अपने शवाब पर है! हल्का गुलाबी अमेरिकन गुड़हल पर भी कलियां लगने लगी हैं।

पीले अलमण्डा की बेल ऊपर तक चली गयी है। अचानक नजर गयी तो उसकी फुनगी पर कुछ फूल भी नजर आये। इस बार भयानक बारिश और उसके बाद कड़ाके की लम्बी चली सर्दी में कई पौधे गल-मर गये। ऐसा लगा कि कई पौधे नर्सरी से लाकर फिर से लगाने पड़ेंगे। पर पाया है कि अपराजिता फिर से हरियरा गयी है और झुलसी तुलसी में नये पत्ते आ गये हैं।

कुछ ही वर्षों में पेड़ और बेलें घर को आच्छादित कर देंगे।

घर के पीछे की ओर भी कई पौधे हैं। कई बेलें। वहां एक लीची का पौधा भी लगाया है। गंगा के इस इलाके में चलेगा या नहीं, अभी देखना बाकी है। नीबू का झाड़ हरा भरा है। उसमें कई फूल लगे पर फल लगने के पहले ही झर गये। शायद अगले सीजन में लगें, जब झाड़ और बड़ा हो जायेगा। दिया तो गंधराज कह कर दिया था नर्सरी वाले नें। देखें, क्या निकलता है!

नीम के किशोर वृक्ष हर तरफ हैं। उनके सारे पत्ते झर चुके हैं और नये आ रहे हैं। कुछ ही दिनों में ये हरे भरे हो जायेंगे। केले का एक गाछ है। पिछली बार उनके पेड़ पर प्राकृतिक तरीके से पके केलों का स्वाद ही निराला था। और फल कई दिन रखने पर सड़े-गले नहीं थे।

केले का गुच्छा।

घर के पीछे एक नल है। नौकरानियों के लिये एक प्रकार का पनघट। वे यहां हाथ पांव धोने, नहाने, कपड़ा कचारने, नाश्ता-भोजन करने और बतकही/पंचायत के लिये आती हैं। आजकल यह कोरोनावायरस के लॉकडाउन के कारण वीरान जगह है। इस जगह पर अब बर्तन भर मांजे-धोये जा रहे हैं।

इसी नल के पास एक पारिजात – हारसिंगार – का वृक्ष है। उसकी बगल में चार साल की उम्र का पलाश। पलाश के फूल इस साल देर से आये हैं। हमारे इस पलाश में तो पहली बार ही आये हैं। अभी नया नया पेड़ बना है ये पलाश।

पहली बार फूला है पलाश

घर की इस यात्रा में और भी छोटे मोटे पड़ाव हैं। पीछे चारदीवारी में खेत की ओर जाने का एक छोटा गेट है, जिससे गेंहू का खेत दिखता है। उसके आगे सागौन के पेड़ हैं। घर के ऊपर – दूसरी मंजिल के ऊपर सोलर पैनल है। वहां खड़े हो कर गांव का हराभरा दृष्य बहुत सुंदर लगता है।

घर के पोर्टिको में गमले हैं। उनमें लगे पौधे अपनी आवश्यकता अनुसार मुझे बुलाते रहते हैं। किसी को पानी चाहिये होता है, किसी को धूप या किसी को छाया। कोई कोई तो मानो बात करने के लिये ही बुलाता है। वे हरे भरे होते हैं तो मन प्रसन्न होता है। कोई बीमार हो जाता है तो मन खिन्न होता है। बिल्कुल किसी परिवार के सदस्य की दशा देख कर।

घर में अपने पति समेत बहुत से बच्चों को पालती हूं मैं। ये पेड़-पौधे-गमले मेरे बच्चे सरीखे ही हैं। ये सब मिलकर इस घर को एक आश्रम का सा दृष्य प्रदान करते हैं। बस, हम अपनी सोच ऋषियों की तरह बना लें तो यहीं स्वर्ग है!


कोविड19 का सामाजिक अलगाव, गांव और गंगा तट

गांव सामान्य सा दिखता है। पर गमछा मुंह पर बांधे है और सहमा हुआ है। आसपास के इलाके में अभी किसी के बीमार होने या मरने की खबर नहीं है, वह होने पर शायद गांव भी घरों में दुबक जाये।



मुझे लगा कि कोरोना (मुख्यतः) शहरी आपदा है। गांव अगर उससे प्रभावित है तो उस सीमा तक, जिस सीमा तक दिल्ली बंबई में रहने वाले गांव लौट कर गांव को खतरे में डाल रहे हैं।

लोग गांव लौट क्यों रहे हैं? बंबई से कूद फांद कर, एक चार चक्का किराये पर ले उसमें ठूंस कर भरे लोग, सरकारी अमले को धता बताते गांव लौट रहे हैं। और मेहनत मजदूरी करने वाले ही नहीं, मध्य वर्ग के लोग – जिनका गांव से थोड़ा भी कनेक्शन बाकी है – वे भी सपरिवार गांव आ कर पसर गए हैं। आगे भी आयेंगे, यह निर्भर करेगा कि सरकार कितनी कड़ाई से लॉकडाउन का पालन करा सकती है।

शहर जब तक नौकरी देता है, जीवन यापन के साधन देता है, जब तक घूमने और परस्पर मिलने तथा मनोरंजन की सुविधाएं देता है, जब तक लोग वहां टिकते हैं। अन्यथा अन्य ऑप्शन तलाशते हैं। अन्य ऑप्शन में गांव प्रमुखता से आता है।

केवल भारत में ही नहीं है। आज मैने न्यूयॉर्क टाइम्स में पढ़ा कि न्यूयॉर्क के शहरी अन्य स्थानों में पलायन का यत्न कर रहे हैं। मुख्यत: धनी लोग। और जहां जाना चाहते हैं, वहां के लोग उसका विरोध कर रहे हैं।

New York Times की खबर

भारत में वैसा नहीं है। यहां गांव अपने बंधुबांधवों को बाहें खोल कर स्वीकार कर रहा है। यह जरूर है कि जो आये हैं, अपने घर में दुबके हुये हैं। घर वाले भी उनकी सेहत की दशा मॉनीटर कर रहे हैं। पर कोई यह नहीं कह रहा कि “सरऊ काहे आइ गये (साले, क्यूँ आ गए)”?

तनाव है। पुलीस की गाड़ी नजर आती है तो लोग सन्न हो जा रहे हैं। चाय की चट्टी बंद करा दी है। बंद कराने में पुलीस ने मां-बहन का आवाह्न किया है, ऐसा सुनने में आया। पर गांव की अपनी गतिविधियां (कुछ सिकुड़ कर) चल रही हैं। वैसा माहौल नहीं दिखता जैसा टेलीवीजन दिखाता है।

खेत से फसल (सरसों) ले लौटते लोग

शाम के समय देखा तो लोग अपने खेतों में निराई कर रहे थे – इक्का दुक्का नहीं, लगभग उतने ही लोग जितने सामान्य समय में किया करते थे। बच्चे और औरतें शाम होने के कारण अपनी बकरियां और गाय भैंस चरा कर वापस ला रही थीं। ठेले पर मेदिनीपुर में गोलगप्पा और समोसा बेचने वाला भी दिखा। उसके आसपास पांच सात लोग थे। कोलाहलपुर में सड़क पर कुछ अधेड़ औरतें वैसे ही गोल बना कर बैठी आपस में बतियाती नजर आयीं, जैसे हमेशा करती आयी हैं। सड़क के किनारे पाही पर लोग वैसे ही दिखे जैसे सामान्य तौर पर दिखते हैं। हां, लगभग आधे लोग – या कुछ ज्यादा ही, मुँह पर रुमाल या गमछा बांधे थे।

लोगों की उपथिति का घनत्व गांव होने के कारण वैसे भी (शहर की अपेक्षा) कम था, पर वैसा ही था, जैसा सामान्य तौर पर होता है।

सड़क पर वाहन नहीं थे। सामान्यत: मिट्टी ढोने वाले ट्रेक्टर और इक्कदुक्का चार पहिया वाहन दिखते थे, अब वे नहीं दिखे। एक भी नहीं। हां, दूर एक ईंट भट्ठे की चिमनी से धुआँ निकलता नजर जरूर आया। गांव के स्तर पर तो वही उद्योग-धंधा है। और वह बंद नहीं हुआ लगता। भट्ठे में गतिविधि का मतलब वहां ईंट ढालने और ढोने वाले मजदूर तो काम कर ही रहे होंगे।

दूर ईंट भट्ठे की चिमनी से धुंआ निकल रहा था

सोशल डिस्टेन्सिंग की आचार संहिता का पालन करते हुये मैं किसी से बिना मिले, बोले – बतियाये साइकिल चलाते सीधे चलता चला गया। ध्येय था अपनी चार पांच किलोमीटर साइकिल चलाने का व्यायाम पूरा करना। वह बिना किसी बाधा के पूरा कर लिया। आंखों से आसपास की गतिविधियां निहारता भर गया। एक दो जगह चलती साइकिल से या रुक कर चित्र जरूर लिये। बस।

गंगा किनारे सूर्यास्त और बटोही (साइकिल)

गंगा किनारे सूरज डूबने को था। सूर्यास्त के चित्र अच्छे आये। एक कौवा दिखा। करार की ऊंचाई से देखा तो तीन आदमी/बच्चे नदी किनारे अपने हाथ पैर धो रहे थे। शायद पास के गांव कोलाहलपुर से शाम के निपटान के लिये आये होंगे।

गंगा किनारे

वापसी में एक महिला का एक आदमी को कहता शब्द सुनाई पड़ा – खोंखत मरि जाबे, एकर कौनो दवाई नाहीं बा (खांसते मर जाओगे, इसकी कोई दवाई नहीं है)। निश्चय ही वह कोरोनावायरस के बारे में कह रही थी।

गांव सामान्य सा दिखता है। पर गमछा मुंह पर बांधे है और सहमा हुआ है। यह मीडिया का असर है। आसपास के इलाके में अभी किसी के बीमार होने या मरने की खबर नहीं है, वह होने पर शायद गांव भी घरों में दुबक जाये।

पर अभी तो अपनी गतिविधियां, कमोबेश जारी रखे हुये है। शायद इसी लिये लोग गांव की ओर पलायन कर रहे हैं।