चाय की चट्टी, मोही और माधुरी

खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।


चाय की चट्टी पर खड़ा था वह बच्चा। एक टी-शर्ट और नेकर में। नंगे पैर। नेकर पीछे से कुछ ज्यादा ही फटी थी, जिससे उसका पीछे का भाग झांक रहा था। एक नाक से पानी बह रहा था। सांवला रंग। आकर्षक चेहरा। भावपूर्ण आंखें। पर कम से कम दो दिन से नहाया नहीं था।

मैने नाम पूछा। बताया – मोही।

फेसबुक नोट्स में 21 अप्रेल 2016 की पोस्ट। फेसबुक ने नोट्स फेज आउट कर दिये, इस लिये ब्लॉग पर सहेजी। पर यह छोटी पोस्ट पुरानी नहीं पड़ी है!

कहां रहते हो? उसने हाथ से बताया – रेलवे लाइन के उस पार।

अरुण (चाय की चट्टी पर बैठे मालिक) को मैने कहा कि पांच रुपये की पकौड़ियां उसे दे दे। मैने अरुण को पकौड़े के पैसे दिये। कागज में रख कर पकौड़ियां उस बच्चे को दीं तो कागज के साथ ही लपेट उसने दोनो हाथों में ले लिया।

मैने कहा – खा लो।

“नाहीं। घरे लई जाब। ओके देब। छोट बा हमसे – माधुरी। (नहीं घर ले जाऊंगा। मुझसे छोटी है माधुरी। उसको दूंगा।)”

खुद ही छोटा बच्चा। चार साल का होगा। अभाव में पलता। पर कुछ भी मिलने पर अपनी छोटी बहन को देने की बात पहले मन में आयी उसके। कौन सिखाता है यह संस्कार। यह स्नेह।

एक कोने से मेरी आंख नम हो आयी।

Mohi the kid
चाय की चट्टी पर मोही। हाथ में लिये है कागज में लपेटी पकौड़ियां।

पहले की कुछ टिप्पणियाँ –

दिनेशराय द्विवेदी – आप की बेहतरीन पोस्टों में से एक।

Gyanendra Tripathi – स्नेह संस्कारगत नहीं होता वह तो प्रकृति प्रदत्त होता है। संवेदनशीलता मूल में होनी चाहिये, स्नेह अनुभव में उतर जाता है, फिर दुनिया की बाक़ी चीज़ें फीकी हो जाती हैं।

Priyankar Paliwal – दिखने वाली भौतिक गरीबी से ज्यादा खतरनाक है मन की गरीबी . भावों की गरीबी . जहां भावों की गरीबी नहीं है वहां अभाव नहीं खलता, प्रेम पलता है . छुटकी माधुरी का यह चार साल का संरक्षक, उसका यह अभावग्रस्त पर भाव-समृद्ध बड़ा भाई मोही यानी ‘मोही द ग्रेट’ अपने आचरण से यह उद्घोषणा करता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव प्रेम है, प्रतिस्पर्धा नहीं . सावधान रहें आपकी रिपोर्टिंग अब एक कवि की रिपोर्टिंग होती जा रही है . 🙂


आज की ब्लॉग पोस्ट – शैलेंद्र चौबे की नयी दुकान

छोटे स्तर पर ही सही; एक सवर्ण नौजवान की सरकारी नौकरी की मरीचिका से पार निकलने की कोशिश बहुत अच्छी लगी!


शैलेंद्र चौबेपुर के हैं। यहां मर्यादी वस्त्रालय के बेसमेंट में दुकान खोली है। मनिहारी, जनरल सामान, प्रसाधन और जूते चप्पल – ये सब रखा है दुकान में। पहले नजर में इस सब चीजों की एक दुकान का कॉन्सेप्ट समझ नहीं आता। पर शैलेंद्र से बात करने पर लगा कि, बाभन होने के बावजूद उन्हें समझ है दुकानदारी की।

ऊपर मर्यादी स्टोर में लोग शादी के कपड़े खरीदते हैं। दुल्हा-दुल्हिन का शादी की पोषाक भी मिलती है वहां। वह खरीदने के बाद ग्राहक टिकुली-बिंदी-प्रसाधन-जूता आदि की दुकान का रुख करते होंगे। उस ग्राहकी का दोहन शैलेंद्र अपनी दुकान में बखूबी कर पायेंगे। कस्बाई स्तर पर यह कॉम्प्लीमेण्ट्री थीम की दुकान खोलने का आईडिया अच्छा लगा। शैलेंद्र (कामना है) की दुकानदारी के व्यवसाय में कई मुकाम तय करेंगे।

“दुकान खोलने के लिये मेरे पास कटका पड़ाव (अपने गांव) का विकल्प था। पर वहां इतने और हर दिशा से आने वाले ग्राहक नहीं मिलते। यहां ग्राहक दो-तीन दिशाओं से मिल जायेंगे। दूसरे, ऊपर के वस्त्रालय वाले खरीदने आने वाले ग्राहक तो हैं ही।”

शैलेंद्र के व्यवहार के कारण मैंने जहां सौ-सवा सौ रुपये की खरीददारी करनी थी, जब वहां से निकला तो पांच सौ की खरीददारी कर चुका था।

जातिगत व्यवसाय के बदलाव मुझे आकर्षित करते हैं। ब्राह्मण-क्षत्रिय की नयी पीढ़ी के पास नौकरियां नहीं हैं। माँ-बाप इंजीनियरिंग/मैडीकल/सिविल सर्विसेज की कोचिंग के लिये अपनी औकात के बाहर खर्च कर अपने बच्चे को ट्यूशन करवाते हैं। अधिकांश मामलों में बच्चा चार पांच साल वह लीप पोत कर क्लर्की, थानेदारी, या चपरासी की नौकरी के लिये आवेदन करता है। उसमें भी गजब की घूसखोरी चलती है। इन सब उपक्रमों के बावजूद एक बड़ी फौज – अनएम्प्लॉयड और अनएम्प्लॉयेबल – बनती जा रही है।

उस दर्दनाक और चरित्रहीन प्रक्रिया की सुरंग में घुसने की बजाय अगर शैलेंद्र चौबे जैसा नौजवान इस तरह की दुकान खोलता है और दुकान चलाने लायक पर्याप्त विनम्रता और व्यवसायिक काबलियत पाने की जद्दोजहद करता है तो उसकी प्रशंसा करनी ही चाहिये।

शैलेंद्र चौबे की दुकान पर दुगनी खरीद करना मुझे खल नहीं रहा। चलते चलते उसका धन्यवाद देना और दुकान पर आते रहने का अनुरोध करना अच्छा लगा। यह व्यवहार, जब उसकी दुकान चलने लगे और आगे और विकसित हो, तब भी कायम रहे; इसकी अपेक्षा करता हूं।

छोटे स्तर पर ही सही; एक सवर्ण नौजवान की सरकारी नौकरी की मरीचिका से पार निकलने की कोशिश बहुत अच्छी लगी!

शैलेंद्र चौबे की महराजगंज में नयी खुली दुकान

सतर्क रेल कर्मी, बसंत चाभीवाला

आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!


बसंत को मैंने कटका रेलवे स्टेशन के पास अपनी पोस्ट-रिटायरमेण्ट रिहायश बनाने के बाद सन 2016 के प्रारम्भ में पहली बार देखा था। सवेरे सवेरे वह कोहरे के मौसम में मफलर पहने चला जा रहा था अपने काम पर। इधर उधर ताकता-झांकता और ढीली पैण्डरोल क्लिप्स को अपने हथौड़े से कसता वह बढ़ रहा था। बहुत ही फोटोजीनिक दृष्य था वह। मैंने साइकिल खड़ी कर उसके कई चित्र, कई कोणों से लिये थे। उसका चित्र इतना पसंद आया था कि कई साल तक बसंत मेरे फेसबुक के कवर पर बना रहा। उसके मफलर पहने चित्र को देख कर बहुत सी टिप्पणियों में उसे अरविंद केजरीवाल कहा गया। यद्यपि बाद में लिये उसके चित्रों में वह मुझे नाना पाटेकर जैसा लगा! 😆

उस समय को बीते साढ़े चार साल हो गये। बीच में कई बार अपनी बीट में काम करता दिखा बसंत। हर बार मैंने एक दो चित्र लिये उसके। कालांतर में वह दिखना बंद हो गया। मैंने सोचा कि शायद कहीं तबादला हो गया हो उसका। पर हाल ही में वह पुन: दिखा। तेईस नम्बर रेल फाटक की गुमटी पर खड़ा था। बताया कि गेटमैन टॉयलेट में है। बाहर निकले तो उसके हस्ताक्षर अपनी डायरी में ले कर आगे बढ़े।

उसकी बीट कटका स्टेशन के पूरब में एक किलोमीटर पहले से प्रारम्भ हो कर पश्चिम में माधोसिंघ की ओर चार किलोमीटर जाती है। आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!

बसंत गेटमैन के इंतजार में रुका था और मैं बसंत से बात करने के लिये। उससे पूछने पर पता चला कि वह यहीं रहता रहा है सालों से। मुझे बीच में नहीं दिखा तो वह मात्र संयोग था। अकेला रहता है कटका स्टेशन पर बने क्वाटर में। रहने वाला रांची का है। मैने बात करने के लिहाज से उसे बताया कि मेरी बिटिया वहीं बोकारो में रहती है। उसने कहा – “बहुत अच्छा है झारखण्ड! यह तो यहां के लोग हैं जो जानते नहीं वहां के बारे में। कहते हैं कि पिछड़ा इलाका है, जंगल है। कभी इन लोगों ने देखा नहीं है।”

दो दिन बाद सवेरे छ बजे यूंही मुझे लगा कि साइकिल सैर के दौरान बसंत से मिला जाये। यह सोचा कि अपनी ड्यूटी पर वह निकलने वाला होगा। या शायद निकल गया हो। मैंने साइकिल कटका स्टेशन पर खड़ी की। स्टेशन मास्टर साहब से पूछा तो उन्होने बताया कि अभी वह स्टेशन पर तो नहीं आया। स्टेशन का सफाईवाला साथ में मुझे उसका घर दिखाने ले गया।

बसंत की कॉलोनी का रास्ता। एक बार लगा कि लौट चला जाये। कुछ उपेक्षित सा है यह इलाका।

क्वाटर पर लखंदर (सफाईवाला) ने आवाज लगाई पर बसंत का कोई उत्तर नहीं मिला। उसने अंदर जा कर बसंत को जगाया। बसंत का रेस्ट था और वह सो रहा था। थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया। उसे यह अंदाज नहीं था कि कोई पुराना विभागाध्यक्ष उसे ढ़ूंढता उसके क्वार्टर पर आयेगा।

बसंत -थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया।

जब आप किसी के बारे में लिखना चाहते हैं तो अपने रुतबे या ईगो को दरकिनार कर चलते हैं। मैं वही कर रहा था। वैसे भी रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारी और अधिकारी पासंग में होते हैं। कोई आपको इज्जत दे या लिहाज करे तो यह आपका सौभाग्य। अन्यथा, एक ब्लॉगर को उसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये।

मैंने बसंत का मोबाइल नम्बर लिया। उसपर घण्टी दी तो पता चला कि उसकी बैटरी डिस्चार्ज्ड है। एक की-मैन के लिये मोबाइल की अहमियत ऑफ ड्यूटी और रेस्ट पर होने के दौरान कुछ खास नहीं होती।

अगले दिन सवेरे उसके पेट्रोल ड्यूटी पर निकलते समय मैं कटका स्टेशन पर ही उससे मिला। वह वर्दी पहने अपने उपकरणों से लैस था। मैंने पूछा कि पटरियों की दशा कैसी है?

“ठीक ही है। पण्डराल (पैण्डरोल क्लिप – pandrol clips) कसने पड़ते हैं। वैसे पिछले दो तीन साल में दो बार मैंने टूटी पटरी देख गाड़ी रुकवाई है।” – बसंत ने जवाब दिया। उसने बताया कि वह म्यूचुअल ट्रांसफर की कोशिश कर रहा है रांची जाने के लिये। मुझसे अनुरोध किया कि मैं एडीईएन साहब को कह दूं कि उसका अप्रूवल दे दें। मैंने उसे अपने केस के कागज की प्रति ले कर घर पर अगले दिन मिलने को कहा। पर वह आया नहीं। शायद झिझक के कारण या शायद यह समझ कर कि कुछ करा पाना मेरे प्रभाव क्षेत्र में नहीं होगा। रिटायर्ड आदमी इस तरह के बहुत से “शायद” की कल्पना कर लेता है और उन्हे बुनता रहता है! 😆

वह रेल की पटरियां देखता आगे बढ़ने लगा। एक जगह तीन चार चाभियां कसीं। एक पैण्डरोल क्लिप छिटक कर गिरी हुई थी, उसे लगा कर हथौड़े से ठोंका। वहीं से मुझे बोला – यहां जर्क लगता है। पण्डराल बहुत ढीले होते हैं यहां।

एक कुशल चाभी वाला अपने ट्रेक के चप्पे चप्पे से परिचित होता है। कहां पैकिंग लूज है, कहां गिट्टी में मिट्टी ज्यादा है। कहां रेल में नुक्स है – विजुअल परीक्षण से उसे बहुत कुछ पता रहता है। बसंत वैसा ही रेल कर्मी लगा।

वह अपने पेट्रोलिंग में काम करता आगे बढ़ता गया। मैंने अपनी साइकिल संभाली गंगा किनारे जाने के लिये। यह सोचा था कि अगले दिन वह मुझसे मिलेगा तो उसके यहां अकेले रहने और झारखण्ड में उसके परिवार के बारे में पता करूंगा। पर वह आया नहीं। वैसे भी आगामी महीनों में उसका म्यूचुअल ट्रांसफर अगर हो गया तो वह चला ही जायेगा अपने देस।

इस सर्दी के मौसम में मैं रेलवे के कर्मियों से मिल कर उनके बारे में जानना/लिखना चाहता हूं। इससे मेरी पुरानी यादें भी उभर कर आयेंगी और रेल का सम्पर्क जो पिछले तीन साल से जो लगभग शून्य है; रिवाइव हो सकेगा। पर देखता हूं कि वह सब करने के लिये अपने अतीत के रुतबे के बहुत से मानसिक अवरोध साफ करने होंगे। किसी सामान्य ग्रामीण से मिलना, बोलना बतियाना और उसकी झोंपड़ी में उसकी खाट पर बैठना सरल है; रेल के किसी अमले से वैसी आत्मीयता सहज स्थापित करना कठिन है। बसंत के मामले में, बहुत प्रयास के बावजूद मैं आधा अधूरा ही सफल हो पाया।

पर यह सफलता भी बुरी नहीं! कोशिश करते रहो, जीडी!


श्री वी.के. पंजियार, मरेप्र, वाराणसी रेल मण्डल

लम्बे अर्से तक रेल से दूर रहा। पिछले तीन साल से मैंने कोई पास नहीं लिया, कोई रेल यात्रा नहीं की। पर पिछले सप्ताह वाराणसी के मण्डल रेल प्रबंधक श्री वी.के. पंजियार जी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अगले छ महीने के दौरान (जब मौसम बाहर निकलने, मिलने जुलने के लिये मुफीद रहता है) मुझे 20-25 रेल कर्मियों से मिलने और उनपर ब्लॉग पोस्टें लिखने के लिये सामग्री एकत्र करने की सहायता करें। डीआरएम साहब ने उपयुक्त सहायता का आश्वासन दिया। आज एडीआरएम प्रवीण कुमार जी से भी सम्पर्क हुआ। अब लगता है रेल-कर्मियों पर नियमित ब्लॉग लिखना हो सकेगा। … रेल का सम्पर्क फिर जुड़ेगा। एक अलग प्रकार से!



राजेश की गुमटी और गांव के सामाजिक-आर्थिक बदलाव

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है।


मेरे गांव के लिये जो सड़क नेशनल हाईवे 19 की सर्विस रोड से निकलती है; उसके मुहाने पर दो गुमटियाँ लग गयी हैं। उनमें से एक गुमटी किलनी की है। दूसरी राजेश की। राजेश के बारे में बताया गया कि वह बम्बई रिटर्न्ड है। वहां मिठाई की दुकान पर कुशल कारीगर था। यहां कोरोना संक्रमण के पहले ही आ गया था; इसलिये उसके बम्बई से रीवर्स पलायन की वजह कुछ और होगी।

राजेश, अपनी गुमटी में समोसे बनाता हुआ

उस रोज राजेश अपनी गुमटी में जलेबियां निकाल चुका था। समोसे का मसाला बनाने के बाद उसे मैदे के कोन में भर कर तलने ही जा रहा था कि मैं वहां से गुजरा। मैंने पूछा -कितने में मिलेंगे कच्चे समोसे?

राजेश ने बताया कि तैयार समोसे छ रुपये जोड़ा बिकते हैं। कच्चे वह पांच रुपये जोड़ा दे देगा। मैंने एक दर्जन खरीदे।

राजेश ब्राह्मण है। राजेश दुबे।

इस गांव में ब्राह्मण विपन्नता में हैं। पर वे अपनी जातिगत ऐंंठ के कारण गुमटी लगाने, समोसा चाय बेचने जैसे काम में नहीं लगे हैं। महिलायें दरिद्रता में जीवन निभा रही हैं पर घर के बाहर और खेतों पर काम करने नहीं निकल रहीं। कथित नीची जाति की महिलायें और पुरुष, जो भी काम मिल रहा है, कर रहे हैं। उनके पास जमीनें नहीं हैं, फिर भी वे अपेक्षाकृत ठीक आर्थिक दशा में हैं।

मैं राजेश को इस बात के लिये अच्छा समझता हूं कि उसने इस छद्म सवर्ण बैरियर को तोड़ कर चाय-समोसे की दुकान तो खोली है।

उसकी गुमटी वाली दुकान के सामने मैंने अपनी साइकिल रोक कर कुछ न कुछ लेना प्रारम्भ किया है। कभी कच्चे समोसे, कभी जलेबी और कभी (अपनी पसंद से बनवाये) कम चीनी वाले पेड़े। अभी तीन किलो बूंदी के लड्डू भी खरीदे। मेरी पत्नीजी भी स्वीकार करती हैं कि राजेश के काम में हुनर है। उसके पास पूंजी होती और मौके पर दुकान तो अच्छी चल सकती थी। पर गांव में हाईवे से सटी गुमटी भी एक सही जगह बन सकती है भविष्य में। अगले पांच साल में, अगर विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध नहीं हुई तो यह गांव एक क्वासी-अर्बन सेटिंग हो जायेगा। तब राजेश की यह गुमटी एक ठीकठाक मिठाई की दुकान या रेस्तरॉ का रूप ले सकती है। अगले पांच साल का अवलोकन करना रोचक होगा…

राजेश नियमित नहीं था अपनी गुमटी खोलने में। एक दिन पूछा कि गुमटी रोज क्यों नहीं खुलती? बताया कि बच्चे को फोड़ा हो गया था, उसके साथ बुखार। सो डाक्टर के पास ले जाने के कारण दुकान बंद रही।

राजेश की बिक्री कम होने का एक कारण यह भी है कि यदा कदा उसकी गुमटी बंद रहती है। दुकान नियमित न होने से ग्राहक छिटक जाते हैं।

मैं जानता हूं कि उसका बताया यह कारण न सही है और न पर्याप्त। पर उसको “मोटीवेट” करने के लिये उसकी दुकान पर रुकने और उससे सामान लेने का जो उपक्रम मैंने किया है – उसके बाद देख रहा हूं कि दुकान नियमित खुल रही है।

उसका बेटा, आदर्श भी साथ में बैठता है दुकान पर। छठवीं क्लास में पढ़ता है। आजकल स्कूल नहीं चल रहे। वह सामान तोलता है और गल्ले से पैसे का लेन देन भी जानता है। मेरे घर सामान देने भी वही आया था। मॉपेड चला लेता है।

राजेश की गुमटी। गल्ले पर बैठा उसका लड़का आदर्श। राजेश समोसे के लिये मैदा गूंथ रहा है।

दो पीढी में बहुत बदला है गांव। राजेश के बाबा या उसके पहले के लोग (छोटी जमीन की होल्डिंग के ही सही) किसान होते रहे होंगे। उसके बाद लोग महानगरों को पलायन किये। अधिकांश ड्राइवर बने – उनके पास पूरे देश में घूमने और ट्रक चलाने की कथायें हैं। ड्राइवर बनने के साथ उन्होने देश तो देखा, पर ट्रक चालक के दुर्गुण भी गांव-समाज में वे लाये। राजेश मुम्बई में मिठाई की दुकान पर रहा तो उसके पास एक वैकल्पिक काम का हुनर है। बिजनेस करने का शऊर भी है। महानगरों के कुछ ऐब भी हैं। उसके कारण जो कमाया वह गंवा चुका है। पर अब एक नयी शुरुआत की सम्भावना बन रही है। अगर वह मेहनत से काम करे, तो अगले दशक में बदलती गांव की तस्वीर का एक प्रमुख पात्र बन सकता है।

राजेश में विनम्रता भी है। वह अदब से बात करता है। वह सफल हो सकता है। और मैं चाहता हूं कि वह सफल बने। वह गांव (सवर्णों) के जुआरी-गंजेड़ी और निकम्मे नौजवानों की भीड़ से अलग अपनी जमीन और पहचान बनाये। यह आसान नहीं है। पर यह सम्भव है। सवर्णता की वर्जनाओं का सलीब ढोते इन नौजवानों के पास कुछ खोने को नहीं है; सिवाय अपनी दकियानूसी वर्जनाओं के। उन्हें अपने खोल से निकल कर, छोटे पैमाने से ही सही, एक नयी पहल करनी चाहिये।

मेरे लिये राजेश उस आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन का सिपाही है। देखना है कि वह अपनी और अपने परिवेश की गलत आदतों और वर्जनाओं में फंस कर रह जाता है या परिवर्तन के नये आयाम तलाशता-बनाता है। एक पहल तो उसने की है।

उसकी सफलता की कामना करता हूं मैं।


राजन भाई की पोती के स्वास्थ्य के लिये नानी के नुस्खे

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।


सवेरे की चाय पर लगभग रोज रहते हैं राजन भाई। मेरे चचेरे भाई हैं। उम्र में मुझसे करीब छ साल बड़े। उनका घर रेलवे लाइन के उस पार अहाता में है। हमारे घर से करीब आधा किलोमीटर दूर। लॉकडाउन पीरियड में एक वही हैं, जो लगभग नियमित मिलते हैं। उनसे गांव की कई सूचनायें मिलती हैं। अन्यथा हम लोग शायद उतने सामाजिक नहीं हैं। 😆

सवेरे की चाय पर राजन भाई। राजेंद्र दुबे।

उनसे कई तरह की चर्चा होती है। आज वे थोड़ा परेशान थे। उनकी सात महीने की पोती की कुछ स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या है। उनसे बात करते समय मुझे बरबस अपनी नानी की याद हो आयी। जब मैं अपने तीन महीने के बेटे के साथ दिल्ली से बनारस उनके पास आयी थी। आने के पहले बेटा बीमार था और मेरे साथ उसके सामान की बड़ी सी गठरी थी। उसमें थे बदाम का तेल, जान्सन के उत्पादों का पूरा किट और अनेक दवाइयां।

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।

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