भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
द्वारिकापुर गांव में सड़क किनारे किसी यादव जी का घर है. उसकी दीवार पर यह व्यक्ति शिव जी का चित्र उकेर रहा था. उसे देख मुझे प्रयागराज के पेंट माई सिटी अभियान की याद हो आई. यह कलाकार भी उसी स्तर का पेंट कर रहा था. मैंने सवेरे के अपने भ्रमण की साइकिल यात्रा को वहीं पॉज दिया.
द्वारिकापुर में सड़क किनारे घर की दीवार पर चित्र उकेरता कलाकार
कलाकार ने बताया कि कल काम शुरू किया था, पर “बूँदिया पड़ई लागि”. बारिश होने से कल काम रोक दिया था. आज सवेरे ही काम चालू कर दिया है. उम्मीद है आठ घंटे मैं, दिन भर में पूरा कर लेगा.
रामधारी सीनियर हैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर की केन्टीन में और संजय शुक्ला कुक हैं. उन दोनों की टीम 50 बिस्तर के इस अस्पताल के मरीजों, डाक्टरों और कर्मचारियों को भोजन देती है.
हमारा घर अस्पताल से पास में है – 10 किलोमीटर दूर. अस्पताल में हमारे लिए भोजन घर से ही आता है. फिर भी एक दो बार हमने कैंटीन का इस्तेमाल किया. और हमें सरप्राइज मिला. खाना अपेक्षा से ज्यादा घरेलू था और सुस्वादु भी. यह भी लगा कि उसका स्वाद मसालों के प्रयोग से नहीं, अन्न और सब्जियों की गुणवत्ता तथा बनाने वाले की कार्य कुशलता से उपजा है.
मेरी पत्नीजी ने कहा – खाना बनाने वाले के हाथ में स्वाद है.
केन्टीन के रसोईया, संजय शुक्ल
केन्टीन में नाश्ते और खाने की लिस्ट में उत्तर और दक्षिण भारतीय व्यंजनों की लिस्ट टंगी है. संजय ने बताया कि वह सब उपलब्ध कराने की योजना है. पर अभी मांग कम होने के कारण नाश्ते में केवल पूरी सब्जी और खाने में दाल चावल रोटी सब्जी बनता है.
“समोसा का इंतजाम करें और दिन भर में एक ही ग्राहक समोसे का मिले तो बहुत सामग्री बर्बाद होगी. इसलिए कुछ समय और देख कर आइटम बढ़ायेंगे.” – संजय ने बताया.
संजय कुक हैं और रामधारी यादव केन्टीन के कर्ता धर्ता. रामधारी घूम घूम कर ऑर्डर भी लेते हैं, लोगों को बताते भी हैं कि कैसे और कितने का काउंटर पर कूपन लेना है. रामधारी टफ लगते हैं, पर हैं रोचक व्यक्ति. मैं उनके पास 4 लंच का ऑर्डर देने गया. हम पति पत्नी यदा कदा एक लंच टिफिन लेते थे. उसमें दोनों के लिए पर्याप्त भोजन होता है. चार लंच के बारे में मैंने कहा कि पिताजी को देखने के लिए लोग आ रहे हैं, उनको भोजन करना है.
सूर्या ट्रॉमा सेंटर की केन्टीन के कर्ता धर्ता – रामधारी यादव
रामधारी ने इसपर एक किस्सा सुनाया. एक आदमी पेड़ से गिर गया तो टांग टूट गई. अस्पताल में भर्ती किया गया. ऑपरेशन कर हड्डी जोड़ी गई. प्लास्टर लगा. चूंकि उसे गाँव देहात में बहुत लोग जानते थे, बहुत से लोग अस्पताल देखने आने लगे. उनके चाय पानी पर खर्चा होने लगा. कुछ देखने वाले दूर से आते थे और उन्हें भोजन भी कराना होता था. एक दो दूर वाले दो तीन रोज रुक भी जाते थे.
एक देखने आने वाले ने पूछा – चच्चा, टांग कब टूटी?
मरीज ने जवाब दिया. “टांग पहले नहीं टूटी थी. टांगतो (यहां देखने आने वालों की आवभगत में) अब टूट गई है.” :lol:
मुझे लगता है कि आपके और रामधारी के पास अगर बातचीत करने का समय हो तो रामधारी की रोचक बातें आपको बाँध सकती है.
केन्टीन का भोजन कक्ष
केन्टीन में बैठने की व्यवस्था है. जो लोग कमरों या वार्ड में भोजन करना चाहते हैं, उनके लिए तीन खाने वाले मिल्टन के इनस्युलेटेड टिफिन बॉक्स भी उपलब्ध हैं. दिन में दो बार रामधारी घूम घूम कर लोगों को चाय पिला देते हैं. अस्पताल में हर कोई उन्हें यादव जी के नाम से जानता, संबोधित करता है.
कुल मिला कर अच्छी और सस्ती सुविधा कही जाएगी यह कैंटीन और उसके अच्छे और जानदार घटक हैं संजय और यादव जी.
कमरों और वार्ड में दिया जाने वाला भोजन इन टिफिन डिब्बों में होता है.
हम लोग पिताजी को लेकर पुनः अस्पताल (Surya Trauma Center and Hospital) में हैं. छ दिन हुए जब वे यहां से डिस्चार्ज हुए थे. कल उन्हें रूटीन चेक अप के लिए लाए. हालत अच्छी तो नहीं थी. लगभग सेमी – कोमा (यह शायद नॉन तकनीकी शब्द है) की दशा.
चेक अप में उन्हें पुनः संक्रमण ग्रस्त पाया गया. डाक्टर साहब ने कहा कि उम्र और संभावना के चलते दो विकल्प हैं. ओरल दवायें घर पर देते हुए चलाना या पुनः अस्पताल में रखना. दोनों दशा में मिरेकल (miracle) की अपेक्षा करना निहित है. हम ने अस्पताल की शरण बेहतर समझी.
एमरजेंसी वार्ड में दो-तीन रेजिडेंट डाक्टर हैं. पिछले बार से उनके चेहरे पहचान में हैं. उनसे बातचीत बहुत ज्यादा नहीं हुई थी. पर उनकी दक्षता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता (commitment) प्रभावित करती थी.
कल उनमें से एक, आलोक जी से मैंने यूं ही पूछ लिया – आप लोग इस जगह इतनी लंबी ड्यूटी करते हैं. तरह-तरह के मरीज और उनके तरह-तरह की व्याधियों और तकलीफ़ों से पाला पड़ता है. इस दशा में अपना सेंस ऑफ ह्यूमर कायम रख पाते हैं?
आलोक जी ने बहुत सोच कर उत्तर दिया – “लोगों की दशा असर तो करती है (कम से कम मेरी) सोच पर. कई बार लगता है कि (इतने कष्टों के साथ) जिंदगी है किस लिए? अपने को मरीजों की दशा में रख कर भी विचार आते हैं…”
फिर जो आलोक जी ने कहा, वह मोटे तौर पर जिंदगी के बड़े ध्येय, और अपनी लीगेसी (legacy, अपनी थाती) की बात लगती है. बोले – “लगता है, कुछ ऐसा करें जो लोगों की खुशी में बढ़ोतरी करे.”
वे अपने को लोगों की खुशी के लिए लगाने की बात कहते हैं. यह बड़ी नोबल और पवित्र सोच है. सामन्यतः लोग इस स्तर पर नहीं सोचते, बोलते, बतियाते.
कुछ समय बाद अपने-आप वे मेरे पास आ कर बोले -” आप शायद जानना चाहें शिव ब्रत लाल बर्मन जी (1860-1939) के बारे में. यहां से 22 किलोमीटर दूर उनका स्थान है. उन्होंने भी इसी प्रकार के विषयों पर लिखा, कहा है.”
वहीं एमरजेंसी वार्ड में खड़े खड़े मैंने शिव व्रत लाल जी को सर्च किया. पाया कि राधा स्वामी सम्प्रदाय के संत थे वे. महर्षि जी के नाम से विख्यात. उनकी अनेक पुस्तकों की लिस्ट है विकीपीडिया पर.
नेट पर उपलब्ध सामग्री के अनुसार शिव व्रत लाल वर्मन जी ने ऐसे विषयों पर लगभग 3000 किताबें/पुस्तिकायें लिखी हैं. राधा स्वामी मत के वे वेदव्यास के रूप में विख्यात हैं. इसी इलाके (भदोही) के व्यक्ति थे वे.
डा. आलोक जी से बात होने पर लगा कि जैसा श्मशान वैराग्य होता है, उसी तरह एक वैराग्य एमरजेंसी वार्ड का भी होता है. सेंसिटिव लोग (और डाक्टर भी) उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते.
अस्पताल का गहन चिकित्सा कक्ष – कभी आप वहाँ जाएं किसी मरीज की तीमारदारी में – तो कुछ समय के लिए उस वैराग्य को देखने, सूंघने और महसूस करने का प्रयास कीजिएगा. व्यक्तित्व को कुछ बेहतर ही बनाएगा वह. आलोक जी से यह छोटी सी बातचीत आश्चर्य जनक भी लगी और अच्छी भी!
डा. आलोक, इमर्जेंसी वार्ड में मेरे पिताजी को पुनः भर्ती करते समय