द्वारिका और परवल का जवा


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परवल के जवा के गठ्ठरों के साथ द्वारिका

पचेवरा के घाट पर प्रतीक्षा करने वालोँ के लिये चबूतरा है। दाह संस्कार करने आये लोग और मोटर बोट पकड़ कर उस पार मिर्जापुर जाने वाले यहाँ इंतजार करते हैँ। मैँ सवेरे वहां तक चक्कर लगाता हूं। कुछ देर सुस्ताने के लिये उस चबूतरे पर बैठता हूं। वहां से गंगा की धारा भी दिखती है और सड़क भी।

अचानक दो आदमी घाट से आते हैं और पास में पड़े हरे डंठल के गठ्ठर उठाने लगते हैँ। ऐसा गठ्ठर मैने पहले कभी नहीँ देखा। उनसे पूछता हूं – क्या है यह?
“परवल। परवल का जवा।” सफेद कमीज पहने एक व्यक्ति बताता है। दोनोँ एक एक गठ्ठर उठा कर चले जाते हैं घाट पर। फिर भी तीन गठ्ठर बचे रहते हैं वहां जमीन पर। मुझे यकीन हो जाता है कि मेरे प्रश्नोँ का उत्तर देने के लिये वे फिर आयेंगे ही; वर्ना मैं उनके पीछे पीछे घाट तक जाता।

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उनकी वापसी में उनसे और जानकारी लेता हूँ। गंगा उस पार वे परवल की खेती करते हैं। यह गठ्ठर वाली वनस्पति परवल के तने हैं। परवल की पौध बनती है इनसे।

कहाँ से ला रहे हैं ये परवल का जवा?

गाजीपुर से।

इतनी दूर से। आसपास नहीँ मिलता क्या?

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पता चला कि वे गाजीपुर के ही रहने वाले हैं वहां उनके परवल के खेत हैं। यहां गंगापार मिर्जापुर में भी परवल की खेती करते हैं। यहां उनकी जमीन नहीं है। पट्टे पर ली है जमीन। छ हजार रुपया बीघा सालाना की लीज। करीब 40 बीघा जमीन है। 7-8 लोग साझे में परवल की खेती करते हैं। गाजीपुर में अपने ही खेत से ले कर आ रहे हैं परवल का जवा। गंगा की रेती में परवल की खेती नहीं होती। उसके आगे मिट्टी के खेत हैं। उनको लीज पर ले कर उनमें पर वल उगाते हैं। पानी बहुत मांगती है परवल की फसल, सो अपने ही पैसे से उन्होने बोरवेल लगाया है। खेती के लिये पर्याप्त पूंजी खर्च की है इन लोगों ने।

वहां गाजीपुर में ही नहीं ली जमीन खेती के लिये?

लाल टीशर्ट वाले व्यक्ति ने बताया – वहां भी अच्छी खेती है। पर परिवार बड़ा हो गया तो कुछ लोगों को बाहर निकलना ही था।  

लोग गाजीपुर/बलिया से आजीविका की तलाश में बम्बई, अहमदाबाद या बंगलोर जाते हैं। इनका आजीविका का मिर्जापुर आने का उद्यमी मॉडल बहुत रोचक लगा मुझे। शायद ये मार्केट के पास खेती कर बेहतर दाम पाते होंगे अपनी फसल का।

लाल टीशर्ट वाला तब तक अंतिम गठ्ठर उठा कर जाने लगा था। मन में प्रश्न बहुत थे पर उनको वहीं विराम दिया मैने।

कौन कहता है कि धुर गाजीपुरी/बलियाटिक लोग आंत्रेपिन्योर नहीं है?! पांच सात मिनट के इस वार्तालाप में पूर्वांचल के प्रति इज्जत बढ़ गयी मेरे मन में।

जाते जाते लाल टीशर्ट वाले से नाम पूछा मैने। बताया – द्वारिका।

आगे पत नहीं कभी मिलना होगा या नहीं द्वारिका से। पर छोटी सी मुलाकात मुझे बहुत कुछ बता गयी। शायद आपको भी, इस माध्यम से! :-)

 

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अंतिम गठ्ठर ले कर गंगा तट पर जाते द्वारिका। अलविदा।

झिनकू


झिनकू

झिनकू औराई के आगे फुटपाथ पर रहता है। कुल 5-7 परिवार हैं बांस की दऊरी, बेना आदि बनाने वालों के। आजमगढ़ के रहने वाले हैं ये। अपने गांव पांच साल में एक बार जाते हैं – तब जब प्रधानी का चुनाव होता है। जिसे वोट लेना होता है, वही ले कर जाता है। वही खर्चा देता है।

यहीं रहते हैं तो तय है कि अपनी मेहनत से कमाते होंगे। कोई जरायम पेशा नहीं|

मैंने उसे एक चेंगारी – बड़े कटोरे बराबर की दऊरी बनाने का ऑर्डर दिया। 100रू में एक। चेंगारी बनाई तो अच्छी पर कुछ बड़े आकार की। मन माफिक आकार की होती तो और बनवाता। न होने पर रिपीट ऑर्डर नहीं दिया।

मन था कि धईकारो के इस कौशल को अमेजन पर एक व्यवसाय का रूप दूँ। वह तालमेल झिनकू से न हो पाया।
कोई और झिनकू मिलेगा फिर कभी। फिर कहीं।

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डा. दुर्गातोष पाण्डेय की रचनाधर्मिता पर विचार


Durgatoshडा. दुर्गातोष पाण्डेय ऑन्कॉलॉजिस्ट हैं। केंसर विशेषज्ञ। भारत के अन्यतम केंसर विशेषज्ञों में अग्रणी। उम्र लगभग 44 साल। गूगल सर्च करने पर उनके विषय में शब्द उभरते हैं – बेस्ट ऑन्कॉलॉजिस्ट ऑफ़ इण्डिया। गूगल पर उनके विषय में 19 रिव्यू हैं और सब पॉजिटिव! रेटिंग 4.9/5 है। लगभग यही रेटिंग उनके फ़ेसबुक पेज पर है।

मुझे लगा कि यह व्यक्ति तो केंसर के फील्ड में ही घूमता होगा। सोते जागते उसे केंसर की बलात म्यूटेट करती सेल्स ही नजर आती होंगी। बातचीत में भी उसी फ़ील्ड की भारी भरकम टर्मिनॉलॉजी से लोगों को आतंकित करता होगा।

अपने लड़के की ब्रेन इंजरी के चक्कर में अनेकानेक न्यूरोसर्जन्स से पाला पड़ा है मेरा। उनमें से अधिकांश (तीन अन्यतम व्यक्तियों को छोड़) अपने क्षेत्र की विशेषज्ञता के केकून में बंधे नजर आये। अत: विशेषज्ञ डा्क्टरों के प्रति मन में कोई बहुत अच्छी धारणा नहीं है मेरी।

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डा. दुर्गातोष पाण्डेय

जब डाक्टर पाण्डेय से मिलने का योग बना तो यही विचार मन में था। उनके बारे में नेट पर जो सामग्री छानी, उसमें एक बात ने ध्यान आकर्षित किया – दुर्गातोष जी ने एक पुस्तक लिखी है। अ पीप इनटू वॉइड (A Peep into Void)| यह केंसर विषयक नहीं है। क्वाण्टम थियरी, यूनिफ़ाइड फील्ड थियरी, काल, अनन्तता, पदार्थ और ऊर्जा के आपसी सम्बन्ध, दर्शन, भौतिकी, गणित और तर्कशास्त्र के इलाके की पुस्तक है। 

अजीब लगा मुझे। अपने अतीत के बारे में कई बातें मुझे याद हो आयीं। याद आये अपने गणित के डीन डा. विश्वनाथ कृष्णमूर्ति। जो हमें ललचाते रहे कि अपनी इन्जीनियरिंग की पढ़ाई की बजाय गणित पकड़ें और जीवन में फील्ड मेडल पाने का सपना पालें। याद आये बायोलॉजी के प्रोफेसर दासगुप्ता जिन्होंने कोशिका के म्यूटेट होते समय धनात्मक आयन के एकाएक 180 अंश पलट कर जाने की बात कही थी और मैं दो दिन अपने द्वितीय वर्ष की भौतिकी/गणित के सहारे उसकी थ्योरी रचने की कोशिश करता रहा। अन्तत: जो बनना था, वही बना। रेल परिचालन का प्रबन्धक – जिसमें दसवीं दर्जा से ज्यादा की पढ़ाई की जरूरत नहीं होती। पर अपने कार्य के क्षेत्र से इतर कुछ कर दिखाने की एक ललक जो मन में होती है – और जिस ललक के कारण डा. दुर्गातोष पाण्डेय ने यह पुस्तक लिखी होगी – उस मनस्थिति को बखूबी जानता हूं मैं।

खैर, डा. दुर्गातोष तो यूनीफ़ाइड फील्ड थ्योरी के क्षेत्र में न जाने पर भी एक अन्यतम विषय के अन्यतम विशेषज्ञ बन गये। लिहाजा उनके मन में कोई मलाल तो नहीं ही होगा कि गणितज्ञ/दार्शनिक/तर्कशास्त्री/भौतिक-विज्ञानी या उप्निषदिक जगत के विद्वान नहीं बने। और जो उनसे मिल कर मुझे लगा – वे अन्यतम इन्सान अवश्य हैं।

PeepInToVoidउनकी पुस्तक A Peep into Void नुक पर तो है, पर अमेजन किंडल पर नहीं। अमेजन से पेपरबैक में इस लिये नहीं खरीदी कि जाने कितने दिन बाद मिलेगी और गांव के पते पर कहीं डिलिवर होने की बजाय वापस न चली जाये। मैने डा. दुर्गातोष से अनुरोध अवश्य किया है कि उसे किण्डल पर उपलब्ध कराने के लिये अपने पब्लिशर को कहें। देखें, क्या होता है।

वैसे उनका विषय मेरे लिये बहुत रोचक है। डॉन ब्राउन का उपन्यास – एंजल्स एण्ड डेमोन्स (Angels and Demons) अभी अभी खत्म किया है मैने जिसमें मैटर और एण्टीमैटर के योग से ऊर्जा बनने की अवधारणा से बहुत बढ़िया थ्रिलर बन गया है। मन में मैटर/एण्टीमैटर और ऊर्जा के योग संयोग घूम रहे हैं और उस में डा. पाण्डेय की पुस्तक पर छपा सर्प युग्म (सर्प, जो एक दूसरे को खा कर पूरी तरह समाप्त हो जायेंगे। दोनों में से कोई नहीं बचेगा!)

डा. दुर्गातोष से मिल कर एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगी, वह उनकी सहजता और उनकी सामान्य व्यक्ति/मरीज से सम्प्रेषण की खूबी थी। हिन्दी में अपने मरीजों से बात करते हुये जबरी विषेषज्ञता के भारी भरकम शब्द ठेल कर उन्हे आतंकित नहीं कर रहे थे। अन्यथा, विकास दुबे जैसा मेरा ब्रदर-इन-लॉ, जो ऑपरेशन के नाम से वैसे ही घबरा रहा था और नम आंखों वाली उसकी पत्नी निधि कभी भी सहज न हो पाते। अपनी पुस्तक के प्रारम्भ में उन्होने अपने को हम्बल केंसर सर्जन कहा है। यही विनम्रता उनकी यू.एस.पी. है! Intro

डा. दुर्गातोष ने  कभी अपने (बतौर ऑन्कॉलॉजिस्ट) मानवीय अनुभवों पर कोई पुस्तक लिखी तो मैं समझता हूं कि बहुत सशक्त पुस्तक होगी वह! और 44 साल की उम्र तथा 12 साल बतौर विशेषज्ञ अनुभव के आधार पर वह पुस्तक जरूर लिखी जा सकती है! इस बीच इस पुस्तक – अ पीप एनटू वॉइड पढ़ने की इच्छा रखता हूं।

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