पूर्वोत्तर रेलवे के ब्राण्ड-अम्बेसडर


पूर्वोत्तर रेलवे के ब्राण्ड अम्बेसडर श्री कन्हैयालाल गुप्ता। यूनियन नेता। उम्र 98 साल।
पूर्वोत्तर रेलवे के ब्राण्ड अम्बेसडर श्री कन्हैयालाल गुप्ता। यूनियन नेता। उम्र 98 साल।

वे वृद्ध नेता हैं पूर्वोत्तर रेलवे की मजदूर यूनियन के। रेल का उपभोक्ता पखवाड़ा मनाने का समय था। अनेकानेक कार्यक्रम हुये। रेलवे की मान्यताप्राप्त यूनियनों के नेताओं को; सन्देश कर्मचारियों और जनता तक फैलाने के लिये; ब्राण्ड-अम्बेसडर घोषित किया गया। उस आधार पर ये वयोवृद्ध नेता – श्री कन्हैयालाल गुप्ता – पूर्वोत्तर रेलवे के ब्राण्ड-अम्बेसडर थे।

पखवाड़े के समापन समारोह में गुप्ता जी गोरखपुर स्टेशन परिसर में वृक्ष लगा रहे थे। मैने उनका चित्र लिया। जब वे पौधे को रोप कर पानी पिला चुके, तब मैने उनकी उम्र और उनकी ऊर्जा का रहस्य पूछा। दोनो प्रश्न वे हंस कर टाल गये।

वृक्षारोपण करते श्री कन्हैयालाल गुप्ता
वृक्षारोपण करते श्री कन्हैयालाल गुप्ता

मैने गुप्ता जी को छोड़ा नहीं। ट्री-प्लाण्टेशन के बाद हम लोग रेलवे स्टेशन के यात्री लॉंज में बैठे थे। गुप्ता जी मुझसे थोड़ी दूर बैठे थे। मैं सयास उठ कर उनके पास गया और उनसे उनके बारे में पूछा।

गुप्ताजी, रेलवे की सेवा में आने के पहले सेना में हवलदार भर्ती हुये थे। एक रेंक प्रोमोशन भी पाये थे। उनके बाद आर्मी छोड़ कर कुछ समय एम्प्लॉयमेण्ट एक्स्चेंज में नौकरी किये और उसके बाद रेलवे की अकाउण्ट शाखा में जूनियर क्लर्क बन गये।

“कौन से सन में रेलवे ज्वाइन की थी?” मेरे यह पूछने पर गुप्ता जी ने हंस कर अपना सिर झटका। सम्भवत: मेरे प्रश्न का उत्तर वे टालना चाहते थे। पर फिर बताया – सन 1946 में।

सन 1946 – मैं चौक गया। ये शारीरिक और मानसिक रूप से चैतन्य, पूर्वोत्तर रेलवे की यूनियन में अपना दबदबा अभी भी कायम रखने वाले ये सज्जन श्री कन्हैयालाल गुप्ता आज से लगभग 70 साल पहले रेल सेवा में आये थे।

किसी ने मुझे उनकी उम्र 98 वर्ष बतायी थी और मैने उसपर यकीन नहीं किया था। पर अब गुप्ता जी स्वयम उस कथन की पुष्टि करते दिख रहे थे। मेरे मन मेंं गुप्ताजी के प्रति आदर में अचानक और वृद्धि हो गयी। पैराडाइम शिफ्ट।

मैने गुप्ता जी से उनकी दिन चर्या पूछी। वे सवेरे चार बजे उठते हैं। थोड़ा व्यायाम कर सवेरे सैर करते हैं। दिन भर यूनियन का काम करते थें। यूनियन और रेल कर्मचारी ही उनका मिशन हैं। पत्नी नहीं रहीं और बाल-बच्चों की विचारधारा से पीढ़ी का अंतर होने के कारण बहुत सामंजस्य नहीं बनता। अत: वे हैं और रेल कर्मचारी हैं, जो परस्पर गुंथे हैं। रात दस बजे सोते हैं। “नींद गहरी आती है। तब चाहे कोई नगाड़ा बजाये, टूटती नहीं।” 

सौ के आसपास की उम्र के गुप्ता जी। एक मिशन ले कर जीवन बिताते। अभी भी ऊर्जावान और सजग। आर्य और वैदिक साहित्य जिस “शतायु” की बात कहता होगा, वह गुप्ता जी साकार करते दिखे। … पूर्वोत्तर रेलवे ने एक प्रकार से सटीक ब्राण्ड अम्बेसडर चुना। पूर्वोत्तर रेलवे की तरह उम्रदराज, ऊर्जावान और अपने परिवेश पर सही प्रभाव डालने वाला।

अपने से चालीस-पचास साल कम उम्र के रेल कर्मचारियों को अपने किन गुणों से बांध कर रखते होंगे वे; कौन से उनके गुण अभी भी उन्हे यूनियन का शीर्षस्थ बनाये हुये हैं; यह जानने का मन है। आगे कभी उनके पास बैठा तो पूछूंगा। आपको भी बताऊंगा।

मैने श्री गुप्ता के पास बैठ कर उनसे उनके बारे में पूछना बेहतर समझा।
मैने श्री गुप्ता के पास बैठ कर उनसे उनके बारे में पूछना बेहतर समझा।

पलाश, सागौन और मध्यप्रदेश के आदिवासी


पवीण चन्द्र दुबे, चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट, उज्जैन सर्किल।
पवीण चन्द्र दुबे, चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट, उज्जैन सर्किल।

मैं प्रवीणचन्द्र दुबे जी से हाइब्रिड यूकलिप्टस और हाइब्रिड सागौन के प्लाण्टेशन के बारे में चर्चा करना चाहता था। प्रवीण जी मेरे सम्बन्धी हैं। उज्जैन सर्किल के मुख्य वन अधिकारी ( Chief Conservator of Forests) हैं। उससे भी अधिक; विद्वान और अत्यन्त सज्जन व्यक्ति हैं। उनकी विद्वता और सज्जनता मुझे सम्बन्धी होने से कहीं ज्यादा आकृष्ट करती है। अन्यथा कई सम्बन्धी हैं, जिन्हे दूर से ही पैलगी/नमस्कार से काम चलाना सुखद लगता है।

हम श्री रवीन्द्र पाण्डेय (मेरे समधी)  के पौत्र के यज्ञोपवीत संस्कार समारोह मे मिले। बालक संस्कार सम्पन्न होने के बाद सभी बड़े लोगों से भिक्षा लेने के लिये हमारे सामने से गुजर रहा था। पलाश की टहनी ले कर। पलाश की टहनी देख प्रवीण जी को आपसी चर्चा का विषय मिल गया, जिसमें मेरी भी पर्याप्त रुचि थी।

पलाश की हरी पत्तियों की टहनी लिये यज्ञोपवीत के उपरांत भिक्षा के लिये आता बालक।
पलाश की हरी पत्तियों की टहनी लिये यज्ञोपवीत के उपरांत भिक्षा के लिये आता बालक।

 

उन्होने कहा – जानते हैं, पलाश की पत्तियां जानवर नहीं चरता। और जंगल में यह निर्बाध बढ़ता है। अत्यंत पवित्र वृक्ष है यह। ग्रामीण और आदिवासी इसकी पत्तियां पत्तल बनाने के काम लाते हैं। इसकी जड़ में उत्तम प्रकार का फाइबर होता है और उससे मजबूत रस्सियां बनाई जाती हैं। स्त्रियां इसके गोंद से कमर कस/लड्डू बनाती हैं जो प्रसूतावस्था में बहुत लाभदायक है। इसका बीज पेट के कीड़े मारता है।

प्रवीण जी आगे बताने लगे और मैने अपने नोट्स लेने के लिये जेब में रखी नोटबुक खोल ली। पलाश के फूल मधुमेह में लाभदायक हैं। इसकी राख में जो क्षार होता है, वह भी औषधीय गुण रखता है। वह खून को पतला करता है। इसका फूल मां दुर्गा की पूजा में समिधा के काम आता है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी एक प्रकार की रोटी – पानिया – बनाते हैं। वे पलाश के पत्तल बिछा कर उसपर रोटी बेलते हैं। फिर उसके ऊपर भी एक पलाश के पत्तों की पत्तल रख कर, दोनो परतों को सिल देते हैं। इस रोटी को उपलों की आग पर सेंक कर रोटी का प्रयोग करते हैं। पलाश और गोबर के धुयें से पानिया का स्वाद अनूठा हो जाता है।

पास बैठे एक सज्जन ने हामी भरी कि रोटी वास्तव में बहुत स्वादिष्ट होती है। वे उज्जैन जा चुके थे और आतिथ्य में प्रवीण जी ने उन्हे पानिया खिलायी थी।

प्रवीण जी ने मुझे भी उज्जैन आने का निमन्त्रण दिया। वहां मुझे भी वे पानिया खिलायेंगे।

प्रवीण जी विद्वान व्यक्ति हैं। उन्होने मध्यप्रदेश की वानिकी, वहां के आदिवासियों की पारम्परिक चिकित्सा और आदिवासियों के वन से जुड़ाव पर तीन पुस्तकें लिखी हैं। मैने उनसे इन पुस्तकों की मांग की। उन्होने वायदा किया कि वे इन पुस्तकों की सॉफ्ट कॉपी मुझे देंगे। निकट भविष्य में मैं उज्जैन जा कर उनसे और भी चर्चा करने का प्रयास करूंगा।

प्रवीण जी से मैं सागौन के प्लाण्टेशन पर चर्चा करने गया था। उन्होने उसके बारे में तो मुझे जानकारी दी; पर यह भी बताया “जानते हैं, गोण्ड आदिवासी सागौन के वृक्षों को कभी काटते नहीं हैं। इसके वन में होने के महत्व को वे जानते हैं। इसी कारण वन में सागौन निर्बाध बढ़ता है। वे केवल अपने परिवार में मृतक की याद में सागौन की लकड़ी की एक तख्ती बना कर निश्चित स्थान पर स्थापित करते हैं। तख्ती का आकार उस व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप होता है। तख्ती पर विभिन्न चिन्ह बने होते है। बहुत कुछ भित्ति-चित्रों की तरह। जंगली जीवन उनमें उकेरा मिलता है। हर तख्ती में सूर्य और चन्द्रमा अनिवार्य रूप से होते हैं।”

प्रवीण जी के पास वानकी जीवन का अनुभव भी है और वन के प्राणियों के प्रति सहृदय दृष्टिकोण भी। सरल और सौम्य स्वभाव के प्रवीण चन्द्र दुबे न केवल अपने विषय में जानकारी रखते हैं, वरन वन प्रति उनके विचारों में गहराई भी है, अनूठापन भी। कम ही लोग इस प्रकार के मिलते हैं।

मैं प्रवीण जी से उत्तरोत्तर अधिकाधिक प्रगाढ़ सम्पर्क और सम्बन्ध बनाने का प्रयास करूंगा।

जवाहिर लाल नहीं रहा!


मेरे मोबाइल में उपलब्ध जवाहिर की अन्तिम तस्वीर। पिछले साल नवम्बर महीने की है।
मेरे मोबाइल में उपलब्ध जवाहिर की अन्तिम तस्वीर। पिछले साल नवम्बर महीने की है।

पिछले सप्ताह इलाहाबाद गया था। शिवकुटी। गंगा किनारे तो नहीं गया, पर गड्डी गुरु (वीरेंद्र वर्मा) को मेरे आने का पता चला था तो मिलने चले आये थे घर पर। गड्डी गुरू से ही पता चला बाकी लोगों के बारे में – वे जो मेरे नित्य के कछार भ्रमण के साथी थे। रावत जी कहीं बाहर गये हैं, सिंह साहब ठीक ठाक हैं। पण्डा जी का काम सामान्य चल रहा है।

मैने जवाहिर का हाल पूछा।

गड्डी गुरू ने बताया – “लगता है, जवाहिर नहीं रहा। पिछली साल दिसम्बर तक था। उसे ठण्ड लग गयी थी। सरदी में उघार बदन रहता था। उसके बाद शायद अपने गांव गया। अब कोई बता रहा है कि खतम हो गया।” 

मुझे सदमा सा लगा यह सुन कर। जवाहिर मेरे ब्लॉग का सबसे जीवन्त पात्र था/है। वह नहीं रहा। अकेला रहता था वह। मछलीशहर का था। गांव में उसके पास आठ बिगहा जमीन थी। बकौल उसके खरीदने वाले उसका (सन 2010-11 में) पन्द्रह लाख दाम लगाते थे। यहां गंगा के कछार में घूमता था। मेहनत मजदूरी करता था। सीधा और स्वाभिमानी जीव। अब नहीं रहा।

जवाहिर पर सन 2006 से अब तक मेरे ब्लॉग पर करीब दो दर्जन पोस्टें हैं। अनेक पाठक जवाहिर से परिचित हैं। अनूप सुकुल मुझे बारबार कहते रहते हैं जवाहिर पर उपलब्ध ब्लॉग सामग्री को पुस्तकाकार देने के लिये। सतीश पंचम तो कई बार स्मरण करते रहते हैं जवाहिर का अपनी टिप्पणियों में।

उन सब पठकों को यह जानना दुखद होगा।

पण्डाजी से टिर्र-पिर्र हो गयी थी तो बहुत समय तक – साल भर से ज्यादा – वह अलग एकाकी बैठा करता था। पर पिछले साल अक्तूबर-नवम्बर में मैं जब शिवकुटी गया था तो उसे अपनी पुरानी जगह, पण्डा की चौकी की बगल में अलाव जलाते पाया था। मुझे लगा था कि अब सब पुराने तरह से चलेगा और शिवकुटी के घाट की जीवन्तता का एक तत्व, जवाहिर, जो अलग-थलग हो गया था; वहीं देखने को मिला करेगा। पर यह नहीं मालुम था कि वह मेरी जवाहिर से आखिरी मुलाकात थी… उसके बाद लम्बे अन्तराल तक मैं इलाहाबाद गया नहीं और अब यह सुना गड्डी गुरू के मुंह से।

यद्यपि यकीन करने को मन नहीं करता। पर जैसा गड्डी गुरू ने बताया कि दिसम्बर के बाद वह यहां कहीं दिखा नहीं तो लगता है कि यह सही हो। मैने जवाहिर को कभी इतने लम्बे अर्से गंगाजी के कछार से दूर नहीं पाया था।

अगली बार शिवकुटी जाऊंगा तो अन्य लोगों से जवाहिर के बारे में पूछने पछोरने का यत्न करूंगा। पर अभी तो यह खबर भर देनी है कि जवाहिर लाल नहीं रहा। :sad:

Design a site like this with WordPress.com
Get started