कुर्सियाँ बुनने वाला


मेरे दफ्तर में कॉरीडोर में बैठा मोनू आज कुर्सियाँ बुन रहा है। पुरानी प्लास्टिक के तार की बुनी कुर्सियों की फिर से बुनाई कर रहा है।

बताता है कि एक कुर्सी बुनने में दो घण्टे लगते हैं। एक घण्टे में सीट की बुनाई और एक घण्टे में बैक की। दिन भर में तीन से चार कुर्सियां बुन लेता है। एक कुर्सी पर मिलते हैं उसे 200 रुपये और सामान लगता है 80 रुपये का। अर्थात लगभग 500 रुपये प्रतिदिन की कमाई! रोज काम मिलता है? मैं जानने के लिये मोनू से ही पूछ लेता हूं।

हां, काम मिलने में दिक्कत नहीं। छौनी (मिलिटरी केण्टोनमेण्ट – छावनी) में हमेशा काम मिलता रहता है।

मुझे नहीं मालुम था कि मिलिटरी वाले इतनी कुर्सियां तोड़ते हैं। :lol:

बहरहाल मोनू का काम देखना और उससे अपडेट लेना अच्छा लग रहा है। कॉरीडोर में आते जाते वह काम करते दिख ही जा रहा है!

मोनू, कुर्सी बीनता हुआ।

मितावली स्टेशन के जीव


मितावली टुण्डला से अगला स्टेशन है दिल्ली की ओर। यद्यपि यहां से तीन दिशाओं में ट्रेने जाती हैं – दिल्ली, कानपुर और आगरा की ओर, पर तकनीकी रूप से इसे जंक्शन नहीं कहा जा सकता – आगरा की ओर यहां से केवल मालगाड़ियां जाती हैं। छोटा स्टेशन है यह – रेलवे की भाषा में रोड साइड।

कुल पौने तीन सौ टिकट बिकते हैं मितावली रेलवे स्टेशन में हर रोज। केवल सवारी गाड़ियां रुकती हैं। आस पास गांव दूर दूर दिखाई नहीं पड़ते। खेत हैं। ज्यादातर खेतों में धान जैसी चीज नहीं, चारा उगा दिखता है।

मैं पुशट्राली पर निरीक्षण करते हुये यहां पंहुचा। स्टेशन मास्टर साहब को लगता है पहले से खबर रही होगी – एक व्यक्ति हमारे पंहुचते ही कोका कोला छाप पेय की बोतलें ले आया। मेरे लिये शर्करा युक्त पेय उचित नहीं है। यह कहने पर भी दिये ग्लास में पेय आधा कर दो – उस व्यक्ति ने थोड़ा ही कम किया। मेहमाननवाजी स्वीकारनी ही पड़ी स्टेशन मास्टर साहब की।

कुछ ही समय हुआ है स्टेशन में सिगनलिंग प्रणाली में परिवर्तन हुये। पहले लीवर से चलने वाले सिगनल थे – जिन्हे लीवर मैन दोनो ओर बने कैबिनों पर स्टेशन मास्टर साहब के निर्देशानुसार खींच कर आने-जाने वाली गाड़ियों के लिये कांटा सेट करते और सिगनल देते थे। कुल मिला कर कम से कम तीन व्यक्ति इस काम में स्ंलग्न होते थे – स्टेशन मास्टर और दो लीवर/कैबिन मैन।

मितावली स्टेशन का परित्यक्त केबिन। अब लीवर की प्रणाली का स्थान सॉलिड स्टेट इंटरलॉकिंग ने ले लिया है।

अब लीवर हटा कर सारा काम सॉलिड स्टेट इण्टरलॉकिंग से होने लगा है। स्टेशन मास्टर साहब के पास एक कम्प्यूटर् लगा है, जिसके मॉनीटर पर पूरे स्टेशन का नक्शा है। उसी नक्शे पर क्लिक कर वे रूट सेट करने और सिगनल देने का काम करते हैं।

सॉलिड स्टेट इण्टरलॉकिंग का मॉनीटर।

स्टेशन मास्टर साहब हमारे सामने एक मॉनीटर से दूसरे (स्टेण्ड बाई) पर स्विच-ओवर करने का डिमॉन्स्ट्रेशन कर रहे थे तो माउस सरक कर गिर गया। कोल्ड ड्र्ंक लाने वाला जवान तुरत बोला – अरे कछुआ गिर गया नीचे।  

शिवशंकर।

वाह! बेकार ही इस उपकरण को माउस कहा जाता है। देसी भाषा में कछुआ बेहतर शब्द है और इसका आकार भी कछुये से ज्यादा मिलता जुलता है।

उस नौजवान का नाम पूछा मैने – शिवशंकर। यहां के किसी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी का लड़का है और रेलवे के कामकाज के बारे में अपने पिता से कम नहीं जानता होगा शिवशंकर! स्टेशन मास्टर साहब का नाम था सीपी शर्मा।

निरीक्षण कर चलते हुये मैने स्टेशन मास्टर साहब से पूछा – और कोई समस्या? मकान वगैरह तो ठीक हैं यहां पर?

कहां साहब यह तो जंगल है। दिन में भी चले आते हैं। कमरे के बाहर तो दिखते हैं ही; कमरे में भी चले आते हैं। परसों ही आ गया था…

मुझे किसी ने बताया था कि यहां जंगली सूअर हैं नीलगाय के अलावा। मैने सोचा मास्टर साहब शायद किसी चौपाया की बात कर रहे हैं। पूछा – कौन आ जाता है? उत्तर शिवशंकर ने दिया – जी, सांप और बिषखोपड़ा। कमरे में भी चले लाते हैं। घर रहने लायक नहीं हैं। इस कमरे में काम करना भी संभल कर रह कर हो सकता है।

मितावली के प्लेटफार्म पर बकरियां चराता गड़रिया।

सांप, बिषखोपड़ा और नीलगाय् तो यहां आते हुये मैने देखे थे। जंगली सूअर देखने में नहीं आये। मुझे बताया गया कि वे खरतनाक हैं। हिंसा पर उतर आयें तो आदमी को मार सकते हैं। … मितावली स्टेशन के जीव!

फिर भी मैने आस पास घूम कर देखा तो स्टेशन पर कुछ परिवार रहते पाये। एक खटिया पर कुछ स्त्रियां-लड़कियां बैठी कंधी-चोटी करती दीखीं। उनकी प्राइवेसी भंग न हो, मैं वापस आ कर स्टेशन से रवाना हो गया।

चलते हुये स्टेशन मास्टर साहब से हाथ मिलाना और शिवशंकर के कन्धे पर आत्मीयता से हाथ रखना नहीं भूला मैं!

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पी.जी. तेनसिंग की किताब से


पी.जी. तेनसिंग भारतीय प्रशासनिक सेवा के केरल काडर के अधिकारी थे। तिरालीस साल की उम्र में सन् २००६ में कीड़ा काटा तो सरकारी सेवा से एच्छिक सेवानिवृति ले ली। उसके बाद एक मोटर साइकल पर देश भ्रमण किया। फ्रीक मनई! उनके सहकर्मी उनके बारे में कहते थे – दार्शनिक, ढीला पेंच, दारू पीने के लिये साथी, फिटनेस के जुनूनी, पार्टी जाने वाले “पशु”, चुपचाप काम में घिसने वाले, विजटिंग प्रोफेसर, अनैक्षुक अफसर, सफल होटल चलानेवाला और सबसे ऊपर – एक ग्रेट दोस्त!

देश भ्रमण में तीन साल लगे। एक किताब लिखी – डोण्ट आस्क एनी ओल्ड ब्लोक फॉर डेरेक्शन्स (Don’t ask any old bloke for DIRECTIONS)। और फिर इस दुनियां से चले गये सन् २०१० में! :sad:

आप उनकी किताब बतैर ट्रेवलॉग पढ़ सकते हैं। यहां मैं एक छोटा अंश सिविल सेवा की दशा के बारे में प्रस्तुत कर रहा हूं, जो उन्होने रांची प्रवास के दौरान के वर्णन में लिखा है। (कहना न होगा कि मेरा हिन्दी अनुवाद घटिया होगा, आखिर आजकल लिखने की प्रेक्टिस छूट गयी है! :-) ):

मुझे मालुम है कि हर राज्य में ईमानदार और बेईमान अफसरों के बीच खाई बन गयी है। ईमानदार नित्यप्रति के आधार पर लड़ाई हारते जा रहे हैं। कुछ सामाना कर रहे हैं रोज दर रोज। बाकी दूसरी दिशा में देखते हुये अपनी नाक साफ रखने की जद्दोजहद में लगे हैं। कई इस सिस्टम से येन केन प्रकरेण निकल जाने की जुगत में लगे हैं। झारखण्ड में मृदुला (पुरानी सहकर्मी मित्र/मेजबान) के कारण मैने कई नौकरशाहों से मुलाकात की। अन्य राज्यों में मैं (एक व्यक्तिगत नियम के तहद) उनसे मिलता ही नहीं। 

एक सीनियर अफसर ने भड़ास निकाली कि समाजवादी व्यवस्था का शासन नौकरशाही की वर्तमान बुराइयों के लिये जिम्मेदार है। पॉलिसी बनाने वालों ने शासन चलाने का दिन प्रति दिन का काम संभाल लिया है। और जिनका काम पॉलिसी के कार्यान्वयन का था, वे राजनेताओं के समक्ष अपनी सारी ताकत दण्डवत कर चुके हैं। 

इस देश में पॉलिसी-मेकर्स की जबरदस्त कमी हो गयी है – वे लोग जो लम्बी दूरी की सोचें और गवर्नेंस के थिंक टैंक हों। मसलन, आप ट्रान्सपोर्ट विभाग को लें। मन्त्री और सचिव को अपना दिमाग एक साथ मिला कर राज्य की लम्बे समय की यातायात समस्याओं को हल करने के लिये लगाना चाहिये। उसकी बजाय मन्त्री बहुत रुचि लेता है कर्मचारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफर में। और सचिव इसमें उसके साथ मिली भगत रखता है। यह काम ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के दफ्तर को करना चाहिये। इससे ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की स्थिति कमजोर होती है। उसका अपने कर्मचारियों पर प्रभाव क्षरित होता है। बस ऐसे ही चलता रहता है और देश लटपटाता चलता जाता है। 

मुझे अपनी तरफ से कुछ जोड़ना चाहिये?! नो चांस। अभी कुछ साल नौकरी करनी है मुझे – मोटर साइकल चलाना नहीं आता मुझे, और मैं तेनसिंग की तरह “दार्शनिक, ढीला पेंच, दारू पीने के लिये साथी, फिटनेस के जुनूनी” आदि नहीं हूं। :lol:


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