भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
आज डाला छठ मनाने के बाद स्त्रियों का एक झुण्ड लौट रहा था। आगे एक किशोर चल रहा था प्रसाद की डलई उठाये। औरतें समवेत गा रही थीं मधुर स्वरों में – सीता से ब्याह रचइओ, हो राम, जब जइयो जनकपुर में!
डाला छठ के समापन उत्सव पर सूर्योदय की प्रतीक्षा में गंगा तट पर लोग।
दीपावली के बाद आती है यह छठ। और दीपावली जहां नकली लाइटों, पटाखों चमक-दमक के प्रदर्शन का त्यौहार बनता गया है उत्तरोत्तर, डाला छठ में देशज संस्कृति अभी भी हरी-भरी है। कार्तिक में गंगा की माटी में मौका पाते जैसे दूब फैल रही है, लगभग उसी तरह छठ का उत्सवी उछाह छछंड रहा है।
सवेरे काफी लोग थे गंगा किनारे। बहुत पहले से आये रहे होंगे। एक व्यक्ति के पास तो मैने बैटरी और सी.एफ.एल. लैम्प का अटैचमेण्ट भी देखा। बाकी लोगों के पास भी पूजा अर्चना की सामग्री की डलिया-सूप-गन्ना आदि के अलावा रोशनी का कुछ न कुछ इंतजाम था। बच्चे फुलझड़ी-पठाके ले कर आये थे। ढोल बजाने वाले भी थे।
स्त्रियां नहा चुकी थीं – शायद ज्यादा अन्धेरे में ही नहा ली होंगी, या यह भी हो सकता है घर से नहा कर आई हों। पर कई पुरुष गंगा स्नान करते दीखे। बच्चे नहीं नहा रहे थे। कार्तिक का गंगाजल सवेरे सवेरे ठण्डा भी था।
हर समूह ने गंगा का तट अपने अपने लिये बांट कर मेड़ बना ली थी। पूजा सामग्री सजाये स्त्रियां बैठे थीं। कहीं कहीं समूह में कुछ गा भी रही थीं। गन्ने के तने लोगों ने अपने पूजा स्थल के आगे गंगाजी के छिछले पानी में गाड़ रखे थे।
मैने देखा – अधिकतर स्त्रियां सूप में पूजा सामग्री ले कर पानी में पूर्व की ओर मुंह कर खड़ी सूर्योदय की प्रतीक्षा कर रही थीं। स्त्रियाँ किसी भी उत्सव की रीढ़ हैं। वे न हों तो उत्सव का रस ही बाकी न रहे।
सूर्य उदय हुये और गन्ने की गण्डेरी से झांकने लगे!
जैसे जैसे पूरब में लालिमा बढ़ रही थी, गहमा गहमी बढ़ रही थी। जिनके पास कैमरे या मोबाइल थे, वे इन क्षणों को संजो रहे थे भविष्य में देखने के लिये।
और सूर्योदय हो गया! देखते ही देखते धुन्धलेसे सूरज कुछ फिट पानी के ऊपर उछल कर चटक लाल गोले के रूप में आ गये। दस मिनट में ही लोग पूजा पूरी कर घाट से लौटने भी लग गये।
मैं चला आया। पत्नीजी रुक गयीं – प्रसाद ले कर आती हूं।
वापसी में स्त्रियों का गीत मन प्रसन्न कर गया – सीता से ब्याह रचइओ, हो राम, जब जइयो जनकपुर में!
सच में डाला छठ त्यौहार अवधपुर का नहीं, जनकपुर का है। सीता माई ने सरयू किनारे डाला छठ के समय सूर्यदेव की पूजा की परम्परा नहीं डाली? क्यों नहीं डाली जी!
श्रीयुत श्रीप्रकाश मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक हैं। जब वे (सन 2009 में) हमारे सदस्य यातायात (रेलवे के यातायात सेवा के शीर्षस्थ अधिकारी) हुआ करते थे, तब से वे लोगों को मेरे ब्लॉग के बारे में बताते रहे हैं। उस समय वे सक्रिय रूप से भारतीय रेलवे यातायात सेवा की साइट पर अधिकारियों को सम्बोधित करती पोस्टें लिखा करते थे। तब वे मुझसे कहा करते थे – मैने तुम्हारा ब्लॉग पढ़ा, तुम मेरा ब्लॉग (अधिकारियों को सम्बोधन) पढ़ते हो या नहीं? उनकी एक पोस्ट का अंश अपने ब्लॉग पर मैने फरवरी’09 में प्रस्तुत भी किया था।
अभी कुछ दिन पहले श्रीप्रकाश जी इलाहाबाद आये थे। तब उन्होने बताया कि मेरा यह वर्डप्रेस का ब्लॉग (halchal.org) वे सप्ताह में एक बार खोल कर जो भी नई पोस्टें होती हैं, पढ़ लेते हैं। शायद उनको ब्लॉग की फीड सब्स्क्राइब करने में दिक्कत आई थी।
मैने उन्हे ब्लॉग की फीड भेजना प्रारम्भ कर दिया है। इसी बहाने ई-मेल से उनसे सम्पर्क हुआ। मेल में उन्होने अपने विचार व्यक्त किये –
श्रीयुत श्रीप्रकाश
तुम्हारा ब्लॉग पढ़ने का मेरा एक कारण (और बहुत से कारण हैं) यह है कि इसके माध्यम से मैं गंगा नदी से अपने जुड़ाव को पुन: महसूस करता हूं। मैं बहुधा अपने बाबाजी के साथ होता था, जब वे गांव से चार किलोमीटर दूर बहती गंगाजी में स्नान के लिये जाते थे।
इलाहाबाद में भी,पचास के दशक के उत्तरार्ध और साठ के दशक के पूर्वार्ध में गंगाजी स्टेनली रोड से करीब एक किलोमीटर दूर (म्यूराबाद के समीप) बहती थीं।[1] हम मम्फोर्डगंज में रहते थे और तब भी मैं अपने बाबाजी के साथ गंगा तट पर जाया करता था।
जब मैं अपने बच्चों को बताता हूं कि गंगाजी का पानी इतना साफ था कि उसमें हम मछलियों और कछुओं को दाना खिलाया करते थे; तब उनके चेहरों पर अविश्वास के भाव साफ दीखते हैं।
यह अलग बात है कि मैने गंगा स्नान नहीं किया (सिवाय हरिद्वार के, जब मैने सन 1972 में इलाहाबाद छोड़ा)।
तुम्हारा ब्लॉग मुझे इलाहाबाद के अपने बचपन की याद दिलाता है।
इलाहाबाद - म्यूराबाद, शिवकुटी, दारागंज और गंगा नदी।
पचास-साठ के दशक में गंगा नदी को देखने समझने वाले सज्जन जब मेरे ब्लॉग की प्रशंसा करें तब एक अलग तरह की सुखद अनुभूति होती है, ब्लॉग की सार्थकता में एक नया आयाम जुड़ जाता है।
मैने श्रीप्रकाश जी से अनुरोध किया कि अगर वे 50-60 के दशक की अपनी इलाहाबाद/गंगा विषयक यादों से मेरे पाठकों को परिचित करा सके तो बहुत अच्छा होगा। मेल से उन्होने मुझे उस समय की गंगा नदी के प्रवाह/मार्ग के बारे में यह सामग्री दी –
कम ही लोग जानते होंगे कि गंगा म्यूराबाद और बेली गांव (सप्रू अपताल के पीछे) बहा करती थी। चांदमारी घाट स्टेनली रोड से एक किलोमीटर से ज्यादा दूर न रहा होगा। नदी लगभग स्टेनली रोड के समान्तर बहती थी और उसके आगे रसूलाबाद होते हुये शिवकुटी पंहुचती थी। गंगाजी की मुख्य धारा इसी प्रकार से थी और इसी लिये चांदमारी घाट (सन् ६२ में आर्मी केण्टोनमेण्ट था और वहां चांदमारी हुआ करती थी) बना था।
स्टेनली रोड के दोनो ओर का क्षेत्र बैरीकेड किया हुआ था और सेना के नियमित स्थापत्य साठ के दशक में बने थे। सन् 1971की लड़ाई के दौरान पकड़े गये पाकिस्तानी सैनिक यहां बन्दी बना कर रखे गये थे। इस बैरीकेडिंग के कारण स्टेनली रोड से गंगा नदी तक जाना रसूलाबाद के पहले सम्भव नही था।
सन् 1967मे ममफोर्डगंज में बाढ़ का बड़ा असर पड़ा। बाढ़ का पानी लाजपत राय रोड के पास से बहते नाले से आया और म्यूराबाद, बेली तथा ममफोर्डगंज तीन-चार दिन तक पानी से भरे रहे। ये पहली और शायद अन्तिम बाढ़ थी जो ममफोर्डगंज तक आई[2]। अब तो नाले पर बाढ़ नियन्त्रण व्यवस्था बन गई है।
गंगाजी अपना मार्ग बदलती रही हैं और यही कारण है कि दोनो ओर कछारी जमीन का विस्तार है। सन् १९६६ के कुम्भ के दौरान नदी लगभग दारागंज बांध के पास से बहती थी। इस लिये मेला नदी के दोनो ओर लगा था। उस साल करीब आठ पॉण्टून पुल थे गंगा पर कुम्भ मेले के दौरान।
नदी के मार्ग बदलने का साल-दर-साल का रिकॉर्ड कहीं न कहीं रखा गया होगा। एक साल में ही कभी कभी नदी अपना मार्ग कई बार बदल लेती हैं। तुम्हें इस विषय में और जानकारी वहां के किसी बढ़े बूढ़े से मिल सकेगी। शायद रसूलाबाद मरघट का पुजारी कुछ बता पाये, यद्यपि वह उम्र में मुझसे छोटा है। उसकी मां अपने जमाने में बहुत ख्याति अर्जित कर चुकी थीं और शायद इस पेशे में वह अकेली महिला थी। वे (महराजिन बुआ) रसूलाबाद घाट पर अन्त्येष्टि का पचास साल तक इन्तजाम करती रही।
श्रीयुत श्रीप्रकाश जी अभी अपने अन्य कार्यों (जिनमें पुस्तकें लिखना भी शामिल है) में व्यस्त हैं। उनसे पुरानी गंगा/इलाहाबाद विषयक यादें साक्षात्कार के माध्यम से लेनी होंगी, जब भी वे इलाहाबाद आयें!
चालीस-पचास साल पहले की बातें सुनने, जानने और ब्लॉग पर प्रस्तुत करने का औत्सुक्य जग गया है मेरे मन में।
[1] गूगल मैप में देखने पर लगता है कि 60 के दशक से गंगा तीन-चार किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में हट गई हैं इलाहाबाद से।
[2] श्रीप्रकाश जी ने बताया कि शायद 1978 की बाढ़ में भी ममफोर्डगंज में पानी आ गया था, पर वे इलाहाबाद छोड़ सन 1971 में चुके थे, और यह बाढ़ उनके समय में नहीं थी।
आज के समय गंगा किनारे जाते लोग। वैसे ही हैं जैसे पचास-साठ के दशक में रहे होंगे?!
आज सवेरे सब यथावत था। सूरज भी समय पर उगे। घूमने वाले भी थे। घाट पर गंगाजी में पानी कुछ बढ़ा हुआ था। वह भैंसासुर की अर्ध-विसर्जित प्रतिमा पानी बढ़ने के कारण पानी में लोट गई थी।
किनारे पर पण्डा यथावत संकल्प करा रहे थे कार्तिक मास का। पास में सनीचरा रहता था कऊड़ा जलाये। आज वह नहीं था। एक और आदमी कऊड़ा जलाये था।
सनीचरा के सृजक नहीं रहे। “रागदरबारी” सूना है। सनीचरा भी जाने कहां गया आज!