उम्र की फिसलपट्टी उतरता सीनियरत्व


मैने यह पोस्ट पोस्ट न की होती अगर मुझे प्रवीण की एक नई पोस्ट के बारे में सूचना देने की कवायद न करनी होती। यह पोस्ट ड्राफ्ट में बहुत समय से पड़ी थी। और अब तो काफी घटनायें गुजर चुकी हैं। ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड के लिये बापी महतो को पकड़ा जा चुका है (अच्छा हुआ, पकड़ गया, नहीं तो उसके कामरेड लोग समाप्त कर देते!)


प्रवीण पाण्डेय ने अपने ब्लॉग पर नई पोस्ट लिखी है – २८ घण्टे। उसे पढ़ने के लिये आप उनके ब्लॉग पर जायें। यह पोस्ट पढ़ कर मुझे लगा जैसे नव विवाहित कवि हृदय गद्य में कविता लिख रहा हो –

… पर तुम्हारी आँखें मेरी ओर उस समय क्यों नहीं घूमी जब मैं चाह रहा था । तुम्हारी ओर देखते हुये तुम्हारे कन्धों को मोड़ना चाह रहा था अपनी ओर । लगता है, मेरी आँखों में अब वह बल नहीं रहा जो खींच ले तुम्हारी दृष्टि, अचानक, बलात, साधिकार ।

मुझे व्यग्रता है कि तुम्हारी आँखों ने मेरी आँखों की अवहेलना कर दी ।

मेरा प्रेम रोगग्रसित है । पहले तो अवहेलना व अधिकार जैसे शब्द नहीं आते थे हमारे बीच । पर पहले तो तुम्हारी आँखें हमेशा मेरी ओर ही मुड़कर देखती थी और मेरी यात्राओं को यथासम्भव छोटा कर देती थी ।…


Oct05 009 सरकारी नौकरी में सीनियॉरिटी समय से पक कर मिलती है। जब जूनियर होते हैं, तो घर जूनियॉरिटी के हिसाब से छोटे मिलते हैं। उस समय छोटे बच्चों के साथ ज्यादा स्पेस – यानी बड़े घर की दरकार होती है। पक कर सीनियर बनने पर बाल बच्चे किनारे लग गये होते हैं, तब बड़े घर मिलते हैं – बड़े बंगले। और वे इतने बडे लगते हैं कि उनके अधिकांश भाग पर भूत इत्मीनान से रहते होंगे – बिना मकान किराया दिये।

सरकारी नौकरी के बाहर देखता हूं तो पाता हूं कि सीनियरत्व उम्र की फिसलपट्टी तेजी से उतरता जा रहा है। तीस – पैंतीस का व्यक्ति सीनियर हो ले रहा है। चार पांच नौकरियां फलांग चुका होता है। बड़े झक्कास पदनाम युक्त होता है। बैंक बैलेंस भी इतना होता है, जितना हमारी इतने साल की नौकरी में न हुआ! हमारी पीढ़ी सीनियरता को पेड़ पर लगे कटहल की तरह धीमे पकाने में नष्ट हो गयी। और अब लोग सीनियरता लीची की तरह पकाने लगे हैं!

Gyan670 अखबार में हेडलाइन्स देखी कि ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस के काण्ड को सीनियर माओवादी ने हरी झण्डी दी थी। जिज्ञासा वश खबर पढ़ी तो पता चला कि यह सीनियर माओवादी, कोई जयन्त नामधर्मी व्यक्ति उन बैठकों की अगुआई कर रहा था, जिनमें यह तय हुआ था कि रेलगाड़ी गिराई जाये।

इस जयन्त की उम्र भी लिखी थी – बाईस साल! सन २००३ में वह भर्ती हुआ था नक्सल आंदोलन में; पन्द्रह साल का था तब। अब वह सीनियर हो चला है। जयन्त जी ने रेल गिराई/गिरवाई हो – यह तो जांच तय करेगी। हमें तो मात्र उसकी उम्र और उसकी सीनियॉरिटी से लेना देना है! जाम्बी थाना  के अमचूरिया गांव के जयन्त की सीनियॉरिटी को देख ईर्ष्या है। रेल चलाने में सीनियॉरिटी हमें इतने समय बाद मिली और रेल गिराने में सीनियॉरिटी जयन्त मात्र बाईस वर्ष की उम्र में पा गये!

सच में, एक शानदार फिसलपट्टी पा गया है सीनियरत्व!    


त्रासदियां – प्रवीण पाण्डेय की पोस्ट


भोपाल त्रासदी गुजर गई। वह किसी अन्य रूप में पुन: सम्भव है। ऐसी ही एक घटना सन २०१८ में घटी। उसके विषय में  प्रवीण पाण्डेय के ब्लॉग पर उनकी पोस्ट त्रासदियां में पढ़ें।


बिज्जू


paws स्वप्न, बीमार हो तो बहुत आते हैं। स्वप्न में हल्की रोशनी में दीखता है मुझे बिज्जू। जंगली बिलाव सा कोई जन्तु। वह भी मुझे देख चुका है। आत्म रक्षा में अपनी जगह बैठे गुर्राहट के साथ दांत बाहर निकाल रहा है।

मुझे प्रतिक्रिया करने की जरूरत नहीं है। अपने रास्ते निकल सकता हूं। पर आशंकित हूं कि कहीं वह आक्रमण कर बैठा तो? मैं अपने पैर का चप्पल निकाल चला देता हूं। कितने बड़े चप्पल! बाइबल की कहानियों के गोलायथ जैसे का चप्पल!

पर वह निशाने पर नहीं लगता। पहला वार खाली। युद्ध में पहले वार की महत्ता है युद्ध का दोष तय करने को। पहला वार, पहला तीर, पहली गोली! पहला शंख किसने बजाया था महाभारत में?!

अब तो मुझे लगता है कि वह आक्रमण कर ही बैठेगा। मैं दानवीय दूसरा चप्पल हाथ में ले कर उसे पीट पीट कर मार देता हूं। उसके शरीर को बायें पैर से फुटबाल की तरह उछालता हूं। मांस का वह लोथड़ा दो मीटर ऊंची दीवार के पार चला जाता है।

पर मुझे संतोष या विजयी भाव नहीं घेरता। अनुताप घेरता है। क्रोंच वध करने वाले सा। एक छोटे जीव को अनायास मारने का अनुताप।

नींद से जगने पर भी वह भाव नहीं जाता। कई स्वप्न इतनी सूक्ष्मता से स्पष्ट क्यों रह जाते हैं मन: पटल पर?

वह स्वप्न मेरी पर्सनालटी बदलेगा? शायद अगली बरसात में सांप-संपोलों को देख उन्हें मारने को उद्धत करने की बजाय मुझे बगल से निकल जाने को प्रेरित करेगा। मैं पहला शंख बजाने वाला भीष्म नहीं बनना चाहता और निरर्थक छोटे युद्ध का विजेता भी नहीं!

महाभारत – उसकी बात अलग है। कौन न बनना चाहेगा अर्जुन!    


आज तीस जून है। प्रवीण पाण्डेय ने आजके दिन अपनी माता जी के सेवा-निवृत्ति के अवसर पर एक पोस्ट लिखी है – 30 जून 2010; जो आप उनके ब्लॉग न दैन्यं न पलायनम् पर देखें। 

यह पोस्ट ड्राफ्ट में बहुत समय से पड़ी थी। स्वप्न-दुस्वप्न बहुधा चले आते हैं; सो अचानक याद आ गयी। अत: पोस्ट कर रहा हूं। पर ब्लॉग पर टिप्पणी-प्रबन्धन का उत्साह या बल नहीं लग रहा। लिहाजा टिप्पणी बन्द!  


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