नत्तू पांड़े, नत्तू पांड़े कहां गये थे?


नत्तू पांड़े नत्तू पांड़े कहां गये थे?
झूले में अपने सो रहे थे
सपना खराब आया रो पड़े थे
मम्मी ने हाल पूछा हंस गये थे
पापा के कहने पे बोल पड़े थे
संजय ने हाथ पकड़ा डर गये थे
वाकर में धक्का लगा चल पड़े थे
नत्तू पांड़े नत्तू पांड़े कहां गये थे?!

 

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(संजय पेडियाट्रीशियन हैं – नत्तू पांड़े के फैमिली डॉक्टर| नत्तू पांड़े हैं पण्डित विवस्वान पाण्डेय। छोटे हैं तो क्या हुआ, नाम दमदार होना चाहिये न!

श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥४-१॥
इस अव्यय योग को मैने विवस्वान को बताया। विवस्वान ने इसे मनु को कहा।
और मनु ने इसे इक्ष्वाकु को बताया॥)


खतम हो लिये जीडी?


शारीरिक फैकेल्टीज में गिराव तो चलेबल है। जोड़ों में दर्द, स्पॉण्डिलाइटिस, चश्मे का नम्बर बढ़ना …  यह सब तो होता रहा है। रक्तचाप की दवा भी इस बार बदल दी है डाक्टर साहब ने। वह भी चलता है। पर मेण्टल फैकेल्टीज में गिराव तो बड़ा डरावना है। आप को कभी अपने बारे में यह लगता है?

डाक्टर साहब के पास उस आदमी को देखता हूं। डाक्टर उससे आम पूछ रहे हैं तो वह इमली बता रहा है। अन्दर से भयभीत है – सो अनवरत बोल रहा है – अंग्रेजी में। मरियल दुबला सा आदमी। जबरदस्त एनिमिक। उससे डाक्टर पूछ रहे हैं कितने साल रिटायर हुये हो गये। वह कहता है कि अभी वह नौकरी में है – सन 2011 में रिटायरमेण्ट है। सत्तर से कम उम्र नहीं लगती चेहरे से। बार बार कहता है कि इससे पहले उसे कोई समस्या नहीं थी। पर वह यह नहीं बता पाता कि समस्या क्या है?!

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और आदतन मैं अपने को उस व्यक्ति के शरीर में रूपांतरित कर लेता हूं। और तब मुझे जो लगता है, वह डराने वाला है – बहुत भयावह! अपने कोर में भयभीत होने पर मैं अपने आप से मन में अनवरत बोलने लगता हूं – अंग्रेजी में!

ओह, किसी को सुनाई तो नहीं दे रहा है? एक पॉज में मैं सोचता हूं – क्या जरा, रोग या मृत्यु का अनुभव किये बिना बुद्धत्व सम्भव है? क्या खतम हुये बिना ‘ज्ञान” मिल सकता है?


डॉक्टर के पास डेढ़ साल बाद गया। इस लिये कि बिना देखे, मेरी दवायें आगे चलाते रहने पर उन्हे आपत्ति थी। और उनके पास जाने पर उनके चेम्बर में आधा घण्टा प्रतीक्षा करनी पड़ी – जब तक वे पहले के दो मरीज निपटाने में लगे थे।

और यह आधा घण्टे का ऑब्जर्वेशन माइनर बुद्धत्व उभार गया मुझमें। उस बुद्धत्व को कहां सरकाऊं, सिवाय ब्लॉग के? :mrgreen:


कम्प्यूटर/मोबाइल पर हिन्दी


मैने प्रवीण पाण्डेय से विण्डोज मोबाइल में हिन्दी की-पैड Eyron(mobile keyboard) का प्रयोग कर हिन्दी फर्राटे से लिखने का जुगाड़ पूछा। जो उपाय बताया, उसे सरल हिन्दी में कहा जायेगा – अभ्यासयोग। जितना प्रयोग होगा, उतना तेज बनेगा औजार।

मेने सोचा, यह इति होगी ई-मेल वार्तालाप की। पर हिन्दी के प्रयोग पर प्रवीण ने एक अत्यन्त स्तरीय पोस्ट लिख डाली है। आप यह पोस्ट देखें। 

बचपन में हिन्दी वर्णमाला सीखने के बाद जब आंग्लभाषा सीखनी प्रारम्भ की तो वैशाखियाँ हिन्दी की ही थीं। ’Apple’ अभी तक दिमाग में ’एप्पल’ के रूप में धँसा हुआ है। एक भाषा से दूसरी भाषा ’लिप्यंतरण’ (Transliteration) के माध्यम सीखना स्वाभाविक है। अंग्रेजी सीखना अन्य भाषायें सीखने से और भी कठिन था क्योंकि यहाँ जो लिखा जाता है वही बोला नहीं जाता है। दुगुना परिश्रम। सोचा कि अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है, परिश्रम तो करना ही पड़ेगा। भौकाल था। कोई कहीं अंग्रेजी में सरपटियाता था तो लगता था कि ज्ञान, फैशन और आकर्षण तीनों एक साथ अवतरित हो गये हैं। एक बार सवारी करने के बाद तो बिना हिन्दी की सहायता के अंग्रेजी के घोड़े सरपट दौड़ाने लगे यद्यपि बोलना सीखने में दो दशक और लग गये।

Keyboard1
Keyboard2

इस कुंजीपटल को अब भारत सरकार ने भी आधिकारिक घोषित कर दिया है । Eyron(mobile keyboard), Microsoft, शब्दकोष.कॉम व अन्य ने भी इसी ले-आउट को मान लिया है ।

अभी तक हिन्दी और अंग्रेजी दोनो ही मन में स्वतन्त्र रूप से जी रही थीं। कोई व्यवधान नहीं। जहाँ एक ओर शिक्षा, परीक्षायें और प्रशिक्षण आदि अंग्रेजी में बीत रहा था वहीं दूसरी ओर अभिरुचियाँ, लेखन और पाठन मातृभाषा हिन्दी में मगन थीं। सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व। पुस्तकें पढ़ते थे और डायरी में लिखते थे । कागज ने भी कभी हिन्दी-अंग्रेजी का भेद नहीं किया, दोनों को समान रूप से स्वीकार किया और प्रस्तुत किया।

समस्या तब प्रारम्भ हुयी जब कम्प्यूटर और इण्टरनेट का प्रादुर्भाव हुआ। अंग्रेजी ज्ञान के कारण इस क्षेत्र में हम भारतीय बहुत आगे बढ़ गये। तार्किक क्षमता से युक्त भारतीय सारे विश्व में छाने लगे। अंग्रेजी द्वारा शासित इस क्षेत्र में हिन्दी की दशा फिर भी दयनीय रही। उस समय सिलिकान वैली में हिन्दुस्तानी अपनी प्रतिभा के पटाखे छोड़ने में व्यस्त थे।

सबसे पहले फोण्ट की समस्या आयी। प्रयास जो भी थे, सराहनीय थे पर बिखरे थे। हर फोण्ट के लिये अलग अलग कुंजीपटल। पहला टाइप करने में समस्या, उसे दूसरे कम्प्यूटर में पढ़ने के लिये फोण्ट के साथ लोड करने की समस्या और उन सबसे यदि उबर लिये तो इण्टरनेट पर अपलोड करने की समस्या।

praveen यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं।

सीडैक नामक संस्था ने इस दिशा में सम्यक प्रयास किये और ऑन-स्क्रीन हिन्दी कुंजीपटल तैयार किया। गूगल महाराज ने अपनी विस्तारवादी नीति के अन्तर्गत हिन्दी के लिये एक ट्रांसलिटरेशन (Transliteration) का माध्यम तैयार किया जो कि बड़ा डाटाबेस होने के कारण सर्वर बेस्ड था और इण्टरनेट के माध्यम से ही चलता था। उसी को और विकसित कर कुछ दिनों पहले एक और सॉफ्टवेयर आया है जो कि ऑफ लाइन भी कार्य करने में सक्षम है और Word based है। बराह/बारह का भी सॉफ्टवेयर आया जो कि वही क्षमता रखता है पर वह Characters based है। यह अच्छी बात हुयी कि जो फोण्ट आया वह यूनीकोड था और वह हर जगह चल सकता थ।

बचपन का बदला आज निकाला जा रहा है। जो कल तक वैशाखी थी आज उसी को वैशाखी की आवश्यकता पड़ रही है। आज यदि हमें ‘सेव’ लिखना है तो ‘sev’ टाइप करना पड़ेगा और वही मन में धँसा हुआ है। यदि आप ’क्षमा’ या ’ज्ञान’ जैसे शब्द सहज रूप से लिख सकते हैं तो आपको हिन्दी में डॉक्टेरेट पाने का पूर्ण अधिकार है। एक अक्षर लिखने के लिये तीन चार बार कुंजीपटल दबाना पड़ता है।

कम्प्यूटर में तो फिर भी थोड़ा स्थायित्व आ गया है, मोबाइल जगत में अभी भी हिन्दी का नामलेवा कोई नहीं है। यदा कदा कोई एसएमएस हिन्दी में आता है तो वह भी डब्बाकार बनकर रह जाता है । मोबाइल में हिन्दी कुंजीपटल है ही नहीं। टचस्क्रीन सेटों में ऑनस्क्रीन कुंजीपटल विण्डो मोबाइल छोड़कर किन्ही और सेटों में नहीं है। वह एक इज़रायली कम्पनी (जी, हां! भारतीय नहीं) ने विकसित किया है। आईफोन ने तो हिन्दी या किसी अन्य भारतीय भाषा को इस योग्य नहीं समझा कि जिनका सपोर्ट उनके द्वारा विकसित किया जाये। हिन्दी के भविष्य का सारा दारोमदार अब किस पर है, किसी को पता नहीं । हम कदाचित उस समाज का अंग हो चुके हैं जिसे जो मिल जाये उसी में प्रसन्न रहना आता है।

कुछ दिनों पहले Indic inscript keyboard पर टाइप करने का प्रयास किया। समय अधिक लगा पर संतुष्टि मिली। अपनी भाषा टाइप करने के लिये अंग्रेजी की सहायता न लेने का हठ बचकाना हो सकता है पर धीरे धीरे टाइपिंग की गति भी सुधर जायेगी और मन की गत भी।Eyron


यह तीन साल पहले था, जब मैने कम्प्यूटर पर पहले पहल हिन्दी में लिख कर ब्लॉग पर पोस्ट किया था – फरवरी २२’२००७ को। क्या सनसनी थी।

और कल रात मोबाइल फोन पर उक्त Eyron ऑन स्क्रीन की-बोर्ड से लिख कर रजाई ओढ़े ओढ़े पोस्ट किया तो वैसा ही सनसनाहट का मामला था। कई बड़े, महान और सीनियर ब्लॉगर होंगे। पर कौन ऐसी सनसनाहट अनुभव करता है एक फोटो और तीन लाइने पोस्ट कर! हां जी, अनूप शुक्ल की डेढ़ गजी पोस्टें जहां जाना चाहें जायें। अपन तो इसी में प्रसन्न हैं!    


अपडेट (११ बजे) – “बधाई” की बलि चढ़ती एक और पोस्ट! :-)


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