इधर के और उधर के लोग


इधर के बारे में मुझे दशकों से मालूम है. इधर माने रेलवे – मेरा कार्य क्षेत्र. रेलवे को मिनी भारत कहते हैं. उस मे बड़े मजे से काम चल रहा था/है. यह महज एक संयोग था कि हिन्दी ब्लॉगरी के लोगों का पता चला. अब चार महीने से उधर यानि हिन्दी ब्लॉगरी के विषय में भी काफी अन्दाज हो गया है.

इधर का व्यवहार कोड़/मैनुअल/नियम/कंवेंशन और रोजमर्रा के काम में आदान-प्रदान से ठीक-ठाक चल जाता है. इधर भी डिस्कॉर्डेण्ट नोट्स हैं पर बेसुरापन कम है. उधर तो गजब की केकोफोनी है! मेरा यह कहना रेलवे को बाहर से देखने वालों को शायद अटपटा लगे- क्योंकि बतौर उपभोक्ता लोगों की नजर दूसरे प्रकार की होती है. मैं यहां व्यवस्था के अन्दर से सभी समस्यायें और सीमायें जानते हुये यथा सम्भव निष्पक्ष लिखने का यत्न कर रहा हूं.

अनूप (मैं जानबूझ कर जी का प्रयोग हटा रहा हूं. आखिर अब तक स्पष्ट हो गया है कि कितनी आत्मीयता और सम्मान है तो जी का पुछल्ला बार-बार लिखने की जहमत क्यों उठाई जाये) ने अपने ब्लॉग पर चन्द्रशेखर (सिवान के शहीद) के विषय मे लिखते लिखते अचानक विषयांतर किया छ इंच छोटा करने की अलंकारिक धमकी के कुछ लोगों के प्रयोग पर. अजीब लगा यह विषयांतर. ऐसा विषयांतर तभी होता है जब कोई विचार किसी को हॉण्ट कर रहा (मथ रहा) हो. तब मुझे अपनी ब्लॉगरी और हिन्दी ब्लॉगरों के व्यवहार पर विचार करने और इधर (रेलवे) और उधर (हिन्दी ब्लॉगरी) के लोगों के तुलनात्मक विवेचन की सूझी.

मैं निम्न बिन्दु पाता हूं जो कहे जा सकें:

  • उत्कृष्टता के द्वीप रेलवे में भी हैं और ब्लॉगरी में भी. रेलवे कमतर नहीं है और यहां हमारे निर्णयों की आर्थिक वैल्यू भी है. हर शाम को अपने निर्णयों पर मनन करते हुये लोग यह संतोष कर सकते हैं कि अपनी तनख्वाह के बदले उन्होने अपने निर्णयों से रेलवे का इतना फायदा किया. जैसा मैने कहा यह संतोष सभी नहीं कर सकते. पर उत्कृष्टता के द्वीप तो कर ही सकते हैं. उसी प्रकार ब्लॉगरी में भी कुछ लोग अपने दिन भर के कृतित्व पर संतोष कर सकते हैं.
  • उदण्डता और उछृंखलता इधर कम है. लोग नियम/मैनुअल/कानून/आचरण के कंवेंशन से बन्धे हैं. लिहाज और सहनशीलता यहां ज्यादा है. संस्थान होने का लाभ है यह. उधर ब्लॉगरी में विश्व को कुछ भी परोस देने की अचानक मिली स्वतंत्रता जहां एक ओर उत्कृष्टता की प्रेरणा देती है वहीं उदण्डता और उछृंखलता की दमित वासनाओं को उत्प्रेरित भी करती है. इन वासनाओं के शमन में कुछ समय तो लगेगा ही. कुछ सीमा तक ये वासनायें मुझे भी नचाती रही हैं – नचा रही हैं.
  • सामाजिकता उधर ज्यादा है. इधर पद का लिहाज है, उधर यह काम सामाजिकता और संस्कार करते हैं. कई लोगों में मैने यह संस्कार पाये या समय के साथ उद्घाटित हुये.
  • अपने आप को, जो नहीं हैं वह प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति उधर ज्यादा है. ऐसा नहीं है कि वह नजर न आ जाता हो. हर एक व्यक्ति इण्टरनेट पर इतने चिन्ह छोड़ देता है कि पहचाना जा सके कि वह क्या है. देर-सबेर पता चल ही जाता है. इसलिये एग्जीबीशनिस्ट होना कोई फायदे का सौदा नहीं. पर हर एक व्यक्ति इससे इत्तिफाक नहीं रखता. रेलवे में भी यह शो-ऑफ करने की आदत कुछ लोगों में है यद्यपि अपेक्षाकृत कम है. इस मामले में रेलवे ज्यादा सरल समाज है. पर यह कोई बहुत बड़ा प्लस फैक्टर मैं नहीं मानूंगा इधर के पक्ष में.
  • श्रीश का कहना है कि ब्लॉगरी में भाई चारा ज्यादा है. असल में ब्लॉगरी का मूल तत्व ही सामाजिकता और लिंकेज पर आर्धारित है. वहां पर्याप्त वैचारिक आदान-प्रदान और दूसरों का पर्याप्त लिहाज सफलता के मूल तत्व हैं. पर शायद यह संक्रमण काल है. जिन लोगों ने पहले बहुत श्रम से बुनियाद रखी है वे अपनी वरिष्ठता खोना नहीं चाहते और नये लोग बिना श्रम के तकनीकी सहारे से रातोंरात प्रसिद्धि पा लेना चाहते हैं. इसका इलाज मात्र समय के पास है. रेलवे में विभागीय द्वन्द्व के बावजूद इंट्रा-रेलवे भाई-चारा ज्यादा है. जो बात मुझे ब्लॉगरी से विमुख करती है – वह इस मामले में इधर और उधर का अंतर है. अगर मेरे पास समय की कमी होगी तो मैं न केवल अपनी नौकरी के कर्तव्य के कारण, वरन इस फैक्टर के कारण भी उधर से अपने को असंपृक्त कर लूंगा.
  • उधर लोगों में एकाग्रता की कमी बहुत नजर आती है. छोटी-छोटी बातें लोगों को गहन सोच की बजाय ज्यादा रुचती हैं. किसी विषय पर आर-पार गहनता से सोचने की वृत्ति कम है. इधर रेलवे में हम समस्या को समझने, विश्लेषण करने और युक्तियुक्त समाधान ढ़ूंढ़ने में ज्यादा ईमानदारी दिखाते हैं.
  • यद्यपि उत्कृष्टता के द्वीप इधर भी हैं और उधर भी हैं पर अगर व्यक्ति के स्तर पर (संस्थान के पिरामिड का उपयोग न करना हो, तो) उत्कृष्टता के जितने अवसर ब्लॉगरी उपलब्ध कराती है, उतने शायद रेलवे न दे पाये. आपकी पुस्तकें, आपका कैमरा, आपकी सोच और आपका कम्प्यूटर – बस, इसके सहारे आप बड़े जादुई प्रयोग कर सकते हैं. कम से कम उत्कृष्टता की सम्भावनाओं को व्यक्ति के स्तर पर तलाशने में कोई विशेष सीमायें नहीं हैं. पहले के कागज-कलम के लेखन की बजाय वह ब्लॉगरी कहीं अधिक स्वतंत्रता और विविध आयाम प्रदान करती है.

कुल मिला कर अभी ब्लॉगरी के प्रयोग चलेंगे!


विक्तोर फ्रेंकल का आशावाद और जीवन के अर्थ की खोज


जब भी नैराश्य मुझे घेरता है, विक्तोर फ्रेंकल (1905-1997) की याद हो आती है. नात्सी यातना शिविरों में, जहां भविष्य तो क्या, अगले एक घण्टे के बारे में कैदी को पता नहीं होता था कि वह जीवित रहेगा या नहीं, विक्तोर फ्रेंकल ने प्रचण्ड आशावाद दिखाया. अपने साथी कैदियों को भी उन्होने जीवन की प्रेरणा दी. उनकी पुस्तक मैंस सर्च फॉर मीनिंग”*उनके जीवन काल में ही 90 लाख से अधिक प्रतियों में विश्व भर में प्रसार पा चुकी थी. यह पुस्तक उन्होने मात्र 9 दिनों में लिखी थी.

पुस्तक में एक प्रसंग है. नात्सी यातना शिविर में 2500 कैदी एक दिन का भोजन छोड़ने को तैयार हैं क्योंकि वे भूख के कारण स्टोर से कुछ आलू चुराने वाले कैदी को चिन्हित कर मृत्युदण्ड नहीं दिलाना चाहते. दिन भर के भूखे कैदियों में ठण्ड की गलन, कुपोषण, चिड़चिड़ाहट, निराशा और हताशा व्याप्त है. बहुत से आत्महत्या के कगार पर हैं. बिजली भी चली गयी है. ऐसे में एक सीनियर विक्तोर को कैदियों को सम्बोधित कर आशा का संचार करने को कहता है. विक्तोर छोटा सा पर सशक्त सम्बोधन देते हैं और उससे कैदियों पर आशातीत प्रभाव पड़ता है. मैं इस अंश को बार-बार पढ़ता हूं. उससे मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है.उस ढ़ाई पृष्ठों का अनुवाद मैं फिर कभी करने का यत्न करूंगा.

अभी मैं पुस्तक के कुछ उद्धरणों का अनुवाद प्रस्तुत करता हूं, जो यह स्पष्ट करे कि विक्तोर फ्रेंकल की सोच किस प्रकार की थी. विभिन्न विषयों पर फ्रेंकल इस प्रकार कहते हैं:

अपने नजरिये को चुनने की स्वतंत्रता पर:
मानव से सब कुछ छीना जा सकता है. सिवाय मानव की मूलभूत स्वतंत्रता के. यह स्वतंत्रता है
किसी भी स्थिति में अपना रास्ता चुनने हेतु अपने नजरिये का निर्धारण करने की.

वह, जो मुझे मारता नहीं, मुझे और दृढ़ता प्रदान करता है. – नीत्से.

जीवन मूल्यों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध होने पर:
मानव को तनाव रहित अवस्था नहीं चाहिये. उसे चाहिये एक उपयुक्त लक्ष्य की दिशा में सतत आगे बढ़ती और जद्दोजहद करती अवस्था.

तनावों को किसी भी कीमत पर ढ़ीला करना जरूरी नहीं है, जरूरी है अपने अन्दर के सोये अर्थ को उद्धाटित करने को उत्प्रेरित होना.

जीवन के अर्थ की खोज पर:
हमें अपने अस्तित्व के अर्थ की संरचना नहीं करनी है, वरन उस अर्थ को खोजना है.

और हम यह खोज तीन प्रकार से कर सकते हैं – (1) काम कर के, (2) जीवन मूल्य पर प्रयोग कर के और (3) विपत्तियां झेल कर.

अपने कार्य को पूरा करने पर:
एक व्यक्ति जो जानता है कि उसकी किसी व्यक्ति के प्रति कुछ जिम्मेदारी है जो उसके लिये प्रेम भाव से इंतजार कर रहा होगा; अथवा उस अधूरे काम के प्रति जो उसे पूरा करना है, तो वह कभी अपने जीवन को यूंही फैंक नहीं देगा. अगर उसे जीवन के
क्यों की जानकारी है तो वह “कैसी” भी परिस्थिति को झेल जायेगा.

महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम जिन्दगी से क्या चाहते हैं, वरन यह है जिंदगी हमसे क्या चाहती है. हम जीवन के अर्थ के बारे में प्रश्न करना छोड़; प्रति दिन, प्रति घण्टे अपने आप को यह समझने का यत्न करें कि जिन्दगी हमसे प्रश्न कर रही है. हमारा उत्तर ध्यान और वार्ता में नहीं वरन सही काम और सही आचरण में होना चाहिये. जिन्दगी का अर्थ उसकी समस्याओं के सही उत्तर पाने तथा वह जिन कार्यों की अपेक्षा मानव से करती है, उनके पूर्ण सम्पादन की जिम्मेदारी मानने में है.


* – पुस्तक पर विकी लिंक यहां है. आप टिप्पणी कर दें और फिर (यदि लिंक पर जाते हों तो) जायें. :)


गंगा का कछार, नीलगाय और जट्रोफा


हरिकेश प्रसाद सिन्ह मेरे साथ जुड़े इंस्पेक्टर हैं. जो काम मुझे नहीं आता वह मैं एच पी सिन्ह से कराता हूं. बहुत सरल जीव हैं. पत्नी नहीं हैं. अभी कुछ समय पहले आजी गुजरी हैं. घर की समस्याओं से भी परेशान रहते हैं. पर अपनी समस्यायें मुझसे कहते भी नहीं. मैं अंतर्मुखी और वे मुझसे सौ गुणा अंतर्मुखी. राम मिलाये जोड़ी…

एक दिन मैने पूछ ही लिया – जमीन है, कौन देखता है?
बोले – यहां से करीब 20-25 किलोमीटर दूर गंगा के कछार में उनकी जमीन है. करीब 40 बीघा. कहने को तो बहुत है पर है किसी काम की नहीं. खेती होती नहीं. सरपत के जंगल बढ़ते जा रहे हैं.
पूरे चालीस बीघा बेकार है?
नहीं. लगभग 10 बीघा ठीक है पर उसमें भी खेती करना फायदेमन्द नहीं रहा.
क्यों?
मर खप के खेती करें पर जंगली जानवर – अधिकतर नीलगाय खा जाते हैं. नीलगाय को कोई मारता नहीं. पूरी फसल चौपट कर देते हैं.
नीलगाय तो हमेशा से रही होगी?
नहीं साहब, पहले आतंक बहुत कम था. पहले बाढ़ आती थी गंगा में. ये जंगली जानवर उसमें मर बिला जाते थे. अब तो दो दशक हो गये बाढ़ आये. इनके झुण्ड बहुत बढ़ गये हैं. पहले खेती करते थे. रखवाली करना आसान था. अब तो वही कर पा रहा है जो बाड़ लगा कर दिन-रात पहरेदारी कर रहा है. फिर भी थोड़ा चूका तो फसल गयी.

मुझे लगा कि बाढ़ तो विनाशक मानी जाती है, पर यहां बाढ़ का न होना विनाशक है. फिर भी प्रश्न करने की मेरी आदत के चलते मैं प्रश्न कर ही गया – वैसा कुछ क्यों नहीं बोते जो नीलगाय न खाती हो?
एच पी सिन्ह चुप रहे. उनके पास जवाब नहीं था.
मैने फिर पूछा – जट्रोफा क्यों नहीं लगाते? रेलवे तो लाइन के किनारे जट्रोफा लगा रही है. इसे बकरी भी नहीं चरती. अंतत: बायो डीजल तो विकल्प बनेगा ही.

हरिकेश की आंखों में समाधान की एक चमक कौन्धी. बोले – दुर्वासा आश्रम के पास एक सभा हुई थी. जट्रोफा की बात हुई थी. पर कुछ हुआ तो नहीं. लगा कि उन्हे इस बारे में कुछ खास मालुम नहीं है.

लेकिन मुझे समाधान दिख गया. सब कड़ियां जुड़ रही हैं. गंगा में पानी उत्तरोत्तर कम हो रहा है. कछार जंगल बन रहा है सरपत का. नील गाय बढ़ रहे हैं. जट्रोफा की खेती से जमीन का सदुपयोग होगा. खेती में काम मिलेगा. जट्रोफा के बीजों का ट्रांसस्ट्रेटीफिकेशन ट्रांसएस्टेरीफिकेशन के लिये छोटे-छोटे प्लाण्ट लगेंगे. उनमें भी रोजगार होगा. बायोडीजल के लाभ होंगे सो अलग. हरिकेश की पूरे 40 बीघा जमीन उन्हे समृद्ध बनायेगी. वह जमीन जहां आज उन्हे कुछ भी नजर नहीं आ रहा.

गंगा में पानी कम हो रहा है तो कोसना और हताशा क्यों? उपाय ढ़ूंढ़े. फिर मुझे लगा कि मैं ही तो सयाना नहीं हूं. लोग देख-सोच-कर रहे होंगे….भविष्य में व्यापक परिवर्तन होंगे. एच पी सिन्ह की जमीन काम आयेगी.

देखें, आगे क्या होता है.

आप जरा जट्रोफा पर जानकारी के लिये यह साइट देखें.


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