गुज्जर आन्दोलन,रुकी ट्रेनें और तेल पिराई की गन्ध


परसों रात में मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल मुझे उठाता रहा. साहब, फलाने स्टेशन पर गुज्जरों की भीड़ तोड फोड कर रही है. साहब, फलने सैक्शन में उन्होने लेवल क्रासिंग गेट तोड दिये हैं. साहब, फलानी ग़ाड़ी अटकी हुयी है आगे भी दंगा है और पीछे के स्टेशन पर भी तोड़ फोड़ है…. मैं हूं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में पर समस्यायें हैं राजस्थान के बान्दीकुई-भरतपुर-अलवर-गंगापुर सिटी-बयाना के आस-पास की। यहाँ से गुजरने वाली ट्रेनों का कुछ भाग में परिचालन मेरे क्षेत्र में आता है. राजस्थान में गुज्जर अन्दोलन ट्रेन रनिंग को चौपट किये है. रेल यात्रियों की सुरक्षा और उन्हें यथा सम्भव गंतव्य तक ले जाना दायित्व है जिससे मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल और मैं जूझ रहे हैं.

पिछली शाम होते-होते तो और भी भयानक हो गयी स्थिति. कोटा-मथुरा रेल खण्ड पर अनेक स्टेशनों पर तोड़-फोड़. अनेक जगहों पर पटरी से छेड़-छाड़. दो घण्टे बैठ कर लगभग 3 दर्जन गाड़ियों के मार्ग परिवर्तन/केंसिलेशन और अनेक खण्डों पर रात में कोई यातायात न चलाने के निर्णय लिये गये. अपेक्षा थी कि आज रात सोने को मिल जायेगा. जब उपद्रव ग्रस्त क्षेत्रों से गाड़ियां चलायेंगे ही नहीं तो व्यवधान क्या होगा?

पर नींद चौपट करने को क्या उपद्रव ही होना जरूरी है? रात के पौने तीन बजे फिर नींद खुल गयी. पड़ोस में झोपड़ीनुमा मकान में कच्ची घानी का तेल पिराई का प्लांट है. उस भाई ने आज रात में ही तेल पिराई शुरू कर दी है. हवा का रुख ऐसा है कि नाक में तेल पिराई की गन्ध नें नींद खोल दी है.

जिसका प्लांट है उसे मैं जानता नहीं. पुराने तेल के चीकट कनस्तरों और हाथ ठेलों के पास खड़े उसे देखा जरूर है. गन्दी सी नाभिदर्शना बनियान और धारीदार कच्छा पहने. मुंह में नीम की दतुअन. कोई सम्पन्न व्यक्ति नहीं लगता. नींद खुलने पर उसपर खीझ हो रही है. मेरे पास और कुछ करने को नहीं है. कम्प्यूटर खोल यह लिख रहा हूं. गुज्जर आन्दोलन और तेल पिराई वाला गड्ड-मड्ड हो रहे हैं विचारों में. हमारे राज नेताओं ने इस तेल पिरई वाले को भी आरक्षण की मलाई दे दी होती तो वह कच्ची घानी का प्लाण्ट घनी आबादी के बीच बने अपने मकान में तो नहीं लगाता. कमसे कम आज की रात तो मैं अपनी नींद का बैकलाग पूरा कर पाता.

आरक्षण की मलाई लेफ्ट-राइट-सेण्टर सब ओर बांट देनी चाहिये. लोग बाबूगिरी/चपरासी/अफसरी की लाइन में लगें और रात में नींद तो भंग न करें.

अच्छा लिखोगे तभी तो लोग पढ़ेंगे


ब्लॉगरी में अच्छी हिन्दी आये इसको लेकर मंथन चल रहा हे. अज़दक जी लिख चुके हैं उसपर दो पोस्ट. उसपर अनामदास जी टिप्पणी कर चुके हैं. इधर देखा तो नीलिमा जी भी लिख चुकी हैं. शास्त्री जे सी फिलिप जी सारथी निकालते हैं. उनका सारथी ब्लॉग नहीं, ब्लॉग का इन्द्रधनुष है. वे भी हिन्दी की गलतियों से आहत हैं. और लोग भी होंगे जो लिख रहे होंगे.

अच्छी हिन्दी के बारे में दो-तीन आयाम हैं. एक है – उसमें वर्तनी की गलतियां न हों, ग्रामर सही हो और वाक्य अर्थ रखते हों. दूसरा है वह अश्लील न हो; और अश्लील ही नहीं वरन काशी का अस्सी या रागदरबारी छाप तरंग वाली हिन्दी के #@ं%ं&$/*&ं वाले शब्द युक्त न हो. तीसरा है – वह स्टेण्डर्ड की हो; पढ़ने में (फूल की नही) एयर फ्रेशनर की ताजगी का अहसास मिले.

अपना सोचना है कि इस पचड़े में ही न पड़ा जाये कि हिन्दी अच्छी हो या बुरी. उसमें निराला/पंत/अज्ञेय हों या भारतेन्दु/प्रेमचन्द/दिनकर या फिर मस्तराम या सेक्स-क्यायह विचार मंथन व्यर्थ है. जो पठनीय होगा, सो दीर्घ काल तक चलेगा. शेष कुछ समय तक इतरायेगा और अंतत: रिसाइकल बिन में घुस जायेगा.

अच्छी और बुरी हिन्दी के चक्कर में उस ब्लॉगर के उत्साह को क्यों मारा जाये जो मेहनत कर चमकौआ ब्लॉग बनाता है. चार लाइन लिख कर मंत्र-मुग्ध निहारता है. अपनी मित्रमण्डली से चर्चा करता है. पत्नी/प्रेमिका/मंगेतर को बार बार खोल कर दिखाता है. 10-20 लोगों को ई-मेल करता है कि वे ब्लॉग देखें. बन्धु, वह उत्साह बड़ा सनसनी पैदा करने वाला होता है. कम्प्यूटर टेक्नॉलॉजी इतने सारे लोगों में इतना क्रियेटिव उत्साह जगाये यह अच्छी/बुरी हिन्दी के फेर में भरभण्ड नहीं होना चाहिये.

और होगा भी नहीं – आप समझते हैं कि नया चिठेरा इस प्रकार की पाण्डित्यपूर्ण सलाह को सुनेगा – ठेंगे पर रखेगा उसे!

बन्धु, वह सुनेगा तो केवल अपनी हिटास (ब्लॉग पर मिलने वाली हिट्स की अदम्य इच्छा) की डिमाण्ड को. भविष्य में अगर वह पायेगा कि तकनीक के प्रयोग, प्रोमोशन के हथकण्डे और सेनशेसनल विषय के बावजूद लोग उसे नहीं पढ़ रहे हैं तो वह अपने आप सही हिन्दी के लेखन की तरफ मुड़ेगा. नहीं करेगा तो अपनी दुकान बन्द कर देगा.

लोग अच्छी हिन्दी की सलाह जारी रखें. वह भी यज्ञ में आहुति है. पर बहुत आशा न रखें. अंतत: लोगों द्वारा पढ़े जाने की चाह ही अच्छी हिन्दी का शृजन सृजन करायेगी.

चित भी मेरी और पट भी


बचपन में मां चिडिया की कहानी बताती थीं. चिड़िया अपनी कुलही (टोपी) पर इतराती फिर रही थी. कह रही थी कि उसकी कुलही राजमुकुट से भी अधिक सुन्दर है. उसके गायन से तंग आ कर कुलही राजा ने छीन ली थी. चिड़िया गाती फिरी रजवा सैतान मोर कुलही लिहेस.(राजा शैतान है. उसने मेरी टोपी ले ली है.)

चिड़िया के निन्दा करने से भी राजा तंग हो गया. जरा सी कुलही. उसपर इतना सुनना पड़ रहा था. राजा नें कुलही लौटा दी.

अब चिड़िया गाने लगी रजवा ड़ेरान मोर कुलही दिहेस. (राजा ड़र गया. उसने मेरी टोपी लौटा दी.) ”

यानी चित भी चिड़िया की और पट भी. यही हाल हमारे जन मानस का है. निंदा और व्यंग हमारी जीवन शैली है. हमारे अखबार और मीडिया के लोग इसे बखूबी जानते हैं. राजा की झूठी सच्ची निन्दा में बड़ा मन लगता है. वह बिकता जो है.

राजा माने सरकार. राजा माने पूंजीपति. राजा माने वह जिसने प्रभुता प्राप्त कर ली है. इसलिये मेधा पटकर/अरुन्धती राय/वर्वर राव/गदर का मात्र महिमा मण्डन होता है. ये लोग चिड़िया का रोल अदा करते हैं. अमेरिका/सोनिया गान्धी/टाटा/बिड़ला/नरेन्द मोदी/मायावती/राहुल/प्रियंका/बुद्धदेव भट्टाचार्य/…./….. ये सब निशाने पर होते हैं. ये मेहनत करें तो गलत. ये गलतियां करे तो बहुत ही अच्छा!

अब देखें बीएसएनएल ने जनवरी,2007 से ब्रॉडबैंड सेवा सस्ती कर दी. पट से रियेक्शन आया पहले कितना लूट रहे थे ये लोग! फिर बीएसएनएल ब्रॉडबैंड के लिये लाइन लग गयी. कल मैने हिन्दी के अखबार में पढ़ा मार्च से आवेदन पैंडिंग हैं. यह प्राइवेट संचार कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिये किया जा रहा है. अब अगर यह प्राइवेट कम्पनियों को फायदे के लिये किया जा रहा है तो जनवरी में प्राइवेट कम्पनियों की नसबन्दी का प्रयास उसी बीएसएनएल ने क्यों किया?

यह सिनिसिज्म अखबार/मीडिया का नहीं है. वे तो वह परोसते हैं, जो बिकता है. यह सिनिसिज्म समाज का है. समाज में हम-आप आते हैं.

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