असली खुशी की दस कुंजियां


मैं रेलवे स्टेशन पर जीने वाले बच्चों पर किये गये एक सर्वेक्षण के आंकड़ों से माथापच्ची कर रहा था.

जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा चौंकाया; वह थी कि 68% बच्चे अपनी स्थिति से संतुष्ट थे. बुनियादी जरूरतों के अभाव, रोगों की बहुतायत, पुलीस का त्रास, भविष्य की अनिश्चितता आदि के बावजूद वे अगर संतुष्ट हो सकते हैं, तो प्रसन्नता का विषय उतना सरल नहीं, जितना हम लोग मान कर चलते हैं.

अचानक मुझे याद आया कि मैने प्रसन्नता के विषय में रीडर्स डायजेस्ट में एक लेख पढ़ा था जिसमें कलकत्ता के अभाव ग्रस्त वर्गों में प्रसन्नता का इंडेक्स ऊंचा पाया गया था. मैने उस लेख का पावरप्वाइंट भी तैयार किया था. कम्प्यूटर में वह मैने ढूंढा और रविवार का सदुपयोग उसका हिन्दीकरण करने में किया.

फिलहाल आप, “असली खुशी की दस कुंजियां” की फाइल का अवलोकन करें. इसके अध्ययन से कई मिथक दूर होते हैं. कहीं-कहीं यह लगता है कि इसमें क्या नयी बात है? पर पहले पहल जो बात सरल सी लगती है, वह मनन करने पर गूढ़ अर्थ वाली हो जाती है. धन किस सीमा तक प्रसन्नता दे सकता है; चाहत और बुद्धि का कितना रोल है; सुन्दरता और सामाजिकता क्यों महत्वपूर्ण हैं; विवाह, धर्म और परोपकार किस प्रकार प्रभावित करते हैं और बुढ़ापा कैसे अभिशाप नहीं है – यह आप इस पॉवरप्वाइण्ट में पायेंगे:

फर्जीवाडा ग्रेड – IV बनाम शिक्षा में ठगी


भारत लाल (मेरा बंगला पियून) ताजा स्कूप लाया है।

उसकी मंगेतर दसवीं में पढ़ती है। मंगेतर का स्कूल “कान्वेंट” स्कूल है। कान्वेंट माने थोड़ी ज्यादा फ़ीस और अंगरेजी मीडियम। इसाई मठ से कोई लेना देना नहीं है कान्वेंट का। स्कूल चलाते होंगे कोई पंडितजी या लालाजी। निम्न मध्यम वर्ग के बच्चों का स्कूल है। स्कूल में बच्चों और पेरेन्ट्स पर रोब तो पड़ना चाहिये। उसके लिए हर १५-२० दिन में एक नाटक होता है। कहा जाता है कि डिप्टी साहब दौरे पर आ रहे हैं। एक साहब दौरे पर आते हैं। मास्टरानियों और बच्चों से पूछते-पाछते हैं। पूरी नौटंकी होती है।

अब ये कौन इलाहबाद का शिक्षा विभाग का डिप्टी डायरेक्टर है जो हर महीने एक गली के प्राइवेट स्कूल में इंस्पेक्शन को पहुंच जाता है?

भारत लाल मंगेतर के साथ बाजार घूम रहा था की मंगेतर ने बताया की फलां सज्जन जो जा रहे हैं वो स्कूल में आते हैं। वो ही डिप्टी डायरेक्टर हैं। भारत लाल भी ठहरा एक नंबर का खुराफाती। वो फलां सज्जन की पूरी जासूसी कर आया। पता चला की वो सज्जन रेलवे में गार्ड हैं। रेलागाडी के ब्रेकवान में बैठ झन्डी दिखाते हैं। स्कूल में इंस्पेक्शन भी कर आते हैं डिप्टी डायरेक्टर बन कर।

यूपोरियन माहौल पूरा नटवरलाल का हैं। कौन कैसे रंग जमा जाएगा, कौन कैसे चूना लगा जाएगा, कौन कब जालसाजी कर जाएगा, कहा नहीं जा सकता। ये तो आप पर है की आप कितना जागरूक और सतर्क रहते हैं। कितना बच निकलते हैं इस तरह के गोरख धंधों से।

पर नटवरलाली इतनी ज्यादा है कि कभी ना कभी तो चूना लगना तय है।

ठगना और ठगाजना
दोनें ही आसुरिक वृत्तियाँ हैं
क्षणिक लाभ और तृष्णा से प्रेरित
कौन किसे ठगता है?
ठगने व ठगेजाने वाले
एक ही तो हैं

कंटिया भाग दो: कंटिये में तो हम ही फंस गये हैं.


कल की पोस्ट पर एक दूसरे मिसिर जी ने जो गुगली फैंकी; उससे लगता है कि कंटिये में हम खुद फंस गये हैं. छोटे भाई शिव कुमार मिश्र ने जो रोमनागरी में टिप्पणी दी है पहले मैं उसे देवनागरी में प्रस्तुत कर दूं:

“सिस्टम भ्रष्ट है…”

और तब तक रहेगा जब तक मिसिराइन अपने को सिस्टम का हिस्सा नहीं मानतीं…. पूरी समस्या यहीं से शुरू होती है कि तथाकथित समाज खुद को सिस्टम का हिस्सा नहीं मानता. हमारे लिये सिस्टम में नेता, सरकारी अफसर, पुलीसवाले और कानून वाले ही हैं… बड़ा आसान है सिस्टम को गाली देना.

सरकारी अफसर अगर घूसखोरी में लिप्त न रहे तो उसके घर वाले उसे कोसते हैं. अगर अपने किसी रिश्तेदार को (जो निकम्मा है) सिफारिश कर के नौकरी न लगवा दे तो कोई उस अफसर से बात नहीं करता. रिश्तेदार यही कहते मिलेंगे कि कुछ नहीं है इस अफसर में – आज तक किसी का भला नहीं किया.

भ्रष्टाचार के सबके अपने-अपने खण्ड-द्वीप हैं, और सब अपने द्वीप पर सुख से रहना चाहते हैं…

भ्रष्ट कहने को उंगली जब हम किसी की तरफ उठाते हैं तो पंजे की तीन उंगलियां हमारी तरफ फेस करती हैं. हमारी पिछली पोस्ट की मिसिराइन सिस्टम का अंग हैं – इसमें मुझे शक नहीं है. आम आदमी (अगर कोई आम आदमी है तो) जब अपनी सुविधा चाहता है तो भ्रष्टाचार पर चिंतन नहीं करता. जब वह भ्रष्टाचार पर चिंतन करता है तो उसे नेता, सरकारी अफसर, पुलीसवाले और कानून वाले – जो भी उससे अलग हैं; ही नजर आते हैं.

पर छोटे भाई शिव कुमार मिश्र ने सरकारी अफसर के घूस खोर न होने की दशा वाली जो बात कही है, उसने मुझे सोचने पर बाध्य किया है. अगर हम (सरकरी अफसर) भ्रष्ट हैं तो फिर कुछ कहने को बचता ही नहीं. पर अगर नहीं हैं; तो चार चीजें हैं –

  1. हम चुगद हैं. ईमानदारी के प्रतिमान बुन कर उसमें कैकून की तरह फंसे हैं.
  2. हम लल्लू हैं. भ्रष्ट होने को भी कलेजा और कला चाहिये. ईमानदार हैं तो इसलिये कि कायर हैं.
  3. हम आदर्शवादी शहीद हैं. अपने चुनाव से भ्रष्टता को नहीं अपनाते. फिर भी उसमें अपने को अलग दिखाने का भाव तो होता है. मेरी कमीज दूसरे से सफेद है – यह अहसास हमेशा पाले रहना चाहते हैं.
  4. हम जो हैं, सो हैं. दुनियां में हमारे लिये भी स्पेस है. अपनी तृष्णाओं पर हल्की सी लगाम लगा कर जिन्दगी मजे से काट जायेंगे.

अब काफी समय तक अपने बारे में चिंतन चलेगा. कटिये में फंसे रहेंगे. पत्नी को भी परेशान करते रहेंगे; पूछ-पूछ कर कि हम चुगद हैं, लल्लू हैं, शहीद हैं या जो हैं सो हैं. मजे की बात है कि प्राइमा फेसी, पत्नी जी हमें ये चारों बता रही हैं.

अपने खण्ड द्वीप पर मजे में रहने में भी बाधक है यह सोच.

Design a site like this with WordPress.com
Get started