दुनियां में वेब सेंसरशिप बढ़ रही है



फाइनेन्शियल टाइम्स में रिचर्ड वाटर्स का न्यूज आइटम है कि दुनियां में वेब सेंसरशिप बढ़ रही है. तकनीकी विकास का प्रयोग “उल्टी दिशा में प्रगति” हेतु किया जा रहा है.

हार्वर्ड लॉ स्कूल के OpenNet Initiative नामक प्रॉजेक्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया है. दस देश – चीन, ईरान, बर्मा,सऊदी अरेबिया, ट्यूनीसीया, उजबेकिस्तान, तुर्की, बेला रूस, थाई लैण्ड व मिश्र व्यापक पैमाने पर वेब-ब्लॉकिन्ग करते हैं. सेंसर्शिप की नयी तकनीकें – जैसे समय-समय पर विकीपेडिया (चीन में) या गूगल ब्लॉगिंग सेवा (पकिस्तान में) पर पूरी ब्लॉकिन्ग; या “की-वर्ड फिल्टरिंग” के आधार पर संदेहास्पद मेटीरियल ट्रैक करना – प्रयोग में लाई जा रही हैं.

इन्टर्नेट का प्रयोग बढाना व उसपर शिकंजा कसना – दोनो के बीच कशमकश तेज हो गयी है.


इँदारा कब उपेक्षित हो गया?



बचपन में गांव का इँदारा (कुआँ) जीवन का केन्द्र होता था. खुरखुन्दे (असली नाम मातादीन) कँहार जब पानी निकालता था तब गडारी पर नीचे-ऊपर आती-जाती रस्सी (लजुरी) संगीत पैदा करती थी. धारी दार नेकर भर पहने उसका गबरू शरीर अब भी मुझे याद है. पता नहीं उसने इँदारे से पानी निकालना कब बंद किया.

इँदारा अब इस्तेमाल नही होता.

गांव में पहले चाँपाकल (हैण्ड पम्प) आया. अब बम्बे (पाइप वाला नल) से पानी आता है. बारिश के मौसम में लोग ढेंकी भी नहीं चलाते – टुल्लू या डीजल से चलने वाला पम्प इस्तेमाल करते हैं. गाँव जाने का अब मन ही नहीं करता. जिस गाँव के साथ यादें जुडी़ हैं, वह गाँव तो है ही नहीं.

खुरखुन्दे अब बुढा़पे की दहलीज पर है. एक शादी के मौके पर मिला था. अब वह एक ठेली चलाता है. लोगों का सामान ढोता है. पालकी का चलन तो उसके बचपन में ही खतम हो गया था. उसके पिता पालकी ले चलते रहे होंगे. वह ठेली ले कर चलता है. यह काम तो पुश्तैनी सा है, पर पानी खींचना बन्द हो गया. इँदारा जो मर गया.

चीन की लडाई के समय से गाँव छूटा है. उस समय सात साल का रहा होऊंगा. इँदारे में पोटैशियम परमैगनेट मिलाने पर लाल हुये पानी को लेकर हवा उडी़ थी कि चीनियों ने पानी में जहर मिला दिया है. चीनियों को जैसे हमारा गाँव ही टार्गेट लगा हो! पानी फिर भी इँदारे का ही पिया गया था. तब इँदारा जीवन का प्रतीक था. अब वह कोई प्रतीक नहीं है.

अब वह उपेक्षित है.

आज, अपने घर के पास मैने एक इँदारा देखा. दौड़ कर मोबाइल के कैमरे से उसके चित्र ले लिये. यह इँदारा भी इस्तेमाल नहीं होता. इसकी गडारी गायब थी. चबूतरा सलामत था. इसके खम्भे पर इसके निर्माण हेतु दान दाताओं के नाम थे. खम्भे की लिखावट का फोन्ट बताता था कि काफी पुराना होगा. कमसे कम ५-६ दशक पुराना. कभी यह भी जीवन का केन्द्र रहा होगा. अब यह सडक पर जाती मोटर साइकलों, ठेलेवालों, इलाहाबाद में कमरा किराये पर लेकर पढने वाले जवान लड़कों, हैलोजन लैम्प की रोशनी, कचरा खलियाते सूअरों और नाई की दुकान का मूक दर्शक भर है. राह चलते लोगों से पूछें कि कोई कुआँ देखा क्या? तो अधिकांश कहेंगे – नहीं तो.

इँदारा पुरातत्व की चीज भी शायद नहीं है. उसमें कुछ लोगों की रुचि होती है. इँदारा बस उपेक्षित भर है.


सेप्टिक टैंक से जलीय तत्व के डिस्चार्ज की समस्या



इलाहाबाद जैसे शहर में सीवेज डिस्पोजल प्रणाली में प्रणाली कम है, सीवेज ज्यादा है. इस शहर में आने पर मैने देखा कि हमारे घर में सेप्टिक टेंक है, पर उसका जलीय डिस्चार्ज का लेवल समय के साथ नगर पालिका की नाली के स्तर से नीचे हो गया है. सड़कें व उसके समान्तर नालियां कालान्तर में ऊंची हो गयी है. और लोगो ने तो सीधा समाधान निकाला है. उन्होने या तो सेप्टिक टेंक बनाये ही नही, या पुराने सेप्टिक टेंक बाईपास कर दिये हैं. घर के कमोड से सारा एफ्लुएन्ट नाली में बहा देते हैं. वह सब अंतत: गंगा में जाता है. मेरे पास निम्न विकल्प हैं:

  1. सारा एफ्लुएन्ट सीधी नाली में बहा कर गंगा के प्रदूषण में अपना इन्क्रीमेंटल योगदान किया जाये.
  2. नगर पालिका के लोगों को बुला कर हर २-३ महीने बाद सारा टेंक साफ कराया जाये. अगर जलीय डिस्चार्ज का लेवल नाली के स्तर से ऊपर होता तो यह काम २-३ वर्षों मे कराना पड़ता. इस विकल्प में नगरपालिका कर्मियों की अक्षमता को साल में ४-६ बार झेलना और उनकी फीस पर ४-६ हजार का सालाना खर्च निहित है.
  3. जलीय एफ्लुएन्ट को हर महीने एक पम्प से निकाल कर नाली में बहा दिया जाये. इस विकल्प में एक बिजली या पैर से चलने वाला पम्प व एक अच्छे फिल्टर की आवश्यकता होगी. बाकी काम खुद किया जा सकता है.

निश्चय ही, तीसरा विकल्प सस्ता व उपयुक्त लगता है. इतना सोचने के बाद मुझे ऑनलाइन/ऑफलाइन मित्रों के सुझावों की दरकार है. कृपया सुझायें कि २००-३०० लीटर जलीय डिस्चार्ज के लिये कौन सा पम्प और इस काम के लिये कैसा फिल्टर उपयुक्त होगा. वह कहां से मिल सकता है?

(चित्र में एक चेम्बर का सेप्टिक टैंक है. चित्र में दर्शाया “Outlet to absorption field” का लेवल नगरपालिका की नाली के लेवल से नीचा है.)


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