डीग, भरतपुर, राजस्थान


29 मई 2023

राजस्थान में दो शक्तिपीठ बताये गये हैं। एक अलवर-जयपुर के बीच श्री अम्बिका देवी शक्तिपीठ है। यह विराटनगर (वैराट ग्राम) में है। यहाँ विराट की राजधानी के खण्डहर हैं। पाण्डवों ने अपने वनवास का अंतिम तेरहवां वर्ष अज्ञातवास के रूप में यहां व्यतीत किया था।

उसके बाद अजमेर के पास पुष्कर सरोवर के समीप पहाड़ी पर गायत्री मंदिर है। यह मंदिर ही मणिवेदिक शक्तिपीठ है। यहां सती के मणिबंध (कलाईयां) गिरे थे।

प्रेमसागर ने वृन्दावन की चौरासी कोस – 360 किमी – की परिक्रमा के दौरान पश्चिमी भाग में डीग की पदयात्रा पहले ही कर रखी है। इसलिये राजस्थान के शक्तिपीठों के दर्शन के लिये उन्होने डीग को चुना, यात्रा प्रारम्भ करने के लिये।

डीग से श्री अम्बिका और मणिबंध शक्तिपीठ का पैदल मार्ग। कुल दूरी 348किमी।

डीग में पंहुच कर प्रेमसागर ने जाट राजाओं के “जल महल” को एक बार पुन: देखा। सोलहवीं सदी में राजा सूरजमल की ख्याति इन इमारतों से जुड़ी है। प्रेमसागर ने महाराजा बदन सिंह (1722 इस्वी) से प्रारम्भ कर एक दर्जन से अधिक भरतपुर-डीग के जाट राजाओं के नाम मुझे भेजे हैं। इसमें दूसरे महाराजा सूरजमल (1755-1763) सर्वाधिक शौर्यवान थे। यह डियाक जाट राजाओं की गाथा के बारे में नहीं है। पर प्रेमसागर ने जो चित्र उस स्थान के भेजे हैं, उनसे यह तो लगता है कि आज से चार सौ साल पहले भी उन महाराजाओं के पास बुद्धि-कौशल-तकनीकी प्रचुर थी। पर उनका समय धूमकेतु की तरह उभरा, चमका और इतिहास हो गया।

[मैंने महाराजा सूरजमल पर कुंवर नटवरसिंह की पुस्तक किण्डल पर डाउनलोड कर ली है। पर कितनी पुस्तकें पढ़ी जायेंगी? प्रेमसागर की डियाक लेखन के लिये कई पुस्तकों को मैंने ब्राउज किया है। पर उन सबके साथ न्याय तो नहीं ही किया। कभी कभी लगता है कि लिखने की बजाय पढ़ना ज्यादा महत्वपूर्ण है। पर फिर ब्लॉग लेखन समय लेने लगता है।]

यह सोचने का विषय है कि भारत में भिन्न भिन्न स्थानों पर दैदीप्यमान राजाओं के बावजूद भी यूरोप के डच-स्पेनी-पुर्तगाली-फ्रेंच-ब्रिटिश कैसे पूरे भू भाग पर छा गये। और भारत ही नहीं, पूरी दुनियां पर। और आज, जब भारत योरोपीय प्रभुत्व के आर्थिक पक्ष से लोहा लेना चाह रहा है तो ये उसके आड़े आ रही हैं ये जाट-गुर्जर-जट्ट की खाप पंचायतें। ऐसा ही हाल दक्षिण-पूर्व का भी है। धर्म और जाति के आधार पर खींचतान से सम्भव है भारत के हाथ से यह मौका भी निकल जाये।

प्रेमसागर के चित्र बहुत चटक नहीं हैं, पर मोहक हैं। महलों की बनावट, घास के लॉन, जलाशय, गुप्त रास्ते, आज के बाजार – सब अच्छे लगते हैं। पर इन सब की मोहकता भविष्य के भारत को कैसे चमकायेगी, यह प्रश्न मेरे मन में बार बार उभरता है।

महलों के आसपास हरियाली है, पर यह भी लगता है कि आगे बहुत ज्यादा नहीं दीखेगी। एक बैलगाड़ी में पानी के लदे ड्रम दीखते हैं।

डीग, भरतपुर, राजस्थान।

कल से लगभग दो सप्ताह प्रेमसागर को राजस्थान में गुजारने हैं। शक्तिपीठों की यात्रा के बहाने मैं इस प्रश्न को भी टटोलना चाहूंगा। राजस्थान भारत की आर्थिक उन्नति में एक बड़ा रोल अदा कर सकता है। यहां के मारवाड़ी समुदाय ने पिछले सौ साल में भारत को आर्थिक ताकत देने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान किया है। विषम जलवायु के बावजूद जुझारूपन कायम रखना राजस्थान की खासियत है। वह देखना और महसूस करना है।

गोवर्धन, वृन्दावन

प्रेमसागर में ऊर्जा है। मेरे मन मेंं मौसम और स्वास्थ्य को ले कर थकान है। फिर भी देखा जायेगा कि इस डियाक से क्या निकल कर आता है!

जय हो! पधारो राजस्थान!

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

वृन्दावन में पदयात्री


28 मई 2023

कल लिखा था –

प्रेमसागर को कांगड़ा से रानीताल तक किसी सज्जन ने अपने वाहन में जगह दे दी है। अब वे रानीताल पंहुच कर किसी बस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। या हो सकता है कि कोई दूसरे वाहन में उन्हें लिफ्ट मिल जाये। आसपास खड़े लोग भी उनकी सहायता करना चाहते हैं।

उसके बाद विशेष बातचीत नहीं हुई। एक जगह उन्होने बताया कि वे बस में बैठे हैं। होशियारपुर जायेंगे। वहां ट्रेन मिली तो उससे अन्यथा बस से लुधियाना जाना होगा।

फिर?

“फिर ट्रेन से बनारस आऊंगा या फिर प्रयागराज।”

प्रेमसागर अगले चरण की यात्रा के पहले शायद अपने शुभचिंतकों से बात करना चाहते हों। पर कौन हैं वे लोग? कौन हैं जो उनकी शक्तिपीठ यात्रा के प्राइम मूवर हैं? कौन हैं जो उन्हें आगे की यात्रा की बात कहते हैं? कौन हैं जो शक्तिपीठों की अवधारणा के प्रति उनकी सोच पुष्ट करते हैं? … मुझे नहीं मालुम। पूछने पर प्रेमसागर एक सपने की बात करते हैं जो उन्हें बार बार आता रहा है और जिसे किसी से शेयर करने पर उन्होने कहा कि तुमने ज्योतिर्लिंगों की यात्रा कर ली, पर मातृशक्ति की यात्रा तो की नहीं। वह करो। और उनके कहने पर वे चल दिये।

मुझे लगता है कि प्रेमसागर के लिये शैव या शाक्त सोच एक अवलम्ब भर है। खूंटी, जिसपर अपना सतत चलना टांग रखा है। ये शक्तिपीठ सम्पन्न हो जायेंगे तो कोई न कोई और खूंटी ईजाद हो जायेगी यात्रा के लिये। यात्रा का संकल्प उसपर टंग जायेगा और यात्रा जारी रहेगी। … पर यात्रा का भी एक अर्थशास्त्र होता है। उस पक्ष को हमेशा हमेशा के लिये अनदेखा नहीं किया जा सकता। मैं इस बारे में प्रेमसागर को कहता हूं, पर लगता नहीं कि उसका कोई प्रभाव पड़ता है।

आखिर मैं उनकी यात्रा का प्राइम मूवर नहीं हूं।

अगले दिन यानि आज प्रेमसागर की लोकेशन दिल्ली के आसपास दिखी और उसके बाद दिल्ली के आगे। मैंने उन्हें फोन कर पूछा – कहां जा रहे हैं?

“मथुरा जा रहा हूं भईया। वहां से बनारस या प्रयाग, जहां की भी मिलेगी, ट्रेन पकडूंगा।”

“बनारस या प्रयाग के आसपास का कोई शक्तिपीठ तो बचा नहीं जिसके दर्शन बाकी हों। यहां आने का क्या लाभ? पास में ही वृन्दावन है। वहां दो शक्तिपीठ हैं। उनके दर्शन क्यों नहीं करते? और उसके आगे अलवर-जयपुर के बीच महाभारतकालीन विराटनगर में एक शक्तिपीठ है। उसके आगे पुष्कर/अजमेर में गायत्री शक्तिपीठ है। मानसून तो यहां आने में और भी समय लगेगा। इन शक्तिपीठों पर क्यों नहीं जाते?”

श्री माँ चामुण्डा शक्तिपीठ, वृन्दावन, मथुरा।

किरीट सोलंकी जी ने एक ट्वीट में कहा था कि प्रेमसागर आपके लैण्ड-रोवर हैं। उनके माध्यम से आप यात्रा कर ले रहे हैं। मुझे ऐसा कोई मुगालता नहीं है। प्रेमसागर अपनी धुन से करते हैं। वे पांच सात लोगों से पूछते हैं और जो रुच जाये, वह करते हैं। पर, फिलहाल तो वे मेरे कहे के अनुसार उतर गये वृन्दावन। वहां दो शक्तिपीठों के दर्शन किये। चामुण्डा शक्तिपीठ और कात्यायनी शक्तिपीठ। दोनो तीन किलोमीटर के अंतर पर हैं। सम्भवत: चामुण्डा शक्तिपीठ ही वृन्दावन का शक्तिपीठ है। गीताप्रेस की पुस्तक शक्तिपीठ दर्शन में इसी का जिक्र है –

सम्भवत: चामुण्डा शक्तिपीठ ही वृन्दावन का शक्तिपीठ है। गीताप्रेस की पुस्तक शक्तिपीठ दर्शन में इसी का जिक्र है

प्रेमसागर ने दोनो मंदिरों के दर्शन कर लिये। उसके बाद ढेर सारे चित्र मेरे पास भेज दिये हैं। मुझसे उन्होने विराटनगर के अम्बिका शक्तिपीठ का लोकेशन मांगा, वह मैंने उनके पास भेज दिया है। अब देखें वे क्या करते हैं। यह स्थान गोवर्धन हो कर जाता है। वहां की पदयात्रा पहले ही प्रेमसागर कर चुके हैं। अगर जाना हो, तो गोवर्धन से पदयात्रा प्रारम्भ कर सकते हैं। गोवर्धन से यह अम्बिका शक्तिपीठ 142किमी दूर है।

देखें आगे क्या होता है। वृन्दावन के दोनो शाक्त मंदिरों और आगे की यात्रा के बारे में कल लिखूंगा। फिलहाल, मैं वाइरल ज्वर के बाद उबर तो गया हूं, पर पढ़ने लिखने में वह एकाग्रता नहीं है। एक दो दिन लगेगा सामान्य होने में।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

यात्रा के दूसरे चरण की वापसी


27 मई 2023

दूसरे चरण में पांच शक्तिपीठों के दर्शन पूरे किये प्रेमसागर ने। जितनी जद्दोजहद दर्शन करने के लिये थी; उतनी ही वापसी के लिये भी है। एक भी पल ज्यादा रुकने का अर्थ है पैसा खर्च करना। और पैसे उनके पास हैं नहीं। कांगड़ा घाटी की सुंदरता समेटने के लिये उनके पास संसाधन नहीं हैं।

पांच सात सौ साल पहले का जमाना नहीं है जब साधू-संतों की इज्जत किया करते थे ग्रामीण। ग्रामीण और नागरिक बदल गये हैं और साधू संतों ने भी अपनी इज्जत खराब कर ली है। यायावरी का वह मॉडल अब उतना प्रभावी नहीं है।

यह ब्लॉग लेखन – यह डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) कुछ सीमा तक उनकी सहायता करता है। जब उन्हें अपना परिचय देता है तो वे अपने ऊपर लिखी पोस्टों का संदर्भ देते हैं। उससे कुछ लोग प्रभावित होते हैं, कुछ नहीं भी होते। यूं गड्डमड्ड तरीके से काम चल रहा है।

प्रेमसागर को कांगड़ा से रानीताल तक किसी सज्जन ने अपने वाहन में जगह दे दी है। अब वे रानीताल पंहुच कर किसी बस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। या हो सकता है कि कोई दूसरे वाहन में उन्हें लिफ्ट मिल जाये। आसपास खड़े लोग भी उनकी सहायता करना चाहते हैं।

देखें आगे की यात्रा कैसे होती है। वे होशियारपुर या जालंधर कैसे पंहुचते हैं। वहां से उन्हें बनारस आना है और बनारस से मुझसे मिलने आना है। वे आगे की यात्रा का रूट-मैप बनाने के लिये मेरे इनपुट्स मांगेंगे। मुझसे जो उनके शक्तिपीठों की यात्रा में नहीं, उनकी पदयात्रा में रुचि रखता है – वह जो अच्छा यात्रा विवरण न मिलने पर खीझता है और अच्छा कण्टेण्ट मिलने पर मन मयूर हो जाता है।

प्रेमसागर को कांगड़ा से रानीताल तक किसी सज्जन ने अपने वाहन में जगह दे दी है। अब वे रानीताल पंहुच कर किसी बस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। या हो सकता है कि कोई दूसरे वाहन में उन्हें लिफ्ट मिल जाये।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
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