मोहन बरम

यह परिसर – करीब दो बीघे का क्षेत्र – मोहन बरम (मोहन ब्रह्म) का स्थान है। आसपास के दो-तीन सौ किलोमीटर के इलाके के श्रद्धालुओं की प्रेत बाधा दूर करने, मनौती मानने और मनोकामना पूरी होने पर बरम बाबा को धन्यवाद देने आने वालों का स्थान।


आदमी की ऊंचाई की वृहदाकार वेदी (चौरी) के पास बैठी वह महिला झूम रही है। उसके खुले काले बाल कभी उसके मुंह पर आते हैं और कभी झटके से पीछे जाते हैं। वह अर्धचेतनता में गा रही है – मोहन बरम बाबा के बारे में कुछ पंक्तियां। गाते गाते बार बार जमीन पर लोट भी जाती है। सब कुछ बड़ा रहस्ययमय लगता है।

मोहन बरम की विशालकाय चौरी के पास झूमती प्रेत-बाधा ग्रस्त महिला

बड़ी वेदी के पीछे एक पानी का कुण्ड है। ज्यादा बड़ा नहीं। वेदी के सामने एक हवन करने का स्थान है। बायीं ओर पताकायें गड़ी हैं। बांस पर लगे झण्डे हैं जिनकी लोग परिक्रमा करते हैं। एक ओर पुजारी कुछ जजमानों के साथ जमीन पर बैठे हैं। कुछ लोग अपनी बारी का इंतजार कर एक ओर बैठे हैं।

मोहन बरम की विशालकाय चौरी के पास झूमती प्रेत-बाधा ग्रस्त महिला का विडियो

परिसर की चार दीवारी पर लिखा है कि मंदिर अनिश्चित काल के लिये बंद है। कोरोना संक्रमण के समय लोगों के झुण्ड को वहां इकठ्ठे नहींं होने दिया जाता।

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मोकालू गुरू का चपन्त चलऊआ- पोस्ट पर री विजिट

भूत प्रेत, चुड़ैल, ओझा, सोखा का स्पेस गांव के जीवन में, मोबाइल और स्मार्ट फोन के युग में अभी भी है और उनका महत्व कम नहीं हुआ है.



यह मेरी ब्लॉगिंग के सबसे पुराने समय की पोस्ट है. सन 2007 में लिखी. उस समय भरत लाल मेरा बंगलों पियुन था. अपने गांव के किस्से मुझे सुनाया करता था. उसके किस्सों का भी प्रभाव था कि अंततः रिटायरमेंट के बाद उसी गांव – विक्रमपुर – में मैंने बसने का निर्णय लिया.

नेशनल हाइवे 19 (GT Road) के किनारे है गांव विक्रमपुर

भूत प्रेत, चुड़ैल, ओझा, सोखा का स्पेस गांव के जीवन में, मोबाइल और स्मार्ट फोन के युग में अभी भी है और उनका महत्व कम नहीं हुआ है. शिक्षा, मेडिकल सेवायें और औद्योगिक विकास अभी भी लचर हैं. जब तक वे ऐसे रहेंगे, ऑकल्ट का दबदबा बना रहेगा.

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