उन्होने लॉकडाउन में हजारों घर लौटते श्रमिकों को भोजन कराया

सुशील ने जितना बताया उससे यह तो स्पष्ट हुआ कि गांव में भी उत्साही और रचनात्मक लोगों की कमी नहीं है। वर्ना मेरा सोचना था कि यह गांव बड़बोले और अकर्मण्य निठल्लों का गांव है। गांव के प्रति मेरी धारणा बदल गयी।


वे सुशील हैं। सुशील कुमार मिश्र उर्फ बबलू। पास के गांव भगवानपुर में रहते हैं। उनके पिता राजनाथ मेरे अच्छे मित्र हैं। एक रात जया दुबे के घर बाटी भोज के दौरान वे भी आमंत्रित थे। भोजन के दौरान उन्होने बताया कि उन्होने और उनके मित्रों ने लॉकडाउन 1.0 में हाईवे के पास शिवाला पर दस दिन तक भण्डारा चलाया था। ध्येय था अपने घरों को लौटते श्रमिकों के लिये भोजन -पानी और कुछ आराम की सुविधा देना।

बाटी-भोज के अगले दिन मैं सुशील से मिलने गया उनके घर। लगभग आधा घण्टा उनसे चर्चा हुई। ज्यादातर सुशील ने ही बताया।

“फुफ्फा, लॉकडाउन होने पर पहले पहल जो लोग पैदल निकले वे बिना तैयारी के थे। उनके पास सामान नहीं था, खाने को भी नहीं। रास्ते में उन्हें ज्यादा सहायता भी नहीं मिल रही थी। हम लोग देखते थे उन लोगों को जाते। तब मन में आया कि इनके लिये कुछ करना चाहिये।”

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कालीन मजदूरों की वापसी – भदोही से लातेहार

जाते जाते देखा; उनमें से एक पोलियोग्रस्त पैर वाला भी था। बैसाखी लिये। बेचारे मजदूर। एक साइकिल पर दो लोग चलने वाले। कैरियर पर बैठ कर। हर एक के पास एक साइकिल भी नहीं थी। उन्हे देख मुझे सरकार पर क्रोध भी हुआ। पर उस क्रोध का क्या जो कोई समाधान न दे सके!


श्रमिक वापस जा रहे हैं। खबरें हैं मेट्रो शहरोंं से या पंजाब से; उत्तरप्रदेश या बिहार/झारखण्ड जा रहे हैं अपने घर को। शुरुआत में तो हड़बड़ी में निकले। बिना तैयारी। पैदल। या ठेले पर भी। अब थोड़ा व्यवस्थित तरीके से लौट रहे हैं। उनके पास कुछ भोजन की सामग्री भी है। अब जो अपने घर के लिये निकल रहे हैं उनके पास बेहतर सर्वाइवल किट है। वे साइकिल पर हैं।

आसपास की सड‌कों पर जो दिखते हैं, और बहुत नजर आते हैं, उनमें खिन्नता भी है और अकबकाहट भी। क्रोध भी है और नैराश्य भी। कोरोनावायरस के प्रति सतर्कता भी है, पर उससे ज्यादा अपने भविष्य को ले कर अनिश्चितता झलकती है व्यवहार में। सरकार के प्रति क्रोध बहुत मुखर नहीं है। पर है जरूर। इस भाव को भविष्य में विपक्ष, अगर सशक्त हुआ (जो फिलहाल लगता नहीं) तो अच्छे से भुना सकता है।

मैं सवेरे साइकिल सैर में निकला था। गंगा किनारे। घर से करीब सात किलोमीटर दूर निबड़िया घाट पर। वहां सामान्यत: मोटरसाइकिल/मॉपेड खड़ी कर घाट पर मछली खरीदने वाले जाते हैं। भोर में जो केवट जाल डाल कर मछली पकड़ते हैं, उनसे ये दुकानदार खरीद कर या तो कस्बे के बाजार में फुटपाथ पर, या गांवों में फेरी लगा कर बेचते हैं।

वहां, निबड़िया घाट के करार पर मुझे कुछ मोटरसाइकिलें दिखीं और कुछ साइकिलें भी। लोग, जो साइकिल के साथ थे, अपने पीठ पर रुकसैक (पिठ्ठू) लादे थे। वे निश्चय ही मछली खरीदने वाले नहीं थे।

यह दृष्य सामान्य से अलग लगा।

निबड़िया घाट पर करार पर खड़े थे ये साइकिल सवार लोग।

वे लोग आपस में मिर्जापुर जाने की बात कर रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि नाव से गंगा पार करें या सड़क पर बढ़ते जायें। मुझसे पूछा कि सड़क मिर्जापुर की ओर जायेगी?

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रवींद्रनाथ दुबे – एन.आर.वी. और शहर-गांव का द्वंद्व

रवींद्रनाथ जी अपने गांव से हर समय किसी न किसी प्रकार जुड़े रहे हैं। वे मेरी तरह “बाहरी” नहीं हैं।


अगर एन.आर.आई. होते हैं – नॉन रेजिडेण्ट इण्डियन तो वे लोग जो गांव छोड़ कर लम्बे अर्से से मेट्रो शहरों में रहने लग गये हों और जिनकी अगली पीढ़ी वहीं पली-बढ़ी हो; वहीं के सपने देखती हो; वहीं के आचार-विचार-व्यवहार जीती हो; उन लोगों को एन.आर.वी. – नॉन रेजिडेण्ट विलेजर (Non Resident Villager) कहा जा सकता है। इस गांव के श्री रवींद्रनाथ दुबे जी को उस श्रेणी में रखा जा सकता है।

श्री रवींद्रनाथ (सुभाष) दुबे जी

आज रवींद्रनाथ जी गांव (विक्रमपुर) से लसमणा की प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पर सवेरे की सैर करते मिल गये। मैँ साइकिल से वापस लौट रहा था और वे आगे जा रहे थे। बोले कि बड़े डरते डरते घर से निकले हैं। हाइवे पर उन्हे आशंका थी कि कोरोनावायरस सम्बंधी लॉकडाउन में कहीं कोई पुलीस वाला न मिले और अपनी लाठी के जोर पर अभद्रता न कर बैठे। उनके पास एक बढ़िया चमकती बेंत वाली छड़ी थी। पैण्ट और बंडी पहने थे। साफ और सुरुचिपूर्ण वेश। उनका चेहरा सवेरे की सूरज की रोशनी में चमक रहा था। वे अत्यंत शरीफ और सरल लगते हैं। बहुत ही प्रिय और मोहक व्यक्तित्व है उनका।

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कोविड19, दहशत, और शहर से गांव को पलायन – रीता पाण्डेय की पोस्ट

यह दहशत शहर वालों का ही रचा हुआ है! वहां है प्रदूषण, भागमभाग, अकेलापन और असुरक्षा। गंदगी शहर से गांवों की ओर बहती है। वह गंदगी चाहे वस्तुओं की हो या विचारों की। गांव में अभी भी किसी भी चीज का इस्तेमाल जर्जर होने तक किया जाता है। कचरा बनता ही कम है।


कल की पोस्ट के बाद रीता पाण्डेय ने यह लिखा –

मेरी एक परिचित ने फोन पर पूछा कि अगर (गांव में) पित्जा खाने का मन हो तो मैं क्या करती हूं? उन्होने कहा कि वे लोग तो पित्जा और कोल्डड्रिंक के बिना रह ही नहीं सकते। वो तो गांव के इन चीजों के बिना जीवन की सोच भी नहीं सकतीं। मुझे उनपर हंसी आयी।

एक दूसरे परिचित ने कहा कि क्या ग्लैमरस लाइफ है आपकी। इतना बड़ा घर और इतनी हरियाली! बड़े शहर में तो इसका ख्वाब ही देख सकते हैं।

गांव की हरियाली

इन लोगों को अपने और गांव के बारे में यह सब याद आ रहा है कोरोनावायरस के चक्कर में।

गांव में कुछ दिन पहले कुछ यादव और कुछ दलित बस्ती के लोग किराये पर टेक्सी कर मुम्बई से भाग कर आये। दिहाड़ी कमाने वाले लोग हैं वे। जब वहां सब बंद हो गया तो रहने और जीविका के लाले पड़ गये। उनके आने पर गांव वालों ने नाराजगी जताई। बताते हैं कि अभी वे अपने घर में ही हैं और चुपचाप रह रहे हैं।

कुछ सवर्ण भी, जो बाहर नौकरी करते थे, अपने वाहन से परिवार समेत गांव आये। प्रश्न उठा, मन में, कि ये सब लादफांद कर गांव क्यों आ रहे हैं? पहले, हमारे बचपन में, स्कूल कॉलेज बंद होने पर हम लोग भाग कर गांव आते थे और गर्मियों में मजे में यहां रहते थे। अब मेट्रो शहरों में लॉकडाउन है। स्कूल कॉलेज, ऑफिस, बाजार, मनोरंजन के साधन और निकलने-घूमने की जगहें, सब बंद हैं। और दहशत और है, ऊपर से। इससे, जिसके पास विकल्प है, जिसके पास गांव में ठिकाना है; वह वापस दौड़ लगा रहा है (अगर चांस लग रहा है, तब)।

यह दहशत शहर वालों का ही रचा हुआ है! वहां है प्रदूषण, भागमभाग, अकेलापन और असुरक्षा। गंदगी शहर से गांवों की ओर बहती है। वह गंदगी चाहे वस्तुओं की हो या विचारों की। गांव में अभी भी किसी भी चीज का इस्तेमाल जर्जर होने तक किया जाता है। कचरा बनता ही कम है।

गांव की अपनी समस्यायें हैं – शिक्षा की या चिकित्सा की। पर ये भी प्रशासनिक फेल्योर का नतीजा हैं। मनरेगा में पैसा झोंक कर ग्रामीणों को विधिवत अकर्मण्य बनाया गया। और अब खेती जैसे मेहनत के काम में मन न लगना उसी के कारण है।

इन सब के बावजूद; अभी भी गांव सहज है, सामान्य है और जागरूक है। दहशत टेलीवीजन फैला रहा है। वैसे यह भी है कि कोरोनावायरस के प्रति जागरूकता भी टेलीविजन से ही आयी है। दूसरे, शहर से भाग कर गांव में आने वाले गांव को कहीं ज्यादा भयभीत कर रहे हैं। वर्ना, गांव की आंतरिक रचना में किराना, दूध, सब्जी जैसी रोजमर्रा की चीजों की कोई समस्या नहीं।

गांव

हां, पित्जा और कोल्डड्रिंक नहीं मिल रहा है! पर वह इस माहौल में तो शहरियों को भी नसीब नहीं है! 😆