लौटे प्रवसियों की प्राथमिकता कोरोना से बचाव नहीं, रोजगार है #गांवकाचिठ्ठा

यह जो बड़ी संख्या में आबादी आ कर गांव में टिकी है, वह यह नहीं पता कर रही कि यहां अस्पताल कितने हैं; कितने बिस्तर उनमें कोविड19 के लिये हैं; … वे यह जानना चाहते हैं कि रोजगार कब, कहां और कैसे मिलेगा।


मई 23, 2020, विक्रमपुर, भदोही

अखबार में कहीं पढ़ा कि आरएसएस ने कोई आंतरिक सर्वे कराया है जिसमें प्रवासी पलायन कर वापस आये साठ फीसदी मजदूर कहते हैं कि मौका लगने पर वे वापस लौटेंगे, अपने काम पर। मैंने जिससे भी बात की है – वापस लौटने वाले से, वह कोविड समस्या से बड़ी समस्या अपने रोजगार की मानता है। पर, फिलहाल, वापस जाने के लिये अभी लोग दुविधा में हैं।

हरिशंकर से मिला था तो उनका कहना था कि सूरत से आते समय उनके मन में यह पक्की धारणा थी कि वापस नहीं जाना है; यद्यपि उनका 10 हजार का घरेलू सामान वहां रखा हुआ है। ठाकुर साहब, जिनके कमरे में हरिशंकर किराये पर रहते थे, उन्होने अगले दो-चार महीने किराया न लेने की बात कही है। इस दौरान वैसे भी कोई और किरायेदार मिलता भी नहीं।

हरिशंकर, सूरत से वापस लौटे हैं
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उन्होने लॉकडाउन में हजारों घर लौटते श्रमिकों को भोजन कराया

सुशील ने जितना बताया उससे यह तो स्पष्ट हुआ कि गांव में भी उत्साही और रचनात्मक लोगों की कमी नहीं है। वर्ना मेरा सोचना था कि यह गांव बड़बोले और अकर्मण्य निठल्लों का गांव है। गांव के प्रति मेरी धारणा बदल गयी।


वे सुशील हैं। सुशील कुमार मिश्र उर्फ बबलू। पास के गांव भगवानपुर में रहते हैं। उनके पिता राजनाथ मेरे अच्छे मित्र हैं। एक रात जया दुबे के घर बाटी भोज के दौरान वे भी आमंत्रित थे। भोजन के दौरान उन्होने बताया कि उन्होने और उनके मित्रों ने लॉकडाउन 1.0 में हाईवे के पास शिवाला पर दस दिन तक भण्डारा चलाया था। ध्येय था अपने घरों को लौटते श्रमिकों के लिये भोजन -पानी और कुछ आराम की सुविधा देना।

बाटी-भोज के अगले दिन मैं सुशील से मिलने गया उनके घर। लगभग आधा घण्टा उनसे चर्चा हुई। ज्यादातर सुशील ने ही बताया।

“फुफ्फा, लॉकडाउन होने पर पहले पहल जो लोग पैदल निकले वे बिना तैयारी के थे। उनके पास सामान नहीं था, खाने को भी नहीं। रास्ते में उन्हें ज्यादा सहायता भी नहीं मिल रही थी। हम लोग देखते थे उन लोगों को जाते। तब मन में आया कि इनके लिये कुछ करना चाहिये।”

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