बटोही ने पहले गाँव-देहात दिखाया। दस किलोमीटर की परिधि में — शरबतखानी से जगतानंद धाम, पचेवरा से गिर्दबड़गांव — सब उसके साथ नापा। वह अब भी नाप सकती है। पर मेरे घुटने अब उतनी मेहनत की इजाज़त नहीं देते। इसीलिये ईबटोही आई। बटोही अब दूसरे रोल में है। रोज़ चालीस-साठ मिनट घर-परिसर में गोल-गोल चक्कर।Continue reading “दो साइकिलों की कहानी”
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अमेरिका के माइकल और उनके डाउज़र्स
रविशंकर जी का फोन आया एक दिन पहले — अगियाबीर का फिर एक चक्कर लगने वाला है कल। साथ में प्रोफेसर अशोक सिंह भी रहेंगे और एक अमेरिकी सज्जन भी हैं। वे आर्कियॉलॉजिस्ट नहीं हैं। वे कहते हैं अर्थ एनर्जी पर काम कर रहे हैं। हमें भी ठीक से नहीं मालुम कि यह कौन साContinue reading “अमेरिका के माइकल और उनके डाउज़र्स”
धनरा भुंजईन की भरसायँ
दूध लेते जाते मैं रोज वह पत्तियों का ढेर और भरसायँ देखता था। भरसायँ यानी मिट्टी का वह गोलाकार चूल्हा जिसमें दाना — चना, मक्का — भूना जाता है। गाँव में अभी भी दिख जाती है सड़क किनारे। मुझे रोज यह भी नजर आता है कि पत्तियों का जखीरा बढ़ रहा है। पर दाना भूननेContinue reading “धनरा भुंजईन की भरसायँ “
