दूध लेते जाते मैं रोज वह पत्तियों का ढेर और भरसायँ देखता था। भरसायँ यानी मिट्टी का वह गोलाकार चूल्हा जिसमें दाना — चना, मक्का — भूना जाता है। गाँव में अभी भी दिख जाती है सड़क किनारे। मुझे रोज यह भी नजर आता है कि पत्तियों का जखीरा बढ़ रहा है। पर दाना भूननेContinue reading “धनरा भुंजईन की भरसायँ “
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महामृत्युंजय पाठ का भंडारा – अगियाबीर की एक शाम
कल प्रेमनारायण मिश्र जी रात पौने नौ बजे आये। वे चित्रकूट धाम से लौट रहे थे और आज होने वाले भंडारे का निमंत्रण देने आये थे। रात का समय, यात्रा की थकान, और उसके बावजूद उनका आग्रह—इससे ही आयोजन का भाव समझ में आ रहा था। प्रेमनारायण जी के यहां सात दिवसीय महामृत्युंजय मंत्र-जाप हुआContinue reading “महामृत्युंजय पाठ का भंडारा – अगियाबीर की एक शाम”
युद्ध से मुक्ति की जुगत
गांवदेहात डायरी तीन दिन से हमने गैस स्टोव का प्रयोग नहीं किया। हम लाई-चना या केले पर जिंदा नहीं रहे, न ही बाजार से पका हुआ भोजन खरीदा। घर में रोटी, पराठा, सब्जी, दाल, चावल—सब कुछ बना। स्वाद भी मिला और पौष्टिकता भी बनी रही। हमने न लकड़ी जलाई, न उपले खरीदे, न कोयले काContinue reading “युद्ध से मुक्ति की जुगत”
