होरमुज़ बंदी और रसोई के कार्बन फुटप्रिंट 


दो अलग दिशाओं में जाती गांव की रसोई 

गांवदेहात डायरी

युद्धों का असली प्रभाव विभीषिकाओं और त्रासदियों में नहीं, लोगों की आदतों में होने वाले परिवर्तन में दिखाई देता है। फारस की खाड़ी और होरमुज़ जलडमरूमध्य मेरे गांव से लगभग 2600 किलोमीटर दूर है। वहां क्या हो रहा है—इससे गांव वालों को सीधा कोई लेना-देना नहीं। पर उसका असर यहां तक पहुंचा है।

मार्च के पहले सप्ताह के अंत तक गांव रसोई गैस की किल्लत से परिचित हो गया। असली दिक्कत तब महसूस हुई जब छोटे सिलिंडर में गैस भरकर बेचने वालों ने हाथ खड़े कर दिए। चाय-समोसे की गुमटियों के शटर बंद हो गए। बम्बई-पूना में काम करने वाले कुछ लड़के वापस आने लगे। उपले, जो एक रुपये के मिलते थे, रातोंरात दो रुपये के हो गए।

उपले बनाने वाली महिलाओं ने उनका आकार भी छोटा कर दिया। झगड़े होने लगे—“ई उपरी अहई कि चपरी?”

मेरा ड्राइवर मेरे घर परिसर में सर्दियों की पेड़-छंटाई से बची सारी लकड़ियां बीन ले गया। लोग लकड़ी और धान की भूसी तलाशने लगे—अपनी रसोई के लिए।

कुल मिलाकर लगभग पूरा गांव अपनी एलपीजी पर निर्भरता आधी से भी ज्यादा घटाकर लकड़ी, उपला और भूसी पर दुगना निर्भर हो गया। गांव की रसोई का कार्बन फुटप्रिंट अनुमानतः 200–300 प्रतिशत बढ़ गया होगा।

मेरे घर में उल्टा हुआ। मैंने अपना सोलर पैनल बढ़ाया—2 kVA से 3 kVA किया। मेरे पास इंडक्शन चूल्हा पहले से था, एक 400 वाट का राइस कुकर भी खरीदा। कुल मिलाकर ₹34,000 का एकमुश्त खर्च किया।

घर की अधिकांश कुकिंग हमने दिन के समय शिफ्ट की, ताकि सोलर चार्जिंग के समय ही पकाने का काम हो। सब्जियों को तलने की बजाय उन्हें स्टीम करने और एक चम्मच तेल में सॉटे करने की विधा अपनाई। रोटियां बनाने के लिए इंडक्शन तवे का प्रयोग किया।

रोज शाम को मैं पूछने लगा—आज गैस का बर्नर ऑन हुआ क्या? हुआ तो कितनी देर के लिए?

गैस अब भी रसोई की मेज पर बीच में राजा की तरह रखा है, पर अब लगता है कि तीन-बर्नर स्टोव की जगह एक छोटा सिंगल-बर्नर रख लिया जाए, और उसे बीच से हटाकर कोने में सरका दिया जाए।

हम अब लगभग 90 प्रतिशत कुकिंग इंडक्शन और राइस कुकर पर—वह भी सोलर ऊर्जा से—कर रहे हैं। रसोई का कार्बन फुटप्रिंट 80–85 प्रतिशत घट गया है।

पहले गैस सिलिंडर 30–35 दिन चलता था। अब 42 दिन हो गए हैं, और उसे उठाने पर लगता है कि आधे से ज्यादा भरा हुआ है। शुरुआती दिनों की तुलना में अब गैस का उपयोग लगातार घटता गया है। अभी बरसात आने में तीन महीने हैं—तब तक सौर ऊर्जा अच्छी मिलेगी और एलपीजी पर निर्भरता शायद 10 प्रतिशत के आसपास रह जाएगी।

होरमुज़ की घटनाओं ने हमारी रसोई पर भी असर डाला है और गांव के बाकी लोगों पर भी—पर हम अलग-अलग दिशाओं में चले हैं।

सत्तर साल की उम्र में मैं कोई नेरेटिव गढ़ने या समाज को बदलने का सपना नहीं देखता। मैं अपना घर ही बदल लूं—वही काफी है। इस मुकाम पर हम वह करने में सफल रहे हैं।

 — ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
12 अप्रेल 2026 

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सवेरे के सपने 


धूमिल यादें

प्रोस्टेट की दवाई अब अपने हिसाब से काम करने लगी है। रात में दो-तीन बार उठना होता है, कभी-कभी चार बार भी। किताबों में और यूट्यूब वाले बताते हैं कि शाम छह बजे के बाद पानी न पिया जाए, तो बेहतर रहता है। पर वह सब किताबी बातें हैं।

रात तीन बजे नींद खुल गई। आधा-पौना घंटा इधर-उधर करने के बाद फिर नींद आई—पर सपनों वाली।

नींद में भी मैं जानता हूं कि मैं रिटायर हो गया हूं। पर बंगला रेलवे का है, फोन रेलवे का है, तामझाम रेलवे का है। मुझे बताया जाता है कि पूना के पास कोई रेल दुर्घटना हो गई है। कंट्रोलर अनुरोध-सा करता है—“सर, आप चले जाएं साइट पर।”

नींद में भी मैं जानता हूं कि अब वह मेरा काम नहीं है। पर एक चाहत बची है—एक्सीडेंट साइट की अनिश्चितता को मैनेज करने की चाहत। अनहोनी को हेड-ऑन झेलने या संभालने की चाहत।

जिंदगी भर वह अनहोनी, वह सरप्राइज एलिमेंट हमेशा रहा है। रेल परिचालन सामान्य भी चले, तब भी वह आकस्मिक घटनाओं से भरा रहता है। उसे झेलने-निपटाने के लिए हर तरह के कर्मचारी होते हैं। पर सबको शीर्ष पर बैठे एक अफसर की जरूरत होती है—एक खूंटी की, जिस पर सारी जिम्मेदारी टांग कर निश्चिंत हो काम किया जा सके।

वह खूंटी रहा हूं पूरी नौकरी भर। जूनियर पद पर था तो छोटी खूंटी था। शीर्ष पर आया तो खूंटी बड़ी हो गई। उस पर ढेर सारी जिम्मेदारियां लाद दी जाती थीं। वह खूंटी ज्यादा ऑर्नामेंटल थी, ज्यादा चमकदार—पर थी तो खूंटी ही।

रिटायरमेंट के बाद वह खूंटी नहीं रही। पर सपनों में, यदा-कदा, मैं खूंटी बन ही जाता हूं। आज भी बना।

मैंने कंट्रोलर से कहा—नींद में—“शुक्ला जी, अब तो नए अफसर को कहिए। मैं तो रिटायर हो गया हूं।”
पर शुक्ला का कहना था—“सर, आपके बिना गए काम नहीं चलेगा।”

मन में अभी भी कोई एषणा है जो ‘सेंस ऑफ इम्पॉर्टेंस’ तलाशती है। मुझे अच्छा लगता है शुक्ला जी का यह कहना। स्वप्न में मैं तैयार होता हूं एक्सीडेंट साइट पर जाने के लिए। एक फोन कर कंट्रोलर से पूछ भी लेता हूं—“मेरा कैरिज तैयार है? मेरे इंस्पेक्टर और चपरासी को बुला दिया है?”

और तभी साढ़े छह बज जाते हैं। पत्नीजी की आवाज आती है—“उठना नहीं है? सवेरे बदाम छीलना और चाय बनाना आपका काम है। आज करोगे या मैं करूं?”

अनमने भाव से मैं उठता हूं। योगेश्वर कृष्ण और मां गायत्री के चित्रों को प्रणाम करता हूं, धरती को हाथ लगाता हूं। नया दिन प्रारम्भ हो गया है—रिटायर्ड जिंदगी का एक और दिन…

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
12 अप्रेल 2026 

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पैदल चलती महिलायें 


धूमिल यादें

तब और अब का समय 

मेरे घर के सामने की सड़क से भांति-भांति के लोग आते-जाते हैं। हर एक के पास अपनी कहानी होगी। सवेरे बनारस और प्रयागराज जाने वाली पैसेंजर पकड़ने वाले लोग गुजरते हैं—तेज़ चाल चलते हुए। कभी गोद में एक बच्चा लिये और दूसरे को लगभग घसीटती महिलायें दिखती हैं। कभी सिर पर बेलपत्र और दूब के गीले गट्ठर लिये औरतें।

सुबह के समय हंसिया और झोला/कपड़ा लिये महिलायें खेत की निराई-कटाई या ताल से चारा काटने के ध्येय से जाती दिखती हैं। लौटते समय सबके सिर पर घास के गट्ठर होते हैं। शाम को मेला-बाजार से लौटती महिलायें होती हैं—हाथ में सब्ज़ी की पन्नियां लटकाये।

आज दो औरतें हमारे घर के सामने रुक कर देर तक बातें करती रहीं। फिर दोनों अलग-अलग दिशाओं में चली गईं। उन्हें देख कर पत्नीजी की अपने बचपन की धुंधली स्मृतियां उभर आईं।

उनका ननिहाल गंगापुर में है—बनारस से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर। उनकी नानी उन्हें और उनके छोटे भाई को रिक्शे से अक्सर बनारस ले जाया करती थीं। गंगापुर की चमरऊटी में कुछ रिक्शेवाले थे; एक दिन पहले ही तय हो जाता कि अगले सवेरे बनारस जाना है।

ऐसे ही एक बार वे बनारस जा रहे थे कि रास्ते में एक पेड़ की छाया में बैठी एक महिला दिखी। कुछ पहचानी-सी लगी। नानी ने रिक्शेवाले से कहा—“तनी रोकु, अमोला लगत बा।”

अमोला गर्भवती थी—छः-सात महीने का गर्भ। गंगापुर की ही थी। पैदल ही बनारस के लिए निकल पड़ी थी। थकी तो रास्ते में आराम करने रुक गई।

गर्भवती स्त्री और पंद्रह किलोमीटर की पैदल यात्रा—तब यह असंभव नहीं था। आज तो ऐसा दृश्य अजूबा लगे।

नानी ने स्नेह भरी गाली देकर अमोला को बुलाया, अपने पास रिक्शे पर बिठाया और नीचे बैठे दो छोटे बच्चे—मेरी पत्नी और उनका भाई।

यह आज से साठ-पैंसठ साल पहले का समय था। तब गरीबी भी थी और साधनों की कमी भी। लोग उस कमी को अपने श्रम और इरादों से पूरा करते थे।

अमोला के यहां तो गरीबी कोई घटक नहीं हो सकता था। उसके पति रेलवे में काम करते थे। उसके साथ तो आदत का ही मामला रहा होगा — लोग, यहां तक कि गर्भवती महिलायें भी पांच-आठ कोस चलना सहज मानते रहे होंगे।

पर आज की अपनी मजबूरियाँ भी हैं। दूरी वही है, पर समय सिमट गया है। काम के घंटे बँधे हैं, जिम्मेदारियाँ फैली हुई हैं, और शरीर पर भी उतना भरोसा नहीं रहा जितना पहले था। सुरक्षा, सुविधा और जल्दबाज़ी—तीनों मिलकर हमें पैदल चलने से दूर ले आये हैं।

अब तो दो किलोमीटर चलने के लिए भी ऑटो खोजा जाता है।

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
11 अप्रेल 2026

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