औरंगाबाद के रंजन कुमार

औरंगाबाद के रंजन कुमार

गांवदेहात डायरी

वह आगे चलता दिखा—दो झंडे लिये। एक तिरंगा और एक धर्म को दर्शाता तिकोना। मैं पीछे से साइकिल पर था। चलते-चलते ही उसका चित्र लिया और फिर उसके पास जाकर साइकिल रोक दी। पूछा—यह क्या लिये हैं और कहां जा रहे हैं?

उसने कहा—“राधे राधे।” मैंने अपना प्रश्न दो बार दोहराया। दोनों बार वही उत्तर—“राधे राधे।” जब मैंने भी “राधे राधे” कहकर उसका अभिवादन स्वीकार किया, तब संवाद खुला।

वह रंजन कुमार है। गांव गोरहाँ, जिला औरंगाबाद, बिहार से आया है। खाटू श्याम तक की यात्रा पर है। अभी तक 200 किलोमीटर चल चुका है। आगे 900 किलोमीटर और जाना है। मैंने उसके पैरों को देखा – चप्पल नहीं है। नंगे पैर। शायद गर्मी से बचाव के लिये उसने दोनो पैरों में क्रेप-बैंडेज बांध रखे हैं। यह भी हो सकता है पैरों में छाले पड़े हों।

बिना पैसे के निकला है। हाथ में मोबाइल है। उसने मुझसे एक सेल्फी लेने का अनुरोध किया। मुझे पूर्व दिशा की ओर—उल्टी दिशा में—मुड़ने को कहा। उसे पता था कि सवेरे के गोल्डन ऑवर में तस्वीर साफ आती तस्वीर लेने के लिये फ्रंट नहीं बैक कैमरे का इस्तेमाल किया उसने। यह भी ध्यान रखा कि रीयर कैमरा ज्यादा मेगा-पिक्सल का है।

उसने धर्म वाला झंडा एक हाथ में थामा था। तिरंगा झंडा पीठ में खोंसा हुआ था। दूसरे हाथ में खाटूश्याम जी की फोटो थी। मुझे उसने फोटो को एक ओर से पकड़ने को कहा फोटो लेने के लिये।

रंजन कुमार के चित्र से एआई द्वारा बनाई पेंटिंग

तस्वीर लेने के बाद उसने बताया कि अपने गांव में बेसहारा वृद्धा-विधवा महिलाओं के लिए एक आश्रम बनाना चाहता है। इस यात्रा के जरिये वह खाटू श्याम जी से अपने प्रोजेक्ट के लिए आशीर्वाद मांगने जा रहा है।

यहीं से मेरे भीतर सवाल उठने लगे।

बिना पैसे के यात्रा का अर्थशास्त्र क्या है? आज के समय में ऐसे यात्रा करते नौजवान कैसे दिख रहे हैं मुझे? नौकरी-रोजगार की कमी है—तो क्या यह एक तरह का पलायनवाद है? या यह रील-इंस्टाग्राम-फेसबुक के दौर का “लाइक-गिनक-टूरिज्म” है?

अस्सी के दशक में अमृतलाल वेगड़ ने नर्मदा परिक्रमा करते बाबाओं को उद्धृत करते लिखा था—परकम्मा पर लोग निकलते हैं जिससे पेट भी भर जाता है और पांव भी पूज जाते हैं। तब भी यात्रा में एक अर्थशास्त्र था—और एक सामाजिक स्वीकृति भी।

शायद वह धारणा आज भी कहीं बनी हुई है। बस उसमें अब सोशल मीडिया जुड़ गया है। रील, लाइक्स, फॉलोअर्स—ये नए “पांव पूजने” के तरीके हैं। अब पेट भी भर सकता है और प्रोफाइल भी।

रंजन कुमार दो झंडे लिये है—तिरंगा और खाटू श्याम जी का झंडा। दो झंडे लेकर चलना दुगना श्रम है। पर वह अपने ध्येय को एक साथ राष्ट्रीय और धार्मिक रूप दे रहा है। शायद इससे उसकी यात्रा की अपील बढ़ती है। शायद इससे रास्ते में मिलने वाले लोगों से उसे ज्यादा सहानुभूति, ज्यादा सहयोग मिलता है। यह एक तरह की नेटवर्किंग भी हो सकती है—अनजाने में या जान-बूझकर।

मेरे भीतर का विश्लेषक उसकी भावना की परतें खोलना चाहता है—जैसे किसी फल को काटकर देखना कि अंदर क्या है। लेकिन मैं अपने आप को रोकता हूँ। हर भावना को डाइसेक्ट करना जरूरी नहीं होता।

फिर भी एक बात साफ दिखती है—उसके द्वारा ली गई सेल्फी किसी न किसी सोशल मीडिया अकाउंट पर जाएगी। वहां उसका उपयोग होगा—शायद उसकी यात्रा के दस्तावेज के रूप में, शायद समर्थन जुटाने के लिए, शायद केवल साझा करने के लिए।

और हो सकता है, रंजन कुमार के जरिये मुझे भी कुछ लाइक्स मिल जाएँ।

अब दुनिया लाइक्स गिनकों की है। जीडी को भी पीछे नहीं रहना चाहिए?

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
14 अप्रेल 2026

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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