कैच नम्बर बाईस


मे रे दफ्तर के पास एक दिन सवेरे हादसा हो गया। एक मोटर साइकल पर पीछे बैठी स्कूल जाने वाली लड़की ट्रक की टक्कर में फिंका गयी। उसका देहांत हो गया। आस-पास वाले लोगों ने ट्रक फूंक कर यातायात जाम कर दिया। दफ्तर आते समय करीब चार पांच किलोमीटर लम्बा ट्रैफिक जाम पाया मैने। एक घण्टा देर से दफ्तर पंहुचा। ड्राइवर ने जिस बाजीगरी से कार निकाल कर मुझे दफ्तर पंहुचाया, उससे मेरा रक्तचाप शूट कर गया होगा। हाथ में का अखबार और वह किताब जिसे पढ़ते हुये मैं सीरियस टाइप लगता होऊंगा, हाथ में ही धरी रह गयी। ट्रेफिक जाम पर मन ही मन जवानी के दिनों की सुनी-बोली अंग्रेजी गालियों का स्मरण होने लगा। दांत पीसते हुये; वेलेण्टाइन दिवस पर रूमानियत की बजाय; गालियों के स्मरण से मैं जवान बन गया।

पर गालियां तो डायवर्शन हैं सही रियेक्शन का। गालियां आपको अभिजात्य या चिर्कुट प्रोजेक्ट कर सकती है। पर वे आपके सही व्यवहार का पर्याय नहीं बन सकतीं। सड़कों पर दुर्घटनायें होती हैं। ट्रेन में भी होती हैं।

पूर्वांचल का कल्चर है कि कुछ भी हो – फूंक डाला जाये। यातायात अवरुद्ध कर दिया जाये। जाम-झाम लगा दिया जाये। समय की इफरात है। सो समय जिसको पिंच करता हो उसको परेशान किया जाये।

पूरे कानपुर रोड (जहां दुर्घटना हुई) पर दोनो तरफ दुकाने हैं सूई से लेकर हाथी तक मिलता है इनमें। दुकानें चुकुई सी (छोटी सी) हैं और बेशुमार हैं। उनका आधा सामान सामने के फुटपाथ पर रहता है। ढ़ेरों दुकाने पोल्ट्री और मांस की हैं जो अपने जिन्दा मुर्गे और बकरे भी सड़क के किनारे बांधे या जाली में रखते हैं। सर्दी के मौसम में रजाई-गद्दे की दूकान वाले सड़क के किनारे सामान फैलाये रहते हैं। धानुका वहीं फुटपाथ पर धुनकी चलाते रहते हैं। आटो ठीक करने वाले फुटपाथ पर आटो के साथ पसरे रहते हैं। गायें आवारा घूमती हैं। लोग अनेक वाहन पार्क किये रहते हैं। लिहाजा पैदल चलने वाले के लिये कोई जगह नहीं बचती। दुपहिया वाहन वाला एक ओर पैदल चलने वालों से बचता चलता है (जिनमें से कई तो फिदाईन जैसी जुझारू प्रवृत्ति रख कर सड़क पर चलते और सड़क पार करते हैं) और दूसरी ओर हैवी वेहीकल्स से अपने को बचाता है।

मुझे रीयल क्रिमिनल वे लगते हैं जो सड़क के आसपास का फुटपाथ दाब कर यातायात असहज कर देते हैं। यही लोग कोई दुर्घटना होने पर सबसे आगे रहते हैं दंगा-फसाद करने, वाहन फूंकने या यातायात अवरुद्ध करने में। उनकी आपराधिक वृत्ति सामान्य जन सुविधा में व्यवधान पंहुचाने में पुष्ट होती है और उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई न हो पाने से उनके हौसले बुलन्द होते जाते हैं।

फुटपाथ बन्द होने से दुर्घटनायें होती हैं। दुर्घटना होने पर फुटपाथ छेंकने वाले ही हंगामा खड़ा करते हैं। हंगामा करने पर उनका फुटपाथ अवरुद्ध करने का अधिकार और पुष्ट होता जाता है। अतिक्रमण और बढ़ता है। फिर और दुर्घटनायें होती हैं। यह रोड मैनेजमेण्ट का सर्क्युलर लॉजिक है – कैच २२।

मैं अगले रोड जाम की प्रतीक्षा करने लगा हूं।

 
और लीजिये, पण्डित शिवकुमार मिश्र की बताई दिनकर जी की कविता “एनारकी” का अंश:

“और अरे यार! तू तो बड़ा शेर दिल है,
बीच राह में ही लगा रखी महफिल है!
देख, लग जायें नहीं मोटर के झटके,
नाचना जो हो तो नाच सड़क से हट के।”

“सड़क से हट तू ही क्यों न चला जाता है?
मोटर में बैठ बड़ी शान दिखलाता है!
झाड़ देंगे तुझमें जो तड़क-भड़क है,
टोकने चला है, तेरे बाप की सड़क है?”

“सिर तोड़ देंगे, नहीं राह से टलेंगे हम,
हां, हां, चाहे जैसे वैसे नाच के चलेंगे हम।
बीस साल पहले की शेखी तुझे याद है।
भूल ही गया है, अब भारत आजाद है।”

यह कविता तो दिनकर जी ने आजादी के बीस साल बाद लिखी थी। अब तो साठ साल हो गये हैं। आजादी और पुख्ता हो गयी है! :-)

मैने कहा न कि मेरी पोस्ट से ज्यादा बढ़िया टिप्पणियां होती हैं। कल पुराणिक जी लेट-लाट हो गये। उनकी टिप्पणी शायद आपने न देखी हो। सो यहां प्रस्तुत है –
रोज का लेखक दरअसल सेंसेक्स की तरह होता है। कभी धड़ाम हो सकता है , कभी बूम कर सकता है। वैसे , आलोक पुराणिक की टिप्पणियां भी ओरिजनल नहीं होतीं , वो सुकीर्तिजी से डिस्कस करके बनती है। सुकीर्तिजी कौन हैं , यह अनूपजी जानते हैं।
लेख छात्रों के चुराये हुए होते हैं , सो कई बार घटिया हो जाते हैं। हालांकि इससे भी ज्यादा घटिया मैं लिख सकता हूं। कुछेक अंक पहले की कादम्बिनी पत्रिका में छपा एक चुटकुला सुनिये-
संपादक ने आलोक पुराणिक से कहा डीयर तुम मराठी में क्यों नहीं लिखते।
आलोक पुराणिक ने पूछा -अच्छा, अरे आपको मेरे लिखे व्यंग्य इत्ते अच्छे लगते हैं कि आप उन्हे मराठी में भी पढ़ना चाहते हैं।
नहीं – संपादक ने कहा – मैं तुम्हारा मराठी में लेखन इसलिए चाहता हूं कि सारी ऐसी तैसी सिर्फ और सिर्फ हिंदी की ही क्यों हो।

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

21 thoughts on “कैच नम्बर बाईस

  1. आपने आलोक जी की टिप्पणी दोहराई तो हम भी अपनी बात दोहरा रहे हैं , टिप्पणी हो तो उनके जैसी और कोई अगर जवाब दे सकता है तो अनूप जी लगता है आज फ़िर उनका नेट खराब है। कुछ गालियाँ संजीत के साथ बैठ हम भी सीख लेंगे दो कारण हैं – एक तो जब संजीत अपनी नयी नयी विध्या का प्र्योग करें तो अपने को समझ आना चाहिए( नहीं तो ऑस्ट्रेलियन और हममें क्या फ़र्क रह जाएगा) दूसरे ये मुसीबत हमें भी रोज झेलनी पढ़ती है

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