विदर्भ की आत्महत्याओं का तोड़ (वाकई?)



मुझे झेंप आती है कि मेरे पास विदर्भ की समस्या का कोई, बेकार सा ही सही, समाधान नहीं है। वैसे बहुत विद्वता पूर्ण कहने-लिखने वालों के पास भी नहीं है। सरकार के पास तो नहियंई है। वह तो मात्र कर्ज माफी का पेड़ लगा कर वोट के फल तोड़ना चाहती है।



श्रीयुत श्रीमोहन पाण्डेय

हमारे साथी अधिकारी श्रीयुत श्रीमोहन ने एक पते की बात बताई है। उनका गांव बलिया जिला में है। गरीबी का मूल स्थान है बलिया। और आज भी गरीबी की भीषणता के दर्शन करने हों तो वहां जाया जा सकता है।

करनराम, गांव दामोदरपुर, पास का रेल स्टेशन फेफना, जिला बलिया के निवासी थे। वे 96 साल की जिन्दगी काट कर दुनियां से गये। उनके अपने पास एक इंच जमीन नहीं थी। गांव में एक बाग में संत की समाधि की देखभाल करते थे करनराम जी। आसपास की लगभग एक बीघा की जमीन में अरहर, पटसन, चना – जो भी हो सकता था बो लेते थे। कुछ और कमाई के लिये पाजामा-कुरता-नेकर आदि देसी पहनावे के वस्त्र सिल लेते थे। उनकी पत्नी उनकी मृत्यु से तीन साल पहले मरी थीं। अर्थात दोनो पूरी जिन्दगी काट कर दुनियां से गये। एक लड़का था जिसे चतुर्थ श्रेणी में एफ सी आई में नौकरी मिली थी और जो अपने बूते पर अफसर बन गया था; पर करन राम जी ऐसे स्वाभिमानी थे कि लड़के से एक रत्ती भी सहायता कभी नहीं ली।


ढ़ोल

करनराम जी के पास खाने को कुछ हुआ तो ठीक वरना पटसन के फूलों की तरकारी बना कर भी काम चलाते थे। सदा मस्त रहने वाले जीव। किसी भी मेले में उनकी उपस्थिति अनिवार्य बनती थी। चाहे बलिया का ददरी मेला हो या गड़वार के जंगली बाबा के मन्दिर पर लगने वाला मेला हो। बड़े अच्छे गायक थे और ढ़ोल बजाते थे। अभाव में भी रस लेने का इंतजाम उनकी प्रकृति का अंग बना हुआ था। उन्हे अवसाद तो कभी हुआ न होगा। भले ही भूखे पेट रहे हों दिनो दिन।

करनराम जी एब्जेक्ट पावर्टी में भी पूरी जिन्दगी मस्त मलंग की तरह काट गये। और पूर्वांचल में करनराम अकेले नहीं हैं। यहां भूख के कारण मौत हो सकती है। पर विदर्भ की तरह के किसानों के सपने टूटने के अवसाद की आत्महत्या वाली मौतें नहीं होतीं। लोगों ने अपनी कृषि से कैश क्रॉप के अरिथमैटिक/कैश-फ्लो वाली अपेक्षायें अपने पर लाद नहीं रखी हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बेचे स्वप्न बिना वास्तविकता का डिस्काउण्ट लगाये उन लोगों ने स्वीकार नहीं कर लिये हैं। उन सपनों के आधार पर हैसियत से ऊपर के कर्ज नहीं ले रखे हैं। मितव्ययता/फ्रूगालिटी उनके गुणसूत्र में है। गंगा की बाढ़ ने सहस्त्राब्दियों से अभावों को सहजता से लेना उन्हे सिखाया है। आप एक आध चारवाकवादी को उद्धृत भले कर दें यहां के; पर सामान्य जनसंख्या करनराम जी की तरह की है।

करनराम जी का उदाहरण शायद विदर्भ का एण्टीडोट हो। न भी हो तो भी उसपर विचार करने से क्या जाता है। अपनी अपेक्षायें कम करने और थोड़े में प्रसन्नता ढ़ूंढ़ना ही तो समाधान है। और कोई समाधान भी तो नहीं है। है भी तो लफ्फाजी की चाशनी में लिपटा यूटोपिया है!

आप भी सोचें!


मुझे पक्का यकीन है कि बुद्धिवादी मेरी इस पोस्ट को खारिज करने का पूरा मन बनायेंगे। देश के आर्थिक विकास की बजाय मैं फ्रूगालिटी की बात कर रहा हूं। और असली बात – किसान की आत्महत्या का इतना बढ़िया मुद्दा मिला है सरकार पर कोड़े बरसाने का, उसे छोड़ मैं पटसन के फूलों की तरकारी की वकालत कर रहा हूं।

“सरकारी मुलाजिम हूं न! सो सरकार के पक्ष के लिये मामला डाइवर्ट कर रहा हूं!”