रेल माल-यातायात का रोचक प्रकार


toy_train_BW चूंकि मैं आजकल रेलवे में माल यातायात का प्रबन्धन देख रहा हूं और नित्यप्रति की ४००-४५० माल गाड़ियों का आदान-प्रदान देखता हूं उत्तर-मध्य रेलवे पर, मैं एक एक ट्रेन का ध्यान नहीं रख सकता कि किस मालगाड़ी में कहां से कहां के लिये क्या जा-आ रहा है। मोटे तौर पर यातायात का स्ट्रीम स्पष्ट होता है। पर कभी कभी कुछ नये प्रकार का यातायात दीखता है जिससे पता चलता है कि लोग किस प्रकार के उद्यम करते हैं। मैं यहां एक उदाहरण दूंगा।

महीना भर पहले ईस्ट कोस्ट रेलवे के मेरे काउण्टर पार्ट का फोन आया कि मैने कण्टेनर में लौह अयस्क लदान कर उनके बन्दरगाह पर भेज दिया है और चूंकि कण्टेनर रेलवे के वैगन नहीं होते, उन्हे लौह अयस्क जैसे पदार्थ को रेलवे के इतर वैगन में लदान पर घोर आपत्ति है। रेलवे की नीति के अनुसार लौह अयस्क जैसा सदा से चल रहा ट्रैफिक रेलवे के अपने वैगनों में जाना चाहिये।

मुझे भी आश्चर्य हुआ – मेरे गांगेय क्षेत्र में कहां से लोहे की खदान आ गयी कि कोई खुराफाती व्यवसायी उसे ला कर कण्टेनरों में लदान करने लगा। तहकीकात करने पर रोचक तत्व पता चला। इस क्षेत्र में लोहे का सरिया या अन्य लोहा काटने-रेतने से जो बुरादा निकलता है, उसे इकठ्ठा किया जाता है, उसे कण्टेनर में लदान कर पूर्वी क्षेत्र के बन्दरगाहों को भेजा जाता है। वहां से यह उन पूर्वी एशियाई देशों को निर्यात होता है जहां लोहे की खदाने नहीं हैं। चूंकि यह बुरादा लगभग पूरी तरह लोहा होता है – काफी दाम मिलते होंगे निर्यात में उसके! मैं कल्पना कर सकता हूं कि छोटे छोटे लड़के या छोटी इकाइयां यह बुरादा इकठ्ठा कर कबाड़ी को देते होंगे, फिर उनसे ले कर कोई बड़ा कबाड़ी एक निर्यात का व्यवसाय करता होगा। कुल मिला कर बड़ा कबाड़ी एक रेक के निर्यत में उतना कमा लेता होगा, जितनी मेरी जिन्दगी भर की पूरी बचत होगी! चूंकि यह लौह अयस्क (आयरन ओर) नहीं, लौह चूर्ण (आयरन डस्ट – एक नये प्रकार का यातायात) था, उसका कण्टेनर में लदान गलत नहीं पाया गया।

पर हाय, हम अफसर क्यों हुये, कबाड़ी क्यों न हुये!

मित्रों हम माल यातायात को और गहराई में प्रोब करें तो बिजनेस के बहुत अनोखे प्रकार-विचार ज्ञात होंगे।

पर इतना कमिटमेण्ट हममें है कहां कि वह सब समझें और फिर नौकरी को लात मार व्यापार में हाथ अजमायें!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

22 thoughts on “रेल माल-यातायात का रोचक प्रकार

  1. आप बिजनेस इत्र की शीशियों का करें या कबाडी का लेकिन प्लीज़ ब्लॉग लिखने के लिए इतना समय जरूर निकाल लीजियेगा जितना इस रेलवे की नौकरी में निकाल लेते हैं :D

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  2. ज्ञान दादा यह लौह चूर्ण स्पार्क इरोजन/वायर कट जैसी सी एन सी मशीनो से निकलता है,मोटा धंधा है .कुछ पैसे का जुगाड करो,शुरू कर लेते है,इस काम के लिये जगह मैने ढूढ ली है यही रेल लाईन के किनारे रेलवे की बहुत अच्छी जगह है.्कोई किराया भी नही देना :)

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  3. हम सब कबाड़ी ही हैं। कुछ रेल का करते है, कुछ खेल का करते हैं। कुछ लोहे का करते हैं, कुछ आटे का करते हैं। बड़े बड़े विकट तर्क हैं जी। एक टीवी चैनल के लिए काम कर रहा था तो एक दिन किसी शराब एसोसियेशन का लैटर आया, जिसमें बजट से पहले डिमांड की गयी थी कि पूरी लिक्वर इंडस्ट्री को कृषि का दर्जा दिया जाये। तर्क था कि शराब अंगूर आदि फलों से बनती है। बीयर पर भी यही तर्क लागू किया गया था।तर्क विकट था। जमाये रहिये।

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  4. भगवान् का लाख लाख शुक्र है कि आप अफसर हुए कबाड़ी नहीं हुए. अगर होते तो इस ब्लॉग पर क्या लिखते? रोचक कयास लगाये जा सकते हैं. चिट्ठाजगत का भीषण नुकसान होता. वैसे कहीं कहीं कुछ कबाडी अफसर भी होते ही हैं.

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  5. आप ने भी खूब कही ,सर….हम अफसर क्यों हुये..कबाड़ी क्यों ना हुये। वैसे आप की पोस्ट से बहुत नवीन जानकारी प्राप्त हुई कि कुछ लोगों में इतनी ज़्यादा एंटरप्रयोरशिप है ….शायद तभी तो कहते हैं कि ज़रूरत अविष्कार की जननी है!!

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  6. बस आईडिया इकट्ठा करते रहिये, नाती पोतों को सुनाने के काम आयेंगे. :)हर क्षेत्र के धनात्मक और ऋणात्मक पहलू होते हैं, इसमें भी होंगे. मगर पॉजिटिव थिकिंग में बुराई नहीं-मन को अच्छा लगता है. जी, आप जारी रहिये. हम सुन रहे हैं.

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  7. नौकरीया पर लात मारने के लिए जिगर लोहाबादी होना चाहिए वरना जानते हैं न कि पत्नी सील-बट्टा लेकर जब दौडेगी तो दिन में भी लोहे का बुरादा ही नजर आएगा … :) :)

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