कन्नन


श्री कन्नन

कन्नन मेरे साथ चेन्नै में मेरे गाइड और सहायक दिये गये थे।

छब्बीस और सताईस अक्तूबर को भारतीय रेलवे के सभी १६ जोनल रेलवे के चीफ माल यातायात प्रबंधकों की बैठक थी। उस बैठक के लिये उत्तर-मध्य रेलवे का मैं प्रतिनिधि था। मेरे स्थानीय सहायक थे श्री कन्नन।

दक्षिण में भाषा की समस्या होती है उत्तरभारतीय के लिये। वह समस्या विकटतम होती है तमिळनाडु में। श्री कन्नन यद्यपि हिन्दी में पर्याप्त “छटपट” नहीं थे। पर मेरा और मेरी पत्नीजी का काम सरलता से चल गया।

कन्नन तेरुनलवेलि जिले के मूल निवासी थे पर बहुत अर्से से चेन्नै के पास चेंगलपेट में अपनी जमीन ले कर घर बना कर रह रहे हैं। रोज वहीं से दक्षिण रेलवे मुख्यालय में वैगन मूवमेण्ट इन्स्पेक्टर की नौकरी करने आते हैं। वे फ्रेट इन्फॉर्मेशन सिस्टम में वैगन के आंकड़ों का रखरखाव का काम देखते हैं। उनकी रेलवे पर कितने वैगन हैं। कितने नये आ रहे हैं, कितने कण्डेम हो कर निकाले जाने हैं वैगन मास्टर में – ये सब उनके कार्य क्षेत्र में आता है।

जब मीटिंग सत्ताईस अक्तूबर को समाप्त हो गयी तो दोपहर तीन बजे के बाद हमारे पास चार पांच घण्टे बचे जिसमें आसपास देखा जा सके। उसमें मैने चेन्नै से पचास-साठ किलोमीटर दूर मामल्लपुरम् (महाबलीपुरम्) जाना चुना। उस यात्रा के बारे में मैं पहले ही लिख चुका हूं।

वहां के रास्ते में मैने यूं ही कन्नन से पूछ लिया – आप किसके समर्थक हैं? कलईग्नार करुणानिधि के या जे जयललिता के? डीएमके के या अन्ना डीएमके के?

कन्नन का बहुत स्पष्ट उत्तर था – सार, आई डोण्ट हैव फेथ इन ऐनी ऑफ देम। दे आर आल द सेम। (सर मुझे उनमें से किसी पर भी भरोसा नहीं है। वे सब एक जैसे हैं।) कन्नन जैसा राजनैतिक मोहभंग इस समय अनेकानेक भारतीय महसूस कर रहे हैं।

उन्होने सोचा कि उनका उत्तर शायद काफी ब्लण्ट था। “सॉरी सार, अगर आपको ठीक न लगा हो।”

मैने कहा – नहीं, इसमें खराब लगने की क्या बात है। बहुत से भारतीय ऐसा सोच रहे हैं।

कन्नन स्वयम् प्रारम्भ हो गये:

सर, मैं अपने काम से काम रखता हूं। अढ़तालीस किलोमीटर दूर से दफ्तर आता हूं और कभी दफ्तर आने में कोताही नहीं की। समय से पहले दफ्तर आने के लिये एक घण्टा पहले घर से निकलता हूं। छुट्टी नहीं करता। मेरी ज्यादा तर कैजुअल लीव लैप्स होती हैं।

– सर, मैने अपनी शादी में सौ रुपया दहेज भी नहीं लिया। इसके बहुत खिलाफ हूं। शादी के बाद मेरे दो लड़के हुये। उसके बाद मैने दो लड़कियां गोद ली हैं। सर, आजकल लोग जन्म लेते ही या जन्म लेते ही या जन्म के पहले ही लड़कियों को मार रहे हैं। मैने सोचा उस सोच का विरोध करने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता कि लड़कियां गोद ली जायें।

मैं कन्नन के कहने से गद्गद् हो गया। हम महानता के बड़े बड़े रोल मॉडल ढूंढ़ते हैं। यहां एक रेलवे के निरीक्षक हैं जो शानदार रोल माडल हैं। उस क्षण से कन्नन के प्रति मेरा पैराडाइम बदल गया!

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कन्नन ने हमें मामल्लपुरम दिखाया – पूरे मनोयोग से एक एक स्थान। समुद्र किनारे मैं जाने को उत्सुक नहीं था। पर वे बड़े आग्रह से हमें वहां ले कर गये। समुद्र की लहरों में हिलाया। मामल्लपुरम के समुद्र की लहरों में खड़े होने और सीशोर मन्दिर देखने का आनन्द कन्नन की बदौलत मिला, जो अन्यथा मैं न लेता/ ले पाता।

हमने मामल्लपुरम में कन्नन से विदा ली। मैं उनसे गले मिला। एक छोटी सी भेंट का आदानप्रदान किया। और पूरी चैन्ने वापसी में उनके प्रति मन में एक अहोभाव बना रहा।

कन्नन जी को नहीं भूलूंगा मैं!

मामल्लपुरम


महाबलीपुरम् ॥ मामल्लपुरम्

दिनांक २८ अक्तूबर’२०१२: 

पिछली बार मैं मामल्लपुरम् (महाबलीपुरम्) आया था सन् १९७९ में। तब यहां भीड़ नहीं थी। गिने चुने वाहन, लोग और दुकानें। कल यहां गया तो लगा मानो मद्रास यहीं चला आया हो। टूरिज्म का विस्फोट।

पिछली बार एक लड़की मुझसे भीख मांग रही थी। बमुश्किल आठ नौ साल की रही होगी। कुछ न मिलने पर वह तमिळ में कोई लोकप्रिय गाना गा कर कैबरे की मुद्राओं में नृत्य करने लगी थी। मुझे बहुत कष्ट हुआ था यह देख कर कि बचपन में रोटी की तलाश कैबरे छाप नृत्य करने को बाध्य कर रही थी उसे। … मैने उसे तब भी भीख नहीं दी थी, पर और लोगों से वह कुछ पा गयी।

अब की बार तो बाजार की संस्कृति पूरे यौवन पर थी। लोगों के पास अपने कैमरे थे। कुछ जोड़े थे अपने में ही बात करते और अनेक मुद्राओं में फोटो खींचते खिंचाते। महिलायें थीं जो अनेक स्थानों पर बैठी खीरा या चना चबैना बेच रही थीं। दुकानें थीं जहां टूरिस्ट लोगों को लुभाने वाला टिलिर पिलिर सामान मिल रहा था।

हमारे साथ दक्षिण रेलवे के सुपरवाइजर श्री कन्नन थे। वे स्थानीय दुभाषिये का भी काम कर रहे थे और हमारे गाइड का भी। एक लड़की – सतरह अठारह साल की होगी, मुझे कांच की मालायें बेचने का यत्न कर रही थी – १०० रुपये की पांच। वह बढ़ते बढ़ते सौ रुपये में दस तक आ गयी – पर मेरी पत्नीजी ने बिल्कुल मना कर दिया। वह कहने लगी खाने को कुछ मिल जायेगा उसे अगर हम खरीद लेंगे। कन्नन जी ने उसे डपट कर भगा दिया। … मैं उसे पचास रुपये देना चाहता था.. बाद में पत्नीजी को बताया भी मैने कि उसकी शक्ल को ध्यान से देखो – कितना सौन्दर्य है उसमें। कहते हैं कि दक्षिण में नारियां सांवली भले ही होती हैं पर फीचर्स उनके बहुत शार्प होते हैं – सुन्दर नैन-नक्श। तभी दक्षिण की कई नेत्रियों ने मुम्बई का फिल्म जगत फतह कर रखा है। उस लड़की के दो तीन फोटो ही मैं क्लिक कर पाया। उससे अगर मालायें खरीद लेते तो शायद बेहतर फोटो ले पाता मैं।

मामल्लपुरम मद्रास से पचास-साठ किलोमीटर की दूरी पर कांचीपुरम जिले में है। यह पल्लव राजाओं के समय में बन्दरगाह था। यहां सात पैगोड़ा (मन्दिर थे)। कहते हैं पाण्डव रहे थे यहां मामल्लपुरम में – एक ही चट्टान को काट तराश कर उन्होने गुफायें बनाई थीं। यहां के पत्थर पर उकेरे हाथी और जुयें बीनते बन्दर तो जगत प्रसिद्ध हैं। भारत की किसी भी सांस्कृतिक ऐतिहासिक पुस्तक में उनका उल्लेख-चित्र शामिल होगा। वैसे यहां का स्थापत्य बौद्ध विहारों की भी याद दिलाता है। पर पल्लवन राज्य में बौद्ध प्रभाव था या नहीं – मुझे ज्ञात नहीं। फिर भी, मुझे पूरे भ्रमण के दौरान भीम और अर्जुन याद आते रहे। इतनी रुक्ष चट्टानों में जान भरने में उनकी भूमिका अवश्य महत्वपूर्ण रही होगी। एक गुफा में मैने अपना चित्र भी खिंचवाया। एक लड़की एक गुफा में अपना माडलिंग वाले पोज़ में फोटो खिंचा रही थी, मैने उसका और खींचने वाले का चित्र ले लिया।

लगता है मामल्लपुरम में विभिन्न सांस्कृतिक प्रभावों का घालमेल है। यह मन्दिरों का स्थान नहीं है – यह जरूर स्पष्ट है।

मामल्लपुरम/महाबलीपुरम में एक गोल चट्टान जाने कैसे एक कोने पर टिकी है। पत्नीजी का फोटो उसके पास खींचा।

ग्रेनाइट चट्टानों पर चढ़ाई चढ़ते उतरते सांस फूलने लगी और अहसास होने लगा कि स्वस्थ बहुत टंच नहीं है। पर अच्छा इतना लग रहा था कि स्वास्थ्य की ऐसी तैसी कहा! घूमना पूरा किया और उसके बाद समुद्र के किनारे जा कर लहरों में हिला भी, उने गिना भी।

चेन्नै से दोपहर सवा तीन बजे रवाना हुये थे। वापस लौटे तो रात के साढ़े आठ बज गये थे। हम थक गये थे और हम बहुत प्रसन्न थे महाबलीपुरम् जा कर! 

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बोबिल्ली से मद्रास का सफर


दिनांक – पच्चीस अक्तूबर, २०१२

इस पोस्ट का शीर्षक लिखते समय एक बारगी लगा कि नाम मद्रास नहीं चेन्नै होना चाहिये। पर मद्रास से स्मृतियां जुड़ी हैं। शायद सन ७९ में एक बार मद्रास आया था, तब वह मद्रास था। आकाशवाणी पर तमिळ उद्घोषिका का उच्चारण सुनाई देता था – चेन्नै पतनम। उस समय लगता था कि वह क्या नाम बोल रही है! कालान्तर में नाम चेन्नै हो गया। अभी एक चेन्नै पर पुस्तक पढ़ी – बिश्वनाथ घोष की “तमरिण्ड सिटी”। उसमें है कि विजयनगरम राज्य के स्थानीय प्रतिनिधि दमर्ला वेंकप्पा के पिता चेन्नप्पा के नाम पर यह नाम तमिळ लोगों द्वारा प्रयोग किया जाता था। दमर्ला वेंकप्पा ने अंग्रेजों को फोर्ट सेण्ट जॉर्ज के निर्माण के लिये जगह दी थी और उसकी ख्वाहिश थी कि जगह को उसके पिता चेन्नप्पा के नाम पर जाना जाये। पर मछेरों का वह गांव जहां फ्रांसिस डे ने किला बनाने की सोची थी, मद्रासपतनम के नाम से जाना जाता था। अंग्रेजो ने वही नाम जारी रखा।

सो मद्रास या चेन्ने – दोनो ही नाम तमिळ हैं। और उनमें अंग्रेज बनाम तमिळ का राष्ट्रवाद नहीं आड़े आता।

खैर मद्रास तो मैं २५ अक्तूबर की दिन-रात की यात्रा कर २६ के भोर में पंहुचूंगा। यह विवरण असल में बोबिल्ली से कोरोमण्डल तट के उत्तरी किनारे का होगा। उसके बाद – तेनाली के आगे तो रात हो चुकी होगी। कोरोमण्डल तट पर तो रात जल्दी घिरती है इलाहाबाद की अपेक्षा!

बोबिल्ली स्टेशन आने के पहले का दृष्य

फिलहाल आज सवेरे जब नींद खुली तो बोबिल्ली जंक्शन आ रहा था। रात में जब सोया था तो मेरा डिब्बा गार्ड के डिब्बे के बाद सबसे पीछे लगा था। जब उठा तो वह इंजन के साथ गाड़ी का पहला डिब्बा था – रात में कहीं न कहीं इंजन रिवर्सल हुआ होगा। अब यह इंजन चेन्नै तक मिनट मिनट पर हॉर्न बजाता यह अहसास कराता रहेगा कि मैं ट्रेन में यात्रा कर रहा हूं।

वैसे हर अधिकारी को यह लगता है कि वह अगर इंजन के आसपास हो तो ट्रेन ड्राइवर जरा ज्यादा ही हॉर्न बजाता है।


बोबिल्ली के बाद का दृष्य

बोबिल्ली ट्रेन कम ही रुकी – दो पांच मिनट। यहां से समुद्र तट लगभग ४०-५० किलोमीटर पूर्व-दक्षिण में होगा। फिर भी पेड़ों के प्रकार बदले नजर आ रहे थे। आम और नीम की बजाय ताड़ ने उनका स्थान ले लिया था। बोबिल्ली के आस पास जल भी काफी दिखा – वैसा जैसा तटीय क्षेत्रों में नजर आता है। धान की फसल थी खेतों में। और नहीं, धान ही धान।

पौने आठ बजे आया विजयनगरम्। पूरे प्लेटफार्म पर किसी आपसी समझ के आधार पर हॉकर्स टेबल लगा कर इडली-वडा-सांभर-चटनी बेंच रहे थे। गाड़ी रुकते ही लोग उनपर टूट पड़े।

विजयनगरम् में इड़्ली-वड़ा बेचता हॉकर

साढ़े सात रुपये का एक पीस वड़ा और पांच रुपये की इडली सस्ते ही जान पड़े। मैने उतर कर वह खरीदा और खाने में स्वाद वास्तव में अच्छा था – यात्रा में पहली बार दक्षिण भारतीय स्वाद मिला। स्टेशन पर पीले रंग के फूल बहुत सुन्दर लग रहे थे। उनके पेड़ को जाने क्या कहते हैं। फूल कनेर की तरह के थे – उनसे अलग और कुछ ज्यादा चटक।

स्टेशनों पर हिन्दी के हिज्जों की बनावट बदल गयी थी। मानो उनमें भी नारियल और इमली का जायका भर गया हो। नामों का प्रकार भी बदल गया था – विजयनगरम्, कण्टकापल्लि, कोत्त्वलसा, विशाखापतनम्…

स्टेशन पर पीले रंग के फूल बहुत सुन्दर लग रहे थे। पेड़ को जाने क्या कहते हैं।

विशाखापत्तनम दस बजे आना था, कुछ जल्दी आ गया। यहां भी टेबल लगा कर हॉकर्स इडली-वड़ा बेंच रहे थे। चूं कि नाश्ते का समय लगभग बीत चुका था, उनपर यात्री टूट कर नहीं पड़े। पर फिर भी ठीक ठाक बिक्री हुई होगी इस अल्लपुझा एक्स्प्रेस से।

सफेद झख कुरता-पायजामा और स्कल कैप लगाये मुसलमान व्यापारी/आढ़तिये पार्सल लदाई देख रहे है।

यहां पार्सल लोडिंग बहुत थी। मछली लोड हो रही थी। सफेद झख कुरता-पायजामा और स्कल कैप लगाये मुसलमान व्यापारी/आढ़तिये पार्सल लदाई देख रहे थे। उनके हाथ में मैने मंहगे वाले मोबाइल भी देखे। मछली जल की रानी है, इन्हे बनाती है अमीर! मछलियों के ट्रॉली पर भी मैने नीम्बू-मिर्च के टोटके लटके पाये। यह टोटका उत्तर-दक्षिण सब ओर पाया जाता है। अल्लापुझा एक्स्प्रेस से मैने बोरियों मेम् मिर्ची जैसा कुछ उतरते भी देखा। एक पीस निकाल कर देखा तो शंका समाधान हो गया – मिर्च नहीं वह फली जैसी कोई सब्जी थी।

एक विक्षिप्त दिखा। खम्बे के चबूतरे की बैंच पर गर्मी में कम्बल ओढ़ कर लेटा था और बार बार बड़बड़ाते हुये हाथ पैर फटकता था। फटकने के बाद सरके हुये कम्बल को फिर से सहेजता था और फिर हाथ पैर फटकने लग जाता था। ऐसे विक्षिप्त उत्तर में भी हैं और दक्षिण में भी।

राजमण्ड्री

मुझे रघुनाथ जी ने बताया ट्विटर पर कि विशाखापातनम के बाद अन्नवरम् में सत्यनारायण जी का मन्दिर दायीं ओर दिखेगा। पर लगता है अन्नवरम मेरे स्नान करने के दौरान निकल गया। उसके बाद स्टेशन आये – एलमंचलि, अनपर्ति और राजमण्ड्री।

राजमण्ड्री (जैसा स्टेशन पर लिखा था) या राजमहेन्द्री (राजा महेन्द्रवर्मन के नाम पर) आन्ध्र की सांस्कृतिक राजधानी है। कवि नान्नैय्या का जन्म स्थान। उन्होने तेळुगु भाषा को लिपि दी, जिससे यह भाषा बन सकी। स्टेशन के बाद गोदावरी नदी पर पुल दिखा – विशालकाय जलराशि और विशालकाय पुल! मैने जो चित्र उसपुल से गुजरते हुये लिये, उसमें अधिकांश पुल के गर्डर के खम्भों के कारण आधे अधूरे आये। चित्रों को काफी काटना छांटना पड़ा। काफी झटके में निकल गया राजमण्ड्री। अन्यथा एक दो मन्दिर, चर्च और गोदावरी के पुल को देख कर मन हुआ कि यहां रुकना चाहिये था। पर भारत में कितने ऐसे स्थान मिलेंगे जहां रुकने का या बसने का मन करे!

गोदावरी नदी पर पुल दिखा – विशालकाय जलराशि और विशालकाय पुल!

आंध्र के तटीय ताड़ के वृक्ष और चावल के खेतों की विशाल कालीन देखना एक अनुभव है। वह कैमरे में लेने के लिये न जाने कितने चित्र लिये। गाड़ी के डिब्बे का शीशा साफ कराया छोटेलाल से। पर चित्रों में वह न आ पाया जो आंखों से दिखता था। चलती ट्रेन और कैमरा आंख देखे का विकल्प बन ही नहीं सकते। शायद सबसे अच्छा होता है अपने शब्दों में वर्णन की क्षमता विकसित करना। पर एक ब्लॉगर – जो खुरदरी भाषा में लिखने का अभ्यस्त हो गया होता है, के लिये वह करना भी कठिन काम है। यह सब मैं पोस्ट रिटायरमेण्ट जिन्दगी के लिये पोस्ट-पोन कर रहा हूं, मानो वह जिन्दगी चालीस-पचास साल की एक्टिव जिन्दगी हो!

क्या सुन्दर कालीन है!

एलुरु गुजरा। छोटा सा शहर और कम देर के लिये रुकी गाड़ी। बीच में एक नहर नुमा नदी थी। छानबीन करने पर पता चला कि वह कृष्णा-गोदावरी नहर है।


विजयवाड़ा बड़ा बन्दरगाह है और रेलवे स्टेशन भी उसी के मुताबिक। यहां ट्रेन कुछ ज्यादा रुकने वाली थी तो हम आधे प्लेटफार्म का चक्कर लगा आये। शाम के नाश्ते के लिये दोसा, वड़ा और आलूवड़ा मिल रहे थे – केटरिंग वाले वह एल्यूमीनियम फ्वॉइल और कैसरोल में बेंच रहे थे। खुला केला मिल रहा था। अच्छा था पर मंहगा – चालीस रुपया दर्जन। बहुत मीठा भी नहीं था। शायद पेड़ पर नहीं, गोदाम में पकाया गया था। एक सेक्ट के लोग-लुगाई लाल कपड़े पहने प्लेटफार्म पर बहुतायत में दिख रहे थे। कुछ के तो झोले भी लाल रंग के थे।

पुष्पगुच्छ लाते आरपीएफ वाले सज्जन

मेरे डिब्बे के पास एक आरपीएफ़ वाला खड़ा था। उसने एक ताक झांक करने वाली महिला को डपटा। मुझे लगा कि मेरी अफसरी को वजन दे कर यह कर रहा है, पर शायद वह औरत कुछ गड़बड़ थी। उल्टे पांव भाग गयी। उस सिपाही से मैने पीले फूल का नाम पूछा जो मुझे पूरे तटीय स्टेशनों पर दिख रहा था और यहां भी स्टेशन के पट्ट के पास ही लगा था। सिपाही ने कहा कि उसे नाम तो नहीं मालुम, पर वह तुरत गया और उस फूल का एक गुच्छा मुझे भेट करने के लिये तोड़ लाया। स्वीट चैप! मैने उसका फोटो लेने का उपक्रम किया तो रुक कर उसने अपना फोटो खिंचाया और उसके बाद मुझे भेट किया।

विजयवाड़ा स्टेशन पर लाल कपड़ों में कुछ यात्री

विजयवाड़ा से जब ट्रेन चली तो शाम छ से ऊपर हो गये थे। अंधेरा हो गया था। आगे कोरोमण्डल तट प्रारम्भ हो रहा है। रात में इस तट के सहारे सहारे चलती ट्रेन मद्रास, बोले तो चेन्ने पंहुच जायेगी। मेरा रहने का इन्तजाम पास की इमारत पर नवीं मंजिल पर किया गया है। पर मैं रात ३-४ बजे वहां ऊठ कर जाने से रहा।

इस पोस्ट को यहीं विराम दिया जाये।

(सवेरे गाड़ी समय पर मद्रास पंहुच गयी ! यह पोस्ट २६ अक्तूबर को मद्रास से पोस्ट हो रही है।)

अल्लापूजा एक्स्प्रेस में – 24 अक्तूबर


धनबाद अल्लापुज़ा एक्स्प्रेस का साइनबोर्ड

धनबाद से यह गाड़ी अलेप्पी जाती है। नाम अल्लापुजा (या अलप्पुझा) एक्स्प्रेस रखा गया है। विकिपेडिया देखने पर पता चला कि अल्लापुज़ा (उच्चारण में आलपुड़ा जैसा कुछ) अलेप्पी का ही मळयालम नाम है। यूं लगता है अलेप्पी के नाम आलपुझा ( Alappuzha) को धनबाद वालों ने उत्तरभारतीय कृत कर अल्लापुजा बना दिया है! 😆

धनबाद में हम मुम्बई हावड़ा मेल से पंहुचे। इलाहाबाद में यह गाड़ी पचास मिनट “पिट” गयी थी, सो जैसा मेरे समधीजी ने बताया, आगे इसे राजधानियां दाबेंगी और धनबाद और लेट होगी पंहुचने में। वही हुआ। धनबाद लगभग सवा घण्टा देरी से पंहुचे हम। अल्लापूजा का धनबाद से छूटने का समय पौने इग्यारह बजे था, सो इस बात कि फिक्र नहीं थी कि गाड़ी छूट जायेगी। अन्यथा रेलवे वाले की गाड़ी छूट जाये?! शेम शेम!

नत्तू पांड़े (मेरे नाती विवस्वान पाण्डेय, उम्र साढ़े तीन साल, जिन्हे ढेर सारी पोयम्स, अपोजिट वर्ड्स, और जाने कहां तक की गिनती आती है और जो नीलम मैडम का जनरल नॉलेज ठीक करते हैं कि दूध गाय नहीं, मुन्नी – उनकी गवर्नेस – देती है) अपने मम्मी-पापा के साथ हमसे मिलने धनबाद आ रहे थे। उनसे पता किया तो वे लगभग एक घण्टे में पंहुचने वाले थे। इस बीच हमारे कोच की शंटिंग प्रारम्भ हो गयी और जब तक वह प्लेटफार्म पर लगा, नत्तू पांड़े को बीस मिनट इन्तजार करना पड़ा स्टेशन मास्टर साहब के कमरे में। मैने यह नहीं पता किया कि वहां इन्तजार में वे स्टेशन मास्टर साहब की कुरसी पर तो नहीं बैठे या एक दो ट्रेनों को लाइन क्लियर देने लेने का काम तो नहीं किया।

नत्तू पांड़े जब हमें मिले तो मानो हमारा पूरा डिब्बा उजास हो गया। मेरी बिटिया और मेरे दामाद से मिलने की खुशी की अपेक्षा उनसे मिलने की खुशी कई गुना थी – मूल की बजाय ब्याज ज्यादा प्रिय होता है – यह निरर्थक नहीं कहा गया! घण्टा भर से कम ही रहे वे हमारे साथ। और उन्होने जाते समय जोश में बाय बाय तो किया, पर मेरी बिटिया ने बाद में मोबाइल पर बताया कि ओवर ब्रिज पर नत्तू पांड़े अड़ गये थे कि नाना-नानी के साथ “हमका इलाबाद जाओ” (नाना-नानी के साथ मुझे इलाहाबाद जाना है।)।

नत्तू पांड़े (विवस्वान पाण्डेय) हमें धनबाद प्लेटफार्म से बाय बाय करते हुये।

धनबाद से गाड़ी बोकारो-रांची होते आगे बढ़ी। रांची के आगे हरियाली थी – जंगल और धान के खेत। जमीन समतल नहीं थी, पर जहां भी जंगल ने जमीन थोड़ी भी छोड़ी, धान ने लप्प से लपक ली थी। कुछ ही जगहों पर पहाड़ियां दिखीं, जिनपर कुछ नहीं उगा था। एक दो जगह लाल मिट्टी के टीले थे। कहीं कहीं लोगों के खलिहान भी दिखे। पर ज्यादा फसल अभी खेतों में थी। दो तिहाई धान के पौधे हरे थे। एक तिहाई पकने की प्रक्रिया में हरे से पीले के बीच थे। उनमें से उठ रही सुगंध हवा में पूरे रास्ते व्याप्त रही।

सुगंध धान की ही नहीं, अनेक वनस्पतियों की लग रही थी। कहीं कहीं हम अटकल लगा रहे थे कि फलाने पेड़ की मंजरी से उठ रही होगी सुगंध। पर वह इतनी विविधता भरी थी कि लगता था जंगल की हर वनस्पति सुगंध के ऑरकेस्टॉ में अपना सुर मिला रही हो। इस समय सूर्यास्त होने जा रहा था। वापसी में यही इलाका सवेरे पड़ने जा रहा है – सो हमने योजना बना ली थी कि वापसी में सवेरे एक शॉल ओढ़ कर पूरब की ओर वाली खिड़की के पार देखने और सूंघने के लिये आसन जमा लेंगे।

रांची के आगे जंगल और खेत।

मैं और मेरी पत्नी देखने और सुगंध लेने में व्यस्त थे। बाकी डिब्बे के लोग घोड़े बेच कर सो रहे थे। शाम के पांच बजने पर उनको झिंझोड़ा गया – भैया, चाय वाय का इन्तजाम तो करो!

और चाय मिल गयी!

राउरकेला आया साढ़े छ बजे। एक पहाड़ी पर वैष्णव देवी मन्दिर का रिप्लिका दिखा। सांझ का अंधेरा गहरा गया  था – सो रोशनी में जगमगाता दिखा स्टेशन प्लेटफार्म से। प्लेटफार्म के कोने पर  एक ओर एक पाण्डाल जगमगा रहा था दुर्गापूजा का। उसमें विशुद्ध काकभुशुण्डि की आवाज वाला कोई व्यक्ति बंगला में अनाउंसमेण्ट कर रहा था कि सड़क पर डांस करने की मनाही है। अभी डीजे बजेगा और जिसको नाचना है, यहीं पाण्डाल में अपनी साध पूरी कर ले। भगवती मां की कृपा रही कि जब तक हमारी गाड़ी प्लेटफार्म पर रही – लगभग आधा घण्टा – डीजे बजना प्रारम्भ नहीं हुआ था। अन्यथा वह पाण्डाल हमारे कोच के पास ही था।

राउरकेला स्टेशन की बगल में जगमगाता दुर्गापूजा का पाण्डाल

छोटे लाल वड़ा और इडली खरीद लाये थे प्लेटफार्म से। उसकी प्रेपरेशन राउरकेला की भौगोलिक अवस्था से मेल खाती थी। यहां उत्तर खत्म हो रहा होता है और दक्षिण प्रारम्भ। इन डिशेज में दोनो का मेल था। राउरकेला स्टेशन के हिन्दी अनाउंसमेण्ट भी अहसास दिला रहे थे कि यह हिन्दी का दक्षिणी सिरा है। यहां हिन्दी अपनी उच्चारण की उत्तरभारियत पूरी तरह खो देती है!

रात हो गयी है। कल सवेरे देखते हैं गाड़ी कहां उगती है। आज तो अखबार का अवकाश था विजयदशमी के कारण। कल देखें अखबार मिलता है या नहीं!

रांची-राउरकेला के बीच पूर्व से पश्चिम को बहती यह जल राशि। सामान्यत जल मुझे पश्चिम से पूर्व बहता दिखा था।

नियंत्रण कक्ष में महाप्रबन्धक


मुझे अपने जूनियर/सीनियर/प्रशासनिक ग्रेड के प्रारम्भिक वर्ष याद आते हैं। अपनी जोन के महाप्रबंधक का दौरा बहुत सनसनी पैदा करता था। कई दिनों की तैयारी होती थी। पचास-सौ पेज का एक ब्रोशर बनता था। जब ग्राफ/पावरप्वाइण्ट बनाने की सहूलियत नहीं थी, तो उसमें ढेरों आंकड़ों की टेबल्स होती थीं। कालान्तर में एक्सेल/ग्राफ/पावरप्वाइण्ट आदि की उपलब्धता से वे काफी आकर्षक बनने लगे। महाप्रबंधक के आगमन के लिये किसी भी मण्डल पर मिनट-मिनट के प्रोग्राम की प्लानिंग होती थी। कहां कहां जायेंगे महाप्रबन्धक; यूनियनें और प्रेस कैसे और कब मिलेंगे उनसे। अगर शहर के सांसद/विधायकों से मिलाना हुआ तो किस जगह मिलाया जायेगा उन्हे। अधिकारियों को वे कब एड्रेस करेंगे। लंच-डिनर… यह सब नियत किया जाता था और इस काम को बहुत बारीकी के साथ सोचा/कार्यान्वित किया जाता था।

अब समय बड़ी तेजी से बदला है। एक ही दशक में बहुत बदला है।

मैं पढ़ा करता हूं कि फलानी देश के प्रधानमन्त्री अपनी साइकल पर सवारी कर दफ्तर आते हैं या फलाने देश के राष्टपति बस में सफर करते पाये गये। इन्फोसिस के नन्दन निलेकनी की साइकल सवारी की तस्वीर बहुधा दिखी है। रेलवे अभी वैसी तो नहीं हुई, पर जैसे हालात बदल रहे हैं, कुछ ही सालों में वैसा हो जाये तो आश्चर्य नहीं होगा।

कल सवेरे हमारे उत्तर-मध्य रेलवे के महाप्रबन्धक श्री आलोक जौहरी जी ने मुझे फोन पर कहा कि चलो, इलाहाबाद रेल मण्डल का एक चक्कर लगा लिया जाये। दो दिन पहले वहां सिगनलिंग की केबल चुराने की घटना से ट्रेनों के परिचालन में बहुत व्यवधान आया था। उसके बाद की दशा और बढ़ते यातायात की जरूरतों का जायजा लेना चाहते थे श्री जौहरी।

मैं उनके कमरे में पंहुचा और हम बिना किसी तामझाम के उनकी कार में इलाहाबाद मण्डल के लिये निकले। मण्डल कार्यालय पर इलाहाबाद के मण्डल रेल प्रबन्धक ने स्वागत किया – एक सादा स्वागत। पुराना जमाना होता तो मार अफरातफरी होती। आधा दर्जन बुके होते और दो तीन फोटोग्राफर कैमरे क्लिक कर रहे होते। यहां मण्डल रेल प्रबंधक ने एक (अपेक्षाकृत छोटा) बुके दिया। फोटोग्राफर तो कोई था नहीं! 😦

श्री जौहरी ने मण्डल के नियंत्रण कक्ष में लगभग सवा घण्टे बैठक की। बैठक में भी कोई औपचारिक एड्रेस नहीं – परस्पर वार्तालाप था। मैं देख रहा था कि कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड के अधिकारी भी बहुत सरलता और तनावहीनता के साथ अपने विचार रख रहे थे। … यह माहौल दस साल पहले नहीं हुआ करता था …

और बैठक खत्म होने के बाद हम सब अपने अपने रास्ते (लंच का समय हो रहा था तो अपने अपने घर या दफ्तर में अपना टिफन बॉक्स खोलने) चले गये।

पता नहीं सरकार या कॉर्पोरेट सेक्टर के शीर्षस्थ अधिकारी के साथ बाकी/फील्ड अधिकारियों का इण्टरेक्शन किस हॉर्मोनी के साथ हुआ करता था और अब कैसे होता है, पर रेलवे में तो बहुत अधिक परिवर्तन आया है। सम्प्रेषण के लिये फोन और मोबाइल सेवा का बाहुल्य; सप्ताह पखवाड़े में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा “मुलाकात” ने जूनियर और सीनियर के परस्पर अजनबीपन को लगभग समाप्त कर दिया है। लोग अब बहुत सहज हैं। हाइरार्की, संस्थान के ऑर्गेनाइजेशन-चार्ट में है, पर व्यवहार में धूमिल पड़ रही है।

लगता है कि कुछ ही सालों में सरकारी सेवाओं में भी शीर्षस्थ सीईओ के अपने ट्विटर और फेसबुक अकाउण्ट सक्रिय होंगे। उनकी सामाजिकता सबको पता चला करेगी। उनका व्यक्तित्व खुला होगा। उनके क्लाउट स्कोर इनहाउस सेलीब्रिटी की माफिक होंगे और वे अपनी सामाजिक-वर्चुअल छवि सहजता से बनाये-संवारेंगे।

जब मैने रेलवे ज्वाइन की थी, तब, अधिकारी डेमी-गॉड्स हुआ करते थे, अब वे उसके उलट, कॉमनर्स के नजदीक हो रहे हैं। इस बदलाव का मेनेजेरियल और सोशियोलॉजिकल – दोनो प्रकार से अध्ययन किया जा सकता है!

महाप्रबंधकगण ओपन-अप हो रहे हैं। और बहुत तेजी से।

इलाहाबाद रेल मण्डल में मुख्य ट्रेन नियंत्रक की कुर्सी पर बैठ वीडीयू पर कण्ट्रोल-चार्ट देखते उत्तर-मध्य रेलवे के महाप्रंधक श्री आलोक जौहरी।
कोई फोटोग्राफर नहीं था तो मैने अपने मोबाइल से लियी चित्र।