कन्नन


कन्नन मेरे साथ चेन्नै में मेरे गाइड और सहायक दिये गये थे। छब्बीस और सताईस अक्तूबर को भारतीय रेलवे के सभी १६ जोनल रेलवे के चीफ माल यातायात प्रबंधकों की बैठक थी। उस बैठक के लिये उत्तर-मध्य रेलवे का मैं प्रतिनिधि था। मेरे स्थानीय सहायक थे श्री कन्नन। दक्षिण में भाषा की समस्या होती हैContinue reading “कन्नन”

मामल्लपुरम


दिनांक २८ अक्तूबर’२०१२:  पिछली बार मैं मामल्लपुरम् (महाबलीपुरम्) आया था सन् १९७९ में। तब यहां भीड़ नहीं थी। गिने चुने वाहन, लोग और दुकानें। कल यहां गया तो लगा मानो मद्रास यहीं चला आया हो। टूरिज्म का विस्फोट। पिछली बार एक लड़की मुझसे भीख मांग रही थी। बमुश्किल आठ नौ साल की रही होगी। कुछContinue reading “मामल्लपुरम”

बोबिल्ली से मद्रास का सफर


दिनांक – पच्चीस अक्तूबर, २०१२ इस पोस्ट का शीर्षक लिखते समय एक बारगी लगा कि नाम मद्रास नहीं चेन्नै होना चाहिये। पर मद्रास से स्मृतियां जुड़ी हैं। शायद सन ७९ में एक बार मद्रास आया था, तब वह मद्रास था। आकाशवाणी पर तमिळ उद्घोषिका का उच्चारण सुनाई देता था – चेन्नै पतनम। उस समय लगताContinue reading “बोबिल्ली से मद्रास का सफर”

अल्लापूजा एक्स्प्रेस में – 24 अक्तूबर


धनबाद से यह गाड़ी अलेप्पी जाती है। नाम अल्लापुजा (या अलप्पुझा) एक्स्प्रेस रखा गया है। विकिपेडिया देखने पर पता चला कि अल्लापुज़ा (उच्चारण में आलपुड़ा जैसा कुछ) अलेप्पी का ही मळयालम नाम है। यूं लगता है अलेप्पी के नाम आलपुझा ( Alappuzha) को धनबाद वालों ने उत्तरभारतीय कृत कर अल्लापुजा बना दिया है! 😆 धनबादContinue reading “अल्लापूजा एक्स्प्रेस में – 24 अक्तूबर”

नियंत्रण कक्ष में महाप्रबन्धक


मुझे अपने जूनियर/सीनियर/प्रशासनिक ग्रेड के प्रारम्भिक वर्ष याद आते हैं। अपनी जोन के महाप्रबंधक का दौरा बहुत सनसनी पैदा करता था। कई दिनों की तैयारी होती थी। पचास-सौ पेज का एक ब्रोशर बनता था। जब ग्राफ/पावरप्वाइण्ट बनाने की सहूलियत नहीं थी, तो उसमें ढेरों आंकड़ों की टेबल्स होती थीं। कालान्तर में एक्सेल/ग्राफ/पावरप्वाइण्ट आदि की उपलब्धताContinue reading “नियंत्रण कक्ष में महाप्रबन्धक”

गंगा किनारे चेल्हा के लिये मशक्कत


बारिश का मौसम बीतने के बाद गंगा सिकुड़ी हैं। उससे पानी उथला हो गया है गंगा किनारे। चेल्हा मछली इस समय किनारे मिलती है। मछेरे उसके लिये जाल डालते हैं, सवेरे सवेरे। मैं जब पंहुचा किनारे पर तो सवेरे के छ बज चुके थे। इस मौसम के हिसाब से कोहरा घना था। मछेरा जाल निकालContinue reading “गंगा किनारे चेल्हा के लिये मशक्कत”