दसमा – अतीत भी, वर्तमान भी #ग्रामचरित

दसमा दोमंजिले मकान में साफसफाई के लिये नीचे-ऊपर सतत दौड़ती रहती थी। मेरी बड़ी मां को वह एक अच्छी सहायिका मिल गयी थी। लीक से हट कर काम कराने के लिये बड़ी मां उसे दो रुपया और ज्यादा गुड़ देती थीं।

लॉकडाउन को लेकर शुरू के फेज में प्रधानमंत्री जी के सम्बोधन के बाद बड़ी अफरातफरी मची। आखिर, रोजमर्रा की चीजें कैसे मिलेंगी? इनमें सबसे महत्वपूर्ण था दूध। दूध मेरे चचेरे भाई सत्येंद्र (मन्ना) दुबे के घर से आता है। घर 500 मीटर दूरी पर है। मेरा बेटा रोज उनके घर जा कर लाया करता था। उसकी इस बहाने सवेरे की सैर और अपनी मामियों से चुहुलबाजी हो जाया करती थी। अब उसका जाना उचित रहेगा?

मन्ना ने ही समाधान किया। बोला – “दीदी, प्रसून को मत भेजा करें। दसमा मेरे घर में काम करती है। साफसफाई रखती है। उसे एक मास्क भी दे दिया है। मास्क लगा कर साफ बर्तन में वह दूध आपके यहां पंहुचा दिया करेगी। (पंहुचाने का) जो उचित समझियेगा, दे दीजियेगा।”

दसमा मन्ना भाई के घर में बर्तन साफ करती है। गोबर के उपले बनाती है। वह पिछले पैंतालीस साल से वहां है। तेरह-चौदह की उम्र में ससुराल आयी थी। मुझसे एक ड़ेढ साल छोटी होगी उम्र में। पूछती हूं तो कहती है – “पचास से ऊपर होब”।

ससुराल आने के बाद कुछ ही दिन बीते होंगे कि वह अपनी सास के साथ हमारे पैत्रिक घर (जहां मन्ना आजकल रहते हैं) में आना जाना शुरू हुआ। प्रौढ़ महिलाओं के बीच दुल्हन की तरह आने वाली दसमा हम बहनों को बड़ी आकर्षक लगती थी। थी तो वह काले रंग की, पर उसका चेहरा चमकता रहता था। उसके दूध से उजले दांत उसे और भी आकर्षक बनाते थे।

दसमा दोमंजिले मकान में साफसफाई के लिये नीचे-ऊपर सतत दौड़ती रहती थी। मेरी बड़ी मां को वह एक अच्छी सहायिका मिल गयी थी। लीक से हट कर काम कराने के लिये बड़ी मां उसे दो रुपया और ज्यादा गुड़ देती थीं। चालीस साल पहले दो-पांच रुपये एक बड़ी रकम होती थी।

अब दशकों बाद दसमा से दूध लाने के बहाने जब मुलाकात हुई तो देखा, उसके चेहरे पर समय के निशान बहुत गहरे हो गये हैं।

पति की मृत्यु के बाद घर सम्भालना उसके लिये बड़ी चुनौती थी। अब मिलने पर उसने बताया कि उसकी एक जवान बहू भी एक बच्चा छोड़ कर दुनियाँ से चली गयी थी।… पर दसमा कभी निराशाजनक बातें नहीं करती। और न कभी असंतुष्ट होती है।

मुझे याद आता है कि बड़ी माँ की कूल्हे की हड्डी टूटने पर बिस्तर पर हो गयी थीं। तब दसमा बिना किसी हीलहुज्जत के उनका कपड़ा साफ करती थी। उनका शौच भी साफ करने में उसे कोई झिझक नहीं दिखाई। उनका सब कुछ किया। वह याद कर कहती है – “आखिर हमहूं त अम्मा क पतोहु रहे (हम भी तो अम्माजी की पुत्रवधु थे)!”

दसमा अपने व्यवहार से नौकर से कहीं ऊपर उठ चुकी है। बड़ी मां जाते समय उसे जरूर आसीस दे कर गयी होंगी, अपनी पुत्रवधु की तरह।


पोस्ट पर श्री गिरीश सिंह जी का ट्वीट –


Author: Rita Pandey

I am a housewife, residing in a village in North India.

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