मेरे बाबा का समय

Grandfather on Village Road

एक पोते की स्मृति और अपना ही भविष्य टटोलने की कोशिश।

मैं छोटा था। चार साल का। बब्बा एक लाठी लिए, धोती-बंडी पहने स्कूल को निकलते थे। पास के गांव शम्भू के पूरा में प्राइमरी के हेड मास्टर थे। बच्चे बहुत डरते थे। बड़े भी उन्हें आते देख पगडंडी से नीचे उतर जाते थे। अपने बाबा पर मुझे गर्व भी था और उनसे डर भी बहुत लगता था।

अब उनके जाने के चालीस साल बाद उनके बारे में सोचता हूं तो बहुत कुछ उमड़ता-घुमड़ता है मन में। सबसे ज्यादा तो उनके जीवन की सादगी और उनकी दिनचर्या पर ध्यान जाता है।

आजकल दुनिया लंबी उम्र के नुस्ख़े खोज रही है। कोई उपवास की घड़ी बाँध रहा है, कोई कैलोरी गिन रहा है, कोई सप्लीमेंट की शीशियाँ सजा रहा है। इन सबको देखते हुए मुझे बार-बार अपने बाबा की याद आती है। वे इन शब्दों से अपरिचित थे। उन्हें “टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग”, “सर्कैडियन रिद्म” या “लॉन्गेविटी” जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था। वे बस अपना जीवन जीते थे। और ऐसा जीते थे कि सत्तासी वर्ष की आयु तक पहुँच कर गए।

हर एकादशी को वे अलोना खाते थे। किस उम्र से यह करना शुरू किया, वह बताने वाला अब कोई नहीं। मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने अपने जीवन में कितनी एकादशियाँ अलोना कीं। शायद हजारों। पर यह जरूर था कि उसमें कोई प्रदर्शन नहीं था, कोई धार्मिक आडंबर भी नहीं। जैसे साँस लेना स्वाभाविक है, वैसे ही वह व्रत भी उनके जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था।

उनके दिन की शुरुआत सूर्योदय से पहले हो जाती थी। गाँव अभी नींद में होता और वे दिन का स्वागत करने निकल पड़ते। पहला भोजन लगभग नौ-दस बजे होता। उसके बाद खेत, मेड़, रास्ते, लोग, मौसम या प्राइमरी स्कूल—सब उनके दिन के साथी थे। भोजन के बाद थोड़ी-सी झपकी। शाम ढलते-ढलते घर वापसी। रात का भोजन एक-दो रोटियों का होता, जिन्हें वे दूध में मींजकर खा लेते। उससे अधिक की उन्हें न आवश्यकता थी, न इच्छा। आठ-नौ बजे तक उनका दिन समाप्त हो जाता।

भोजन दिन में दो बार होता था। यदा कदा चना-चबैना होता रहा होगा, जिसकी मुझे स्मृति नहीं है।

उन्होंने कभी व्यायाम नहीं किया। कोई वजन नहीं उठाया, कोई मुगदर नहीं भांजा। उस अर्थ में कतई नहीं, जिसमें आज हम व्यायाम समझते हैं।

उनका व्यायाम खेत तक जाने वाली पगडंडी थी। उनका जिम गाँव की मेड़ें थीं। उनके ट्रेडमिल की जगह कच्ची सड़क थी, जिस पर वे अस्सी वर्ष पार कर जाने के बाद भी रोज़ बारह-पंद्रह किलोमीटर चल लेते थे। शरीर दुबला था, लेकिन दुर्बल नहीं। उसमें सहज श्रम की कमाई थी, प्रदर्शन की नहीं।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उन्होंने भोजन नहीं नापा, भूख को पहचाना। उन्होंने कैलोरी नहीं गिनी, श्रम किया। उनके पास घड़ी नहीं थी। दालान से बाहर निकल, आसमान में सूरज निहार कर वे कह देते थे—दो बज गए हैं। उन्होंने नींद का ऐप नहीं लगाया, अँधेरा होते ही सो गए। उन्होंने स्वास्थ्य की चिंता नहीं की; जीवन जिया। शायद स्वास्थ्य उसी का एक उपफल था।

पर यदि कोई मुझसे पूछे कि उनकी सबसे बड़ी संपत्ति क्या थी, तो मैं खेतों का नाम नहीं लूँगा।

मैं कहूँगा—उनकी जिज्ञासा।

जीवन के अंतिम वर्ष में उनकी आँखें धुँधला चुकी थीं। पढ़ना कठिन हो गया था पर उनके भीतर शिक्षक का अनुशासन कमजोर नहीं हुआ था। उन्होंने मेरे द्वारा उन्हें ला कर दी के. एम. मुंशी का “लोपामुद्रा” पचासी-छियासी की उम्र में पूरी पढ़ी।

मुझे उन्हें चारपाई पर बैठे, सिर किताब में गड़ाये पन्ने दर पन्ने पढ़ते हुये का दृश्य आज भी विस्मित करता है। शरीर थक सकता है, आँखें कमज़ोर हो सकती हैं, लेकिन यदि मन अभी भी किसी पुस्तक के अगले पन्ने तक पहुँचना चाहता है, तो मनुष्य वास्तव में बूढ़ा नहीं हुआ है।

अंतिम महीनों में उम्र ने उनपर अपना अधिकार जताया। कुछ मतिभ्रम हुआ, पैरों ने जवाब देना शुरू किया, एक सर्दी और कफ़ ने उन्हें बिस्तर पर रोक लिया। लेकिन इससे पहले उन्होंने अपने हिस्से का जीवन पूरा जी लिया था। ऐसा नहीं लगता कि मृत्यु ने उन्हें बीच रास्ते से उठाया। लगता है जैसे उन्होंने अपना काम पूरा किया और फिर चुपचाप चले गए।

मेरे पर-बाबा भी पचासी वर्ष से अधिक जिए थे। उनकी पत्नी – मेरी बुढ़िया आइया – भी उनके कुछ वर्ष बाद तक रहीं। इसलिए कभी-कभी सोचता हूँ—क्या यह विरासत रक्त में थी या जीवन-पद्धति में? शायद दोनों में। पर यदि मुझे किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं जीवन-पद्धति को चुनूँगा। क्योंकि वही विरासत हर पीढ़ी को फिर से अर्जित करनी पड़ती है।

अब मैं जब साइकिल लेकर गाँव की सड़क पर निकलता हूँ, खेतों की ओर देखता हूँ, किसी पेड़ की नई पत्ती पर ठिठक जाता हूँ, या घर लौटकर कोई पुस्तक खोल लेता हूँ, तो कभी-कभी लगता है कि मैं केवल अपना दिन नहीं जी रहा। मेरे भीतर कहीं बाबा का जीवन-अनुशासन भी चल रहा है।

समय बदल गया है। अब हमारी थाली बदल गई है, हमारा काम बदल गया है, हमारी रातें कृत्रिम रोशनी से भर गई हैं। लेकिन कुछ बातें अभी भी बचाई जा सकती हैं—सादा भोजन, नियमित दिनचर्या, चलते रहने की आदत, और जीवन के अंतिम पड़ाव तक जिज्ञासु बने रहने की ललक।

शायद दीर्घजीविता का सबसे बड़ा रहस्य वर्षों की गिनती में नहीं, बल्कि इस बात में है कि जीवन के कितने वर्षों तक मनुष्य का औत्सुक्य कायम रहता है।

बाबा ने मुझे यही सिखाया। बिना कभी सिखाने की कोशिश किए। बिना कभी कहे। कहा तो शायद उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं। उनके द्वारा मेरी प्रशंसा भी मुझे किसी और के बताने पर ही पता चली।

बाबा को याद करते-करते मैं अनायास अपना हिसाब लगाने लगता हूँ।

वे अस्सी वर्ष की आयु तक रोज़ खेत चले जाते थे।

वे अस्सी वर्ष की आयु तक रोज़ खेत चले जाते थे। मैं अब साइकिल चलाता हूँ। वे पैदल चलते थे, मैं पैडल भरता हूँ। वे लोपामुद्रा पढ़ते थे, मैं किंडल पर किताबें पढ़ता हूँ। वे लालटेन के समय के आदमी थे, मैं इंटरनेट के समय का।

हमारे बीच आधी सदी से ज्यादा का फ़ासला है, पर कुछ बातें अब भी एक-सी हैं—सुबह जल्दी उठने की इच्छा, दिन भर कुछ करते रहने की बेचैनी, और यह विश्वास कि मनुष्य को आख़िरी साँस तक जिज्ञासु बने रहना चाहिए।

फिर भी मैं उनसे पीछे हूँ। काफी पीछे।

मुझे मधुमेह है। घुटनों में ऑस्टियोआर्थराइटिस है। गर्मी में हाँथ का बेना नहीं, एयर कंडीशनर चाहिए। सर्दी में अलाव की बजाय हीटर का सहारा लेना पड़ता है। सप्ताह में दो रातें ऐसी आती हैं जब नींद रूठ जाती है। मेरा शरीर उनके शरीर जैसा सहज नहीं रहा।

कभी-कभी लगता है कि मैंने विज्ञान तो बहुत पा लिया, पर शरीर की वह सादगी खो दी, जो उन्हें बिना जाने मिली थी।

फिर अपने ही विचार पर मायूस सा मुस्कुरा देता हूँ। आखिर हर पीढ़ी को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है। अपने काल-समय के अनुसार।

बाबा की लड़ाई अभाव, मलेरिया, अकाल और कठिन श्रम से थी। एक बार सियार ने काट लिया तो रेबीज़ के इलाज के लिए उन्हें कसौली तक जाना पड़ा। मेरी लड़ाई मधुमेह, बैठकर काम करने की आदत और चौबीस घंटे जगती हुई दुनिया से है।

इसलिए मेरा उद्देश्य बाबा जैसा बनना नहीं है। वह संभव भी नहीं। मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि जब मेरी उम्र सत्तासी वर्ष हो, तब भी नियमित, हर सुबह साइकिल निकालने का मन करे, कोई नई किताब मुझे पुकारे, और किसी पौधे की नई पत्ती देखकर मैं ठिठक जाऊँ।

यदि ऐसा हुआ, तो समझूँगा कि मैंने बाबा से मिली विरासत का कुछ हिस्सा बचा लिया। और सतासी से जितना ज्यादा जिया, वह बोनस ही माना जाएगा!

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

2 thoughts on “मेरे बाबा का समय

  1. हर काल की अपनी जीवन शैली होती है और अपनी विविधाताएं – फिर भी कुछ बातें अभी भी बचाई जा सकती हैं—सादा भोजन, नियमित दिनचर्या, चलते रहने की आदत, और जीवन के अंतिम पड़ाव तक जिज्ञासु बने रहने की ललक। आप आज के युग के बाबा हैं जिन्हें अगली पीढ़ी इसी चाव से लिखेगी और पढ़ेगी। आप शतायु हों यही मंगलकामनाएं -सादर – समीर लाल

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