बरसात का उत्तरार्ध


कल शाम गंगाजी के किनारे गया था। एक स्त्री घाट से प्लास्टिक की बोतल में पानी भर कर वापस लौटने वाली थी। उसने किनारे पर एक दीपक जलाया था। साथ में दो अगरबत्तियां भी। अगरबत्तियां अच्छी थीं, और काफी सुगंध आ रही थी उनसे। सूरज डूब चुके थे। घाट पर हवा से उठने वाली लहरेंContinue reading “बरसात का उत्तरार्ध”

ठहरी हुई नाव और सतरंगा मोरपाखी


यह एक उपन्यास है। औपन्यासिक कृति का पढ़ना सामान्यत: मेरे लिये श्रमसाध्य काम है। पर लगभग पौने दो साल पहले मैने श्रीमती निशि श्रीवास्तव का लिखा एक उपन्यास पढ़ा था – “कैसा था वह मन”। उस पुस्तक पर मैने एक पोस्ट भी लिखी थी – कैसा था वह मन – आप पढ़ कर देखें! अबContinue reading “ठहरी हुई नाव और सतरंगा मोरपाखी”

खजूरी, खड़ंजा, झिंगुरा और दद्दू


शुरू से शुरू करता हूं। मिर्जापुर रेस्ट हाउस से जाना था मुझे झिंगुरा स्टेशन। मिर्जापुर से सीधे रास्ता है नेशनल हाई-वे के माध्यम से – ऐसा मुझे बताया गया। पर यह भी बताया गया कि वह रास्ता बन्द है। अत: डी-टूर हो कर जाना होगा वाया बरकछा। सवेरे मैने विण्ढ़म फॉल देखा था। यह नहींContinue reading “खजूरी, खड़ंजा, झिंगुरा और दद्दू”

Design a site like this with WordPress.com
Get started