आदमी


दफ्तरों में समय मारते आदमीचाय उदर में सतत डालते आदमी अच्छे और बुरे को झेलते आदमीबेवजह जिन्दगी खेलते आदमी गांव में आदमी शहर में आदमीइधर भी आदमी, उधर भी आदमी निरीह, भावुक, मगन जा रहे आदमीमन में आशा लगन ला रहे आदमी खीझ, गुस्सा, कुढ़न हर कदम आदमीअड़ रहे आदमी, बढ़ रहे आदमी हों रतीContinue reading “आदमी”

कबि न होहुं नहिं चतुर कहाऊं


कबि न होहुं नहिं चतुर कहाऊं; मति अनुरूप राम गुण गाऊं. बाबा तुलसीदास की भलमनसाहत. महानतम कवि और ऐसी विनय पूर्ण उक्ति. बाबा ने कितनी सहजता से मानस और अन्य रचनायें लिखी होंगी. ठोस और प्रचुर मात्रा में. मुझे तो हनुमानचालिसा की पैरोडी भी लिखनी हो तो मुंह से फेचकुर निकल आये. इसलिये मैं यत्र-तत्रContinue reading “कबि न होहुं नहिं चतुर कहाऊं”

वृद्धावस्था के कष्ट और वृन्दावन-वाराणसी की वृद्धायें


मेरे मित्र श्री रमेश कुमार (जिनके पिताजी पर मैने पोस्ट लिखी थी) परसों शाम मुझे एसएमएस करते हैं – एनडीटीवी इण्डिया पर वृद्धों के लिये कार्यक्रम देखने को कहते हैं. कार्यक्रम देखना कठिन काम है.पहले तो कई महीनों बाद टीवी देख रहा हूं तो “रिमोट” के ऑपरेशन में उलझता हूं. फिर वृद्धावस्था विषय ऐसा हैContinue reading “वृद्धावस्था के कष्ट और वृन्दावन-वाराणसी की वृद्धायें”

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