तिरंगा और जलेबी


मेरी जलेबी ठण्डी न हो जाये, इसलिये घर पंहुचने की जल्दी थी। अन्यथा इस राष्टीयता के बाजर की चहल पहल को और इत्मीनान से देखता।

रतलाम और रतलामी सेव


वहां से गुजरते हुये; और मैं बहुधा पैदल ही गुजरता था; छनती रतलामी सेव की गंध अभी भी यादों में है। उनकी भट्टियां, बनियान पहने एक हांथ से झारा साधे और दूसरे से बेसन की लोई दबा कर नमकीन झारते लोगों की छवियां मन में बनी हुई हैं।

रुद्राभिषेक और रुद्र सूक्त


भला हो कल के प्रदोष काल के रुद्राभिषेक का। मैं रिश्ते के कारण श्रेष्ठ ब्राह्मण था सो मुझे बिना कुछ किये पण्डिज्जी लोगों के साथ पहले भोजन कराया गया। पांच सौ रुपये की दक्षिणा भी मिली (जो मैंने पूरी निष्ठा से अपनी पत्नीजी को दे दी!)

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