रात आते ही – शाम सात सवा सात बजे झींगुर गायन शुरू कर देते हैं। और यह आवाज रात भर चलती है। गांव के सन्नाटे का संगीत है यह। पितृपक्ष लग गया है जो कोई अन्य आवाज – कोई डीजे या जै मातादी जागरण या अखंड मानस पाठ आदि नहीं हो रहा। आजकल झींगुरचरितमानस काContinue reading “रात ढलते ही झींगुर गायन”
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इंटरनेट – ब्लॉग से एआई तक : देसी मिट्टी और नैनो ट्रेंड्स
फरवरी 2007 में मेरा ब्लॉग बना – ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल। तब से अब तक 2500 के आसपास पोस्टें हो गई हैं। फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और क्वोरा पर कुछ और भी। पर इन सभी को साधने में थकान होती है। शुरुआती मानक 150 शब्दों का था। उससे ज्यादा हिंदी लिखना भारी पड़ता था। हिंदीContinue reading “इंटरनेट – ब्लॉग से एआई तक : देसी मिट्टी और नैनो ट्रेंड्स”
तुर्री – कमोडानुशासन से बिडेटानुभव तक
बचपन से शुरू करता हूं। सन 1958 रहा होगा। तीन साल का ज्ञानदत्त। खेलते कूदते अचानक दबाव बना तो दौड़ लगाई घर के सामने के दूसरे खेत में। नेकर का नाड़ा नहीं खुला तो पेट सिकोड़ कर किसी तरह उसे नीचे किया। निपटान में एक मिनट लगा होगा बमुश्किल। पानी की बोतल का प्रचलन नहींContinue reading “तुर्री – कमोडानुशासन से बिडेटानुभव तक”
