रेल की दुनिया – सन 1999 में जनसत्ता में छपा लेख



स्क्रैप-बुक बड़े मजे की चीज होती है. आप 8-10 साल बाद देखें तो सब कुछ पर तिलस्म की एक परत चढ़ चुकी होती है. मेरी स्क्रैप-बुक्स स्थानांतरण में गायब हो गयीं. पिछले दिनों एक हाथ लगी – रद्दी के बीच. बारिश के पानी में भी पढने योग्य और सुरक्षित. उसी में जनसत्ता की अक्तूबर 1999 की कतरन चिपकी है. यह “दुनिया मेरे आगे” स्तम्भ में “रेल की दुनिया” शीर्षक से लेख है श्री रामदेव सिंह का. उस समय का सामयिक मुद्दा शायद दो सांसदों द्वारा टाटानगर स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्सप्रेस के कण्डक्टर की पिटाई रहा हो; पर लेख की आज भी वही प्रासंगिकता है. मैं रामदेव सिंह जी से पूर्व अनुमति के बिना ब्लॉग पढ़ने वाले मित्रों के अनुरोध पर यह लेख प्रस्तुत कर रहा हूं, अत: उनसे क्षमा याचना है. आप कृपया लेख देखें:


रेल की दुनिया
रामदेव सिंह

हिन्दी के बहुचर्चित कवि ज्ञानेन्द्रपति की एक कविता है “श्रमजीवी एक्स्प्रेस” जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:

सवाल यह है
श्रमजीवी एक्सप्रेस में
तुम श्रमिकों को
चलने देते हो या नहीं
कि अघोषित मनाही है उनके चलने की
कि रिजर्वेशन कहां तक है तुम्हारा, कह
बांह उमेठ, उमेठ लेते हो उनका अंतिम रुपैया तक
या अगले स्टेशन पर उतार देते हो
यदि सींखचों के पीछे भेजते नहीं

पूरी कविता तो भारतीय रेल की नहीं, सम्पूर्ण देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था की पोल खोल कर रख देती है. इन पंक्तियों से भी भारतीय रेल की एक छवि तो स्पष्ट होती ही है जिसमें प्रतिनिधि खलनायक और कोई नहीं, रेल का टीटीई ही है, जिसका नाम कवि ने नहीं लिया है. इससे अलग हिन्दी का एक चर्चित उपन्यास “अठारह सूरज के पौधे” (लेखक रमेश बक्षी, जिसपर “सत्ताइस डाउन” नाम से फिल्म बन चुकी है) का नायक भी एक टीटीई है, जिसके संत्रास की कई परतें हैं. लोहे के रास्ते पर लगातार अप-डाउन करते, कन्धे छीलती भीड़ एवम नियम और व्यवहार के विरोधाभासों के बीच झूलते एक टीटीई का भी एक निजी संसार होता है जिसे सिर्फ बाहर से देख कर नहीं समझा जा सकता है. भागती हुई रेल के बाहर की दुनियां कितनी खुशनुमा होती है, खुले मैदान, खुश दिखते पेड़-पौधे, कल-कल बहती नदी, नीला आकाश, और अन्दर? अन्दर कितनी घुटन, कितना शोर, चिल्ल-पों, झगड़ा-तकरार! एक टीटीई इन दोनो दुनियाओं के बीच हमेशा झूलता रहता है.

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रीय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?

गांधीजी तो रेलों के माध्यम से हो रही राष्ट्रीय क्षति से इतने चिंतित थे कि उन्होने कभी यहां तक कहा था कि “यदि मैं रेल का उच्चाधिकारी होता तो रेलों को तब तक के लिये बन्द कर देता, जब तक लोग बिना टिकट यात्रा बन्द करने का आश्वासन नहीं दे देते.” आज से 15-20 वर्षों पहले तक गांधीजी का यह कथन बड़े-बड़े पोस्टर के रूप में रेलवे स्टेशन की दीवारों पर चिपका रहता था. अब यह पोस्टर कहीं दिखाई नहीं देता. ऐसा नहीं कि गान्धी के इस कथन पर लोगों ने अमल कर लिया हो और अब ऐसे पोस्टरों की जरूरत नहीं रह गयी हो. सच्चाई तो यह है कि जैसे गांधी जी की अन्य नैतिकतायें हमारे देश के आम लोगों से लेकर राजनेताओं के लिये प्रासंगिक नहीं रह गयी हैं, उसी तरह रेलवे स्टेशनों पर प्रचारित यह सूत्र वाक्य उनके लिये महत्वहीन हो गया. अब तो यह दृष्य से ही नहीं दिमाग से भी गायब हो गया है. अब के राजनेता तो अपने साथ बिना टिकट रैलियां ले जाना अपनी शान समझते हैं.

टाटा नगर रेलवे स्टेशन पर पुरुषोत्तम एक्प्रेस के कण्डक्टर की पिटाई सत्ताधारी दल के दो सांसदों ने सिर्फ इसलिये करदी कि उन्हें वातानुकूलित डिब्बे में जगह नहीं मिली. जबकि उनका आरक्षण पहले से नहीं था, न हीं तत्काल डिब्बे में कोई जगह थी. सांसद द्वय के गणों ने घण्टों गाड़ी रोक कर रेल प्रशासन की ऐसी-तैसी की. सैकड़ों लोग तमाशबीन बन कर यह सब देखते रहे. रेलवे में बिना टिकट यात्रा का प्रचलन पुराना होते हुये भी इधर 20-25 वर्षों में ऐसे यात्रियों के चरित्र में एक गुणात्मक फर्क आया है, जो गौर तलब है. पहले जहां रेलगाड़ियों में टीटीई को देख कर बिना टिकट यात्री दूर भागता था, ऐसी चोर जगहों में बैठ कर यात्रा करता था जहां टीटीई नहीं पंहुच सके वहीं अब बिना टिकट यात्री ठीक वहीं बैठता है जहां टीटीई बैठा हो. बल्कि तरह तरह की फब्तियों को सुनने के बदले टीटीई ही वहां से हट जाना पसन्द करता है. भिखारियों और खानाबदोशों को छोड़ दें तो गरीब और मेहनतकश वर्ग के लोग बिना टिकट यात्रा से परहेज करते हैं. टिकट लेने के बाद भी सबसे ज्यादा परेशान वही होते हैं जबकि खाते पीते वर्ग के लोग ही सबसे अधिक बिना टिकट यात्रा करते हैं. सुप्रसिद्ध व्यंगकार परसाई जी ने अपने संस्मरणों में उन कई तरीकों का वर्णन किया है जिनके सहारे टीटीई पर या तो धौंस जमा कर या गफलत में डाल कर लोग बिना टिकट यात्रा करते हैं.

यह नयी रेल संस्कृति है जिसकी दोतरफा मार टीटीई झेलता है. एक तरफ अपने बदसलूक और बेईमान होने की तोहमद उठाता है जिसमें बड़ा हिस्सा सच का भी होता है. दूसरी तरफ वह ईमानदारी से काम करने की कोशिश करता है तो बड़े घरों के उदण्ड मुसाफिर अपनी बदतमीजियों के साथ उसे उसकी औकात बताने में कोई कसर नहीं छोड़ते.


टीटीई की नौकरी के विरोधाभास



ट्रेन के समय पर कोच के टीटीई को निहारें. आप कितने भी लोक प्रिय व्यक्ति हों तो भी आपको ईर्ष्या होने लगेगी. टीटीई साहब कोई बर्थ खाली नहीं है कहते हुये चलते चले जा रहे हैं; और पीछे-पीछे 7-8 व्यक्ति पछियाये चल रहे हैं. टीटीई साहब मुड़ कर उल्टी दिशा में चलने लगें तो वे सभी लोग भी पलट कर फिर पछिया लेंगे.बिल्कुल अम्मा बतख और उसके पीछे लाइन से चलते बच्चे बतखों वाला दृष्य!

टीटीई साहब को गोगिया पाशा से कम नहीं माना जाता. वे आपके सामने पूरा चार्ट फैलादें, पूरी गाड़ी चेक कर दिखादें कि कोई बर्थ खाली नहीं है. पर हर आदमी सोचता है कि वे अगर इच्छा शक्ति दिखायें तो आसमां में सुराख भी कर सकते हैं और एक बर्थ का जुगाड़ भी. उनके पीछे चलने वाली “बच्चा बतख वाली” जनता यही समझती है. इसी समझ के आधार पर अर्थशास्त्र की एक शाखा कार्य करती है. कई उपभोक्ता लोग हैं जिन्हे इस अर्थशास्त्र में पीएचडी है. और वे इस अर्थशास्त्र को गाहे-बगाहे टेस्ट करते रहते हैं.

मेरे पिताजी किस्सा सुनाते है कि उनके छात्र होने के दिनों में फलाना टीटीई था, जिसका आतंक इलाहाबाद से मेजा-माण्डा तक चलने वाले स्टूडेण्टों पर बहुत था. टीटीई-पावर और स्टूडेण्ट-पावर में अंतत: स्टूडेण्ट-पावर जीती. स्टूडेण्टों ने एक दिन मौका पा कर टौंस नदी में उस फलाने टीटीई को झोक कर उसका रामनाम सत्त कर दिया. यह आज से 50 साल पहले की बात होगी.वैसे मैं अपने पिताजी की पुराने समय की बातों को चुटकी भर नमक (पिंच ऑफ सॉल्ट) के साथ ही लेता हूं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अपने दिनों के जितने वे किस्से सुनाते हैं; उन्हें वैलिडेट करने का मेरा न कोई मन है और न संसाधन. पर फलाने टीटीई के टौंस नदी में झोंकने की जो कथा वे सुनाते हैं, उससे छात्र वर्ग में टीटीई के प्रति गहन अरुचि स्पष्ट होती है.

रेलवे की दुनिया

(रामदेव सिंह के सन 1999 में जनसत्ता में छपे एक लेख के अंश):

रेलवे जनसेवा का एक ऐसा उपक्रम है, जिसकी संरचना वाणिज्यिक है, जिसके रास्ते में हजार किस्म की परेशानियां भी हैं. राष्ट्रिय नैतिकता में निरंतर हो रहे ह्रास से इस राष्ट्रीय उद्योग की चिंता भला किसे है? रेलवे में टिकट चेकिंग स्टाफ की आवश्यकता ही इसलिये हुई होगी कि वह रेलवे का दुरुपयोग रोके और डूब रहे रेलवे राजस्व की वसूली करे. अंग्रेज रेल कम्पनियों के दिनों में ही टीटीई को ढेर सारे कानूनी अधिकार दे दिये गये थे. लेकिन उससे यह उम्मीद भी की गयी थी कि वह “विनम्र व्यवहारी” भी हो. रेल में बिना टिकट यात्रा ही नहीं, बिना कारण जंजीर खींचने से लेकर रेल परिसर में शराब पीना और गन्दगी फैलाना तक कानूनन अपराध है. एक टीटीई की ड्यूटी इन अपराधों को रोकने एवम अपराधियों को सजा दिलाने की है लेकिन शर्त यह है कि होठों पर मुस्कुराहट हो. कितना बड़ा विरोधाभास है यह. अब खीसें निपोर कर तो ऐसे अपराधियों को पकड़ा नहीं जा सकता है. जाहिर है इसके लिये सख्त होना पड़ेगा. सख्त हो कर भी 20-25 के झुण्ड में जंजीर खींच कर उतर रहे “लोकल” पैसेंजर का क्या बिगाड़ लेगा एक टीटीई?@

ब्लॉग पढ़ने वाले 8-10 परसेण्ट लोग परदेस में भी हैं – वहां टीटीई जैसी जमात के क्या जलवे हैं? कोई सज्जन बताने का कष्ट करेंगे?

जलवे तो तभी होते हैं जब डिमाण्ड-सप्लाई का अंतर बहुत हो. यह अंतर टीटीई की “जरूरत” और ग्राहक की “तत्परता” में हो या ट्रेनों में उपलब्ध बर्थ और यात्रा करने वालों की संख्या में हो. आप समझ सकते हैं कि जलवे ग्रीष्मकाल या दशहरा-दिवाली के समय बढ़ जाते हैं. ऐसा कोई अध्ययन तो नहीं किया गया है कि इस जलवे के समय में टीटीई वर्ग छुट्टी ज्यादा लेता है या वर्षा ऋतु के चौमासे में. पर यह अध्ययन किसी रिसर्च स्कॉलर को एच.आर.डी. में पीएचडी की डिग्री दिलवा सकता है.

मैं यहां टीटीई पर केवल व्यंग नहीं करना चाहता. उनकी नौकरी में जोखिम बहुत हैं. बहुत से वीवीआईपी सही-गलत तरीके से यात्रा करते हैं. कभी किसी सही को गलत तरीके से या गलत को सही तरीके से उन्होनें चार्ज कर लिया तो बड़ा हाई-प्रोफाइल मामला बन जाता है – जो बड़ों-बड़ों के सलटाये नहीं सलटता. बेचारे टीटीई की क्या बिसात! उसकी नौकरी तलवार की धार पर है. इसके अलावा उस जीव से दो विरोधी आवश्यकतायें हैं – व्यवहार विनम्र हो और बिना टिकट की वसूली कस के हो. भारत में शराफत से सीधी उंगली कुछ नहीं निकलता. अत: जब टीटीई यात्रियों से जायज पैसे वसूलता है तो उसपर अभद्र व्यवहार, नशे में होने और (अनुसूचित जाति-जनजाति के मामले में) जाति सूचक अपशब्द प्रयोग करने के आरोप तो फट से लगा दिये जाते हैं. हर तीसरा-चौथा टीटीई इस प्रकार की शिकायत का जवाब देता पाया जाता है. और अगर वह जड़भरत की तरह निरीह भाव से काम करता है – तो उसे प्रशासन की लताड़ मिलती है कि वह कसावट के साथ टिकट चैकिंग नहीं कर रहा.

जब टीटीई की बात हो रही है तो मैं एक टीटीई की भलमनसाहत की चर्चा के बिना नहीं रह सकता. हम लोग, एक दशक से भी अधिक हुआ, रेलवे स्टाफ कॉलेज बडौदा में कोई कोर्स कर रहे थे. हमें दो-दो के ग्रुप में बडौदा स्टेशन पर कर्मचारियों की कार्य के प्रति निष्ठा जांचने भेजा गया. चूकि हम लोग लोकल नहीं थे, हमें बतौर यात्री स्वांग रच कर यह जांचने को कहा गया था. मेरे साथ मेरे मित्र थे. हेड टिकेट कलेक्टर के दफ्तर के बाहर मैं अचानक लंगड़ाने लगा. मेरे मित्र मुझे सहारा देकर हेड टीसी के दफ्तर में ले कर गये. मैने पूरी पीड़ा से बयान किया कि फुट ओवर ब्रिज से उतरते हुये सीढ़ियों की चिकनाहट से मेरा पैर स्लिप कर मोच खा गया है. तेज दर्द है. हेड टीसी ने तुरंत मुझे बैठने को कुर्सी दी. मोजा उतार कर मेरा पैर चेक किया और बोला कि फ्रेक्चर नहीं लगता. वह दौड़ कर दवा की दूकान से मूव/आयोडेक्स ले आया. मेरे पैर पर धीरे-धीरे लगाया और कुछ देर आराम करा कर ही मुझे जाने दिया. धन्यवाद देने पर वह हल्का सा मुस्कुराया भर. मुझे हेमंत नाम के उस नौजवान हेड टीसी की याद कभी नहीं भूलेगी.

तो मित्रों टीटीई की नौकरी अलग अलग प्रकार की अपेक्षाओं से युक्त है. टीटीई करे तो क्या करे!


@ रामदेव सिंह जी का यह लेख मेरी ब्लॉग पोस्ट से कहीं बेहतर लिखा गया लेख है. लालच तो मन में ऐसा हो रहा है कि पूरा का पूरा लेख प्रस्तुत कर दिया जाय, पर वह लेखक के साथ अन्याय होगा और शायद चोरी भी.


रेल दुर्घटना – कितने मरे हैं जी?



अमन चैन के माहौल में कल दफ्तर में बैठा था. कुछ ही समय पहले श्रीश के ब्लॉग पर हरयाणवी लतीफे पर टिप्पणी की थी. अचानक सवा बारह बजे कण्ट्रोल रूम ने फोन देने शुरू कर दिये कि जोधपुर हावडा एक्सप्रेस का कानपुर सेण्ट्रल पहुंचने के पहले डीरेलमेण्ट हो गया है. आलोकजी की माने तो मुझे कहना चाहिये अवपथन हो गया है. पर न कण्ट्रोल ने अवपथन शब्द का प्रयोग किया न आज सवेरे तक बातचीत में किसी ने अन्य व्यक्ति ने इस शब्द का प्रयोग किया है. लिहाजा मैं अपने “भाषा वैल्यू सिस्टम” बदलने के पहले पुराने तरीके से ही लिखूंगा.

ताबड़ तोड़ तरीके से हमने तय किया कि मुख्यालय से महाप्रबन्धक और अन्य विभागाध्यक्षों की टीम भी दुर्घटना स्थल पर जायेगी. मण्डल रेल प्रबन्धक की टीम तो आधे घण्टे में ही रवाना हो गयी थी. पीछे से महाप्रबन्धक महोदय की टीम के साथ हम भी रवाना हुये. दुर्घटना स्थल से अधिकारी गण जो बता रहे थे उसके अनुसार ट्रेन का मल्टीपल इंजन और आगे के तीन डिब्बे डीरेल हो गये थे. इंजन तिरछे हो गये थे और आगे का एक डिब्बा इंजन पर चढ़ कर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. कुल मिला कर स्थिति गम्भीर दुर्घटना की थी. पूरा यातायात अवरुद्ध था.

हम लोगों का पहला ध्यान इस बात पर होता है कि किसी की मृत्यु तो नहीं हुई है. साइट से अधिकारी बराबर बता रहे थे कि किसी मौत को वे नहीं देख रहे. कुछ घायल अवश्य हैं. हमारे डॉक्टर भी साइट पर हैं. पर तबतक टीवी चैनलों की खबरें आने लगी थीं. उनके संवाददाताओं ने यात्री मारने प्रारम्भ कर दिये थे. हमारे अधिकारी कुछ घायलों की बात कर रहे थे और चैनल 8-10 मौतों की. अधिकारी और टीवी वाले दोनो घटनास्थल पर ही थे. दबाव में साइट से एक अधिकारी बेचारा बोल भी गया कि साहब मुझे तो कोई मौत नहीं दिख रही पर मेरे सामने टीवी चैनल वाला बता रहा है मौतें!

कानपुर पहुंच कर हम लोगों ने साइट का मुआयना किया. दुर्घटना बडी थी. पर तब तक दुर्घटना राहत की टीम दो लाइनों में से एक लाइन रिस्टोर कर चुकी थी और दुर्घटनाग्रस्त गाड़ी भी रवाना की जा चुकी थी. महाप्रबन्धक महोदय तीन अस्पतालों में भरती 31 घायलों को देखने चले गये. उनमें से कुल 7 गम्भीर घायल थे. शेष साधारण रूप से. तीनों अस्पतालों में रेलवे के लोग और डाक्टर उपस्थित थे. टीमें वरिठ अधिकारियों की लीड़रशिप में रिस्टोरेशन में लग गयीं. एक लाइन से हमारी मेल-एक्सप्रेस गाड़ियां 22 मिनट के अंतर पर आने-जाने लगीं. सामान्य अवस्था में यह अंतर 10-12 मिनट होता. लिहाजा कुल 16 गाड़ियां हमें दूसरे रास्तों से डायवर्ट भी करनी पड़ीं.

अभी तक दो कोच और एक इंजन टेकल हो चुके हैं साइट से मण्डल रेल प्रबन्धक का सन्देश हैं कि शेष एक इंजन और एक कोच 10 बजे तक उठ जायेंगे और दोपहर 1 बजे तक यातायात सामान्य हो जायेगा.

वह टीवी वालों ने मौतों को घायलों में ट्रांसफार्म कैसे किया होगा पता नहीं!


इधर के और उधर के लोग


इधर के बारे में मुझे दशकों से मालूम है. इधर माने रेलवे – मेरा कार्य क्षेत्र. रेलवे को मिनी भारत कहते हैं. उस मे बड़े मजे से काम चल रहा था/है. यह महज एक संयोग था कि हिन्दी ब्लॉगरी के लोगों का पता चला. अब चार महीने से उधर यानि हिन्दी ब्लॉगरी के विषय में भी काफी अन्दाज हो गया है.

इधर का व्यवहार कोड़/मैनुअल/नियम/कंवेंशन और रोजमर्रा के काम में आदान-प्रदान से ठीक-ठाक चल जाता है. इधर भी डिस्कॉर्डेण्ट नोट्स हैं पर बेसुरापन कम है. उधर तो गजब की केकोफोनी है! मेरा यह कहना रेलवे को बाहर से देखने वालों को शायद अटपटा लगे- क्योंकि बतौर उपभोक्ता लोगों की नजर दूसरे प्रकार की होती है. मैं यहां व्यवस्था के अन्दर से सभी समस्यायें और सीमायें जानते हुये यथा सम्भव निष्पक्ष लिखने का यत्न कर रहा हूं.

अनूप (मैं जानबूझ कर जी का प्रयोग हटा रहा हूं. आखिर अब तक स्पष्ट हो गया है कि कितनी आत्मीयता और सम्मान है तो जी का पुछल्ला बार-बार लिखने की जहमत क्यों उठाई जाये) ने अपने ब्लॉग पर चन्द्रशेखर (सिवान के शहीद) के विषय मे लिखते लिखते अचानक विषयांतर किया छ इंच छोटा करने की अलंकारिक धमकी के कुछ लोगों के प्रयोग पर. अजीब लगा यह विषयांतर. ऐसा विषयांतर तभी होता है जब कोई विचार किसी को हॉण्ट कर रहा (मथ रहा) हो. तब मुझे अपनी ब्लॉगरी और हिन्दी ब्लॉगरों के व्यवहार पर विचार करने और इधर (रेलवे) और उधर (हिन्दी ब्लॉगरी) के लोगों के तुलनात्मक विवेचन की सूझी.

मैं निम्न बिन्दु पाता हूं जो कहे जा सकें:

  • उत्कृष्टता के द्वीप रेलवे में भी हैं और ब्लॉगरी में भी. रेलवे कमतर नहीं है और यहां हमारे निर्णयों की आर्थिक वैल्यू भी है. हर शाम को अपने निर्णयों पर मनन करते हुये लोग यह संतोष कर सकते हैं कि अपनी तनख्वाह के बदले उन्होने अपने निर्णयों से रेलवे का इतना फायदा किया. जैसा मैने कहा यह संतोष सभी नहीं कर सकते. पर उत्कृष्टता के द्वीप तो कर ही सकते हैं. उसी प्रकार ब्लॉगरी में भी कुछ लोग अपने दिन भर के कृतित्व पर संतोष कर सकते हैं.
  • उदण्डता और उछृंखलता इधर कम है. लोग नियम/मैनुअल/कानून/आचरण के कंवेंशन से बन्धे हैं. लिहाज और सहनशीलता यहां ज्यादा है. संस्थान होने का लाभ है यह. उधर ब्लॉगरी में विश्व को कुछ भी परोस देने की अचानक मिली स्वतंत्रता जहां एक ओर उत्कृष्टता की प्रेरणा देती है वहीं उदण्डता और उछृंखलता की दमित वासनाओं को उत्प्रेरित भी करती है. इन वासनाओं के शमन में कुछ समय तो लगेगा ही. कुछ सीमा तक ये वासनायें मुझे भी नचाती रही हैं – नचा रही हैं.
  • सामाजिकता उधर ज्यादा है. इधर पद का लिहाज है, उधर यह काम सामाजिकता और संस्कार करते हैं. कई लोगों में मैने यह संस्कार पाये या समय के साथ उद्घाटित हुये.
  • अपने आप को, जो नहीं हैं वह प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति उधर ज्यादा है. ऐसा नहीं है कि वह नजर न आ जाता हो. हर एक व्यक्ति इण्टरनेट पर इतने चिन्ह छोड़ देता है कि पहचाना जा सके कि वह क्या है. देर-सबेर पता चल ही जाता है. इसलिये एग्जीबीशनिस्ट होना कोई फायदे का सौदा नहीं. पर हर एक व्यक्ति इससे इत्तिफाक नहीं रखता. रेलवे में भी यह शो-ऑफ करने की आदत कुछ लोगों में है यद्यपि अपेक्षाकृत कम है. इस मामले में रेलवे ज्यादा सरल समाज है. पर यह कोई बहुत बड़ा प्लस फैक्टर मैं नहीं मानूंगा इधर के पक्ष में.
  • श्रीश का कहना है कि ब्लॉगरी में भाई चारा ज्यादा है. असल में ब्लॉगरी का मूल तत्व ही सामाजिकता और लिंकेज पर आर्धारित है. वहां पर्याप्त वैचारिक आदान-प्रदान और दूसरों का पर्याप्त लिहाज सफलता के मूल तत्व हैं. पर शायद यह संक्रमण काल है. जिन लोगों ने पहले बहुत श्रम से बुनियाद रखी है वे अपनी वरिष्ठता खोना नहीं चाहते और नये लोग बिना श्रम के तकनीकी सहारे से रातोंरात प्रसिद्धि पा लेना चाहते हैं. इसका इलाज मात्र समय के पास है. रेलवे में विभागीय द्वन्द्व के बावजूद इंट्रा-रेलवे भाई-चारा ज्यादा है. जो बात मुझे ब्लॉगरी से विमुख करती है – वह इस मामले में इधर और उधर का अंतर है. अगर मेरे पास समय की कमी होगी तो मैं न केवल अपनी नौकरी के कर्तव्य के कारण, वरन इस फैक्टर के कारण भी उधर से अपने को असंपृक्त कर लूंगा.
  • उधर लोगों में एकाग्रता की कमी बहुत नजर आती है. छोटी-छोटी बातें लोगों को गहन सोच की बजाय ज्यादा रुचती हैं. किसी विषय पर आर-पार गहनता से सोचने की वृत्ति कम है. इधर रेलवे में हम समस्या को समझने, विश्लेषण करने और युक्तियुक्त समाधान ढ़ूंढ़ने में ज्यादा ईमानदारी दिखाते हैं.
  • यद्यपि उत्कृष्टता के द्वीप इधर भी हैं और उधर भी हैं पर अगर व्यक्ति के स्तर पर (संस्थान के पिरामिड का उपयोग न करना हो, तो) उत्कृष्टता के जितने अवसर ब्लॉगरी उपलब्ध कराती है, उतने शायद रेलवे न दे पाये. आपकी पुस्तकें, आपका कैमरा, आपकी सोच और आपका कम्प्यूटर – बस, इसके सहारे आप बड़े जादुई प्रयोग कर सकते हैं. कम से कम उत्कृष्टता की सम्भावनाओं को व्यक्ति के स्तर पर तलाशने में कोई विशेष सीमायें नहीं हैं. पहले के कागज-कलम के लेखन की बजाय वह ब्लॉगरी कहीं अधिक स्वतंत्रता और विविध आयाम प्रदान करती है.

कुल मिला कर अभी ब्लॉगरी के प्रयोग चलेंगे!


कुछ सफल और आत्म-मुग्ध (हिन्दी ब्लॉगर नहीं) लोग!


मेरा लोगों से अधिकतर इण्टरेक्शन ज्यादातर इण्टरकॉम-फोन-मीटिंग आदि में होता है. किसी से योजना बना कर, यत्न कर मिलना तो बहुत कम होता है. पर जो भी लोग मिलते है, किसी न किसी कोण से रोचक अवश्य होते हैं.

अधिकतर लोग मेरे मुख्यालय में सोमवार की महाप्रबन्धक महोदय की रिव्यू मीटिंग में मिलते हैं. ये होते हैं 20 से तीस साल तक की अवधि सिविल/इंजीनियरिंग सेवा में गुजारे हुये विभागाध्यक्ष लोग. इनमें से प्रत्येक व्यक्ति कम से कम 5000 रेल कर्मियों पिरामिड के शीर्ष पर होते हैं. सामान्य जन-अवधारणा से अलग, अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत से उपलब्धियां पाये और उन उपलब्धियों से एक ब्लॉगर की तरह ही आत्म-मुग्ध लोग हैं ये. मै इनमें से कुछ सज्जनों के विषय में बिना नाम लिये लिखने का यत्न करता हूं.

एक सज्जन हैं; जो सबसे ज्यादा इम्पेशेण्ट दीखते हैं. अगर उनके अपने विभाग की बात न हो तो दूसरों को समस्या का समाधान सुझाने में पीछे नहीं रहते. और कोई दूसरा भला आपकी बिन मांगी सलाह क्यों हजम करने लगा? परिणाम द्वन्द्व में होता है अक्सर. मजे की बात यह हुई की किसी ने मुझे बताया कि ये बम-ब्लास्टिया सज्जन परम-शांति नामक शीर्षक से एक ब्लॉग भी लिखते हैं. मैने ब्लॉग देखा. बिना चित्रों के, अंगेजी के एक ही फॉंण्ट में, ब्लैक एण्ड ह्वाइट रंग में था वह. फुरसतिया जी की पोस्टों से दूने लम्बे लेख थे उसमें. वास्तव में परम शांति थी. कौन पढ़े! एक पोस्ट पर एक कमेण्ट दिखा तो उसे पढ़ने का मन हुआ. वह निकला उन्ही के किसी कर्मचारी का जो न जाने किस मोटिव से ऐसी प्रशंसा कर रहा था जैसे कि वह पोस्ट-लेखन 10 कमाण्डमेण्ट्स के बाद सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज हो!

दूसरे सज्जन हैं जो वानप्रस्थ आश्रम की उम्र में चल रहे हैं पर कुंवारे हैं. कविता करते हैं. फाइलों पर अनिर्णय की बीमारी है उनके हस्ताक्षर लेना चक्रव्युह भेदने से कम नहीं है. एक बार पूंछा गया कि ये हस्ताक्षर क्यों नहीं करते? बढ़िया कमेण्ट था हस्ताक्षर करना आता होता तो निकाह न हो गया होता?

तीसरे सज्जन हैं जो सरनेम नहीं लगाते. पर जब भी किसी से पहली बार मिलते हैं तो येन-केन-प्रकरेण अपना जाति-गोत्र स्पष्ट कर देते हैं; जिससे कोई उन्हें अनुसूचित वर्ग का न समझ ले. विद्वान हैं, अत: जो भी पढ़ते हैं, उसे सन्दर्भ हो चाहे न हो, मीटिंग के दौरान बोल जरूर देते हैं. यानि ब्लॉगरों को जबरी लिखने की बीमारी होती है; उन्हे जबरी विद्वत्व प्रदर्शन की! कौन क्या कर लेगा!

चौथे सज्जन हैं जो हर चीज का तकनीकी हल तलाशते हैं. उनके घर में अच्छी खासी प्रयोगशाला और जंक मेटीरियल का कबाड़खाना है. रेलवे में गलत फंसे हैं. किसी कम्पनी में होते जो मेवरिक सोच को सिर माथे पर लेती तो उनकी वैल्यू हीरे की तरह होती. पर यहां तो जैसे ही वे कोई समाधान सुझाते हैं चार लोग तड़ से ये बताते हैं कि ये फलाने कोड/मैनुअल/रूल के तहद परमिसिबल नहीं है! फिर भी, मानाना पड़ेगा कि वे अधेड़ उम्र में भी (रेलवे जैसे ब्यूरोक्रेटिक सेट-अप में) इतने सतत विरोध के बावजूद तकनीकी इनोवेशन की उर्वरता खो नहीं बैठे!

ऊपर जो लिखा है उन सज्जनों के रोचक पक्ष है. उनकी दक्षता और मानवीय उत्कृष्टता के पक्ष अधिक महत्वपूर्ण हैं. पर उन पक्षों के लिये मुझे बहुत अधिक लिखना पड़ेगा. इसके अलावा कुछ सज्जन और हैं, जिन पर फिर कभी मन बना तो लिखूंगा.

गुज्जर आन्दोलन,रुकी ट्रेनें और तेल पिराई की गन्ध


परसों रात में मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल मुझे उठाता रहा. साहब, फलाने स्टेशन पर गुज्जरों की भीड़ तोड फोड कर रही है. साहब, फलने सैक्शन में उन्होने लेवल क्रासिंग गेट तोड दिये हैं. साहब, फलानी ग़ाड़ी अटकी हुयी है आगे भी दंगा है और पीछे के स्टेशन पर भी तोड़ फोड़ है…. मैं हूं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में पर समस्यायें हैं राजस्थान के बान्दीकुई-भरतपुर-अलवर-गंगापुर सिटी-बयाना के आस-पास की। यहाँ से गुजरने वाली ट्रेनों का कुछ भाग में परिचालन मेरे क्षेत्र में आता है. राजस्थान में गुज्जर अन्दोलन ट्रेन रनिंग को चौपट किये है. रेल यात्रियों की सुरक्षा और उन्हें यथा सम्भव गंतव्य तक ले जाना दायित्व है जिससे मेरा केन्द्रीय-कंट्रोल और मैं जूझ रहे हैं.

पिछली शाम होते-होते तो और भी भयानक हो गयी स्थिति. कोटा-मथुरा रेल खण्ड पर अनेक स्टेशनों पर तोड़-फोड़. अनेक जगहों पर पटरी से छेड़-छाड़. दो घण्टे बैठ कर लगभग 3 दर्जन गाड़ियों के मार्ग परिवर्तन/केंसिलेशन और अनेक खण्डों पर रात में कोई यातायात न चलाने के निर्णय लिये गये. अपेक्षा थी कि आज रात सोने को मिल जायेगा. जब उपद्रव ग्रस्त क्षेत्रों से गाड़ियां चलायेंगे ही नहीं तो व्यवधान क्या होगा?

पर नींद चौपट करने को क्या उपद्रव ही होना जरूरी है? रात के पौने तीन बजे फिर नींद खुल गयी. पड़ोस में झोपड़ीनुमा मकान में कच्ची घानी का तेल पिराई का प्लांट है. उस भाई ने आज रात में ही तेल पिराई शुरू कर दी है. हवा का रुख ऐसा है कि नाक में तेल पिराई की गन्ध नें नींद खोल दी है.

जिसका प्लांट है उसे मैं जानता नहीं. पुराने तेल के चीकट कनस्तरों और हाथ ठेलों के पास खड़े उसे देखा जरूर है. गन्दी सी नाभिदर्शना बनियान और धारीदार कच्छा पहने. मुंह में नीम की दतुअन. कोई सम्पन्न व्यक्ति नहीं लगता. नींद खुलने पर उसपर खीझ हो रही है. मेरे पास और कुछ करने को नहीं है. कम्प्यूटर खोल यह लिख रहा हूं. गुज्जर आन्दोलन और तेल पिराई वाला गड्ड-मड्ड हो रहे हैं विचारों में. हमारे राज नेताओं ने इस तेल पिरई वाले को भी आरक्षण की मलाई दे दी होती तो वह कच्ची घानी का प्लाण्ट घनी आबादी के बीच बने अपने मकान में तो नहीं लगाता. कमसे कम आज की रात तो मैं अपनी नींद का बैकलाग पूरा कर पाता.

आरक्षण की मलाई लेफ्ट-राइट-सेण्टर सब ओर बांट देनी चाहिये. लोग बाबूगिरी/चपरासी/अफसरी की लाइन में लगें और रात में नींद तो भंग न करें.